Pushti Sewa Sahitya

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08/04/2026

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वरुथिनी एकादशी को अखण्ड भूमण्डलेश्वर वल्लभाचार्य श्री महाप्रभुजी के प्राकट्य उत्सव के रूप में मनाया जाता है।श्री महाप्रभ...
18/04/2020

वरुथिनी एकादशी को अखण्ड भूमण्डलेश्वर वल्लभाचार्य श्री महाप्रभुजी के प्राकट्य उत्सव के रूप में मनाया जाता है।

श्री महाप्रभुजी का प्रागटय 1535, चैत्र एकादशी बृहस्पति वार को धनिष्ठा नक्षत्र, शुभयोग, बवकरण वृश्चिकलग्न में रात की धडी़ 6/44 में हुआ । इस मास को माधव मास भी कहा जाता है। मा का अर्थ आधिदैविक लक्ष्मी, धव यानि लक्ष्मी के पति, इस लिये लगे कि प्रभु अपने ही मास मे प्रकट हुये, दैवीजीव को लीला की प्राप्ती होये।

वरुथिनी ऐकादशी को वरदान देने वाली भी माना जाता है क्यों कि वरुथिनी का अर्थ वर देना होता है।दुसरे भावके बारेमें सोचे तो बह्मसंबंधका मंत्र प्रकट हुआ वह दिन शुक्लपक्ष की ऐकादशी, ऐकादशी माह की 11 तिथि है, शरीर की10 इंद्रियां और मन 11वी को बस में करके श्रीआचार्यजी स्वरुप को जानने का प्रयत्न करे तो जीव को प्रभु प्राप्ति का मार्ग मिले। (लोकिक भोग में पडे हुऐ जीव श्रीआचार्यजी के स्वरुप को जान ही न पाये।)

श्री प्रभु ने बृज में प्रकट हो कर 11 वर्ष और 52 दिन शुद्ध पुष्टी की लीला का दान किया। वैसे ही श्रीवल्लभ ने 52 वर्ष भुतल पर बिराज के शुद्ध पुष्टी का दान किया दोनों में पूरा साम्य है।

आप वंसंत ऋतु रुपी निधी का काम करके दैवीजीव के हृदय में प्रभु मिलन के लिये आधिदैविक अग्नि प्रकट करवाने हेतु ग्रीष्म के आरंभ में प्रकट हुऐ। घोर माया के अंधकार मे पड़े दैवीजीव के हृदय में ज्योति का प्राकट्य करने। प्रकाश का उद्दीपन अंधकार में किया इसलिये प्रभु केअवतार रुप में आचार्य माने गये। आप कृष्ण पक्ष में प्रकट हो कर सदा सर्वदा 84 बेठकजी में बिराजमान हुऐ। जगत में जीवोंं का मार्गदर्शन हो, वेद वेदातो का ज्ञान हो इस हेतु ही श्री आचार्यजी कार्यरत रहे।

बाल रुप में ही अत्यत मनोहर, श्याम वर्ण तेजस्वी, विशाल ललाट अलौकिक स्वरूप के साथ प्रकटे, जैसे भगवान वामन सतयुग में प्रकट हुऐ और वामन के रुप में बालि का उद्धार किया, श्री रामचन्द्र जी ने त्रेता युग में क्षत्रियोंं का उद्धार किया, पूर्ण पुरुषोत्तम श्री कृष्ण ने द्वापरयुग में सबका उद्धार किया।

ऐसे ही श्रीमहाप्रभुजी ने भी जीवों को शरण में लिया और सरस्वतकल्प की लीला पूर्ण करने आपश्री का प्रादुर्भाव कलयुग में हुआ। आज के दिन सभी पुष्टि मार्गीय महाप्रभुजी के चित्राजी को तिलक कर, माला धरा, भोगधराऐ, गाँव में बेठकजी हो तो वहां जाके झारी भरे चरणस्पर्श करे धोती उपरणा धराये। और मंगल बधाई गान करें |

|| श्री महाप्रभु जी के प्राग्टय उत्सव की मंगल बधाई ||

राग.सारंगः-
केसर की धोती पहरे केसरी उपरणा ओढे तिलक
मुद्रा धर बैठे श्रीलक्ष्मणभटधाम।
जन्म धोष जन जन अदभुत रूचि मान मान
नख शिख की शोभा ऊपर बारों कोटिक काम।।1।।
सुंदरता निकाई तेजप़ताप अतुलताई आस-पास युवतिजन करत हैं गुणगान।
पद्नाभ प्रभु विलोक श्री गिरिवरधर वाघधीश यह
अवसर जे हुते महाभाग्यवान।।2।

