Omveer Singh-IBC-Bada Business

Omveer Singh-IBC-Bada Business I am a certified independent business consultant with "Bada Business" by Dr.Vivek Bindra Ji.

19/12/2023

चाहे कोई कैसा भी हो, लेकिन एक साधु को उसकी निंदा कभी नहीं करनी चाहिए।


19/12/2023

बिन उपदेश अचम्भ है, क्यों जिवत हैं प्राण।
भक्ति बिना कहाँ ठौर है, ये नर नाहीं पाषाण।।

19/12/2023

्ति_संदेश

19/12/2023

#हिन्दूसाहेबान_नहींसमझे_गीतावेदपुराणPart15 के आगे पढिए.....)
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#हिन्दूसाहेबान_नहींसमझे_गीतावेदपुराणPart16

"हिन्दू साहेबान! नहीं समझे गीता, वेद, पुराण"

वेदों वाली साधना यानि जो श्रीमद्भगवत गीता के रूप में द्वापर के अंत में बताई है, यह सत्ययुग के लगभग एक लाख वर्ष बीत जाने पर नष्ट हो गई थी यानि लुप्त हो गई थी। ऋषिजन व अन्य साधक मनमाना आचरण करने लग गए थे जो गीता अध्याय 16 श्लोक 23 में व्यर्थ कहा है।

प्रमाण :- राजा ऋषभ देव व मरीचि।

राजा नाभि राज के पुत्र राजा ऋषभ देव राज त्यागकर मनमाना आचरण करने लगे। एक वर्ष तक निराहार रहे। (भूखे रहे यानि बिल्कुल खाना नहीं खाया)। उनके पौत्र (Grandson) बाहुबली के पुत्र श्रेयांस ने उनका व्रत खुलवाया। फिर एक हजार वर्ष तक घोर तप किया। उसके पश्चात् धर्मदेशना (दीक्षा) देनी प्रारंभ की। प्रथम धर्मदेशना अपने पौत्र (भरत के पुत्र) मरीचि को दी। यही मरीचि वाली आत्मा जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर महावीर वर्धमान हुए। ऋषभदेव जी एक वर्ष निराहार रहे। फिर जंगल में जाकर एक हजार वर्ष तक तप किया। मरीचि ने वही साधना की जो उनके गुरू व दादा जी ऋषभ देव ने स्वयं की थी तथा वही मरीचि को बताई थी। गीता अध्याय 6 श्लोक 16 में कहा है कि हे भारत! योग यानि साधना न तो बिल्कुल न खाने वाले की, न अधिक खाने वाले की, न अधिक जागने वाले की, न अधिक सोने वाले की सफल होती है यानि निराहार रहने वाले की भक्ति व्यर्थ है। गीता अध्याय 17 श्लोक 5-6 में कहा है कि जो मन कल्पित घोर तप को तपते हैं। वे शरीर में स्थान-स्थान पर विराजमान शक्तियों व अन्य जीवों को, जो शरीर में जीवाणु हैं, उनको तथा मुझे क्रश करने वाले (पीडा देने वाले) हैं, उनको असुर स्वभाव के जान। (गीता अध्याय 17 श्लोक 5-6)

निष्कर्ष : श्री ऋषभदेव जी उसके पौत्र व शिष्य मरीचि ने भी ऐसी साधना की। जिस कारण से मरीचि के जीव ने महाबीर जैन तक के जीवन के बीच के जन्मों में जो लाभ व हानि हुई, वह संक्षिप्त में इस प्रकार है :-

कभी भीलों के राजा का जन्म जीया। कभी देवता बना, कभी स्वर्ग में गया, कभी नरक में गिरा। 60 करोड़ बार गधा बना, 30 करोड़ बार कुत्ता बना, 20 करोड़ बार बिल्ली का जीवन पाया। स्त्री बना, नपुसंक हजारों बार बना, फिर महाबीर वर्धमान (जैन) का जन्म हुआ। महाबीर वर्धमान ने 363 पाखंड मत चलाए, जिनका पालन वर्तमान में जैन समाज कर रहा है। अधिक जानकारी के लिए पढ़ें फोटोकॉपी में निम्न पुस्तक का आंशिक लेख :-

