Pallet - a Motivational Canvas

Pallet - a Motivational Canvas About Pallet…a Motivational Canvas :
We believe that every individual has his/ her own dreams and aspirations and hence it works to refuel that spark.

Permanently closed.

Pallet, in its unique process, helps people to realize one’s hidden potential and harness them to present their greater self to the world. We go through interactive sessions with power discussions, storytelling, mental exercises and various learning activities. We focus on developing a perception towards work which is based on values and ethics. It results in positive change of thought process and

behavior. Pallet helps you to :
Explore i within you
Convert your potential into performance
Develop efficient and impact leadership
Develop genius attitude
Live an extraordinary life

We may not make you success in a day but we may lead you on that path

04/01/2022

एक पुत्र अपने वृद्ध पिता को
रात्रिभोज के लिये एक अच्छे रेस्टोरेंट
में लेकर गया।
खाने के दौरान वृद्ध पिता ने कई बार भोजन अपने कपड़ों पर गिराया।
रेस्टोरेंट में बैठे दूसरे खाना खा रहे लोग
वृद्ध को घृणा की नजरों से देख रहे थे ,
लेकिन उसका पुत्र शांत था।

खाने के बाद पुत्र बिना किसी शर्म के
वृद्ध को वॉशरूम ले गया।
उनके कपड़े साफ़ किये, चेहरा साफ़ किया, बालों में कंघी की, चश्मा पहनाया,
और फिर बाहर लाया।
सभी लोग खामोशी से उन्हें ही देख रहे थे।

फ़िर उसने बिल का भुगतान किया
और वृद्ध के साथ बाहर जाने लगा।
तभी डिनर कर रहे एक अन्य वृद्ध ने
उसे आवाज दी, और पूछा -
क्या तुम्हें नहीं लगता कि यहाँ अपने पीछे
तुम कुछ छोड़ कर जा रहे हो?

उसने जवाब दिया - नहीं सर,
मैं कुछ भी छोड़कर नहीं जा रहा।

वृद्ध ने कहा - बेटे, तुम यहाँ
प्रत्येक पुत्र के लिए एक शिक्षा, सबक और प्रत्येक पिता के लिए
उम्मीद छोड़कर जा रहे हो...

आमतौर पर हम लोग अपने बुजुर्ग माता-पिता को अपने साथ बाहर ले जाना पसंद नहीं करते,
और कहते हैं - क्या करोगे,
आपसे चला तो जाता नहीं,
ठीक से खाया भी नहीं जाता,
आप तो घर पर ही रहो,
वही अच्छा होगा।

लेकिन क्या आप भूल गये कि
जब आप छोटे थे,
और आपके माता पिता आपको
अपनी गोद में उठाकर ले जाया करते थे।
आप जब ठीक से खा नहीं पाते थे तो माँ आपको अपने हाथ से खाना खिलाती थी,
और खाना गिर जाने पर
डाँट नही, प्यार जताती थी।

फिर वही माँ बाप बुढ़ापे में
बोझ क्यों लगने लगते हैं?

माँ-बाप भगवान का रूप होते हैं।
उनकी सेवा कीजिये,
और प्यार दीजिये क्योंकि एक दिन
आप भी बूढ़े होंगे।

अपने माता-पिता का सदैव सम्मान करें...
🙏🚩

04/01/2022
04/09/2021

*""वाणी पर नियंत्रण ...""*

एक बार एक बूढ़े आदमी ने अफवाह फैलाई कि उसके पड़ोस में रहने वाला नौजवान चोर है।

यह बात दूर - दूर तक फैल गई आस - पास के लोग उस नौजवान से बचने लगे।

नौजवान परेशान हो गया कोई उस पर विश्वास ही नहीं करता था।

तभी गाँव में चोरी की एक वारदात हुई और शक उस नौजवान पर गया उसे गिरफ्तार कर लिया गया।

लेकिन कुछ दिनों के बाद सबूत के अभाव में वह निर्दोष साबित हो गया।

निर्दोष साबित होने के बाद वह नौजवान चुप नहीं बैठा उसने बूढ़े आदमी पर गलत आरोप लगाने के लिए मुकदमा दायर कर दिया।

पंचायत में बूढ़े आदमी ने अपने बचाव में सरपंच से कहा..

मैंने जो कुछ कहा था, वह एक टिप्पणी से अधिक कुछ नहीं था किसी को नुकसान पहुंचाना मेरा मकसद नहीं था।

सरपंच ने बूढ़े आदमी से कहा... आप एक कागज के टुकड़े पर वो सब बातें लिखें, जो आपने उस नौजवान के बारे में कहीं थीं..
..और जाते समय उस कागज के टुकड़े - टुकड़े करके घर के रस्ते पर फ़ेंक दें कल फैसला सुनने के लिए आ जाएँ..

बूढ़े व्यक्ति ने वैसा ही किया..

अगले दिन सरपंच ने बूढ़े आदमी से कहा कि फैसला सुनने से पहले आप बाहर जाएँ और उन कागज के टुकड़ों को...

जो आपने कल बाहर फ़ेंक दिए थे, इकट्ठा कर ले आएं...

बूढ़े आदमी ने कहा मैं ऐसा नहीं कर सकता.. उन टुकड़ों को तो हवा कहीं से कहीं उड़ा कर ले गई होगी...

अब वे नहीं मिल सकेंगें... मैं कहाँ - कहाँ उन्हें खोजने के लिए जाऊंगा ?

सरपंच ने कहा 'ठीक इसी तरह, एक सरल - सी टिप्पणी भी किसी का मान - सम्मान उस सीमा तक नष्ट कर सकती है...

