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01/11/2025
24/11/2022

आपको शारिरिक परेशानियां कहीं मानसिक परेशानियों के कारण तो नहीं हो रही हैं?
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एंग्जाइटी, स्ट्रेस और डिप्रेशन के रोगियों को कई फिजिकल समस्याएं भी होती हैं। कई बार फिजिकल समस्याएं लेकर जब रोगी हमारे पास आता है और हम उन्हें कहते हैं कि, "यह समस्या आपको मेंटल स्ट्रेस, एंजायटी या डिप्रेशन की वजह से है तो वे उसे स्वीकार नहीं करते।" मैं आपको यहां पर कुछ लक्षण बताना चाहता हूं जो कि मेंटल स्ट्रेस की वजह से होते हैं और ये लक्षण क्यों उत्पन्न होते हैं उसकी भी आपको वजहें बताऊंगा-

1. बार-बार मोशन के लिए जाना या पेट फूलना और पेट में गुड गुड होना: जब हमारा दिमाग किसी प्रकार के तनाव में होता है तो वह शरीर के उन अंगों को आदेश देता है जिनमें वेस्ट मटेरियल रखा हो जिसमें आंतें भी आती हैं। आंतों में यदि पचा हुआ या अधपचा खाना होता है तो दिमाग उसे आदेश देता है कि, "मैं अभी तनाव में हूं, इसलिए आप उन सब चीजों को हटा दीजिए जोकि आवश्यक नहीं है।" आंतें सुप्रीम ऑर्गन का आदेश मानकर फोरन खाली होने के लिए प्रयासरत हो जाती हैं। जो भी भोजन हो, थोड़ा हो ज्यादा हो और पचा हुआ हो या अधपचा हो, वह उसे निकालना चाहती हैं। जब व्यक्ति स्ट्रेस में होता है तब उसे बार-बार टॉयलेट जाने की हाजत होती है। स्ट्रेस का दौर जितना हो उसे उतनी ही देर तक बार बार टॉयलेट जाना पड़ सकता है। हम देखते हैं कि जब छोटे बच्चों का कोई एग्जाम पेपर होता है जिसमें उन्हें फेल होने का या कम नंबर आने का डर होता है तो उसके पहले उन्हें दस्त लग जाते हैं, या इंटरव्यू के पहले हम बार बार टॉयलेट जाते हैं, या स्टेज पर जाने से पहले हमें टॉयलेट जाना पड़ता है।

2. बार-बार पेशाब आना: जैसा कि मैंने ऊपर बताया है कि मस्तिष्क अंगों को आदेश देता है कि वह अपने आप को खाली कर दें, शरीर को हल्का फुल्का बनाने के लिए ताकि वह आने वाली समस्याओं से लड़ सके। जैसा कि सिद्धांत है फाइट आर फ्राइट- लड़ो या भागो। लड़ने में भी और भागने में भी शरीर को हल्का होना चाहिए, इसलिए वह हल्का होना चाहता है अपने अंदर के सभी अपशिष्टों को निकालकर। इसी आदेश के तहत यूरिनरी ब्लैडर अपने आप को बार बार खाली करता है। यह अवस्था हाइपर एक्टिव ब्लैडर कहलाती है। ज़रा सा भी उसमें मूत्र भरा नहीं कि वह हमें प्रेरित करेगा टॉयलेट जाकर उसे खाली करके आने के लिए।

3. ज्यादा पसीना आना: इसके पीछे भी उपरोक्त कारण ही जो मैंने गिनाए हैं: शरीर को गैरज़रूरी चीजों से खाली किया जाए ताकि वह हल्का हो और लड़ने या भागने के लिए अनुकूल बने।

4. मस्कुलर पेन या मांस पेशियों का दर्द: क्योंकि तनाव या टेंशन शब्द का अर्थ होता है तना हुआ होना या खिंचा हुआ होना और इसका विपरीत शब्द होता है रिलैक्स। स्ट्रेस के अंदर हमारी मसल्स तनी हुई अवस्था में रहती हैं। ऐसे में लोगों को मसल्स के दर्द होते हैं। जब हम उन्हें कहते हैं कि आपको गर्दन का दर्द या पीठ का दर्द या कमर का दर्द स्ट्रेस के कारण है तो वे इसे स्वीकार नहीं करते, जबकि स्ट्रेस के दौर के गुज़र जाने के बाद उन्हें अपने दर्द में आराम हो जाता है।