पुस्तक "आओ जैन धर्म को जाने" जिसके लेखक हैं प्रवीण कुमार जैन (एम. ए. शास्त्री) जम्बूद्वीप हस्तिनापुर, प्रकाशक श्रीमती सुनीता जैन जम्बूद्वीप-हस्तिनापुर- 250404 (मेरठ) उत्तर प्रदेश, मुद्रक धिनेन्द्र जैन, न्यू ऋषभ आफसेट प्रिन्टर्स मेरठ। कृपया पढ़ें इस पुस्तक के पृष्ठ नं. 293-296 की फोटोकॉपी।

आओ जैन धर्म को जानें

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विशेष प्रकरण

प्रश्न ३३४३- श्री महावीर भगवान के अन्य कौन-कौन से नाम है?

उत्तर- अन्य पांच नाम हैं-१. वीर २. अतिवीर ३. सन्मति ४. महावीर ५. एवं वर्धमान ।

प्रश्न ३३४४- श्री महावीर भगवान के पाँच नामों को बताने वाली पद्य बताइये ? उत्तर - श्री वीर महाअतिवीर सन्मति नायक हो।

जय वर्धमान गुणधीर सन्मति दायक हों। प्रश्न ३३४५ श्री महावीर भगवान के बचपन में कौन-कौन से नाम थे ?

उत्तर-वीर एवं वर्धमान ।

प्रश्न ३३४६- श्री महावीर भगवान का सन्मति नाम कैसे पड़ा ?

उत्तर-एक समय जब महावीर भगवान पालने में झूल रहे थे संजय विजय चारण ऋषियों को तत्वों में कुछ शंका थी भगवान के दर्शन करते ही उनकी शंका दूर हो गई अत उन्होने उनका नाम सन्मति रखा।

प्रश्न ३३४७-श्री महावीर भगवान के बचपन का नाम वर्धमान कैसे पड़ा ? उत्तर-श्री महावीर भगवान को बचपन में शुक्ल पक्ष के चन्द्रमा के समान बढ़ते हुए देखकर इन्द्र ने उनका नाम वर्धमान रखा।

प्रश्न ३३४८- श्री महावीर भगवान का नाम महावीर कैसे पड़ा ?

उत्तर- एक बार महावीर भगवान बच्चों के साथ खेल रहे थे संगम नामक देव नाग का रूप बनाकर पेड़ से लिपट गया सारे बच्चे भाग गये लेकिन महावीर भगवान ने उसके फन पर चढ़ कर क्रीड़ा की। भक्तिवश उस देव ने प्रकट होकर उनका नाम महावीर रखा।

प्रश्न ३३४९ - श्री महावीर भगवान का अतिवीर नाम कैसे पड़ा ?

उत्तर-राजा श्री सिद्धार्थ के पागल हाथी को वश में करने से उनका नाम अतिवीर पड़ा।

प्रश्न ३३५० श्री महावीर भगवान का महतिवीर नाम कैसे पड़ा ?

उत्तर- भगवान श्री महावीर उज्जैयनी नगरी अतिमुक्तक नाम शमशान में प्रतिमायोग से विराजमान थे महादेव नामक रुद्र ने उपसर्ग करके परीक्षा की भगवान अपने ध्यान से चलायमान नहीं हुए तब उसने उनका मह-तिवीर नाम रखा।
प्रश्न ३३५१ - श्री महावीर भगवान के जीवन का कथन कहाँ से प्रारम्भ होता है ?

उत्तर- पुरुरवा नामक भील की पर्याय से। प्रश्न ३३५२-पुरुरवा भील कौन था और उसने क्या किया ?

