09/06/2026
यह तस्वीर जीवन का सबसे कड़वा सच दिखाती है। सीढ़ी पर सबसे ऊपर “सफलता” का कप रखा है, लेकिन उस तक पहुंचने से पहले हमें “लोग क्या कहेंगे”, “समय नहीं है”, “रिश्तेदार”, “दोस्त”, “परिवार”, “आराम की आदत”, “समाज”, “डर” और “असफलता का डर” जैसी सीढ़ियां पार करनी पड़ती हैं। सबसे मुश्किल बात ये कि नीचे खड़े लोग हमें ऊपर जाने ही नहीं देना चाहते – वे रस्सी पकड़कर पैर खींचते हैं, बहाने देते हैं, डराते हैं।
लेकिन सफलता उन्हीं को मिलती है जो इन खींचने वाले हाथों को नजरअंदाज करके एक और कदम ऊपर चढ़ते हैं। “बहाने” वाली सीढ़ी को छोड़ दो, “डर” को पीछे रख दो, और बस “सफलता” की तरफ देखते हुए बढ़ते जाओ। याद रखो – छोटा कदम भी आगे बढ़ने का संकेत है। रुकना हार है, चलना जीत है। बस चलते रहो।
_एक छोटी प्रेरक कहानी:_
एक मेंढक ने पेड़ की चोटी पर चढ़ने का निश्चय किया। नीचे खड़े बाकी मेंढक चिल्लाने लगे – “ये असंभव है! आज तक कोई नहीं चढ़ा! तुम नहीं चढ़ पाओगे!” पर वो मेंढक फिर भी चढ़ता गया और चोटी पर पहुंच गया। जानते हो क्यों? क्योंकि वो मेंढक बहरा था। उसने सोचा कि सारे मेंढक उसका हौसला बढ़ा रहे हैं। इसलिए अगर तुम्हें अपने लक्ष्य तक पहुंचना है, तो नकारात्मक आवाज़ों के प्रति “बहरे” हो जाओ।
_गिराने को तो दुनिया खड़ी है, पर उड़ान तेरी अपनी है,_
_जो खींचे नीचे रस्सी से, उससे ऊंची सीढ़ी अपनी है।_
_मंज़िल तुझको पुकार रही, बस कदम तू आगे बढ़ा,_
_कल वही तालियां बजाएंगे, जो आज राह में खड़े हैं।_