Star's Mystery Solution

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जीवन को आसान बनाइए, दुनिया नहीं बदल सकते परंतु अपनी सोच अवश्य बदल सकते हैं।
01/03/2022

जीवन को आसान बनाइए, दुनिया नहीं बदल सकते परंतु अपनी सोच अवश्य बदल सकते हैं।

21/08/2021

श्रावण मास की पूर्णिमा में एक ऐसा पर्व मनाया जाता है जिसमें पूरे देश के भाई-बहनों का आपसी प्यार दिखाई देता है – रक्षा बंधन। वर्ष 2021 में रक्षा बंधन 22 अगस्त, रविवार को मनाया जाएगा।भाई-बहन के प्यार, स्नेह को दर्शाते इस त्योहार की परंपरा आज लगभग हर धर्म में मनाई जाती है। धर्म-मज़हब से परे यह त्योहार भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक है।

रक्षाबंधन पर्व
किसी भी रिश्तें की मजबूती की बुनियाद होता है विश्वास और यही विश्वास एक बहन अपने भाई पर रखती है जब वह इस पर्व के दिन भाई की कलाई पर एक धागा जिसे राखी कहते है, बांधती है। अपने हाथ में राखी बंधवाकर भाई यह प्रतिज्ञा करता है कि वह अपनी बहन की सदैव रक्षा करेगा चाहे परिस्थिति कितनी ही विषम क्यों ना हो। राखी का धागा केवल रक्षा ही नहीं बल्कि प्रेम और निष्ठा से दिलों को भी जोड़ता है| इस दिन का महत्त्व इतना अधिक है कि यदि कोई बहन अपने भाई से इस दिन मिल नहीं पाती तो भी डाक द्वारा उन्हें राखी अवश्य भेजती है। रक्षा बंधन से जुड़ीं कईं ऐसी कथाएँ हैं जिनमें राखी बाँधने वाली बहन नहीं बल्कि पत्नी या ब्राह्मण भी हैं। क्योंकि यह सूत्र, यह धागा एक रक्षासूत्र होता है।

रक्षा बंधन शुभ महूर्त

रक्षा बंधन तिथि - 22 अगस्त 2021, रविवार

* रक्षाबंधन अनुष्ठान शुभ मुहूर्त - सुबह 06 बजकर 15 से शाम 05 बजकर 31 मिनट तक

* रक्षाबंधन अपराह्न मुहूर्त - दोपहर 01 बजकर 42 मिनट से शाम 04 बजकर 18 मिनट तक

पूर्णिमा तिथि आरंभ – 21 अगस्त 2021 को शाम 07 बजे से

पूर्णिमा तिथि समाप्त- 22 अगस्त 2021 को शाम 05 बजकर 31 मिनट तक

भद्रा रक्षाबंधन - प्रातः 05 बजकर 54 मिनट से 06 बजकर 12 मिनट तक ( 22 अगस्त 2021)

पौराणिक कथा
पौराणिक कथाओं के अनुसार एक समय देवों और असुरों के बीच लम्बे समय से युद्ध चला जा रहा था। इस युद्ध में देवों की निरंतर हार हो रही थी और इस बात से दुखी देवराज इंद्र अपने गुरु बृहस्पति के पास परामर्श लेने गए। वहाँ इंद्र की पत्नी इन्द्राणी भी थी। इंद्र की व्यथा सुनकर इन्द्राणी ने उनसे कहा कि वह श्रावण की शुक्ल पूर्णिमा में विधि-विधानपूर्वक एक रक्षासूत्र तैयार करेंगी। इन्द्राणी ने इंद्र से वह रक्षासूत्र ब्राह्मणों से बंधवाने के लिए कहा और कहा कि उनकी अवश्य ही विजय होगी और वाकई ऐसा करने पर देवताओं की विजय हुईं। तभी से ब्रहामणों द्वारा रक्षासूत्र बंधवाने की यह प्रथा प्रचलित है।

एक कथा के अनुसार ग्रीक नरेश महान सिकंदर की पत्नी ने सिकंदर के शत्रु पुरुराज की कलाई में राखी बांधी थी ताकि युद्ध में उनके पति की रक्षा हो सके और ऐसा हुआ भी, युद्ध के दौरान कईं अवसर ऐसे आए जिनमें पुरुराज ने जब भी सिकंदर पर प्राण घातक प्रहार करना चाहा, किन्तु अपनी कलाई पर बंधी राखी देख पुरुराज ने सिकंदर को प्राणदान दिया।