जिसे वह व्यक्ति किसी भी दशा में दोबारा प्राप्त करने में सक्षम नहीं हो सकता।

इसलिए यदि किसीके बारे में कुछ अच्छा नहीं कह सकते, तो चुप रहें।

वाणी पर हमारा नियंत्रण होना चाहिए, ताकि हम शब्दों के दास न बनें l

02/09/2021

*विद्या से बुद्धि श्रेष्ठ है*
एक तालाब में दो मछलियाँ रहती थीं । एक थी शतबुद्धि (सौ बुद्धियों वाली), दूसरी थी सहस्त्रबुद्धि (हजार बुद्धियों वाली) । उसी तालाब में एक मेंढक भी रहता था । उसका नाम था एकबुद्धि । उसके पास एक ही बुद्धि थी । इसलिये उसे बुद्धि पर अभिमान नहीं था । शतबुद्धि और सहस्त्रबुद्धि को अपनी चतुराई पर बड़ा अभिमान था।

एक दिन सन्ध्या समय तीनों तालाब के किनारे बात-चीत कर रहे थे। उसी समय उन्होंने देखा कि कुछ मछि़यारे हाथों में जाल लेकर वहाँ आये । उनके जाल में बहुत सी मछलियाँ फँस कर तड़प रही थीं । तालाब के किनारे आकर मछि़यारे आपस में बात करने लगे । एक ने कहा - "इस तालाब में खूब मछलियाँ हैं, पानी भी कम है। कल हम यहाँ आकर मछलियां पकड़ेंगे ।"

सबने उसकी बात का समर्थन किया। कल सुबह वहाँ आने का निश्चय करके मछि़यारे चले गये। उनके जाने के बाद सब मछलियों ने सभा की। सभी चिन्तित थे कि क्या किया जाय। सब की चिन्ता का उपहास करते हुये सहस्त्रबुद्धि ने कहा- "डरो मत, दुनियां में सभी दुर्जनों के मन की बात पूरी होने लगे तो संसार में किसी का रहना कठिन हो जाय । सांपों और दुष्टों के अभिप्राय कभी पूरे नहीं होते; इसीलिये संसार बना हुआ है । किसी के कथनमात्र से डरना कापुरुषों का काम है । प्रथम तो वह यहाँ आयेंगे ही नहीं, यदि आ भी गये तो मैं अपनी बुद्धि के प्रभाव से सब की रक्षा करलूँगी ।"

शतबुद्धि ने भी उसका समर्थन करते हुए कहा - "बुद्धिमान के लिए संसार में सब कुछ संभव है। जहां वायु और प्रकाश की भी गति नहीं होती, वहां बुद्धिमानों की बुद्धि पहुँच जाती है। किसी के कथनमात्र से हम अपने पूर्वजों की भूमि को नहीं छो़ड़ सकते। अपनी जन्मभूमि में जो सुख होता है वह स्वर्ग में भी नहीं होता । भगवान ने हमें बुद्धि दी है, भय से भागने के लिए नहीं, बल्कि भय का युक्तिपूर्वक सामना करने के लिए ।"

तालाब की मछलियों को तो शतबुद्धि और सहस्त्रबुद्धि के आश्‍वासन पर भरोसा हो गया, लेकिन एकबुद्धि मेंढक ने कहा- "मित्रो ! मेरे पास तो एक ही बुद्धि है; वह मुझे यहां से भाग जाने की सलाह देती है । इसलिए मैं तो सुबह होने से पहले ही इस जलाशय को छो़ड़कर अपनी पत्‍नी के साथ दूसरे जलाशय में चला जाऊँगा ।" यह कहकर वह मेंढक मेंढकी को लेकर तालाब से चला गया ।

दूसरे दिन अपने वचनानुसार वही मछि़यारे वहाँ आये । उन्होंने तालाब में जाल बिछा़ दिया । तालाब की सभी मछलियां जाल में फँस गईं । शतबुद्धि और सहस्त्रबुद्धि ने बचाव के लिए बहुत से पैंतरे बदले, किन्तु मछि़यारे भी अनाड़ी न थे । उन्होंने चुन-चुन कर सब मछलियों को जाल में बांध लिया । सबने तड़प-तड़प कर प्राण दिये ।

सन्ध्या समय मछि़यारों ने मछलियों से भरे जाल को कन्धे पर उठा लिया । शतबुद्धि और सहस्त्रबुद्धि बहुत भारी मछलियां थीं, इसीलिए इन दोनों को उन्होंने कन्धे पर और हाथों पर लटका लिया था । उनकी दुरवस्था देखकर मेंढक ने मेंढकी से कहा-

"देख प्रिये ! मैं कितना दूरदर्शी हूं । जिस समय शतबुद्धि कन्धों पर और सहस्त्रबुद्धि हाथों में लटकी जा रही है, उस समय मैं एकबुद्धि इस छो़टे से जलाशय के निर्मल जल में सानन्द विहार कर रहा हूँ । इसलिए मैं कहता हूँ कि विद्या से बुद्धि का स्थान ऊँचा है, और बुद्धि में भी सहस्त्रबुद्धि की अपेक्षा एकबुद्धि होना अधिक व्यावहारिक है ।"

(सीख : विद्या से बुद्धि का स्थान ऊँचा है, और बुद्धि में भी सहस्त्रबुद्धि की अपेक्षा एकबुद्धि होना अधिक व्यावहारिक है ।)