उत्तर-पुष्कलावती देश की पुंडरीकिणी नगरी में वह भीलों का राजा था उसने सागर सेन मुनिराज से मद्यमांस मधु का त्याग वृत लिया था जिसे जीवन पर्यंत पालन किया।

प्रश्न ३३५३- श्री महावीर भगवान का जीव पुरुरवा भील की पर्याय से कहाँ गया ?

उत्तर-पहले सौधर्म स्वर्ग में एक सागर की आयु वाला देव हुआ।

प्रश्न ३३५४- पहले स्वर्ग के बाद श्री महावीर भगवान का जीव किस पर्याय में गया ?

उत्तर-भरत चक्रवर्ती की रानी अनंतमती से मारीचि नामक ज्येष्ठ पुत्र हुआ। प्रश्न ३३५५- मारीचि की पर्याय से महावीर भगवान का जीव किस पर्याय में गया ?

उत्तर-ब्रह्म स्वर्ग में देव हुआ।

प्रश्न ३३५६- ब्रहम स्वर्ग के बाद श्री महावीर भगवान का जीव किस पर्याय में गया ? उत्तर- अयोध्या नगरी में कपिल ब्राहमण की काली स्त्री से जटिल नाम का पुत्र हुआ।

प्रश्न ३३५७-जटिल की पर्याय से श्री महावीर भगवान का जीव किस पर्याय में गया ?

उत्तर-सौधर्म स्वर्ग में एक सागर की आयु वाला देव हुआ।

प्रश्न ३३५८- सौधर्म स्वर्ग से निकलकर श्री महावीर भगवान का जीव किस पर्याय में गया ?

उत्तर- इसी भरत क्षेत्र में सूतिका नामक गाँव में अग्निभूत ब्राहमण की गौतम स्त्री से अग्निसह नामक पुत्र।

प्रश्न ३३५९- अग्निसह की पर्याय से श्री महावीर भगवान का जीव किस पर्याय में गया ?

उत्तर-स्वर्ग में गया।

प्रश्न ३३६०- स्वर्ग की पर्याय से श्री महावीर भगवान का जीव किस पर्याय में गया ? उत्तर-भरत क्षेत्र के मन्दिर नामक ग्रम में गौतम ब्राहमण की कौशिकी पत्नी से अग्निमित्र नाम का पुत्र हुआ।

प्रश्न ३३६१ - अग्निमित्र की पर्याय से श्री महावीर भगवान का जीव कहाँ गया। उत्तर-माहेन्द्र स्वर्ग में।

प्रश्न ३३६२- माहेन्द्र स्वर्ग से श्री महावीर भगवान का जीव कहाँ गया ?
उत्तर- सिंहगिरि पर्वत पर सिंह हुआ पुनः प्रथम नरक में गया।

आओ जैन धर्म को जानें

प्रश्न ३३७३- प्रथम नरक से निकल कर श्री भगवान महावीर का जीव कहाँ गया ?

उत्तर- हिमवान पर्वत शिखर पर सिंह हुआ । यहाँ पर उसे अर्जितजय एवं अमित गुण नामक मुनिराज ने संबोधित किया।

प्रश्न ३३७४- सिंह का जीव किस पर्याय में गया ?

उत्तर-सौधर्म स्वर्ग में सिंह केतु नाम का देव हुआ। प्रश्न ३३७५- सिंह केतू का जीव किस पर्याय में गया ?

उत्तर-कनक प्रभ नगर में राजा नकपुंख विद्याधर और रानी कनकमाला से कन्कोज्वल नाम का पुत्र हुआ।

प्रश्न ३३७६-कनकोज्वल आगे किस पर्याय में गया ?

उत्तर-सांतवे स्वर्ग में देव हुआ।

प्रश्न ३३७७-सातवें स्वर्ग से श्री भगवान महावीर का जीव कहाँ गया?

उत्तर-अयोध्या नगरी में राजा वज्रसेन की शीलवती रानी से हरिषेण नाम का पुत्र ।

प्रश्न ३३७८- हरिषेण का जीव आगे किस पर्याय में गया ?

