24/01/2026
कल्पना करो…
लंका की रणभूमि अब पूरी तरह शांत हो चुकी है।
युद्ध समाप्त हो गया है।
चारों तरफ मृत शरीर बिछी है,
गिद्ध आसमान में मंडरा रहे है।
वह रावण…
जो कभी इतना शक्तिशाली था कि देवता भी कांपते थे,
आज पराजित होकर धरती पर घायल लेटा है।
उसकी सांसें अब भारी हो चली हैं,
आंखों का तेज़ बुझ चुका है।
विजय श्रीराम की है…
लेकिन ध्यान देना,
राम के चेहरे पर गर्व नहीं है।
केवल शांति है… और करुणा से दूर खड़े होकर रावण की तरफ देख रहे है।
अचानक श्रीराम (शांत स्वर में) लक्ष्मण से कहते है :
हे लक्ष्मण…
रावण के पास जाओ।
लक्ष्मण (हैरान होकर):
हे प्रभु?
वह हमारा शत्रु है।
जिसने संसार को इतना दुख दिया…
उसके पास मुझे क्यों भेज रहे हैं?
श्रीराम (मुस्कुराते हुए) लक्ष्मण से कहते है
हाँ लक्ष्मण,
उसके कर्म गलत थे।
लेकिन यह मत भूलो—
वह एक महान विद्वान भी है।
वेदों का ज्ञाता,
महादेव का भक्त,
अद्भुत ज्ञान से भरपूर व्यक्ति।
ज्ञान की कीमत
किसी के गलत रास्ते पर जाने से कम नहीं हो जाती।
श्रीराम आगे कहते है कि
इंसान अहंकार, इच्छाओं और अति घमंड के कारण गिरता है,
लेकिन ज्ञान…
ज्ञान हमेशा अमूल्य रहता है।
जाओ।
उसे विद्यार्थी की तरह देखो,
विजेता की तरह नहीं।
उसके सिर के पास बैठो और सुनो।
यह उसका अंतिम क्षण है—
अब उसके शब्द अहंकार से मुक्त होंगे।
लक्ष्मण आगे बढ़ते हैं…
घायल रावण के पास पहुँचते हैं।
लेकिन वे उसके पैरों के पास खड़े हो जाते हैं।
रावण…
रावण तो लक्ष्मण की तरफ आंख उठाकर भी नहीं देखता।
लक्ष्मण क्रोधित होकर वापस श्री राम के पास चले जाते है, और कहते है
हे प्रभु श्री राम,
मैंने कहा था न के वो कुछ नहीं बोलेगा।
बहुत घमंडी है।
श्रीराम (शांत, गंभीर स्वर में):
लक्ष्मण…
तुम उनके पास खड़े थे।
जो विद्वान और गुणी होते हैं,
उनका ज्ञान
तभी बहता है
जब सामने वाला
विनम्र होकर
सीखने की भावना से बैठता है।
लक्ष्मण समझ जाते हैं।
वे वापस रावण के पास लौटते हैं…
रावण के सिर के पास जाकर बैठते हैं,
हाथ जोड़कर नम्रता से प्रणाम करते हैं।
अब…
रावण की आंखें खुलती हैं।
करुणा से भरी हुई आंखे है रावण की
रावण (धीमी, टूटती आवाज़ में) लक्ष्मण से कहते है
हे लक्ष्मण…
ध्यान से सुनो।
मुझे पता था
की क्या सही है और क्या गलत?
लेकिन…
मैं अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण नहीं रख सका।
मैंने अपने घमंड को
अपने ज्ञान से ऊपर रख दिया।
दशों दिशाओं को जीतने वाला रावण
आज इस अवस्था में पड़ा है।
मेरे पास ज्ञान की कमी नहीं थी…
कमी थी तो
अहंकार पर नियंत्रण की।
हे लक्ष्मण , प्रतिभा तुम्हें शक्तिशाली जरूर बनाती है,
ज्ञान तुम्हें बुद्धिमान जरूर बनाता है…
लेकिन अहंकार—
अहंकार तो दोनों को नष्ट कर देता है।
इतना कहकर…
रावण अपने प्राण त्याग देता है।
लक्ष्मण भाव-विभोर हो जाते हैं।
वे रावण के चरण स्पर्श करते हैं
और श्रीराम के पास लौटते हैं।
लक्ष्मण (विनम्र स्वर में) श्री राम से कहते है,
प्रभु,
आपने सत्य कहा।
रावण जैसा महान, प्रतिभाशाली राजा भी
अपने अहंकार के कारण
इस दशा में पहुँच गया कि आज उसके कुल का नाश तक हो गया है।
तो फिर
सामान्य व्यक्ति को तो
अपने अहंकार पर
आवश्य नियंत्रण रखना चाहिए।
दोस्तों
यही इस कथा की सबसे बड़ी सीख है—
ज्ञान और बुद्धि की कदर करनी चाहिए़
चाहे वह
दुश्मन से ही क्यों न मिले, जैसे लक्ष्मण से रावण से सिखा,
साथ ही ज्ञान और प्रतिभा
मन के नियंत्रण के बिना
व्यर्थ हैं।
अगर रावण समय रहते
अपने अहंकार पर विजय पा लेता,
तो आज
वह घर-घर में पूजित होता…
दशहरे में जलाया नहीं जाता।
आज के युवाओं के लिए संदेश यही है कि
श्री राम की तरह ज्ञान का सम्मान करना चाहिए, चाहे ज्ञान देने वाला, मित्र, शत्रु, भाई, शिक्षक, श्रीमती , श्रीमान, माता पिता जहां से भी ज्ञान मिले ले लेना चाहिए।
अहंकार को अपने भीतर जगह बनाने नहीं देना चाहिए
और याद रखो—
राम की तरह शांत रहें
लक्ष्मण की तरह जिज्ञासु रहें
और अहंकार के कारण
अपने आपको
रावण बनने मत दें ।