31/08/2021

*सतत् सक्रिय*
गिद्धों का एक झुण्ड खाने की तलाश में
भटक रहा था। उड़ते – उड़ते वे एक टापू पे पहुँच गए। वो जगह उनके लिए स्वर्ग के समान थी। हर तरफ खाने के लिए मेंढक, मछलियाँ और समुद्री जीव मौजूद थे और इससे भी बड़ी बात ये थी कि वहां इन गिद्धों का शिकार करने वाला कोई जंगली जानवर नहीं था और वे बिना किसी भय के वहां रह सकते थे।
युवा गिद्ध कुछ ज्यादा ही उत्साहित थे, उनमे से एक बोला, ” वाह ! मजा आ गया, अब तो मैं यहाँ से कहीं नहीं जाने वाला, यहाँ तो बिना किसी मेहनत के ही हमें बैठे -बैठे खाने को मिल रहा है! बाकी गिद्ध भी उसकी हाँ में हाँ मिला ख़ुशी से झूमने लगे।
सबके दिन मौज -मस्ती में बीत रहे थे लेकिन झुण्ड का सबसे बूढ़ा गिद्ध इससे खुश नहीं था। एक दिन अपनी चिंता जाहिर करते हुए वो बोला, ” भाइयों, हम गिद्ध हैं, हमें हमारी ऊँची उड़ान और अचूक वार करने की ताकत के लिए
जाना जाता है। पर जबसे हम यहाँ आये हैं हर कोई आराम तलब हो गया है।
ऊँची उड़ान तो दूर ज्यादातर गिद्ध तो कई महीनो से उड़े तक नहीं है और आसानी से मिलने वाले भोजन की वजह से अब हम सब शिकार करना भी भूल रहे हैं।
ये हमारे भविष्य के लिए अच्छा नहीं है।
मैंने फैसला किया है कि मैं इस टापू को छोड़ वापस उन पुराने जंगलो में लौट जाऊँगा। अगर मेरे साथ कोई चलना चाहे तो चल सकता है। बूढ़े गिद्ध की बात सुन बाकी गिद्ध हंसने लगे।
किसी ने उसे पागल कहा तो कोई उसे मूर्ख की उपाधि देने लगा। बेचारा बूढ़ा गिद्ध अकेले ही वापस लौट गया।
समय बीता, कुछ वर्षों बाद बूढ़े गिद्ध ने सोचा ना जाने मैं अब कितने दिन जीवित रहूँ, क्यों न एक बार चल कर अपने पुराने साथियों से मिल लिया जाए।
लम्बी यात्रा के बाद जब वो टापू पे पहुंचा तो वहां का दृश्य भयावह था। ज्यादातर गिद्ध मारे जा चुके थे और जो बचे थे वे बुरी तरह घायल थे। “ये कैसे हो गया ?”, बूढ़े गिद्ध ने पूछा। कराहते हुए एक घायल गिद्ध बोला, “हमे क्षमा कीजियेगा, हमने आपकी बातों को गंभीरता से नहीं लिया और आपका मजाक तक उड़ाया।
दरअसल, आपके जाने के कुछ महीनो बाद एक बड़ी सी जहाज इस टापू पे आई और चीतों का एक दल यहाँ छोड़ गयी। चीतों ने पहले तो हम पर हमला नहीं किया, पर जैसे ही उन्हें पता चला कि हम सब न ऊँचा उड़ सकते हैं और न अपने पंजो से हमला कर सकते हैं।
उन्होंने हमे खाना शुरू कर दिया। अब हमारी आबादी खत्म होने की कगार पर है बस हम जैसे कुछ घायल गिद्ध ही ज़िंदा बचे हैं। बूढ़ा गिद्ध उन्हें देखकर बस अफ़सोस कर सकता था, वो वापस जंगलों की तरफ उड़ चला।

*दोस्तों, अगर हम अपनी किसी शक्ति का Use नहीं करते तो धीरे-धीरे हम उसे Lose कर देते हैं। For instance, अगर हम अपने Brain का Use नहीं करते तो उसकी Sharpness घटती जाती है, अगर हम अपनी* *Muscles का Use नही करते*तो उनकी ताकत घट जाती है इसी तरह अगर हम अपनी Skills को polish नहीं करते तो हमारी काम करने की Efficiency कम होती जाती है।*
*तेजी से बदलती इस दुनिया में हमें खुद को बदलाव के लिए तैयार रखना चाहिए। पर बहुत बार हम अपनी Current Job या Business में इतने Comfortable हो जाते हैं कि बदलाव के बारे में सोचते ही नहीं और अपने अन्दर कोई नयी Skills Add नहीं करते, अपनी Knowledge बढ़ाने के लिए कोई किताब नहीं पढ़ते कोई Training Program नहीं Attend करते,*
*यहाँ तक की हम उन चीजों में भी Dull हो जाते हैं जिनकी वजह से कभी हमे जाना जाता था और फिर जब MarketConditions Change होती हैं और हमारी नौकरी या बिज़नेस पे आंच आती है तो हम हालात को दोष देने लगते हैं।*
*ऐसा मत करिये अपनी काबिलियत अपनी ताकत को जिंदा रखिये अपने कौशल, अपने हुनर को और तराशिये उसपे धूल मत जमने दीजिये और जब आप ऐसा करेंगे तो बड़ी से बड़ी मुसीबत आने पर भी आप ऊँची उड़ान भर पायेंगे।*

27/08/2021

*!! परेशानी की चट्टान !!*

एक किसान था। उसके खेत में एक पत्थर का एक हिस्सा जमीन से ऊपर निकला हुआ था, जिससे ठोकर खाकर वह कई बार गिर चुका था और कितनी ही बार उससे टकराकर खेती के औजार भी टूट चुके थे।