उत्तर-महाशुकु स्वर्ग में देव हुआ।

प्रश्न ३३७९ - महाशुकु स्वर्ग से श्री महावीर भगवान का जीव कहाँ गया ?

उत्तर-धातकी खंड की पूर्व विदेह की पुष्कलावती देश की पुंडारीकिणी नगरी

में राजा सुमित्र रानी मनोरमा से प्रिय मित्र नाम का चक्रवर्ती हुआ। प्रश्न ३३८०-प्रिय मित्र नाम का चक्रवर्ती आगे किस पर्याय में गया ?

उत्तर-सहस्वार स्वर्ग में देव हुआ।

प्रश्न ३३८१- सहस्त्रार स्वर्ग से श्री महावीर भगवान का जीव किस पर्याय में गया ?

उत्तर-जम्बूद्वीप के छत्रपुर नगर में नंदीवर्धन राजा की वीरमति रानी से नंद नाम का पुत्र हुआ।

प्रश्न ३३८२-नंद का जीव आगे किस पर्याय में गया ?

उत्तर-पुष्योत्तर विमान में देव हुआ तनंनतर २४वें तीर्थंकर श्री महावीर भगवान

हुए।

प्रश्न ३३८३-श्री महावीर भगवान के जीव ने कितने पाखंडमत चलाये ? उत्तर-तीन सौ तेरसठ पाखंड मत चलाये।

ऊपर लगी फोटोकॉपी पुस्तक "आओ जैन धर्म को जानें" की हैं।

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18/12/2023

#हिन्दूसाहेबान_नहींसमझे_गीतावेदपुराणPart14 के आगे पढिए.....)
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#हिन्दूसाहेबान_नहींसमझे_गीतावेदपुराणPart15

जैन धर्म का विकास-इतिहास

तीर्थकर ऋषभदेव की जीवन घटनाएँ: तीर्थकर ऋषभदेव अंतिम कुलकर नाभिराज के पुत्र थे। उनकी माता मरूदेवी थी। वे इक्ष्वाकूवंशी नाभिराज अयोध्या के एक लोकप्रिय राजा थे। तरूण होने पर नाभिराज ने ऋषभदेव का विवाह सुनंदा और सुमंगला से कर दिया। सुनंदा ने तेजस्वी पुत्र बाहुबली और पुत्री सुंदरी को जन्म दिया और सुमंगला ने भरत सहित 99 पुत्रों और ब्राह्मी पुत्री को जन्म दिया।

समय आने पर ऋषभदेव ने भरत को अयोध्या का, बाहुबली को तक्षशिला का और शेष युवराजों को उनकी योग्यतानुसार राज्य सौंपकर संसार त्याग दिया और दीक्षा लेकर साधना में लीन हो गये। साधना काल में पाणि पात्री ऋषभदेव एक वर्ष तक निराहार रहे। बाद में बाहुबली के पौत्र श्रेयांस कुमार ने इक्षुरस देकर उनकी इस निराहार-वृत्ति को तोड़ा। लगातार एक हजार वर्ष तक तपस्या करने वाले मुनि ऋषभदेव ने अंत में केवलज्ञान प्राप्त किया

और धर्मदेशना प्रारंभ की। प्रथम धर्मदेशना भरत के पुत्र मरीचि को दी जो बाद में चौबीसवें तीर्थकर महावीर बने। प्रमाण के लिए पेश है जैन संस्कृति कोष के मुख्य पृष्ठ तथा पृष्ठ 175- 177 की फोटोकॉपी

Encyclopaedia of Jainism

जैन संस्कृति कोथ
प्रथम भाग
जैन इतिहास, संस्कृति, कला एवं पुरातत्त्व प्रो० भागचन्द्र जैन 'भास्कर'
जैन परम्परा विकास, इतिहास और जिनशासन

