18/12/2023
#हिन्दूसाहेबान_नहींसमझे_गीतावेदपुराणPart14 के आगे पढिए.....)
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#हिन्दूसाहेबान_नहींसमझे_गीतावेदपुराणPart15
जैन धर्म का विकास-इतिहास
तीर्थकर ऋषभदेव की जीवन घटनाएँ: तीर्थकर ऋषभदेव अंतिम कुलकर नाभिराज के पुत्र थे। उनकी माता मरूदेवी थी। वे इक्ष्वाकूवंशी नाभिराज अयोध्या के एक लोकप्रिय राजा थे। तरूण होने पर नाभिराज ने ऋषभदेव का विवाह सुनंदा और सुमंगला से कर दिया। सुनंदा ने तेजस्वी पुत्र बाहुबली और पुत्री सुंदरी को जन्म दिया और सुमंगला ने भरत सहित 99 पुत्रों और ब्राह्मी पुत्री को जन्म दिया।
समय आने पर ऋषभदेव ने भरत को अयोध्या का, बाहुबली को तक्षशिला का और शेष युवराजों को उनकी योग्यतानुसार राज्य सौंपकर संसार त्याग दिया और दीक्षा लेकर साधना में लीन हो गये। साधना काल में पाणि पात्री ऋषभदेव एक वर्ष तक निराहार रहे। बाद में बाहुबली के पौत्र श्रेयांस कुमार ने इक्षुरस देकर उनकी इस निराहार-वृत्ति को तोड़ा। लगातार एक हजार वर्ष तक तपस्या करने वाले मुनि ऋषभदेव ने अंत में केवलज्ञान प्राप्त किया
और धर्मदेशना प्रारंभ की। प्रथम धर्मदेशना भरत के पुत्र मरीचि को दी जो बाद में चौबीसवें तीर्थकर महावीर बने। प्रमाण के लिए पेश है जैन संस्कृति कोष के मुख्य पृष्ठ तथा पृष्ठ 175- 177 की फोटोकॉपी
Encyclopaedia of Jainism
जैन संस्कृति कोथ
प्रथम भाग
जैन इतिहास, संस्कृति, कला एवं पुरातत्त्व प्रो० भागचन्द्र जैन 'भास्कर'
जैन परम्परा विकास, इतिहास और जिनशासन
53
175
सम्यग्ज्ञान और ब्रह्मचर्य, वीतराग, परिमोक्ष, यति आदि शब्द उस समय के दिगम्बर यति मुनियों का आभास दे रहे हैं।
रामायण में श्रमण शब्द का प्रयोग अनेक बार हुआ है जो स्पष्ट रूप से जैनों के लिए दिखाई देता है (रामा. ४.१८.३३; २.६३.४८, २.६३.५)। महाभारत (शान्तिपर्व. ३४.७) में ही शालावृक नामक जैन यति के ६६००० अनुयायियों को इन्द्र द्वारा मारे जाने का उल्लेख है। उस संघ में से मात्र तीन यति बच गये थे-- पृथुरश्मि, वृहद्गिरा और रायोवाज। उसी समय एक लौक्य बृहस्पति जिन यति का भी उल्लेख है। यहां यह उल्लेखनीय है कि इस काल तक वातरशना जैन मुनियों का उल्लेख "यति" रूप में भी होने लगा था।
पुराणों में कहा गया है कि बारहवें देवासुर संग्राम के बाद "नहुषानुज" रजि देवेन्द्र हुआ। इन्द्र रजि को पितृतुल्य मानता था। रजिपुत्रों को यह सह्य नहीं हुआ। दोनों के बीच संघर्ष चला। इन्द्र ने लौक्य बृहस्पति के माध्यम से रजि को जिनधर्म में दीक्षित किया। इस घटना का उल्लेख हरिवंश पुराण (१.२८.३०-३२), मत्स्यपुराण (२४.४२- ४८), विष्णुपुराण (३.१७.४१-४२: ३.१८.७.१२) और देवी भागवत पुराण (४.१३.५२-५६) में भी आया है। विष्णुपुराण में अर्हत् को महामोह और नग्न बताया गया है।