रोजाना की तरह आज भी वह सुबह-सुबह खेती करने पहुंचा और इस बार वही हुआ, किसान का हल पत्थर से टकराकर टूट गया। किसान क्रोधित हो उठा, और उसने निश्चय किया कि आज जो भी हो जाए वह इस चट्टान को जमीन से निकाल कर इस खेत के बाहर फेंक देगा। वह तुरंत गाँव से ४-५ लोगों को बुला लाया और सभी को लेकर वह उस पत्थर के पास पहुंचा और बोला, 'यह देखो जमीन से निकले चट्टान के इस हिस्से ने मेरा बहुत नुक्सान किया है, और आज हम सभी को मिलकर इसे आज उखाड़कर खेत के बाहर फेंक देना है।' ऐसा कहते ही वह फावड़े से पत्थर के किनारे वार करने लगा।

पर यह क्या ! अभी उसने एक-दो बार ही मारा था कि पूरा का पूरा पत्थर जमीन से बाहर निकल आया। साथ खड़े लोग भी अचरज में पड़ गए और उन्हीं में से एक ने हँसते हुए पूछा, 'क्यों भाई, तुम तो कहते थे कि तुम्हारे खेत के बीच में एक बड़ी सी चट्टान दबी हुई है, पर ये तो एक मामूली सा पत्थर निकला।'

किसान भी आश्चर्य में पड़ गया, सालों से जिसे वह एक भारी-भरकम चट्टान समझ रहा था दरअसल वह बस एक छोटा सा पत्थर था। उसे पछतावा हुआ कि काश उसने पहले ही इसे निकालने का प्रयास किया होता तो ना उसे इतना नुकसान उठाना पड़ता और ना ही दोस्तों के सामने उसका मजाक बनता।

*शिक्षा:-*
हम भी कई बार जिन्दगी में आने वाली छोटी-छोटी बाधाओं को बहुत बड़ा समझ लेते हैं, और उनसे निपटने की बजाय तकलीफ उठाते रहते हैं। ज़रुरत इस बात की है कि हम बिना समय गंवाएँ उन मुसीबतों से लड़ें, और जब हम ऐसा करेंगे तो कुछ ही समय में चट्टान सी दिखने वाली समस्या एक छोटे से पत्थर के समान दिखने लगेगी जिसे हम आसानी से हल पाकर आगे बढ़ सकते हैं।

21/08/2021

*निष्ठा पूर्वक कर्म*
कौशिक नामक एक ब्राह्मण बड़ा तपस्वी था। तप के प्रभाव से उसमें बहुत आत्म बल आ गया था। एक दिन वह वृक्ष के नीचे बैठा हुआ था कि ऊपर बैठी हुई चिड़िया ने उस पर बीट कर दी। कौशिक को क्रोध आ गया। लाल नेत्र करके ऊपर को देखा तो तेज के प्रभाव से चिड़िया जल कर भस्म हो गई।
ब्राह्मण को अपने बल पर गर्व हो गया। दूसरे दिन वह एक सद्गृहस्थ के यहाँ भिक्षा माँगने गया। गृहस्वामिनी पति को भोजन परोसने में लगी थी। उसने कहा, “भगवन् ! थोड़ी देर ठहरो अभी आपको भिक्षा दूँगी।” इस पर ब्राह्मण को क्रोध आया कि मुझ जैसे तपस्वी की उपेक्षा करके यह पति-सेवा को अधिक महत्व दे रही है।

गृहस्वामिनी ने दिव्य दृष्टि से सब बात जान ली। उसने ब्राह्मण से कहा, “क्रोध न कीजिए मैं चिड़िया नहीं हूँ। अपना नियत कर्तव्य पूरा करने पर आपकी सेवा करूँगी।” ब्राह्मण क्रोध करना तो भूल गया, उसे यह आश्चर्य हुआ कि चिड़िया वाली बात इसे कैसे मालूम हुई ?

ब्राह्मणी ने इसे पति सेवा का फल बताया और कहा कि इस संबंध में अधिक जानना हो तो मिथिलापुरी में तुलाधार वैश्य के पास जाइए। वे आपको अधिक बता सकेंगे। भिक्षा लेकर कौशिक चल दिया और मिथिलापुरी में तुलाधार के घर जा पहुँचा।

वह तौल-नाप के व्यापार में लगा हुआ था। उसने ब्राह्मण को देखते ही प्रणाम अभिवादन किया और कहा, “तपोधन कौशिक देव ! आपको उस सद्गृहस्थ गृहस्वामिनी ने भेजा है सो ठीक है। अपना नियत कर्म कर लूँ तब आपकी सेवा करूँगा। कृपया थोड़ी देर बैठिये।“ ब्राह्मण को बड़ा आश्चर्य हुआ कि मेरे बिना बताये ही इसने मेरा नाम तथा आने का उद्देश्य कैसे जाना ?

थोड़ी देर में जब वैश्य अपने कार्य से निवृत्त हुआ तो उसने बताया कि मैं ईमानदारी के साथ उचित मुनाफा लेकर अच्छी चीजें लोक-हित की दृष्टि से बेचता हूँ। इस नियत कर्म को करने से ही मुझे यह दिव्य दृष्टि प्राप्त हुई है। अधिक जानना हो तो मगध के निजाता चाण्डाल के पास जाइये। कौशिक मगध चल दिये और चाण्डाल के यहाँ पहुँचे।

वह नगर की गंदगी झाड़ने में लगा हुआ था। ब्राह्मण को देखकर उसने साष्टाँग प्रणाम किया और कहा, “भगवन् ! आप चिड़िया मारने जितना तप करके उस सद्गृहस्थ देवी और तुलाधार वैश्य के यहाँ होते हुये यहाँ पधारे यह मेरा सौभाग्य है। मैं नियत कर्म कर लूँ, तब आपसे बात करूँगा। तब तक आप विश्राम कीजिये।”

