11/12/2022
*रोग से मुक्ति क्यों नहीं हो पाती?*
*ज्ञानी जी कहते हैं*.....
बुद्ध ने कहा है: जिस घर में दीया जलता है, उस घर में चोर नहीं आते। ऐसे ही जिस घर में दिव्या ध्यान का दीया जलता है, उस घर में कोई रोग प्रवेश नहीं करते। ये सब रोग हैं। ये ही असली रोग हैं। शरीर के रोग तो कुछ खास नहीं हैं। उनका तो इलाज चिकित्सक कर देता है। मैं भी चिकित्सक हूं, लेकिन मैं आत्मा के रोगों का चिकित्सक हूं।
ऊपरी लक्षणों पर मत जाओ, हमेशा जड़ को काटो। और जड़ को काटने की एक ही कुल्हाड़ी है- दिव्य ध्यान।
एक बार *फकीर रिंझाई* नदी के तट पर बैठा था। और एक आदमी ने उससे पूछा, संक्षिप्त में कह दें कि आपकी शिक्षा का सार क्या है? वह चुपचाप ही बैठा रहा। कुछ बोला ही नहीं। उस आदमी ने कहा, आपने सुना नहीं?
आप बहरे तो नहीं हैं?
ऊंचा तो नहीं सुनते हैं?
मैंने पूछा- उसने, चिल्ला कर कहा अब की बार- कि मैंने पूछा कि आपकी शिक्षाओं का संक्षिप्त सार क्या है, थोड़े में बता दें।
रिंझाई ने कहा, बताया, लेकिन तुम समझे नहीं। मैं चुप जो बैठा रहा, वही मेरी शिक्षाओं का सार है। चुप बैठ जाओ। उस आदमी ने कहा, इतना संक्षिप्त भी न करो, थोड़ा विस्तार। तो रिंझाई ने अंगुली से रेत पर लिख दिया- ``ध्यान``। उस आदमी ने कहा, यह भी कोई विस्तार हुआ! यह तो बात वही की वही हुई। रिंझाई ने कहा, मैं भी क्या करूं, सागर को कहीं से भी चखोगे तो खारा ही पाओगे। उस आदमी ने कहा, थोड़ा और, मुझे समझाने के लिए जरा जोर देकर, स्पष्ट कर दें।
तो रिंझाई ने बड़े-बड़े अक्षरों में लिख दिया- _ध्यान_। उस आदमी ने कहा, तुम आदमी पागल तो नहीं हो? मैं पूछता हूं कि मुझे समझाने के लिए, साफ करने के लिए और थोड़ा प्रकाश डालो, और स्पष्ट करो। तो रिंझाई खड़ा हो गया और अपने पैर से उसने रेत पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिख दिया- *दिव्य ध्यान*। और उसने कहा कि अब इससे ज्यादा मैं भी नहीं कर सकता।
ध्यान ही सार-सूत्र है। ध्यान मिल गया तो सब संपदा मिल गई, प्रभु का राज्य मिल गया। ध्यान नहीं मिला तो तुम कुछ भी पा लो, सब व्यर्थ है।
हजारों लाखों के मेडिकल बिल बचाओ कष्टों(शारीरिक मानसिक और आध्यात्मिक) से मुक्ति पाओ *दिव्या रेकी ध्यान अपनाओ*