53

175

सम्यग्ज्ञान और ब्रह्मचर्य, वीतराग, परिमोक्ष, यति आदि शब्द उस समय के दिगम्बर यति मुनियों का आभास दे रहे हैं।

रामायण में श्रमण शब्द का प्रयोग अनेक बार हुआ है जो स्पष्ट रूप से जैनों के लिए दिखाई देता है (रामा. ४.१८.३३; २.६३.४८, २.६३.५)। महाभारत (शान्तिपर्व. ३४.७) में ही शालावृक नामक जैन यति के ६६००० अनुयायियों को इन्द्र द्वारा मारे जाने का उल्लेख है। उस संघ में से मात्र तीन यति बच गये थे-- पृथुरश्मि, वृहद्गिरा और रायोवाज। उसी समय एक लौक्य बृहस्पति जिन यति का भी उल्लेख है। यहां यह उल्लेखनीय है कि इस काल तक वातरशना जैन मुनियों का उल्लेख "यति" रूप में भी होने लगा था।

पुराणों में कहा गया है कि बारहवें देवासुर संग्राम के बाद "नहुषानुज" रजि देवेन्द्र हुआ। इन्द्र रजि को पितृतुल्य मानता था। रजिपुत्रों को यह सह्य नहीं हुआ। दोनों के बीच संघर्ष चला। इन्द्र ने लौक्य बृहस्पति के माध्यम से रजि को जिनधर्म में दीक्षित किया। इस घटना का उल्लेख हरिवंश पुराण (१.२८.३०-३२), मत्स्यपुराण (२४.४२- ४८), विष्णुपुराण (३.१७.४१-४२: ३.१८.७.१२) और देवी भागवत पुराण (४.१३.५२-५६) में भी आया है। विष्णुपुराण में अर्हत् को महामोह और नग्न बताया गया है।

महाभारत के कपिलस्यूयरश्मि संवाद (शान्तिपर्व, २६८-२७०) से उक्त घटना की पुष्टि होती है। यहां कपिल संज्ञक विद्वान जैनधर्म के निवृत्ति मार्ग का उपदेश देते हुए दिखाई देते हैं। वहीं इन्द्र के हिंसामय यज्ञ की चर्चा हुई और वसु द्वारा उसके समर्थ का उल्लेख मिला। बाद में अहिंसा धर्म का प्रचारक भी विष्णु को माना गया। इसी संदर्भ में वृहस्पति अंगिरस, वसु का अहिंसामय यज्ञ (महाभारत ३३७ शान्तिपर्व.) का उल्लेख मिलता है (तीर्थकर का इतिहास-डॉ० कुंवरलाल जैन, दिल्ली १९९३)। इस तरह ऋषभदेव के विषय में निष्कर्ष रूप कह सकते हैं--

१) ऋषभ के पौत्र मरीचि (भरत के पुत्र) को पुराण में वैदिक धर्म का प्रवर्तक माना गया है। यही मरीचि जैन परम्परा में आगे चलकर महावीर वर्धमान बना।
२) प्रवृत्ति से निवृत्ति की ओर दृष्टि थी। निवृत्ति लक्ष्य रहता था। जैनों ने निवृत्ति प्रधान बना लिया और वैदिको ने प्रवृत्ति में अधिक समरसता दिखाई।
३) निवृत्ति का चरम लक्ष्य वीतरागत्व था जिसे दिगम्बरों ने बनाये रखा। श्वे. परम्परा प्रवृत्ति के प्रति उन्मुख रही।
४) जीवन के ये दो मार्ग हैं जो वैदिक और श्रमण संस्कृति के प्रतीक हैं। ये दोनों एक दूसरे के परिपूरक हैं।

जैन संस्कृति कोश: जैन इतिहास, कला और पुरातत्त्व

५) दोनों परम्पराओं में आदान-प्रदान भी बना रहा। जैन पुराणों में वर्णित क्षत्रिय वसु (उपरिचर) के आख्यान से स्पष्ट है कि उसने हिंसामय यज्ञ का समर्थन किया और उसी तरह वैदिक ब्राह्मण नारद ने हिंसा का विरोध किया तथा अन्य ब्राह्मण ऋषि पर्वत ने हिंसा का समर्थन किया।

