सैध्दांतिक एवम प्रयोगात्मक Astrology

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कुंभ -कुंभ के आयोजन में जो तथाकथित influencers,Youtuber,Media persons और reporters सनातनी साधु संतों के ऊपर चिलम , धूम्र...
29/01/2025

कुंभ -

कुंभ के आयोजन में जो तथाकथित influencers,Youtuber,
Media persons और reporters सनातनी साधु संतों के ऊपर चिलम , धूम्रपान , गांजा इत्यादि नशे के आरोप लगा कर उन्हें पूर्ण रूप से नशेड़ी सिद्ध करने में लगे है। उनका यह आरोप पूर्णतया सही नहीं है।

आइए इसे तंत्र शास्त्र के माध्यम से समझते है।

तंत्र शास्त्र में ध्यान ,समाधि और सिद्धि के लिए बहुत से विधियों , आसनों , क्रियाओं और मंत्रों और यंत्रों का उपयोग बताया गया है। जिनमें ध्यान प्रमुख है।

जब तंत्र साधक या वाम मार्गी साधक या अन्य संप्रदायों के साधक ध्यान या अन्य क्रिया करते है। तो ध्यान एकाग्र होता है। ब्रह्मचर्य पुष्ट शरीर होने के कारण ध्यान लगने पर वीर्य सप्त चक्रों में से जिस पर ध्यान एकाग्र किया जाता है, उस चक्र की ओर उर्ध्वाधर रीढ़ की हड्डी के सहारे इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना नाड़ियों के सहारे ऊपर चढ़ने लगता है।

यह वीर्य मूलाधार के नीचे जननेन्द्रिय में सर्प के समान कुंडली मार के बैठी हुई नस के नीचे दबा रहता है। ध्यान द्वारा जोर पड़ने पर उस सर्प का मुंह खुल जाता है और वीर्य मनुष्य शरीर में ऊपर की ओर जाने लगता है। इसे ही कुण्डलिनी जागरण कहते है।

इस प्रकार वीर्य के ऊपर चढ़ने के कारण रीढ़ की हड्डी में तीव्र जलन होती है। गर्मी महसूस होती है। जिसे सहन कर पाना प्रायः साधकों के लिए कठिन होता है। इसलिए उस गर्मी को सहन करने को साधक गांजा , शराब , चिलम तंबाकू इत्यादि नशे का सहारा लेते है। जिसे आजकल की पीढ़ी समझ नहीं सकती और उन्हें नशेड़ी, शराबी और गंजेडी कहती है। जो गलत है।

साधु - संत ऊपर से कुछ और होते है। अंदर से कुछ और। उनकी बाहरी क्रिया वे इस प्रकार की रखते है कि जनसामान्य उन्हें विछिप्त समझे। ताकि जनसंपर्क कम से कम हो। इसलिए कभी साधु संतों का, वाममार्गी साधकों का चाहे वे किसी भी संप्रदाय के हो अपमान नहीं करना चाहिए। उन्हें आदर सम्मान ही देना चाहिए।

Astrologer
Chetan chittosiya

राधे राधे।।आप अपनी राशि के अनुसार भी सकारात्मक फल देने वाले कुछ चुनिंदा पौधे और वनस्पति भी इस श्रावण मास के पावन अवसर पर...
01/07/2023

राधे राधे।।

आप अपनी राशि के अनुसार भी सकारात्मक फल देने वाले कुछ चुनिंदा पौधे और वनस्पति भी इस श्रावण मास के पावन अवसर पर अपने आसपास किसी सरकारी भूमि में किसी बगीचे अथवा सार्वजनिक स्थल पर इन पौधों को लगाकर अपने जीवन में एक सकारात्मक का अनुभव कर सकते हैं।

मेष राशि वालों के लिए नीम का वृक्ष लगाना चाहिए और वृष राशि वालों के लिए बड़, और गूलर का वृक्ष लगाना चाहिए, मिथुन राशि के जातकों को ताड और केले का वृक्ष लगाना चाहिए। और कर्क राशि वालों को अंजीर का वृक्ष शुभ फल प्रदान करने वाला रहता है।

सिंह राशि वालों के लिए कटहल और आंवला का वृक्ष लगाना उपयोगी रहेगा ,कन्या राशि वाले जामुन के पेड़ लगाएं, तुला राशि वालों को मेहंदी के पेड़ लगाना ज्यादा उपयोगी रहेगा। और वृश्चिक राशि वालों के लिए कत्था जिसको खदिर भी कहते हैं और खैर भी कहते हैं । का वृक्ष सदैव शुभ फल प्रदान करने वाला और उन्नति दायक रहेगा।