चाण्डाल जब सेवा-वृत्ति से निवृत्त हुआ तो उन्हें संग ले गया और अपने वृद्ध माता पिता को दिखाकर कहा, “अब मुझे इनकी सेवा करनी है। मैं नियत कर्त्तव्य कर्मों में निरन्तर लगा रहता हूँ इसी से मुझे दिव्य दृष्टि प्राप्त है।”

*तब कौशिक की समझ में आया कि केवल तप साधना से ही नहीं, नियत कर्त्तव्य कर्म, निष्ठापूर्वक करते रहने से भी ‘आध्यात्मिकता का लक्ष्य’ पूरा हो सकता है और सिद्धियाँ मिल सकती हैं।*

20/08/2021

*जिंदगी एक दिन की*
एक दिन एक आदमी एक बहुत बड़े साधु के पास जाकर दुखी मन से बोला कि बाबा,मैं अपने स्वभाव से बहुत परेशान हो गया हूँ।मैं जहाँ भी जाता हूँ, मेरा लोगों से मन मुटाव या झगड़ा हो जाता है। किसी से भी मेरी पटती नहीं है, इसलिए मैं हमेशा बहुत निराश रहता हूँ । मैने लोगों से आपके बारे में बहुत सुना है और अब देख भी रहा हूँ कि आप इतने शान्त रहते है। मुझे भी कृपया अपने जैसा ही बना दे, और कुछ उपाय बताएं जिससे मैं भी अपने आप को बदल सकूँ ।

यह सुनकर साधु बाबा दुःखी हो गये और चुपचाप उस आदमी से कुछ दूर हटकर बैठ गए ।

वह व्यक्ति फिर उनके नजदीक जाकर बोला...बाबा, क्या हुआ, मुझ पर दया करके मुझें कुछ उपाय बताएं ।

साधु ने कहा.... देखों भाई , अभी अभी मैंने अपनी साधना के बल पर ये जाना है कि अब तुम्हारा जीवन सिर्फ 15 दिन का बचा है । इसके बाद तुम इस लोक में नहीं रहोगे । यदि मेरी मानो तो तुम्हारे पास सिर्फ़ 15 दिन ही शेष हैं अपना जीवन व अपने आप को बदलने के लिए । इन दिनों में सबकों प्यार बाटों, किसी से दुर्भावना मत रखो | अपने माँ-बाप की ख़ूब सेवा करो ।अपनी पत्नी बच्चों के साथ अच्छे से अधिक से अधिक समय बिताओ । किसी से भी मिलो तो प्यार से बातें करो और जरूरतमंद लोगों के काम आओ । भूलकर भी गुस्सा मत करो । किसी से नफ़रत या द्वेष भी बिलकुल मत रखो।

साधु बाबा की बातें सुनकर वह व्यक्ति बहुत निराश हो गया । पर उसको साधु की बात अच्छी लगी और वो समझ गया कि उसके पास समय बहुत कम है इसलिए इतने दिनों में सबको खुश भी करना हैं ।

उसके बाद वह आदमी वहाँ से चला गया औऱ साधु के निर्देश के मुताबिक आचरण करने लगा ।

15 वें दिन आकर वह आदमी साधु के चरणों में गिर गया और बहुत निराश होकर बोला... बाबा, मैने सोचा कि आज मेरे जीवन का आख़री दिन है तो आपके भी दर्शन कर लूं और आपको धन्यवाद भी दे दूँ ।

साधु ने कहा पहले ये बताओं की ये 15 दिन तुमने कैसे गुजरे ?? तुमने कैसा जीवन व्यतीत किया ?

वह व्यक्ति बोला...बाबा, अब मैं बिल्कुल सब बदल गया हूँ , जो लोग मुझसे नफरत करते थे वो भी मुझसे प्यार करने लगे । मेरे घर में भी सब मुझसे अच्छे से व्यवहार करने लगे । इतने दिन में मेरा ना तो किसी से झगड़ा हुआ ना ही मुझे किसी की बात का बुरा लगा | क्योंकि मुझे मालुम था कि सिर्फ़ कुछ दिन ही तो जीना हैं फिर क्यों किसी से झगड़ा या नफरत करूँ और मैने सब से माफी भी माँग ली । और देखों आज मैं भी खुश हूँ और लोग भी मुझसे खुश हैं। जो जीवन मैं जिंदगी भर नहीं जी पाया, मुझे ऐसा लगता हैं मैने ये सिर्फ़ 15 दिनों में जी लिया ।आज मैंने प्रेम के महत्व को समझ लिया । इसलिए बाबा मैं आपका धन्यवाद करने चला आया । साथ में मेरी ये भी इच्छा है कि आप मेरे घर परिवार को भी अपना बहुत आशीर्वाद दें ताकि मेरे न रहने पर वे सुखी रहें।

आदमी की सारी बातों को सुनकर साधु बोले..देखो भाई तुम अभी मरने वाले नहीं हो । मैने तो तुम्हारे 15 दिन जीवन के शेष इसलिए कहा था ताकि तुम अंदर से ख़ुद को बदल लो क्योंकि मैं तो सिर्फ एक दिन की ही जिंदगी मानकर जिता हूँ ताकि मैं भूलकर भी किसी का दिल ना दुखा दूँ ।