६) आर्य वस्तुतः किसी जाति का नाम नहीं था। वह तो एक विशेषण था।

पौराणिक परम्परा में प्रतिबिम्बित तीर्थकर ऋषभदेव की परम्परा को जैन परम्परा के साथ रखा जा सकता है। जैन पुराणकारों में आचार्य जिनसेन एक सशक्त हस्ताक्षर है। उन्होंने आदिपुराण के द्वितीय अध्याय में तीर्थंकर ऋषभदेव को प्रणामकर उनकी परम्परा का आख्यान किया है और इस परम्परा को तीर्थकर महावीर और उनके गणधर गौतम स्वामी, उनसे प्रश्नकर्ता श्रेणिक और श्रेणिक की प्रशंसा करने वाले ऋषिगणों से जोड़ा है। ऋषिगण ने जो गणधर स्तोत्र कहा है उसमें और उसके पूर्व 'इमे तपोधना दीप्ततवसो वातवल्कलाः (२.१८) 'तथा मुनयो वातरशनाः' (२.६४) जैसे पद्यों का उल्लेख किया जा सकता है जो वेदों और पुराणों में प्रयुक्त हुए हैं। ये पद निस्सन्देह हमारी जैन परम्परा को समाहित किये हुए हैं। इस सन्दर्भ में आदिपुराण का विशेष अध्ययन किया जाना अपेक्षित है।

२. जैनधर्म का विकास-इतिहास

पिछले अध्याय में हमने जैनधर्म की मूल विशेषताओं की ओर संकेत करते हुए उसके उद्भव का उल्लेख किया था और उसके आद्य तीर्थंकर ऋषभदेव के योगदान की चर्चा की थी। यहां हम संक्षेप में जैनधर्म के विकासात्मक इतिहास की चर्चा करेंगे। इस क्रम में सर्वप्रथम हम तीर्थंकर ऋषभदेव और अरिष्टनेमि के जीवन वृत्तान्त पर दृष्टिपात कर लें।

तीर्थंकर ऋषभदेव की जीवन घटनाएँ

तीर्थङ्कर ऋषभदेव अन्तिम कुलकर नाभिराज के पुत्र थे। उनकी माता मरुदेवी थीं। वे ईक्ष्वाकुवंशी नाभिराज अयोध्या के एक लोकप्रिय राजा थे। तरुण होने पर नाभिराज ने ऋषभदेव का विवाह सुनन्दा और सुमंगला से कर दिया। सुनन्दा ने तेजस्वी पुत्र बाहुबली और पुत्री सुन्दरी को जन्म दिया और सुमंगला ने भरत सहित ९९ पुत्रों और ब्राह्मी पुत्री को जन्म दिया।

समय आने पर ऋषभदेव ने भरत को अयोध्या का, बाहुबली को तक्षशिला का और शेष युवराजों को उनकी योग्यतानुसार राज्य सौंपकर संसार त्याग दिया और दीक्षा लेकर साधना में लीन हो गये। साधनाकाल में पाणिपात्री ऋषभदेव एक वर्ष तक निराहार रहे। बाद में बाहुबली के पौत्र श्रेयांस कुमार ने इक्षुरस देकर उनकी इस जैन परम्परा विकास, इतिहास और जिनशासन निराहारवृत्ति को तोड़ा। लगातार एक हजार वर्ष तक तपस्या करनेवाले मुनि ऋषभदेव ने अन्त में केवलज्ञान प्राप्त किया और धर्मदेशना प्रारम्भ की। प्रथम धर्मदेशना भरत के पुत्र मारीचि को दी, जो बाद में चौबीसवें तीर्थङ्कर महावीर बने। इसी तरह ब्राह्मी और सुन्दरी ने भी तीर्थङ्कर ऋषभदेव से दीक्षा ले ली। भरत के अन्य ९८ भाइयों ने भी जिन दीक्षा लेकर अपना आत्मकल्याण किया।