धनु राशि वालों के लिए पीपल का वृक्ष लगाएं लेकिन दूर निर्जन स्थान पर, मकर राशि वाले खेजड़ी और सीताफल का पेड़ लगाएं, कुंभ राशि वालों को शीशम और का शमी (खेजड़ा) का पेड़ लगाना चाहिए । तथा मीन राशि वालों के लिए शहतूत का पेड़ लगाना चाहिए।

राशि के अनुसार इन पौधों को लगाने से जीवन में एक सकारात्मकता का अनुभव होगा।
यह सभी पौधे अंदर से हैप्पीनेस देने वाले होते हैं ।अपनी-अपनी राशियों के अनुसार जैसे-जैसे इनकी ग्रोथ बढ़ती है, हैप्पीनेस बढ़ती चली जाती है।

सुख समृद्धि और सागर के वातावरण का निर्माण होता है घर परिवार में खुशहाली बनी रहती है।

वास्तु के अनुसार घर में या घर के आसपास हरियाली हो खासतौर से अपनी वास्तु सीमा में तो घर परिवार में सुख समृद्धि और खुशहाली...
01/07/2023

वास्तु के अनुसार घर में या घर के आसपास हरियाली हो खासतौर से अपनी वास्तु सीमा में तो घर परिवार में सुख समृद्धि और खुशहाली बनी रहती है सुख और सौहार्द्र का वातावरण बना रहता है।

श्रावण मास आरंभ होने जा रहा है सभी से हमारा अनुरोध है अपने वास्तु परिसर में छोटे या बड़े पौधे अवश्य लगाएं।

अपने भवन और वास्तव में जगह नहीं है तो किसी भी सरकारी भूमि मैं नीम पीपल बरगद आम अर्जुन अशोक जामुन मौलसिरी आमला और विल्व पत्र आदि के पौधे अवश्य लगाएं।

और यदि यह भी संभव नहीं है तो अपने घर में तुलसी का पौधा, अवश्य लगाएं घी ग्वार ग्वारपाठा एलोवेरा लगाएं ,जो एक बड़े गमले में भी लग सकता है।

किसी भी जन्म पत्रिका में 3 प्रकार के भाव मुख्य माने जाते है। 1-कारक2-अकारक3-तटस्थ1- कारक ग्रह - जन्मपत्रिका में जो ग्रह ...
13/06/2022

किसी भी जन्म पत्रिका में 3 प्रकार के भाव मुख्य माने जाते है।

1-कारक
2-अकारक
3-तटस्थ

1- कारक ग्रह - जन्मपत्रिका में जो ग्रह शुभ फल प्रदान करने वाले होते हैं। उन्हें कारक ग्रह कहा जाता है।

2- अकारक ग्रह - जन्मपत्रिका में जो ग्रह अशुभ फल प्रदान करने वाले होते हैं। उन्हें अकारक ग्रह कहा जाता है

3- तटस्थ ग्रह - जन्मपत्रिका में जो ग्रह तटस्थ फल प्रदान करने वाले होते हैं। उन्हें तटस्थ ग्रह कहा जाता है।

इसके भी अतिरिक्त पत्रिका में 2 और मुख्य ग्रह के प्रकार होते है।

अति कारक ग्रह - पत्रिका में वे ग्रह जो तटस्थ एवम कारक दोनो भाव के स्वामी होते है। यह ग्रह पत्रिका में सर्वाधिक शुभ फल प्रदान करते है।

अति अकारक ग्रह - पत्रिका में वे ग्रह जो तटस्थ एवं अकारक भाव दोनो भावों के एकसाथ स्वामी होते है। यह ग्रह पत्रिका में सर्वाधिक अशुभ फल प्रदान करते है।

सिंह लग्न ही एकमात्र ऐसी लग्न होती है। जिसमे तीनो कारक ग्रहों के अतिरिक्त तीन ग्रह अति अकारक होते है। अति अकारक ग्रह ऐसे ग्रह होते है। जो पत्रिका में सामान्य अशुभ ग्रहों (अकारक एवम मारक) से भी ज्यादा अशुभ फल प्रदान करने वाले होते है।

सिंह लग्न ही एकमात्र ऐसी लग्न होती है। जिसमे शनि,बुध,शुक्र ये तीनो ग्रह अतिअकारक होते है अर्थात अत्यधिक अशुभ ग्रह। अन्य किसी लग्न में ऐसा नही होता। अतः सभी राशियों की लग्नो में सबसे ज्यादा अशुभ परिणाम झेलने वाली लग्न सिंह लग्न ही होती है, इसलिये सिंह लग्न ही सबसे ज्यादा मजबूत लग्न मानी जाती है। इसलिए यह जिम्मेदारी सिंह लग्न को दी गयी। इसके स्वामी बनाए गए, ग्रहों के राजा सूर्य।

🍀 ॐ गं गणपतये नमः 🍀🙏ज्योतिष शास्त्र  में कवि , लेखक , कुशल वक्ता एवम उपन्यासकार बनने का योग - 1- पत्रिका में द्वितीय भाव...
25/04/2022

