01/10/2021
।। ॐ गं गणपतये नमः ।।
मंत्रों का संबंध वैदिक ज्योतिष से बहुत प्रगाढ़ है। हालांकि विषय काफी गुप्त एवं विस्तृत है।
प्रारम्भ से ही मंत्रों का संबंध ज्योतिष शास्त्र से बहुत ही घनिष्ट रहा है। जितने भी प्रकार के मंत्र हैं । उनकी राशि का संबंध जातक की जन्म राशि से समझना चाहिए। अपनी राशि से मंत्र की राशि 1,5,9 है । तो उसको सिद्ध कहते हैं। 6 , 2, 10 है, तो उसको साध्य कहते हैं। 3,7,11 हो तो सुसिद्ध कहते है। 4, 8,12 हो तो रिपु कहते है।
सिद्ध मंत्र - यह सिद्ध होने में समय लेता है।
साध्य मंत्र - यह सिद्ध होने में बहुत समय लेता है।
सुप्रसिद्ध मंत्र - यह तुरंत सिद्ध होकर फल देता है ।
रिपु मंत्र - यह जपकर्ता का नाश करता है । इस मंत्र का कभी भी जप नही करना चाहिए ।
इन चारो प्रकार के मंत्रों के देवताओं के वर्ण क्रमशः ये है ।
रक्त वर्ण , श्वेत वर्ण , पीत वर्ण , श्याम वर्ण
जप समय अंतराल में वे विचित्र रूप धारण कर जपकर्ता को स्वप्न में दर्शन देते हैं। यदि उनका मुख क्रूर , क्रोध से पूर्ण लगे। तो मंत्र जप नहीं करना चाहिए। यदि सौम्य एवं प्रसन्न है। तो ही जप करना चाहिए।
सात्विक देवता मंत्र का सात्विक , राजस देवता का राजस , तामसिक देवता का तामसिक मंत्र होता है। सात्विक मंत्र का जप उत्तर में मुख करके , राजस का पूर्व में मुख करके , तामसिक का पश्चिम में मुख करके जप करते है।
मंत्रों का उच्चारण - पुल्लिंग और सात्विक मंत्र का जप कंठ में करना चाहिए। स्त्रीलिंग , राजसिक मंत्रों का जप होठों में करना चाहिए । इसी प्रकार नपुंसकलिंग , तामसिक मंत्र का जप भ्रामरी स्वर में करना चाहिए।
मंत्र जागरण का समय - सात्विक मंत्र के जागरण का समय प्रातः काल होता है। राजसिक मंत्रों का जागरण का समय संध्या काल होता है । जबकि तामसिक मंत्र के जागरण का समय मध्य रात्रि का होता है। सात्विक मंत्र के लिए चर्मासन , राजासिक मंत्रों के लिए कम्बलासन , तामसिक के लिए वस्त्रासन का प्रयोग करना चाहिए।
मंत्र का पुनश्चरण - पुनश्चरण से मंत्र की शक्ति स्थाई एवं श्रंखलित हो जाती है। फिर मंत्र जागृत करने तथा सिद्ध करने की आवश्यकता भी नहीं रहती है।पुनश्चरण के चार अंग है।
1- मंत्र की जप संख्या जितनी हो सके उसका चार गुना जप करना।
2- दुगनी संख्या का हवन करना।
3- आधी संख्या का तर्पण करना
4- उस आधी संख्या की भी आधी संख्या में अपने नाम अक्षर का भाग लेकर जितनी शेष बचे उसके अनुसार ब्राह्मण भोजन कराना चाहिए । यह तांत्रिक पुनश्चरण विधान है।
जप और माला - जब और माला जी एक दूसरे के पूरक नहीं जा सकते हैं सभी प्रकार के मंत्रों के लिए रुद्राक्ष की माला को श्रेष्ठ माना जाता है।
1- स्त्रीदेवता का मन्त्र 51दानों पर
2- पुरुष देवता का मंत्र 108 दाने पर
3- नपुंसक देवता का मंत्र 21 दाने पर करना चाहिए।
श्रद्धा और विश्वास के साथ किया गया मंत्र जप अवश्य ही फल देने वाला होता है। गीता में भगवान श्री कृष्ण ने कहा है - यज्ञाना जप यज्ञोस्मी । 16 प्रकार के प्रमुख यज्ञ है। उनमें जप यज्ञ सर्वश्रेष्ठ है।
आगे .....