महाभारतकाल में जब श्रीकृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्र से शिशुपाल का वध किया था तो उस समय उनकी ऊँगली कट गयी थी। श्रीकृष्ण के ऊँगली से रक्त बहता देख द्रौपदी ने अपनी साड़ी का पल्ला फाड़ कर उनकी ऊँगली पर बाँध दिया था। वह साड़ी का एक टुकड़ा किसी रक्षासूत्र से कम नहीं था अतः श्रीकृष्ण ने द्रौपदी को सदैव उनकी रक्षा करने का वचन दिया और जब आगे जाकर भरी सभा में दु:शासन द्रपुदी का चीरहरण कर रहा था और पांडव और अन्य सभी उनकी सहायता नहीं कर पा रहे थे तब श्रीकृष्ण ने द्रौपदी की लाज राखी और अपना वचन पूर्ण किया।

पुराणों में एक और रोचक कथा का वर्णन है। एक समय भगवान विष्णु राजा बलि को दिए गए अपने वचन को पूरा करने के लिए बैकुण्ड छोड़ कर बलि के राज्य चले गए थे और बलि के राज्य की रक्षा करने लगे। माँ लक्ष्मी ने भगवान को वापस लाने के लिए एक दिन एक ब्राह्मणी के रूप में राजा बलि की कलाई पर राखी बाँध कर उसके लिए मंगलकामना की। राजा बलि ने भी ब्राह्मणी रुपी माँ लक्ष्मी को अपनी बहन माना और उनकी रक्षा का वचन दिया| तब माँ लक्ष्मी अपनी असल रूप में आई और राजा बलि से विनती की कि वह श्रीविष्णु जी को अपने वचन से मुक्त कर पुनः बैकुण्ड लौट जाने दे। राजा बलि ने अपनी बहन को दिए वचन की लाज रखी और प्रभु को अपने वचन से मुक्त कर दिया।

रक्षा बंधन के दिन राखी बाँधने के अतिशुभ मुहूर्त अपराह्न का समय होता है। यदि कभी अपराह्न मुहूर्त किन्ही ज्योतिषी कारणों से उपलब्ध ना हो, तो प्रदोष मुहूर्त भी अनुष्ठान के लिए शुभ माना जाता है| भद्रा समय किसी भी प्रकार के शुभ कार्य के लिए अशुभ माना जाता है इसलिए इस समय अनुष्ठान न करें|
bhasin.astro

20/08/2021

कजरी तीज-
भारत की पावन भूमि में अनेक तीज पर्व बड़े ही हर्षोल्लास और उमंग के साथ मनाए जाते हैं। कजरी तीज भारत में मनाए जाने वाले तीन प्रमुख तीज त्योहारों में से एक है। अन्य दो हरियाली तीज और हरतालिका तीज हैं। हरियाली तीज के पंद्रह दिन बाद कजरी तीज का पर्व मनाया जाता है।

कजरी तीज 2021 तिथि और समय
शुभ कजरी तीज 25 अगस्त 2021 (बुधवार) को मनाई जानी है। इस बार इस पावन अवसर पर विशेष धृति योग बन रहा है। आमतौर पर यह माना जाता है कि धृति योग में किए गए सभी कार्य सही तरीके से पूरे होते हैं।

दिनांक और समय नीचे दिया गया है।

* तृतीया तिथि प्रारंभ - 04:04 अपराह्न, 24 अगस्त 2021
*तृतीया तिथि समाप्त - 04:18 अपराह्न, 25 अगस्त 2021

कजरी तीज का क्या महत्व है?
कजरी तीज को बड़ी तीज के नाम से भी जाना जाता है। भारत के कुछ क्षेत्रों में, कजरी तीज को सतुदी तीज के नाम से भी जाना जाता है। उत्तर भारतीय कैलेंडर के अनुसार, यह शुभ अवसर भाद्रपद माह में कृष्ण पक्ष की तृतीया (तीसरे दिन) को मनाया जाता है। दक्षिण भारतीय कैलेंडर के अनुसार, यह त्योहार श्रावण महीने में कृष्ण पक्ष में आता है। लेकिन दोनों कैलेंडर में कजरी तीज एक ही दिन पड़ती है। आमतौर पर, यह पवित्र अवसर रक्षा बंधन के तीन दिन बाद और कृष्ण जन्माष्टमी से पांच दिन पहले आता है।