*पुष्टि मार्ग में मकर संक्रांति....🔹🔶🔸🔷*सूर्य के उत्तरायण प्रवेश के साथ स्वागत-पर्व के रूप में मकर संक्रांति का उत्सव मन...
15/01/2019

*पुष्टि मार्ग में मकर संक्रांति....🔹🔶🔸🔷*

सूर्य के उत्तरायण प्रवेश के साथ स्वागत-पर्व के रूप में मकर संक्रांति का उत्सव मनाया जाता है। वर्षभर में बारह राशियों मेष, वृषभ, मकर, कुंभ, धनु इत्यादि में सूर्य के बारह संक्रमण होते हैं और जब सूर्य धनु राशि को छोड़कर मकर राशि में प्रवेश करता है, तब मकर संक्रांति होती है। सूर्य का उत्तरायण प्रवेश अत्यंत शुभ माना गया है। महाभारत में उल्लेख मिलता है कि भीष्म शरशैया पर लेटे हुए तब तक देह त्याग को रोके रहे जब तक उत्तरायण का आरंभ नहीं हुआ। वेदों में वर्णित भगवान आदित्य तेजस्वी हैं, तांबई रंग के हैं और सात घोड़ों के रथ पर सवार हैं।
*इस दिन पुष्टि संप्रदाय में ठाकुरजी का '
भोगी के दिन अभयंग स्नान कर साज सिंगार श्याम सुभग तन। पुण्य काल तिलवा भोग घर के प्रेम सों बीरी अरोगावत निज जन ॥1॥ मोहन श्याम मनोहर मूरति करत विहार नित व्रज वृंदावन। 'परमानंददास' को ठाकुर राधा संग करत रंग निश दिन॥2॥'*

चूँकि राज भोग में पुण्य काल में तिल की सामग्री भोग में आती है। यही तिल की सामग्री शक्कर एवं गुड़ की धराई जाती है।
शीतऋतु के अनुसार ठाकुरजी का सुख विचार कर अर्थात गुड़ तथा तिल व शक्कर की सामग्री जो कि उष्ण होती है वह ठाकुरजी के लिए शीतकाल में लाभप्रद है। इसलिए इसका भोग लगता है। फिर ऋतु अनुसार राग, भोग एवं श्रृंगार पुष्टि संप्रदाय में श्री श्रीनाथजी को किया जाता है।

*तिल की सामग्री में एक तिल दूसरे तिल से जितना निकट है उतने ही प्रभु अपने निजजन को निकटता प्रदान करते हैं।*

मकर संक्रांति पर पुष्टि संप्रदाय में ठाकुरजी के सन्मुख संध्या आरती एवं सेन दर्शन में पतंग उड़ाने के पद गाए जाते हैं। '

*पतंग के पद ( १ ) 🌸
कान्ह अटा चढि चंग उडावत,
हों अपुने आंगन हू ते हेरो।।
लोचन चार भये नंदनदन,
काम कटाक्ष भयो भटु मेरो ।।१।।
कितो रही समुजाय सखीरी,
हटकर न मानत बहुतेरो।।
नंददास प्रभु अब धों मिले है,
ऐंचत डोर किंधो मन मेरो।।२।।

*भावार्थ (१) 🌸

हे सखी ! कनैया अपनी अट्टालिका (छत) पर चढकर पतंग उडा रहे हैं। मैंने अपने चौक से उन्हें देखा है। उस
नंदनंदन के नैत्र मिलते ही कामबाण रूपी नेत्रों से मेरी तरफ कटाक्ष किया
। हे सखी! कितना ही समझा रही हूँ,यह मेरा मन अटक गया है,सो मान नह़ीं रहा है। श्रीनंददासजी के प्रभु कब दर्शन देंगे। वे मेरे को प्रेम रुपी डोर से खींच रही हैं या पतंग को खींच रहे हैं ।

