15/01/2019
*पुष्टि मार्ग में मकर संक्रांति....🔹🔶🔸🔷*
सूर्य के उत्तरायण प्रवेश के साथ स्वागत-पर्व के रूप में मकर संक्रांति का उत्सव मनाया जाता है। वर्षभर में बारह राशियों मेष, वृषभ, मकर, कुंभ, धनु इत्यादि में सूर्य के बारह संक्रमण होते हैं और जब सूर्य धनु राशि को छोड़कर मकर राशि में प्रवेश करता है, तब मकर संक्रांति होती है। सूर्य का उत्तरायण प्रवेश अत्यंत शुभ माना गया है। महाभारत में उल्लेख मिलता है कि भीष्म शरशैया पर लेटे हुए तब तक देह त्याग को रोके रहे जब तक उत्तरायण का आरंभ नहीं हुआ। वेदों में वर्णित भगवान आदित्य तेजस्वी हैं, तांबई रंग के हैं और सात घोड़ों के रथ पर सवार हैं।
*इस दिन पुष्टि संप्रदाय में ठाकुरजी का '
भोगी के दिन अभयंग स्नान कर साज सिंगार श्याम सुभग तन। पुण्य काल तिलवा भोग घर के प्रेम सों बीरी अरोगावत निज जन ॥1॥ मोहन श्याम मनोहर मूरति करत विहार नित व्रज वृंदावन। 'परमानंददास' को ठाकुर राधा संग करत रंग निश दिन॥2॥'*
चूँकि राज भोग में पुण्य काल में तिल की सामग्री भोग में आती है। यही तिल की सामग्री शक्कर एवं गुड़ की धराई जाती है।
शीतऋतु के अनुसार ठाकुरजी का सुख विचार कर अर्थात गुड़ तथा तिल व शक्कर की सामग्री जो कि उष्ण होती है वह ठाकुरजी के लिए शीतकाल में लाभप्रद है। इसलिए इसका भोग लगता है। फिर ऋतु अनुसार राग, भोग एवं श्रृंगार पुष्टि संप्रदाय में श्री श्रीनाथजी को किया जाता है।
*तिल की सामग्री में एक तिल दूसरे तिल से जितना निकट है उतने ही प्रभु अपने निजजन को निकटता प्रदान करते हैं।*
मकर संक्रांति पर पुष्टि संप्रदाय में ठाकुरजी के सन्मुख संध्या आरती एवं सेन दर्शन में पतंग उड़ाने के पद गाए जाते हैं। '
*पतंग के पद ( १ ) 🌸
कान्ह अटा चढि चंग उडावत,
हों अपुने आंगन हू ते हेरो।।
लोचन चार भये नंदनदन,
काम कटाक्ष भयो भटु मेरो ।।१।।
कितो रही समुजाय सखीरी,
हटकर न मानत बहुतेरो।।
नंददास प्रभु अब धों मिले है,
ऐंचत डोर किंधो मन मेरो।।२।।
*भावार्थ (१) 🌸
हे सखी ! कनैया अपनी अट्टालिका (छत) पर चढकर पतंग उडा रहे हैं। मैंने अपने चौक से उन्हें देखा है। उस
नंदनंदन के नैत्र मिलते ही कामबाण रूपी नेत्रों से मेरी तरफ कटाक्ष किया
। हे सखी! कितना ही समझा रही हूँ,यह मेरा मन अटक गया है,सो मान नह़ीं रहा है। श्रीनंददासजी के प्रभु कब दर्शन देंगे। वे मेरे को प्रेम रुपी डोर से खींच रही हैं या पतंग को खींच रहे हैं ।
*( २ )*
उडी उडावन लागे लाल,
सुंदर पथक बाध मनमोहन,
बाजत मोरनके ताल ।।१।।
काउ पकरत कोउ एंचत,
कोउ देखत नैन विशाल।
कोउ न कोउ करत कुलाहल,
कोउ बजत बोहो करताल।।२।।
कोउ गुड गुडिसों रिझ,
अपुन खेंचत डोर रसाल।
"परमानंद" स्वामी मनमोहन,
रीझ रहत एक ही ततकाल।।३।।
*भावार्थ ( २ ) 🌸
व्रज के बाल सखा,पतंग उडा रहे हैं।
मनमोहन ने सुंदर कंलगी बांधी है,जो मोर की ताल जैसी बजती है। कोई पकड रहे हैं,कोई खींच रहे हैं,कोई चंचल विशाल नेत्र वाले नाच रहा हैं,कोई कोलाहल कर रहे हैं,हाथों की ताल बजा-बजाकर आनंद ले रहे हैं ।
कोई पतंग को पतंग से उलझा रहा है। प्रसन्नता से दौडकर आकर खींच रहे हैं। श्रीपरमानंदजी के स्वामी मनमोहन एक ही ताल से प्रसन्न हो रहे हैं।
इस प्रकार पूरी भारतीय संस्कृति में मकर संक्रांति का विशेष महत्व है। भगवान सूर्य का उत्तरायण इसी दिन होता है। उत्तरायण में प्राण त्यागने वाले की उर्धगति होती है। उसे गोलोकवास की प्राप्ति होती है।
भारतीय परंपरा में प्रत्येक उत्सव का तथा इससे जुड़े व्यंजनों का भी अपना महत्व है। चूँकि तिल की सामग्री, (गुड़ तथा शक्कर के साथ बनी) उष्ण होती है। अतः शीत ऋतु में इसका सेवन स्वास्थ्य की दृष्टि से लाभप्रद है। अतः मकर संक्रांति तिल की सामग्री का एवं खिचड़ी (मूँग की दाल तथा चावल आखा नमक) का विशेष रूप से दान देने का पर्व माना जाता है।
🌸 *:◇ मकर संक्रान्ति ◇:* 🌸
आज भलो संक्रान्ति पुण्य दिन,
ताते मोदक लेहो मेरे लाल ।।
बरसाने ते न्योति बुलाई,
संग लिये ब्रिजबाल ।।१।।
नीके धोय मधुर रस बांध्यो,
भरि भरि राखे कंचन थाल।।
बैठो रतन जटित सिंहासन,
सखा संग लै अपुने ग्वाल।।२।।
खेलो बैठो आय परस्पर,
सखा मंडली जोरि गोपाल।।
आपुन खाओ,देहो सबनकों,
करो परस्पर ख्याल ।।३।।
देखत फूलत मात बाबा दोउ,
वारत हें मोतिनकी चाल।।
कुंभनदास प्रभु गोवरनधर,
प्रेम प्रीति प्रतिपाल ।।४।।
*भावार्थ 🌸
हे लाल ! आज पवित्र उत्सव का दिन है अतः
लड्डु का स्वाद लीजिये। बरसाने से भोजन का निमंत्रण आया है। सभी व्रजबाल सखा सहित बुलाया है। स्वर्ण थालों का रूचिकर व्यंजनों से भरकर रखे हैं। सभी ग्वाल बालों के साथ,प्रभु रत्न जडित सिंहासन पर बिराजमान हैं । गोपाल के साथ मिलकर सभी ग्वाल सखा बैठो और खेलो आप स्वयं खावो और सब को खिलाओ,परस्पर एक दुसरे का ख्याल रखो। माता श्रीयशोदाजी और श्रीनंदबाबा द्रश्य देखकर हो रहे हैं और मुक्ताहार न्योछावर कर रहे हैं।
*जय श्री कृष्ण....*🌸💐👏🏼