इधर भरत चक्रवर्ती में सम्राट बनने की प्रबल आकांक्षा जागी। उन्होंने आत्मसमर्पित होने के लिए सभी नरेशों के पास दूत भेजे। महाबली बाहुबली को छोड़कर सभी नरेशों ने भरत का आधिपत्य स्वीकार कर लिया। व्यर्थ में प्राणीहिंसा न हो इस दृष्टि से दोनों भाइयों के बीच जलयुद्ध, दृष्टियुद्ध और मल्लयुद्ध हुआ। उनमें बाहुबली विजयी हुए। भरत ने अपनी पराजय से क्रुद्ध होकर बाहुबली के ऊपर चक्र चलाया, पर वह बाहुबली का घात किये बिना ही वापिस आ गया। सगोत्रज और चरम शरीरी का वह वध नहीं करता। यह देखकर भरत लज्जित हुए तथा बाहुबली को साम्राज्य-लिप्सा से ग्लानि हुई। फलतः उन्होंने राज्य त्यागकर जिन दीक्षा ले ली और कठोर तप किया। बाद में केवलज्ञान प्राप्त कर निर्वाण भी प्राप्त किया।

भरत-बाहुबली युद्ध की ये सारी घटनायें पोदनपुर में हुई थीं जिसकी अवस्थिति आज भी विवादास्पद बनी हुई है। अधिक सम्भावना यही है कि यह पोदनपुर उत्तर में होना चाहिए।

जहाँ तक आदिनाथ ऋषभदेव के सांस्कृतिक अवदान का प्रश्न है, वे एक संस्कृति विशेष के पुरोधा तो थे ही, साथ ही उन्होंने मानव को सामाजिकता का पाठ भी पढ़ाया। भोगभूमि से कर्मभूमि की ओर आने का समय एक संक्रान्ति काल था और संक्रान्ति काल के वातावरण को अपने अनुरूप बनाना सरल नहीं था। ऋषभदेव ने इस दुरूह कार्य को सरल बना दिया। असि, मसि, कृषि, वाणिज्य-विद्या और शिल्प की शिक्षा के साथ ही चौसठ या बहत्तर कलाओं का अध्ययन भी उनके योगदान के साथ जुड़ा हुआ है। समाज ने इन सारी कलाओं को समरसतापूर्वक आत्मसात किया और परस्परोपग्रहो जीवानाम् के आधार पर अहिंसा और अपरिग्रह की चेतना को नया स्वर दिया। अस्तित्व के प्रश्न को जितनी सुदृढ़ता के साथ यहाँ समाधानित किया गया है वह अपने आप में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। सह-अस्तित्व और सहभागिता पर आधारित जैनधर्म को प्रस्थापित करने का श्रेय तीर्थङ्कर ऋषभदेव को ही जाता हैं। उनके द्वारा प्रवेदित सूत्र ही उत्तरकालीन जैनधर्म की आधारशिला रहे है। दण्ड-व्यवस्था, राज- व्यवस्था, विवाह-प्रथा, व्यवसाय, खाद्य समस्या का हल, शिक्षा, कला और शिल्प आदि क्षेत्रों में उन्होंने नयी व्यवस्था को जन्म दिया।

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18/12/2023


17/12/2023

#श्रीमद्भगवद्गीता_का_यथार्थ_ज्ञान
गीता अध्याय 15 श्लोक 4 के अनुसार वह लोक कौन सा हैं जहां गए हुए साधक लौटकर इस संसार में नहीं आती अर्थात उनका पूर्ण मोक्ष हो जाता है?

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17/12/2023

#श्रीमद्भगवद्गीता_का_यथार्थ_ज्ञान
पवित्र गीता जी अध्याय 17 के श्लोक 23 में छिपे ओम तत्सत मंत्र की रहस्य को जानें।
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