*( २ )*
उडी उडावन लागे लाल,
सुंदर पथक बाध मनमोहन,
बाजत मोरनके ताल ।।१।।
काउ पकरत कोउ एंचत,
कोउ देखत नैन विशाल।
कोउ न कोउ करत कुलाहल,
कोउ बजत बोहो करताल।।२।।
कोउ गुड गुडिसों रिझ,
अपुन खेंचत डोर रसाल।
"परमानंद" स्वामी मनमोहन,
रीझ रहत एक ही ततकाल।।३।।

*भावार्थ ( २ ) 🌸

व्रज के बाल सखा,पतंग उडा रहे हैं।
मनमोहन ने सुंदर कंलगी बांधी है,जो मोर की ताल जैसी बजती है। कोई पकड रहे हैं,कोई खींच रहे हैं,कोई चंचल विशाल नेत्र वाले नाच रहा हैं,कोई कोलाहल कर रहे हैं,हाथों की ताल बजा-बजाकर आनंद ले रहे हैं ।
कोई पतंग को पतंग से उलझा रहा है। प्रसन्नता से दौडकर आकर खींच रहे हैं। श्रीपरमानंदजी के स्वामी मनमोहन एक ही ताल से प्रसन्न हो रहे हैं।

इस प्रकार पूरी भारतीय संस्कृति में मकर संक्रांति का विशेष महत्व है। भगवान सूर्य का उत्तरायण इसी दिन होता है। उत्तरायण में प्राण त्यागने वाले की उर्धगति होती है। उसे गोलोकवास की प्राप्ति होती है।
भारतीय परंपरा में प्रत्येक उत्सव का तथा इससे जुड़े व्यंजनों का भी अपना महत्व है। चूँकि तिल की सामग्री, (गुड़ तथा शक्कर के साथ बनी) उष्ण होती है। अतः शीत ऋतु में इसका सेवन स्वास्थ्य की दृष्टि से लाभप्रद है। अतः मकर संक्रांति तिल की सामग्री का एवं खिचड़ी (मूँग की दाल तथा चावल आखा नमक) का विशेष रूप से दान देने का पर्व माना जाता है।

🌸 *:◇ मकर संक्रान्ति ◇:* 🌸

आज भलो संक्रान्ति पुण्य दिन,
ताते मोदक लेहो मेरे लाल ।।
बरसाने ते न्योति बुलाई,
संग लिये ब्रिजबाल ।।१।।
नीके धोय मधुर रस बांध्यो,
भरि भरि राखे कंचन थाल।।
बैठो रतन जटित सिंहासन,
सखा संग लै अपुने ग्वाल।।२।।
खेलो बैठो आय परस्पर,
सखा मंडली जोरि गोपाल।।
आपुन खाओ,देहो सबनकों,
करो परस्पर ख्याल ।।३।।
देखत फूलत मात बाबा दोउ,
वारत हें मोतिनकी चाल।।
कुंभनदास प्रभु गोवरनधर,
प्रेम प्रीति प्रतिपाल ।।४।।

*भावार्थ 🌸
हे लाल ! आज पवित्र उत्सव का दिन है अतः
लड्डु का स्वाद लीजिये। बरसाने से भोजन का निमंत्रण आया है। सभी व्रजबाल सखा सहित बुलाया है। स्वर्ण थालों का रूचिकर व्यंजनों से भरकर रखे हैं। सभी ग्वाल बालों के साथ,प्रभु रत्न जडित सिंहासन पर बिराजमान हैं । गोपाल के साथ मिलकर सभी ग्वाल सखा बैठो और खेलो आप स्वयं खावो और सब को खिलाओ,परस्पर एक दुसरे का ख्याल रखो। माता श्रीयशोदाजी और श्रीनंदबाबा द्रश्य देखकर हो रहे हैं और मुक्ताहार न्योछावर कर रहे हैं।

*जय श्री कृष्ण....*🌸💐👏🏼

🍁श्री वल्लभाधीश की जय 🍁बधाई 🎷बधाई 🎷बधाई आज का दिन हमारे लिए अति आनंद उत्साह का है । प्रभु चरण श्री गुसाँईजी (श्री विट्ठल...
30/12/2018

