29/07/2026
*सती का त्याग*
शिवपुराण में सती के त्याग की कथा अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रेरणादायक है। सती, जो भगवान शिव की पत्नी थीं, ने अपने पिता दक्ष प्रजापति के अपमान के कारण अपना जीवन त्याग दिया था।
सती दक्ष प्रजापति की पुत्री थीं और भगवान शिव की पत्नी। दक्ष प्रजापति, ब्रह्मा जी के पुत्र थे और उनमें अहंकार बहुत अधिक था। एक बार उन्होंने एक बड़ा यज्ञ आयोजित किया, जिसमें उन्होंने सभी देवताओं, ऋषियों, और महापुरुषों को आमंत्रित किया, लेकिन उन्होंने जानबूझकर अपने दामाद भगवान शिव को आमंत्रण नहीं भेजा।
जब सती को पता चला कि उनके पिता ने यज्ञ का आयोजन किया है और शिव को आमंत्रित नहीं किया, तो उन्हें बहुत दुख हुआ। सती ने शिव से यज्ञ में जाने की अनुमति मांगी, लेकिन शिव ने उन्हें समझाया कि बिना बुलाए वहां जाना उचित नहीं होगा। इसके बावजूद, सती ने जाने का निश्चय किया और अपने पिता के यज्ञ में पहुंच गईं।
यज्ञ में पहुंचने पर सती ने देखा कि वहां कोई भी शिव का सम्मान नहीं कर रहा है। यहां तक कि उनके पिता दक्ष भी शिव का अपमान कर रहे थे। सती यह अपमान सहन नहीं कर पाईं। उन्होंने अपने पिता से बहुत निवेदन किया कि वह शिव का अपमान न करें, लेकिन दक्ष ने उनकी एक न सुनी और शिव के विरुद्ध अपमानजनक बातें कहने लगे।
यह देखकर सती अत्यंत दुखी हो गईं और उन्होंने सोचा कि इस शरीर को धारण करने का कोई अर्थ नहीं है जो ऐसे पिता की संतान है, जो उनके पति का अपमान करता है। उन्होंने यज्ञ की अग्नि में अपने आप को समर्पित कर दिया और प्राण त्याग दिए।
सती के इस त्याग से भगवान शिव अत्यंत क्रोधित हो गए। शिव ने वीरभद्र को उत्पन्न किया, जिसने दक्ष के यज्ञ को नष्ट कर दिया और दक्ष का सिर काट दिया। बाद में, देवी सती ने पार्वती के रूप में पुनर्जन्म लिया और फिर से शिव से विवाह किया।
इस कथा से हमें यह सीख मिलती है कि सच्चे प्रेम और सम्मान के बिना कोई भी संबंध टिकाऊ नहीं होता, और अपमान का प्रतिकार केवल त्याग और बलिदान के द्वारा ही किया जा सकता है। सती का त्याग इस बात का प्रतीक है कि प्रेम और सम्मान के लिए किए गए त्याग की कोई सीमा नहीं होती।