विवाहित महिलाओं के जीवन में कजरी तीज का दिन शुभ माना जाता है। इस दिन रखा गया व्रत विवाहित महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। इस पवित्र दिन पर, विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र के लिए अपने पति के लिए व्रत रखती हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार जो महिलाएं इस व्रत को रखती हैं और उनकी सभी मनोकामनाएं पूरी करती हैं, उनसे माता पार्वती और भगवान शिव प्रसन्न होते हैं। महिलाएं देवी पार्वती की पूजा करती हैं और सुखी वैवाहिक जीवन के लिए उनसे आशीर्वाद मांगती हैं। इस अवसर पर महिला भक्त भगवान शिव और माता पार्वती से सुखी वैवाहिक जीवन की प्रार्थना करती हैं। वे अपनी शादी में हमेशा प्यार, सद्भाव और शांति के लिए प्रार्थना करते हैं। कजरी तीज का त्योहार नारीत्व की भावना का जश्न मनाता है। चूंकि यह त्योहार पति की समृद्धि और लंबी उम्र के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है, इसलिए विवाहित महिलाएं इस दिन को बड़े उत्साह और जोश के साथ मनाती हैं।
अविवाहित लड़कियां भी इस दिन को मना सकती हैं और एक अच्छा और देखभाल करने वाला पति पाने के लिए व्रत रख सकती हैं। आमतौर पर यह माना जाता है कि अगर कोई अविवाहित लड़की इस अवसर को श्रद्धा के साथ मनाती है, तो उसे न केवल अपने लिए एक उपयुक्त पति मिलेगा, बल्कि उसका वैवाहिक जीवन हमेशा आनंदमय रहेगा।

कजरी तीज अनुष्ठान क्या हैं?
इस पवित्र अवसर पर, महिलाएं सख्त निर्जला व्रत रखती हैं, यानी एक ऐसा व्रत जिसमें आप भोजन न करने के साथ-साथ पानी का सेवन नहीं करते हैं। इस व्रत को कजरी तीज व्रत कहा जाता है। हालांकि गर्भवती महिलाएं पानी और फलों का सेवन कर सकती हैं। जब कोई महिला इस व्रत को करना शुरू करती है, तो उसे 16 वर्षों तक ऐसा करना जारी रखना चाहिए।

आइए जानते हैं इस दिन कौन-कौन से कर्म किए जाते हैं।
* कजरी तीज के दिन महिलाएं सुबह जल्दी उठकर अपने सुबह के सारे काम खत्म कर लेती हैं। महिलाओं को स्नान कर नए कपड़े पहनने चाहिए। वे खुद को चूड़ियों, सिंदूर और बिंदी से सजाते हैं। महिलाओं के लिए नवविवाहित दुल्हन के रूप में तैयार होना एक प्रथागत प्रथा मानी जाती है। कई महिलाएं हाथों और पैरों में मेहंदी भी लगाती हैं।

* कजरी तीज पर गाय की पूजा को त्योहार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। महिलाएं गाय को घी और गुड़ की रोटी खिलाकर अपना व्रत तोड़ती हैं।

* कजरी तीज पर सत्तू, घी और सूखे मेवों का उपयोग करके कई व्यंजन तैयार किए जाते हैं। कजरी तीज का व्रत करवा चौथ के समान ही है। यही कारण है कि जब द्रष्टा चंद्रमा को देखता है और उसकी पूजा करता है तो उपवास समाप्त हो जाता है।

इस दिन नीमड़ी माता की पूजा करने की भी प्रथा है। देवी नीमड़ी या नीमड़ी माता इस त्योहार से जुड़ी हैं; इसलिए देवी नीमड़ी की वंदना इस त्योहार का एक अभिन्न अंग है। एक बार जब आप सुबह स्नान कर लें, तो गाय के गोबर या मिट्टी का उपयोग करके दीवार के सहारे पोखर जैसी या तालाब जैसी आकृति बनाएं। इसके बाद इसमें नीम का तना लगाएं। नीम की टहनी या नीम की टहनी भी कर सकती है। उसके बाद तालाब में कच्चा दूध और पानी डालें, एक दीया जलाएं और उसके पास दीपक रखें। खीरा, केला, सेब, सत्तू, सिंदूर, पवित्र धागा, नींबू आदि से एक थाली बना लें। कच्चा दूध भी चाहिए। शाम के समय महिलाएं पूजा के लिए तैयार होती हैं।