🍀 ॐ गं गणपतये नमः 🍀
🙏

ज्योतिष शास्त्र में कवि , लेखक , कुशल वक्ता एवम उपन्यासकार बनने का योग -

1- पत्रिका में द्वितीय भाव के स्वामी का सम्बंध चतुर्थ भाव के स्वामी से होगा।

2- पत्रिका में द्वितीय भाव का स्वामी चतुर्थ भाव मे बैठा होना।

ये योग श्री कुमार विश्वास जी , श्री प्रसून जोशी जी , स्व. श्री अटल विहारी वाजपेयी जी , श्री रामधारी सिंह दिनकर जी , श्री जयशंकर प्रसाद जी , श्री अशोक चक्रधर जी , श्री हरिवंश राय बच्चन जी , श्री मैथिली शरण गुप्त जी , श्री रविन्द्र नाथ टैगोर जी की पत्रिका में देखने को मिला है।

अन्य कवियों के जन्म विवरण उपलब्ध नही हो पाए। जो उपलब्ध हो पाए तो उनकी प्रामाणिकता के बारे में संदेह रहा है। यह मेरा अनुभव है। इसमें त्रुटि हो सकती है। परंतु आप लोगो को सही लगे तो इसका लाभ उठा सकते है।

जय सियाराम
चेतन चित्तोसिया
Astrologer

01/10/2021

।। ॐ गं गणपतये नमः ।।

मंत्रों का संबंध वैदिक ज्योतिष से बहुत प्रगाढ़ है। हालांकि विषय काफी गुप्त एवं विस्तृत है।

प्रारम्भ से ही मंत्रों का संबंध ज्योतिष शास्त्र से बहुत ही घनिष्ट रहा है। जितने भी प्रकार के मंत्र हैं । उनकी राशि का संबंध जातक की जन्म राशि से समझना चाहिए। अपनी राशि से मंत्र की राशि 1,5,9 है । तो उसको सिद्ध कहते हैं। 6 , 2, 10 है, तो उसको साध्य कहते हैं। 3,7,11 हो तो सुसिद्ध कहते है। 4, 8,12 हो तो रिपु कहते है।

सिद्ध मंत्र - यह सिद्ध होने में समय लेता है।
साध्य मंत्र - यह सिद्ध होने में बहुत समय लेता है।
सुप्रसिद्ध मंत्र - यह तुरंत सिद्ध होकर फल देता है ।
रिपु मंत्र - यह जपकर्ता का नाश करता है । इस मंत्र का कभी भी जप नही करना चाहिए ।

इन चारो प्रकार के मंत्रों के देवताओं के वर्ण क्रमशः ये है ।
रक्त वर्ण , श्वेत वर्ण , पीत वर्ण , श्याम वर्ण

जप समय अंतराल में वे विचित्र रूप धारण कर जपकर्ता को स्वप्न में दर्शन देते हैं। यदि उनका मुख क्रूर , क्रोध से पूर्ण लगे। तो मंत्र जप नहीं करना चाहिए। यदि सौम्य एवं प्रसन्न है। तो ही जप करना चाहिए।

सात्विक देवता मंत्र का सात्विक , राजस देवता का राजस , तामसिक देवता का तामसिक मंत्र होता है। सात्विक मंत्र का जप उत्तर में मुख करके , राजस का पूर्व में मुख करके , तामसिक का पश्चिम में मुख करके जप करते है।

मंत्रों का उच्चारण - पुल्लिंग और सात्विक मंत्र का जप कंठ में करना चाहिए। स्त्रीलिंग , राजसिक मंत्रों का जप होठों में करना चाहिए । इसी प्रकार नपुंसकलिंग , तामसिक मंत्र का जप भ्रामरी स्वर में करना चाहिए।

मंत्र जागरण का समय - सात्विक मंत्र के जागरण का समय प्रातः काल होता है। राजसिक मंत्रों का जागरण का समय संध्या काल होता है । जबकि तामसिक मंत्र के जागरण का समय मध्य रात्रि का होता है। सात्विक मंत्र के लिए चर्मासन , राजासिक मंत्रों के लिए कम्बलासन , तामसिक के लिए वस्त्रासन का प्रयोग करना चाहिए।

मंत्र का पुनश्चरण - पुनश्चरण से मंत्र की शक्ति स्थाई एवं श्रंखलित हो जाती है। फिर मंत्र जागृत करने तथा सिद्ध करने की आवश्यकता भी नहीं रहती है।पुनश्चरण के चार अंग है।

1- मंत्र की जप संख्या जितनी हो सके उसका चार गुना जप करना।
2- दुगनी संख्या का हवन करना।
3- आधी संख्या का तर्पण करना
4- उस आधी संख्या की भी आधी संख्या में अपने नाम अक्षर का भाग लेकर जितनी शेष बचे उसके अनुसार ब्राह्मण भोजन कराना चाहिए । यह तांत्रिक पुनश्चरण विधान है।