स्ट्रेस में होने पर हमारी मसल्स जकड़ी हुई होती हैं जिसके कारण एक और लक्षण भी उत्पन्न होता है और वह है सांस लेने में थोड़ी सी कठिनाई होना। आम भाषा में हम कह सकते हैं कि जब हम तनाव में होते हैं तो हमें सांस खींच कर लेना होती है। हमारी पेट की और छाती की मसल्स तनाव के कारण पूरी तरह से फैल नहीं पाती जिससे हमें ताकत के साथ उन्हें फैलाकर सांस लेना पड़ती है।

5. मानसिक समस्याओं से ग्रस्त लोगों में एक और समस्या आम होती है-थकान। इसकी वजह यह है कि जब हमारा मस्तिष्क तनाव में होता है तो उस समय वह हमारे शरीर के पोषक तत्व और कैलोरीज का सबसे ज्यादा इस्तेमाल करता रहता है। सबसे महत्वपूर्ण अंग होने की वजह से शरीर के सारे अंग उसका सहयोग करते हैं और अपने हिस्से की कैलोरी भी उसे देने पर कोई एतराज़ नहीं करते। क्योंकि वे लगातार काम भी करते रहते हैं इसलिए कम कैलोरी और कम पोषक तत्व मिलने से वे थकते चले जाते हैं। इसी कारण हमारा पूरा शरीर थकान और दर्द महसूस करता है।

6. धड़कनों का बढ़ना: जब हम चिंता-तनाव में होते हैं तो हमारा मस्तिष्क हृदय को यह आदेश देता है कि वह ज्यादा से ज्यादा रक्त आपूर्ति शरीर के उन हिस्सों को करें जो लड़ने या भागने (फाइट आर फ्राइट सिद्धांत) में मदद करेंगे। इस कारण वह तेजी से धड़कने लगता है। अगर तनाव बहुत ज्यादा होता है तो यह धड़कन अनियंत्रित और अनियमित हो जाती हैं। यही वजह है कि तनाव लेने वाले व्यक्तियों का हृदय कमज़ोर और उनका ब्लड प्रेशर बढ़ा होता है।

7. डायबिटीज: मानसिक तनाव लेने वाले लोग लोगों में डायबिटीज भी कॉमन होती हैं। जब हमारे शरीर में स्ट्रेस हार्मोन रिलीज होते हैं और शरीर फाइट आर फ्राइट के लिए तैयार होता है तो लीवर और मसल्स में से स्टोर्ड ग्लूकोज़ ब्लड में प्रवाहित होने लगता है। ऐसे में शरीर को भरपूर ऊर्जा मिलती है लेकिन जब यह प्रक्रिया बार-बार होती है जबकि हम ना तो किसी से लड़ते हैं और ना कहीं भागते हैं बल्कि अपनी कुर्सी पर या अपने बेड पर या सोफे पर पड़े पड़े चिंतित होते रहते हैं तो यह एक्स्ट्रा ग्लूकोस ब्लड के अंदर ही दौड़ता रहता है और ऐसा बार-बार होने से सेल्स के ग्लूकोस इनटेक कारवने वाले इंसुलिन रिसेप्टर्स खराब हो जाते हैं। जिसके कारण ज़्यादा तनाव लेने वाले व्यक्ति को डायबिटीज हो जाती है।

मानसिक तनाव में हमें कई शारीरिक लक्षण प्रकट होते हैं इनमें से प्रमुख मैंने ऊपर बताए हैं। अभी लोगों में इनके प्रति जागरूकता नहीं है इसलिए उन्हें समझाने में चिकित्सकों को खासी मशक्कत करना पड़ रही है। रोगियों को भी समझना चाहिए कि हमारा मन शरीर का शासक है, जैसा वह चाहता है वैसा ही हमारा शरीर करता है। मन की शक्ति को हमें स्वीकार करना चाहिए और सबसे पहले हमें उसको ठीक करने का प्रयास करना चाहिए। प्लूटो का एक कथन यहां विचारणीय है कि- "चिकित्सक सबसे बड़ी गलती यह कहते हैं कि वे मन का इलाज किए बगैर ही शरीर का इलाज शुरू कर देते हैं।"

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