शाम को नीमड़ी माता की पूजा करने के लिए आपको इन चरणों या पूजा विधि का पालन करना होगा।

* देवी नीमड़ी को जल और रोली छिड़कें और फिर उन्हें चावल अर्पित करें।
* नीमड़ी माता के पीछे की दीवार पर मेहंदी, काजल और सिंदूर का उपयोग करके 13 बिंदुओं को चिह्नित किया गया है। अनामिका उंगली से सिंदूर और मेहंदी के बिंदु बनाने चाहिए, जबकि तर्जनी का उपयोग करके 13 काजल बिंदु बनाना चाहिए।
* इसके बाद नीमड़ी माता को वस्त्र, मेहंदी, काजल और आभूषण चढ़ाए जाते हैं। नीमड़ी माता को पवित्र धागा भी चढ़ाया जाता है। दीवार को पवित्र धागे की मदद से उस पर अंकित बिंदुओं का उपयोग करके भी सजाया जाता है।
* नीमड़ी माता को फल और दक्षिणा अर्पित करें। फिर पूजा कलश (पवित्र कलश) पर तिलक लगाएं और उसके चारों ओर लच्छा (पवित्र धागा) बांधें।
* एक दीया (दीपक) जलाएं और उसे तालाब के पास रखें। नींबू, खीरा, नोज-पिन, नीम की टहनी, साड़ी आदि को दीपक की रोशनी में रखें। भक्तों को उन सभी चीजों का प्रतिबिंब देखना चाहिए जो उन्होंने देवी नीमड़ी को पानी और दूध में तालाब में अर्पित की हैं।
* इसके बाद चंद्रमा को अर्घ्य और जल अर्पित करें। भक्तों को चंद्रमा को अक्षत और रोली चढ़ानी चाहिए। उसके बाद हाथ में चांदी की अंगूठी और गेहूं के दाने लेकर चंद्रमा को अर्घ्य दिया जाता है।

कजरी तीज कैसे मनाई जाती है?
शुभ कजरी तीज उत्तरी भारतीय राज्यों, विशेष रूप से बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्य प्रदेश में बहुत धूमधाम और खुशी के साथ मनाई जाती है। चूंकि यह पवित्र त्योहार महिलाओं के लिए है, इसलिए महिलाएं इस दिन को आपस में आनंद लेती हैं। कजरी तीज पर महिलाएं पेड़ों पर या अपने घरों में सुंदर झूले लगाती हैं। यह विशेष दिन लोकगीतों की धुन पर गीत गाने और नृत्य करने जैसी आनंददायक और हर्षित गतिविधियों में व्यतीत होता है। कजरी या काजली गीत इस उत्सव का एक अनिवार्य हिस्सा हैं। बिहार और उत्तर प्रदेश के लोग ढोल की ताल के साथ कजरी गीत गाते हैं। खीर, बादाम का हलवा, घेवर आदि जैसे अविश्वसनीय व्यंजन तैयार किए जाते हैं। कजरी तीज के अनुष्ठानों और उत्सवों में सत्तू एक महत्वपूर्ण वस्तु है। इन व्यंजनों को महिलाओं द्वारा तैयार किया जाता है और देवी पार्वती को अर्पित किया जाता है। बाद में, इसे परिवार के सदस्यों और दोस्तों के बीच वितरित किया जाता है।
कुछ क्षेत्र इस पवित्र त्योहार में अपना स्वयं का स्पर्श जोड़ सकते हैं, यही वजह है कि प्रथाएं एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में भिन्न हो सकती हैं, लेकिन इस दिन के पीछे का उद्देश्य और विचार वही रहता है। संक्षेप में, कजरी तीज एक अनूठा त्योहार है जिसके सकारात्मक प्रभाव को सभी भक्तों द्वारा महसूस किया जा सकता है जो इस दिन को मनाते हैं।

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