जप और माला - जब और माला जी एक दूसरे के पूरक नहीं जा सकते हैं सभी प्रकार के मंत्रों के लिए रुद्राक्ष की माला को श्रेष्ठ माना जाता है।
1- स्त्रीदेवता का मन्त्र 51दानों पर
2- पुरुष देवता का मंत्र 108 दाने पर
3- नपुंसक देवता का मंत्र 21 दाने पर करना चाहिए।

श्रद्धा और विश्वास के साथ किया गया मंत्र जप अवश्य ही फल देने वाला होता है। गीता में भगवान श्री कृष्ण ने कहा है - यज्ञाना जप यज्ञोस्मी । 16 प्रकार के प्रमुख यज्ञ है। उनमें जप यज्ञ सर्वश्रेष्ठ है।

आगे .....

।। 🍀ॐ श्री गणेशाय नमः 🌿।।महापुरुषों अथवा श्रेष्ठ चरित्रों में मिलने वाले समान योग - 1- लग्नेश किसी भी पाप ग्रह से पीड़ित ...
28/09/2021

।। 🍀ॐ श्री गणेशाय नमः 🌿।।

महापुरुषों अथवा श्रेष्ठ चरित्रों में मिलने वाले समान योग -

1- लग्नेश किसी भी पाप ग्रह से पीड़ित नही होता है। लग्न बलवान अवस्था मे होती है। लग्नेश केंद्र या त्रिकोण में अथवा पराक्रम भाव में अथवा स्वराशि अथवा उच्च राशि मे मौजूद होता है।

2- पराक्रम भाव बलवान होता है। जिससे इन्हें कर्म करने के लिए पर्याप्त ऊर्जा मिलती है। कर्मठ होते है।

3-दशम भाव इनका बलवान होता है। जिससे कार्यक्षेत्र में प्रगति करते है।

4- तीनों त्रिकोण पर शुभ ग्रह अथवा त्रिकोण अधिपतियो की दृष्ति अथवा स्थिति प्रभाव होता है।

5- बुध , गुरु , सूर्य जैसे ग्रह दिगबली अथवा उच्च राशि मे होते है।

6-इनका शनि अच्छी स्थिति में होता है। जिससे जनता के यह प्रिय होते है। राहु इनकी पत्रिका में शुभकारी होता है।

7- धर्मकर्माधिपति राजयोग अथवा त्रिकोण अधिपतियो का वर्गोत्तम होना अथवा पुष्कर नावमांश में होना।

ये कुछ स्थितियां आपको कॉमन मिलेंगी। इसके अलावा भी बहुत स्थितियां होती है। ज्योतिष में कुण्डली एक पहेली होती है। बहुत सारे योग , दुर्योग सम्भव है। परन्तु ये कुछ असामान्य और एक जैसी विशेषता आपको अवश्य मिलेगी।

इति 🍀

💐ॐ नमः शिवाय 💐आपके अपनी बहिनों से सम्बन्ध खराब होने का योग - 1- बुध-केतु की युति , बुध-शनि की युति , बुध-राहु , बुध मंगल...
27/09/2021

💐ॐ नमः शिवाय 💐

आपके अपनी बहिनों से सम्बन्ध खराब होने का योग -

1- बुध-केतु की युति , बुध-शनि की युति , बुध-राहु , बुध मंगल की युति

2- यदि पत्रिका में बुध आपके तृतीय भाव अथवा एकादश भाव का स्वामी होकर शनि या राहु या केतु या मंगल से पीड़ित हो रहा हो।

3- बुध आपकी पत्रिका में अस्त हो , छटे भाव या अष्ठम भाव या तृतीय भाव मे शत्रु राशि मे हो।

अगर उपयुक्त योग हो एवम गुरु पत्रिका में त्रिकोण अधिपति होकर बुध पर दृष्ति डाल रहा हो । तो मतभेदों के साथ सम्बन्ध स्थिरता लिए हुए रहते है ।

🌿जिनकी पत्रिका में इस प्रकार के सम्बन्ध हो । उन्हें ईश्वर ने एक मौका दिया है। पिछले जन्म में जिन्होंने प्रकृति के पेड़ पौधों को , पक्षियों को , किसी स्त्री को नुकसान पहुंचाया हो। तो उसके द्वारा प्रताड़ित होने का योग इस जन्म में बहिन के द्वारा बनाया है। इस प्रकार समझकर अपनी बहिन के लिए सब प्रकार से भले कार्य करने चाहिए। चाहे वह कितना ही बुरा कहे। हमे अपने अगले जन्म के बुध ग्रह हो शुभ करना चाहिए। 🍀

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