महाभारत के कपिलस्यूयरश्मि संवाद (शान्तिपर्व, २६८-२७०) से उक्त घटना की पुष्टि होती है। यहां कपिल संज्ञक विद्वान जैनधर्म के निवृत्ति मार्ग का उपदेश देते हुए दिखाई देते हैं। वहीं इन्द्र के हिंसामय यज्ञ की चर्चा हुई और वसु द्वारा उसके समर्थ का उल्लेख मिला। बाद में अहिंसा धर्म का प्रचारक भी विष्णु को माना गया। इसी संदर्भ में वृहस्पति अंगिरस, वसु का अहिंसामय यज्ञ (महाभारत ३३७ शान्तिपर्व.) का उल्लेख मिलता है (तीर्थकर का इतिहास-डॉ० कुंवरलाल जैन, दिल्ली १९९३)। इस तरह ऋषभदेव के विषय में निष्कर्ष रूप कह सकते हैं--
१) ऋषभ के पौत्र मरीचि (भरत के पुत्र) को पुराण में वैदिक धर्म का प्रवर्तक माना गया है। यही मरीचि जैन परम्परा में आगे चलकर महावीर वर्धमान बना।
२) प्रवृत्ति से निवृत्ति की ओर दृष्टि थी। निवृत्ति लक्ष्य रहता था। जैनों ने निवृत्ति प्रधान बना लिया और वैदिको ने प्रवृत्ति में अधिक समरसता दिखाई।
३) निवृत्ति का चरम लक्ष्य वीतरागत्व था जिसे दिगम्बरों ने बनाये रखा। श्वे. परम्परा प्रवृत्ति के प्रति उन्मुख रही।
४) जीवन के ये दो मार्ग हैं जो वैदिक और श्रमण संस्कृति के प्रतीक हैं। ये दोनों एक दूसरे के परिपूरक हैं।
जैन संस्कृति कोश: जैन इतिहास, कला और पुरातत्त्व
५) दोनों परम्पराओं में आदान-प्रदान भी बना रहा। जैन पुराणों में वर्णित क्षत्रिय वसु (उपरिचर) के आख्यान से स्पष्ट है कि उसने हिंसामय यज्ञ का समर्थन किया और उसी तरह वैदिक ब्राह्मण नारद ने हिंसा का विरोध किया तथा अन्य ब्राह्मण ऋषि पर्वत ने हिंसा का समर्थन किया।
६) आर्य वस्तुतः किसी जाति का नाम नहीं था। वह तो एक विशेषण था।
पौराणिक परम्परा में प्रतिबिम्बित तीर्थकर ऋषभदेव की परम्परा को जैन परम्परा के साथ रखा जा सकता है। जैन पुराणकारों में आचार्य जिनसेन एक सशक्त हस्ताक्षर है। उन्होंने आदिपुराण के द्वितीय अध्याय में तीर्थंकर ऋषभदेव को प्रणामकर उनकी परम्परा का आख्यान किया है और इस परम्परा को तीर्थकर महावीर और उनके गणधर गौतम स्वामी, उनसे प्रश्नकर्ता श्रेणिक और श्रेणिक की प्रशंसा करने वाले ऋषिगणों से जोड़ा है। ऋषिगण ने जो गणधर स्तोत्र कहा है उसमें और उसके पूर्व 'इमे तपोधना दीप्ततवसो वातवल्कलाः (२.१८) 'तथा मुनयो वातरशनाः' (२.६४) जैसे पद्यों का उल्लेख किया जा सकता है जो वेदों और पुराणों में प्रयुक्त हुए हैं। ये पद निस्सन्देह हमारी जैन परम्परा को समाहित किये हुए हैं। इस सन्दर्भ में आदिपुराण का विशेष अध्ययन किया जाना अपेक्षित है।
२. जैनधर्म का विकास-इतिहास
पिछले अध्याय में हमने जैनधर्म की मूल विशेषताओं की ओर संकेत करते हुए उसके उद्भव का उल्लेख किया था और उसके आद्य तीर्थंकर ऋषभदेव के योगदान की चर्चा की थी। यहां हम संक्षेप में जैनधर्म के विकासात्मक इतिहास की चर्चा करेंगे। इस क्रम में सर्वप्रथम हम तीर्थंकर ऋषभदेव और अरिष्टनेमि के जीवन वृत्तान्त पर दृष्टिपात कर लें।
तीर्थंकर ऋषभदेव की जीवन घटनाएँ
तीर्थङ्कर ऋषभदेव अन्तिम कुलकर नाभिराज के पुत्र थे। उनकी माता मरुदेवी थीं। वे ईक्ष्वाकुवंशी नाभिराज अयोध्या के एक लोकप्रिय राजा थे। तरुण होने पर नाभिराज ने ऋषभदेव का विवाह सुनन्दा और सुमंगला से कर दिया। सुनन्दा ने तेजस्वी पुत्र बाहुबली और पुत्री सुन्दरी को जन्म दिया और सुमंगला ने भरत सहित ९९ पुत्रों और ब्राह्मी पुत्री को जन्म दिया।