19/08/2021

*बाँटने से बढ़ता है*

*एक गांव में धर्मदास नामक एक व्यक्ति रहता था।*

*बातें तो बड़ी ही अच्छी- अच्छी करता था पर था एकदम कंजूस।*
*कंजूस भी ऐसा वैसा नहीं बिल्कुल मक्खीचूस।*
*चाय की बात तो छोड़ों वह किसी को पानी तक के लिए नहीं पूछता था।*
*साधु-संतों और भिखारियों को देखकर तो उसके प्राण ही सूख जाते थे कि कहीं कोई कुछ मांग न बैठे।*
*एक दिन उसके दरवाजे पर एक महात्मा आये और धर्मदास से सिर्फ एक रोटी मांगी।*
*पहले तो धर्मदास ने महात्मा को कुछ भी देने से मना कर दिया,*
*लेकिन तब वह वहीं खड़ा रहा तो उसे आधी रोटी देने लगा। आधी रोटी देखकर महात्मा ने कहा कि अब तो मैं आधी रोटी नहीं पेट भरकर खाना खाऊंगा।*
*इस पर धर्मदास ने कहा कि अब वह कुछ नहीं देगा।*
*महात्मा रातभर चुपचाप भूखा-प्यासा धर्मदास के दरवाजे पर खड़ा रहा।*
*सुबह जब धर्मदास ने महात्मा को अपने दरवाजे पर खड़ा देखा तो सोचा कि अगर मैंने इसे भरपेट खाना नहीं खिलाया और यह भूख-प्यास से यहीं पर मर गया तो मेरी बदनामी होगी।*
*बिना कारण साधु की हत्या का दोष लगेगा।*
*धर्मदास ने महात्मा से कहा कि बाबा तुम भी क्या याद करोगे, आओ पेट भरकर खाना खा लो।*
*महात्माजी भी कोई ऐसे वैसे नहीं थे।*
*धर्मदास की बात सुनकर महात्मा ने कहा कि अब मुझे खाना नहीं खाना, मुझे तो एक कुआं खुदवा दो।*
*‘लो अब कुआं बीच में कहां से आ गया’ धर्मदास ने साधु महाराज से कहा।*
*रामदयाल ने कुआं खुदवाने से साफ मना कर दिया।*
*साधु महाराज अगले दिन फिर रातभर चुपचाप भूखा- प्यासा धर्मदास के दरवाजे पर खड़ा रहा।*
*अगले दिन सुबह भी जब धर्मदास ने साधु महात्मा को भूखा-प्यासा अपने दरवाजे पर ही खड़ा पाया तो सोचा कि अगर मैने कुआं नहीं खुदवाया तो यह महात्मा इस बार जरूर भूखा-प्यास मर जायेगा और मेरी बदनामी होगी।*

*धर्मदास ने काफी सोच- विचार किया और महात्मा से कहा कि साधु बाबा मैं तुम्हारे लिए एक कुआं खुदवा देता हूं और इससे आगे अब कुछ मत बोलना।*
*‘नहीं, एक नहीं अब तो दो कुएं खुदवाने पड़ेंगे’*,
*महात्मा की फरमाइशें बढ़ती ही जा रही थीं।*
*धर्मदास कंजूस जरूर था बेवकूफ नहीं। उसने सोचा कि अगर मैंने दो कुएं खुदवाने से मनाकर दिया तो यह चार कुएं खुदवाने की बात करने लगेगा*
*इसलिए रामदयाल ने चुपचाप दो कुएं खुदवाने में ही अपनी भलाई समझी।*
*कुएं खुदकर तैयार हुए तो उनमें पानी भरने लगा। जब कुओं में पानी भर गया तो महात्मा ने धर्मदास से कहा,*
*‘दो कुओं में से एक कुआं मैं तुम्हें देता हूं और एक अपने पास रख लेता हूं।*
*मैं कुछ दिनों के लिए कहीं जा रहा हूं, लेकिन ध्यान रहे मेरे कुएं में से तुम्हें एक बूंद पानी भी नहीं निकालना है*।
*साथ ही अपने कुएं में से सब गांव वालों को रोज पानी निकालने देना है।*
*मैं वापस आकर अपने कुएं से पानी पीकर प्यास बुझाऊंगा।’*
*धर्मदास ने महात्मा वाले कुएं के मुंह पर एक मजबूत ढक्कन लगवा दिया।*
*सब गांव वाले रोज धर्मदास वाले कुएं से पानी भरने लगे।*
*लोग खूब पानी निकालते पर कुएं में पानी कम न होता।*
*शुध्द-शीतल जल पाकर गांव वाले निहाल हो गये थे और महात्मा जी का गुणगान करते न थकते थे।*
*एक वर्ष के बाद महात्मा पुनः उस गांव में आये और धर्मदास से बोले कि उसका कुआं खोल दिया जाये।*

*धर्मदास ने कुएं का ढक्कन हटवा दिया।*
*लोग लोग यह देखकर हैरान रह गये कि कुएं में एक बूंद भी पानी नहीं था।*

*महात्मा ने कहा, ‘कुएं से कितना भी पानी क्यों न निकाला जाए वह कभी खत्म नहीं होता अपितु बढ़ता जाता है।*
*कुएं का पानी न निकालने पर कुआं सूख जाता है इसका स्पष्ट प्रमाण तुम्हारे सामने है और यदि किसी कारण से कुएं का पानी न निकालने पर पानी नहीं भी सुखेगा तो वह सड़ अवश्य जायेगा और किसी काम में नहीं आयेगा।’*
*महात्मा ने आगे कहा, ‘कुएं के पानी की तरह ही धन-दौलत की भी तीन गतियां होती हैं*
*उपयोग, नाश अथवा दुरुपयोग।*
*धन-दौलत का जितना इस्तेमाल करोगे वह उतना ही बढ़ती जायेगी।*
*धन-दौलत का इस्तेमाल न करने पर कुएं के पानी की वह धन-दौलत निरर्थक पड़ी रहेगी। उसका उपयोग संभव नहीं रहेगा या अन्य कोई उसका दुरुपयोग कर सकता है।*
*अतः अर्जित धन-दौलत का समय रहते सदुपयोग करना अनिवार्य है।’*
*‘ज्ञान की भी कमोबेश यही स्थिति होती है।*
*धन-दौलत से दूसरों की सहायता करने की तरह ही ज्ञान भी बांटते चलो।*
*हमारा समाज जितना अधिक ज्ञानवान, जितना अधिक शिक्षित व सुसंस्कृत होगा उतनी ही देश में सुख- शांति और समृध्दि आयेगी।*
*फिर ज्ञान बांटने वाले अथवा शिक्षा का प्रचार- प्रसार करने वाले का भी कुएं के जल की तरह ही कुछ नहीं घटता अपितु बढ़ता ही है’*,
*धर्मदास ने कहा, ‘हां, गुरुजी आप भी बिल्कुल ठीक कह रहे हो।*
*मुझे अपनी गलती का अहसास हो गया है।’*

