02/06/2020
मुक्त बाज़ार का एक ही मन्त्र है : प्रतिस्पर्धात्मक बनो , साथ वाले को कुहनी-घुटना मारकर गिराओ और आगे बढ़ जाओ। जीवन एक रेस है , इसमें जीतना ही तुम्हारा लक्ष्य होना चाहिए। कोई मरता है , तो मरे। तुम्हें इससे क्या ! तुम अपने बारे में सोचो और ढंग से सोचो !
कोविड-19 ने निजीकरण के सबसे स्याह पहलुओं को खोल कर रख दिया है। जो लोग समाज में सबसे ज़रूरी काम करते हैं , वे ही सबसे कम कमाते हैं। खाना उपजाने व पहुँचाने वाले , कारखानों में रात-दिन मज़दूरी करने वाले , बीमारों की देखरेख करने वाले पैसों की तंगी से जूझ रहे हैं। उनके पास सुरक्षा नाम की कोई चीज़ नहीं है। लेकिन जिन्हें बिचौलियों का काम आता है , जो तीन-पाँच करना जानते हैं और लम्बी-लम्बी फेंक सकते हैं , वे लगातार सम्पन्न बने हुए हैं। जितना ये लोग एक दिन में कमाते हैं , उतना आवश्यक सेवाएँ देने वाले कई बार साल-भर में भी नहीं कमा पाते। तिस पर तुर्रा यह कि कम्पटीटिव तो बनना ही पड़ेगा ! बिना कम्प्टीशन के कौन सा सुख किसी को मिला है !
जब कुछ ऊपर बैठे लोगों के मुनाफ़े को ध्यान में रखकर योजनाएँ बनायी जाएँगी , जनहित नहीं होने वाला। निजी हितों की रक्षा करने वाला तन्त्र जनता की उपेक्षा करेगा ही , चाहे दावे बड़े-बड़े किये जाते रहें। अन्धे लोभी निजीकरण को सामंजस्य और साहचर्य जैसी भावनाओं से कुछ लेना-देना नहीं। उसे केवल अपने स्वार्थ के बारे में सोचना है , केवल अपना मुनाफ़ा ज़्यादा-से-ज़्यादा बनाना है।
बड़े उद्योगपतियों को एक बहुत बड़ी ग़लतफ़हमी है। वे सोचते हैं कि प्रतिस्पर्धा में जीतना में एक क़िस्म की प्रतिभा है। एक प्रतिभा जो उनके पास अधिक है और इसीलिये आज वे अरबों-खरबों में खेल रहे हैं। ऐसा सोचने वाले यह मौलिक बात भूल जाते हैं कि उन्हें उद्योगपति बनाने और उनका मुनाफ़ा उनको देने में न जाने कितने ही आम लोग एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाया करते हैं। पूरा समाज मिलकर साथ हाथ बँटाता है , तब उद्योग बनता है और चलता है। और जब वह चल पड़ता है , तब उद्योगपति हाथों को झाड़ कर श्रेय अपनी निजी प्रतिभा को देने लगता है। स्वयं को प्रतिस्पर्धा-विजेता बना कर कॉलर ऊपर करने लगता है।
सफल होना केवल निजी कारणों से सम्भव होता है --- यह सबसे बड़ा झूठ है। सफलता समाज के योगदान के बाद ही मिलती है। माँ-बाप , भाई-बहन , रिश्तेदार , दोस्त , प्रेमी व कामकाजी साथी व न जाने कितने ही अनजाने लोग हमें हम बनाते हैं। लेकिन जब हम हम बन जाते हैं , तब सीना चौड़ा कर के कह देते हैं कि हमने प्रतिस्पर्धा में सबको पिछड़कर सबको यह मुक़ाम हासिल किया है।
हमने अपना हासिल केवल अपना हासिल लगता है , जबकि वह सबका साझा हासिल होता है। अब यह हमें तय करना है कि कोविड-19 के बीतने के बाद प्रतिस्पर्धात्मक बने रहकर इस लूट-खसोट के साथ जीना है अथवा साझे समाज के मानव-मूल्यों को वापस स्थापित करना है।
सबको साथ लेकर सामान्य किन्तु स्वस्थ सुख पाना है अथवा मैं-केवल मैं के जाप के साथ बीमार धनपशु बनते जाना है।
( अर्थ-इतिहासकार डर्क फिलिप्सन की किताब 'जीडीपी ने दुनिया पर शासन कैसे जमाया और इससे निबटने के लिए क्या करें' पढ़ते हुए। )