समय आने पर ऋषभदेव ने भरत को अयोध्या का, बाहुबली को तक्षशिला का और शेष युवराजों को उनकी योग्यतानुसार राज्य सौंपकर संसार त्याग दिया और दीक्षा लेकर साधना में लीन हो गये। साधनाकाल में पाणिपात्री ऋषभदेव एक वर्ष तक निराहार रहे। बाद में बाहुबली के पौत्र श्रेयांस कुमार ने इक्षुरस देकर उनकी इस जैन परम्परा विकास, इतिहास और जिनशासन निराहारवृत्ति को तोड़ा। लगातार एक हजार वर्ष तक तपस्या करनेवाले मुनि ऋषभदेव ने अन्त में केवलज्ञान प्राप्त किया और धर्मदेशना प्रारम्भ की। प्रथम धर्मदेशना भरत के पुत्र मारीचि को दी, जो बाद में चौबीसवें तीर्थङ्कर महावीर बने। इसी तरह ब्राह्मी और सुन्दरी ने भी तीर्थङ्कर ऋषभदेव से दीक्षा ले ली। भरत के अन्य ९८ भाइयों ने भी जिन दीक्षा लेकर अपना आत्मकल्याण किया।
इधर भरत चक्रवर्ती में सम्राट बनने की प्रबल आकांक्षा जागी। उन्होंने आत्मसमर्पित होने के लिए सभी नरेशों के पास दूत भेजे। महाबली बाहुबली को छोड़कर सभी नरेशों ने भरत का आधिपत्य स्वीकार कर लिया। व्यर्थ में प्राणीहिंसा न हो इस दृष्टि से दोनों भाइयों के बीच जलयुद्ध, दृष्टियुद्ध और मल्लयुद्ध हुआ। उनमें बाहुबली विजयी हुए। भरत ने अपनी पराजय से क्रुद्ध होकर बाहुबली के ऊपर चक्र चलाया, पर वह बाहुबली का घात किये बिना ही वापिस आ गया। सगोत्रज और चरम शरीरी का वह वध नहीं करता। यह देखकर भरत लज्जित हुए तथा बाहुबली को साम्राज्य-लिप्सा से ग्लानि हुई। फलतः उन्होंने राज्य त्यागकर जिन दीक्षा ले ली और कठोर तप किया। बाद में केवलज्ञान प्राप्त कर निर्वाण भी प्राप्त किया।
भरत-बाहुबली युद्ध की ये सारी घटनायें पोदनपुर में हुई थीं जिसकी अवस्थिति आज भी विवादास्पद बनी हुई है। अधिक सम्भावना यही है कि यह पोदनपुर उत्तर में होना चाहिए।
जहाँ तक आदिनाथ ऋषभदेव के सांस्कृतिक अवदान का प्रश्न है, वे एक संस्कृति विशेष के पुरोधा तो थे ही, साथ ही उन्होंने मानव को सामाजिकता का पाठ भी पढ़ाया। भोगभूमि से कर्मभूमि की ओर आने का समय एक संक्रान्ति काल था और संक्रान्ति काल के वातावरण को अपने अनुरूप बनाना सरल नहीं था। ऋषभदेव ने इस दुरूह कार्य को सरल बना दिया। असि, मसि, कृषि, वाणिज्य-विद्या और शिल्प की शिक्षा के साथ ही चौसठ या बहत्तर कलाओं का अध्ययन भी उनके योगदान के साथ जुड़ा हुआ है। समाज ने इन सारी कलाओं को समरसतापूर्वक आत्मसात किया और परस्परोपग्रहो जीवानाम् के आधार पर अहिंसा और अपरिग्रह की चेतना को नया स्वर दिया। अस्तित्व के प्रश्न को जितनी सुदृढ़ता के साथ यहाँ समाधानित किया गया है वह अपने आप में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। सह-अस्तित्व और सहभागिता पर आधारित जैनधर्म को प्रस्थापित करने का श्रेय तीर्थङ्कर ऋषभदेव को ही जाता हैं। उनके द्वारा प्रवेदित सूत्र ही उत्तरकालीन जैनधर्म की आधारशिला रहे है। दण्ड-व्यवस्था, राज- व्यवस्था, विवाह-प्रथा, व्यवसाय, खाद्य समस्या का हल, शिक्षा, कला और शिल्प आदि क्षेत्रों में उन्होंने नयी व्यवस्था को जन्म दिया।
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