18/08/2021

*गलतफहमी*
एक धोबी का गधा था। गधे का नाम था--उद्धत। वह दिन भर कपडों के गट्ठर इधर से उधर ढोने में लगा रहता। धोबी स्वयं कंजूस और निर्दयी था। अपने गधे के लिए चारे का प्रबंध नहीं करता था। बस रात को चरने के लिए खुला छोड देता। निकट में कोई चरागाह भी नहीं थी। शरीर से गधा बहुत दुर्बल हो गया था।

एक रात उस गधे की मुलाकात एक गीदड़ से हुई। गीदड़ ने उससे पूछा 'कहिए महाशय, आप इतने कमज़ोर क्यों हैं?'

गधे ने दुखी स्वर में बताया कि कैसे उसे दिन भर काम करना पडता है। खाने को कुछ नहीं दिया जाता। रात को अंधेरे में इधर-उधर मुंह मारना पडता है।

गीदड़ बोला 'तो समझो अब आपकी भुखमरी के दिन गए। यहां पास में ही एक बडा सब्जियों का बाग़ है। वहां तरह-तरह की सब्जियां उगी हुई हैं। खीरे, ककडियां, तोरई, गाजर, मूली, शलजम और बैंगनों की बहार है। मैंने बाग़ तोडकर एक जगह अंदर घुसने का गुप्त मार्ग बना रखा है। बस वहां से हर रात अंदर घुसकर छककर खाता हूं और सेहत बना रहा हूं। तुम भी मेरे साथ आया करो।' लार टपकाता गधा गीदड़ के साथ हो गया।

बाग़ में घुसकर गधे ने महीनों के बाद पहली बार भरपेट खाना खाया। दोनों रात भर बाग़ में ही रहे और पौ फटने से पहले गीदड़ जंगल की ओर चला गया और गधा अपने धोबी के पास आ गया।

उसके बाद वे रोज रात को एक जगह मिलते। बाग़ में घुसते और जी भरकर खाते। धीरे-धीरे गधे का शरीर भरने लगा। उसके बालों में चमक आने लगी और चाल में मस्ती आ गई। वह भुखमरी के दिन बिल्कुल भूल गया। एक रात खूब खाने के बाद गधे की तबीयत अच्छी तरह हरी हो गई। वह झूमने लगा और अपना मुंह ऊपर उठाकर कान फडफडाने लगा। गीदड़ ने चिंतित होकर पूछा 'मित्र, यह क्या कर रहे हो? तुम्हारी तबीयत तो ठीक हैं?'

गधा आंखें बंद करके मस्त स्वर में बोला 'मेरा दिल गाने का कर रहा हैं। अच्छा भोजन करने के बाद गाना चाहिए। सोच रहा हूं कि ढैंचू राग गाऊं।'

गीदड़ ने तुरंत चेतावनी दी 'न-न, ऐसा न करना गधे भाई। गाने-वाने का चक्कर मत चलाओ। यह मत भूलो कि हम दोनों यहां चोरी कर रहे हैं। मुसीबत को न्यौता मत दो।'

गधे ने टेढी नजर से गीदड़ को देखा और बोला 'गीदड़ भाई, तुम जंगली के जंगली रहे। संगीत के बारे में तुम क्या जानो?'

गीदड़ ने हाथ जोडे 'मैं संगीत के बारे में कुछ नहीं जानता। केवल अपनी जान बचाना जानता हूं। तुम अपना बेसुरा राग अलापने की ज़िद छोडो, उसी में हम दोनों की भलाई है।'

गधे ने गीदड़ की बात का बुरा मानकर हवा में दुलत्ती चलाई और शिकायत करने लगा 'तुमने मेरे राग को बेसुरा कहकर मेरी बेइज्जती की है। हम गधे शुद्ध शास्त्रीय लय में रेंकते हैं। वह मूर्खों की समझ में नहीं आ सकता।'

गीदड़ बोला 'गधे भाई, मैं मूर्ख जंगली सही, पर एक मित्र के नाते मेरी सलाह मानो। अपना मुंह मत खोलो। बाग़ के चौकीदार जाग जाएंगे।'

गधा हंसा 'अरे मूर्ख गीदड़! मेरा राग सुनकर बाग़ के चौकीदार तो क्या, बाग़ का मालिक भी फूलों का हार लेकर आएगा और मेरे गले में डालेगा।'

गीदड़ ने चतुराई से काम लिया और हाथ जोडकर बोला 'गधे भाई, मुझे अपनी ग़लती का अहसास हो गया हैं। तुम महान गायक हो। मैं मूर्ख गीदड़ भी तुम्हारे गले में डालने के लिए फूलों की माला लाना चाहता हूं। मेरे जाने के दस मिनट बाद ही तुम गाना शुरू करना ताकि मैं गायन समाप्त होने तक फूल मालाएं लेकर लौट सकूं।'

