30/03/2022
ग्रामीण पेयजल आपूर्ति में भूजल का हिस्सा 90 प्रतिशत है। जाहिर है कि भूजल के अति दोहन से पेयजल आपूर्ति पर भी बुरा प्रभाव पड़ेगा। विशेषकर अधिकांशत: सूखाग्रस्त रहने वाले क्षेत्रों में इस बात का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए।
भूजल के अति दोहन से भूजल संकट पैदा होने की सम्भावनाएँ पैदा हो जाती हैं। भूजल के अति दोहन का अर्थ है कि भूजल के पुन: भरने की गति से ज़्यादा मात्रा में भूजल निकालना।
2007 में योजना आयोग द्वारा स्थापित भूजल प्रबन्धन विशेषज्ञ समूह की रिपोर्ट में माना गया है कि भूजल के पुन: भरने की गति से कहीं ज़्यादा गति से भूजल को निकला जा रहा है। एक साल में भूजल निकालने की मात्रा 210 बिलियन घन मीटर है। इससे भूजल का स्तर लगातार गिरता जा रहा है।
1995 में जहाँ 7 प्रतिशत प्रखण्ड संवेदनशील और अति दोहन के शिकार थे, उनकी संख्या 2004 में बढ़कर 28 प्रतिशत हो गई थी, जो अब बढ़कर और ज़्यादा हो चुकी होगी। ट्यूबवेल्स की संख्या 210 लाख से पार हो चुकी है।
ऐसी स्थिति में भूजल संरक्षण और संवर्धन पर पूरा ध्यान देने की जरूरत है। संरक्षण का अर्थ है कि प्राकृतिक रूप से जितना भूजल भर रहा है, उतनी ही मात्रा में भूजल का दोहन करना। यानी टिकाऊ प्रबन्धन करना और संवर्धन का अर्थ है, भूजल भरण की प्राकृतिक प्रक्रिया व स्थलों का गम्भीर भूगर्भ शास्त्रीय अध्ययन करके प्राकृतिक पुन: भरण की प्रक्रिया को मानव-निर्मित हस्तक्षेप से तेज़ करना।
भूगर्भीय जलाशय एक बहुत ही जटिल संरचना है, जो उस क्षेत्र की मिट्टी और चट्टानों की संरचना पर आधारित होती है। जहाँ-जहाँ सैंड स्टोन जैसी छिद्रिल चट्टानें और रेतीली दोमट मिट्टी होती है, वहाँ पानी सोखने की क्षमता ज़्यादा होती है।
भूगर्भीय चट्टानों के अन्दर टूट-फूट और दरारें आग्नेय चट्टानों वाले क्षेत्रों में भूजल संचय में मददगार होती हैं। अन्यथा जो सख्त चट्टानों वाले क्षेत्र हैं, उनमें भूजल सोखने की क्षमता कम होती है। भूजल की स्थिति अच्छी होने का बहुत बड़ा लाभ यह होता है कि सतह पर बनाए गए बड़े-बड़े जलाशयों की तरह भूमि को रोकने और विस्थापन जैसी समस्याएँ कभी नहीं होती।
भूगर्भीय जलाशय अन्दर-ही-अन्दर आपस में जुड़े भी रहते हैं, इसी पानी को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने वाली नहरों के लिये भी भूमि अधिग्रहण की जरूरत नहीं होती।
हाँ, इतना जरूर है कि भूगर्भीय जलाशयों की क्षमता और आन्तरिक जुड़ाव व्यवस्थाओं की सटीक जानकारी के आधार पर भूजल संवर्धन का कार्य मानवकृत प्रयासों से सुचारू रूप से किया जा सकता है। कुछ भूगर्भीय जलाशय 10-20 मीटर गहरे होते हैं और कुछ की गहराई 100 से 500 मीटर तक भी हो सकती है।
भूजल पर निर्भरता के स्तर को देखते हुए भूजल संवर्धन कार्य पर बहुत कम ध्यान दिया जा रहा है। भारतवर्ष में बारिश के पानी का अधिकांश हिस्सा समुद्र में चला जाता है। बारिश का पूरे साल में बँटवारा भी असमान होता है।
एक मौसम सूखा निकल जाता है तो दूसरे में जरूरत से ज़्यादा बारिश और बाढ़ की स्थिति बन जाती है, लेकिन जब जल संरक्षण की बात आती है तो सतह पर जलाशय और रिवर लिंकिंग (नदी जोड़ो) जैसे विकल्पों पर ही ज़्यादा चर्चा होती है।
ये विकल्प विस्थापन बढ़ाने वाले और केन्द्रीयकृत प्रबन्धन व्यवस्था की माँग करते हैं, ये बहुत खर्चीले हैं, जबकि भूजल की उचित संरक्षण व संवर्धन योजना के लिये कोई विस्थापन नहीं होगा। यह सस्ती और विकेन्द्रीकृत भी होगी। हाँ, इसकी भी कुछ सीमाएँ हो सकती हैं जिन्हें ध्यान में रखा जा सकता है।