🍁श्री वल्लभाधीश की जय 🍁
बधाई 🎷बधाई 🎷बधाई
आज का दिन हमारे लिए अति आनंद उत्साह का है । प्रभु चरण श्री गुसाँईजी (श्री विट्ठलनाथजी)के प्राकट्य उत्सव की अनेक अनेक मंगल मय बधाई
😊🍁🍃🍁🍃🍁🍃🍁
विट्ठल शब्द का अर्थ है-
"विदा ज्ञानेन ठान् शून्यान लाति स्वीकरोति सःविट्ठल "जो ज्ञान शुन्य जीवों को क्रपा पूर्वक भगवद ज्ञान देकर शरण में लेते हैं वो विट्ठल हैं ।पाण्डुरंग श्री विट्ठलनाथजी के स्वरूप से आपश्री का साक्षात ऐक्य होने से भी आपश्री का नामकरणविट्ठल किया गया ।
एसे परमदयाल, परम क्रपाल,प्रभु चरण श्रीगुसाँईजी की क्रपा द्रष्टि सदैव जीवों पर बनी रहे।
बहुत बहुत बधाई वल्लभनन्दन श्री गुसांईंजी के जन्मोत्सव की
🌷बधाई 🌷बधाई 🌷बधाई 🌷
🍁🎷🎺🎉🎊🎉🎷🎺🍁

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29/10/2018

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*शरद पूर्णिमा की बहुत बहुत बधाइयाँ*  *शरद पूर्णिमा*🌕 शरद पूर्णिमा की रात्रि को भगवान श्रीकृष्ण ने गोपियों का मनोरथ पूरा ...
24/10/2018

*शरद पूर्णिमा की बहुत बहुत बधाइयाँ*

*शरद पूर्णिमा*

🌕 शरद पूर्णिमा की रात्रि को भगवान श्रीकृष्ण ने गोपियों का मनोरथ पूरा करने के लिए वेणु नाद किया और गोपियाँ वेणु नाद सुनकर जिस भी स्थिति में थी प्रभु मिलन को दौड़ी चली आई 🌕

✨ इतनी रात्रि में घोर वन(वृन्दावन) में गोपियों के आने पर भगवान श्री कृष्ण गोपियों को समझाते है कि इस तरह रात में अकेले नहीं आना चाहिए...जो नारी धर्म के अनुकूल नहीं ✨

💫 गोपियाँ भगवान की बाते सुनती रहीं फिर बोलना शुरू किया है और कहा -
*मैवं विभोsर्हति भवान गदिन्तु नृशंसं*
*सन्त्यज्य सर्व विषयं स्तव पादमूलम*
*भक्ता भजस्व दुरवग्रह मा त्यजास्मान*
*देवो यथाssदिपुरुषो भजते मुमुक्षून्*

❄ गोपियों ने कहा - प्यारे श्री कृष्ण तुम घट घट व्यापी हो हमारे हृदय की बात जानते हो, तुम्हे इस प्रकार निष्ठुरता भरे वचन नहीं कहने चाहिए, सब कुछ छोड़कर केवल तुम्हारे चरणों में ही प्रेम करती है; इसमे संदेह नहीं कि तुम स्वतंत्र और हठीले हो और तुम पर हमारा कोई वश नहीं है; फिर भी तुम अपनी ओर से, जैसे आदिपुरुष भगवान नारायण कृपा करके अपने मुमुक्षु भक्तो से प्रेम करते है वैसे ही हमें स्वीकार कर लो हमारा त्याग मत करो

*चार प्रकार की गोपियाँ रास में है -* नित्य सिद्धा, साधन सिद्धा, श्रुति सिद्धा, प्रवीणा

🔘 नित्य सिद्धा सबसे ऊँचे स्तर की गोपियाँ हैं, उच्च कोटि की महापुरुष है और तीसरे स्तर की श्रुति सिद्धा गोपियाँ वेद की ऋचाएँ है, सभी गोपियाँ भगवान से कहती हैं कि हम आपकी शरणागत है 🔘

*सन्त्यज्य सर्व विषयं स्तव पादमूलम*
*भक्ता भजस्व दुरवग्रह मा त्यजास्मान*

🌺 गोपियों की बातों से भगवान रास विहारी प्रसन्न होकर रास करते हैं, जिससे गोपियों को मान हो जाता है और प्रभु अंतर्धान हो जाते हैं 🌺

*रासेश्वरी श्रीराधा रानी की जय*

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