गधे ने गर्व से सहमति में सिर हिलाया। गीदड़ वहां से सीधा जंगल की ओर भाग गया। गधे ने उसके जाने के कुछ समय बाद मस्त होकर रेंकना शुरू किया। उसके रेंकने की आवाज़ सुनते ही बाग़ के चौकीदार जाग गए और उसी ओर लट्ठ लेकर दौडे, जिधर से रेंकने की आवाज़ आ रही थी। वहां पहुंचते ही गधे को देखकर चौकीदार बोला “यही है वह दुष्ट गधा, जो हमारा बाग़ चर रहा था।’

बस सारे चौकीदार डंडों के साथ गधे पर पिल पडे। कुछ ही देर में गधा पिट-पिटकर अधमरा गिर पडा।

(सीख: अपने शुभचिन्तकों और हितैषियों की नेक सलाह न मानने का परिणाम बुरा होता है।)

12/08/2021

*नर सेवा-नारायण सेवा*
जंगल मे बने एक मंदिर रोज एक पुजारी घी का दीपक जलाता व पुष्प अर्पित कर विभिन्न तरह की मिठाई से भोग लगाता।मन्दिर के आगे एक चौराहे पर एक गरीब व्यक्ति प्रतिदिन तेल का दीपक जलाकर रखता।दोनों का यह नित्य क्रम था।संयोग से दोनों की मृत्यु एक ही दिन हुई।उस गरीब आदमी को स्वर्ग में ऊंचा स्थान मिला व उस पुजारी को नीचा स्थान।पुजारी ने कहा प्रभु मैने आपकी अच्छी सेवा की है।आपको भिन्न-भिन्न व्यंजनों का भोग लगाया है फिर भी मुझे नीचा स्थान ।उस निम्न आदमी जो तेल का दीया जलाता ।वो तो कभी मन्दिर में भी आपके दर्शन करने नही आया।उसे मेरे से भी ऊंचा स्थान।ऐसा अन्याय मेरे साथ क्यो किया।प्रभु बोले उस आदमी ने चौराहे पर दीपक जलाकर इंसानों को रास्ता दिखाया है अर्थात उसने मानवता की निस्वार्थ सेवा की है। नर सेवा नारायण सेवा ।तुमने कुछ पाने के लिये पूजा की है।मैं मंदिरों में नही रहता।मैं तो चराचर जगत में निवास करता हूँ।
मानवता की सेवा ही मेरी सेवा है। इसलिये इस मनुष्य की सेवा तुम्हारी पूजा से श्रेष्ठ है। इसलिए तुम्हें नीचा स्थान मिला है।

08/08/2021

*लेबल*

एक शरारत के दौरान, एक छात्र ने अपने सहपाठी की पीठ पर एक कागज चिपका दिया जिसमें लिखा था "मैं बेवकूफ हूँ।" उसने बाकी छात्रों से कहा कि वें लड़के को इस बारे में न बताए।

इस तरह बाकी छात्र दिन भर उस लड़के पर हँस रहे थे। कुछ ही देर बाद गणित की कक्षा शुरू हुई और उनके शिक्षक ने बोर्ड पर एक कठिन प्रश्न लिखा।

इसका जवाब लेबल वाले लड़के के अलावा कोई नहीं दे पा रहा था। वह बोर्ड की ओर गया और उसने उस प्रश्न को हल कर दिया। वो इस बात से अनजान था कि उस लेबल के चिपके होने के कारण, बाकी छात्र उसकी ओर देख कर मन ही मन हँस रहे थे।

अब शिक्षक ने बच्चों से उसके लिए ताली बजाने को कहा और उसकी पीठ पर लगे कागज को हटा दिया जिसके बारे में वह लड़का नहीं जानता था।

शिक्षक ने उससे कहा "ऐसा लगता है कि तुम्हें अपनी पीठ पर चिपके लेबल के बारे में नहीं पता था जो तुम्हारे एक सहपाठी ने ही लगाया था, और बाकी ने इसे गुप्त रखा था।"

फिर शिक्षक ने बाकी कक्षा की ओर मुँह करके कहा "इससे पहले कि मैं तुम सबको सजा दूँ, मैं तुम्हें दो बातें बताऊँगा:

सबसे पहले, आपके पूरे जीवन में लोग आपकी पीठ पर आपकी प्रगति को रोकने के लिए कई बुरी चीजों के लेबल लगाएंगे।

अगर उस लड़के को लेबल के बारे में पता होता तो वह सवाल का जवाब देने के लिए नहीं उठता।

आपको भी जीवन में बस इतना करना है कि जब लोग आपको लेबल देते हैं तो आप उसे अनदेखा करें और अपनी प्रगति, सीखने और खुद को बेहतर बनाने के हर मौके का उपयोग करें।”

“दूसरा यह है कि, यह स्पष्ट है कि आप सभी के बीच उसका कोई वफादार दोस्त नहीं है जो उस लेबल को हटाने के बारे में उसे बताता। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपके कितने दोस्त हैं बस आपके और आपके दोस्तों के बीच की वफादारी मायने रखती है।" यदि आपके पास ऐसे मित्र नहीं हैं जो आपकी पीठ पीछे आपकी रक्षा कर सकें, जो आपकी देखभाल कर सकें, और जो वास्तव में आपकी परवाह करते हों, तो आप अकेले ही बेहतर हैं।

बुराई करने वाले व्यक्ति के लिए, वह शब्द जो उसने दूसरे व्यक्ति के विरुद्ध कहें है, वह उस व्यक्ति को जीवन भर के लिए नुकसान पहुँचा सकते हैं।

लोगों पर इस तरह के इल्जाम न लगाएं जो उन्हें नुकसान पहुंचाये जबकि इससे आपका कोइ फायदा नहीं होने वाला।

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