26/04/2026
एक बार की बात है। भक्तराज हनुमान् रामसेतु के समीप ध्यान में अपने प्रभु श्रीराम की भुवन मोहिनी झाँकी का दर्शन करते हुए आनन्दित थे। ध्यानावस्था में हनुमान जी को बाह्य जगत् की स्मृति न थी। उसी समय शनिदेव समुद्र तट पर टहल रहे थे। उन्हें अपनी शक्ति एवं पराक्रम का अत्यधिक अहंकार था। वे मन-ही-मन सोच रहे थे 'मुझमें अतुलनीय शक्ति है। सृष्टि में मेरी समता करने वाला कोई नहीं है।' इस प्रकार विचार करते हुए शनि की दृष्टि ध्यानमग्न हनुमान जी पर पड़ी। उन्होंने हनुमान जी को पराजित करने का निश्चय किया। युद्ध का निश्चयकर शनि हनुमान जी के समीप पहुँचे। शनि ने हनुमान जी के समीप पहुँचकर उद्दण्डता का परिचय देते हुए अत्यन्त कर्कश स्वर में कहा- 'बन्दर! मैं प्रख्यात शक्तिशाली शनि तुम्हारे सम्मुख उपस्थित हूँ और तुमसे युद्ध करना चाहता हूँ। तुम पाखण्ड त्यागकर खड़े हो जाओ।' तिरस्कार करने वाली अत्यन्त कटुवाणी सुनते ही भक्तराज हनुमान ने अपने नेत्र खोले और बडी ही शालीनता एवं शान्ति से पूछा-'महाराज! आप कौन है और यहाँ पधारने का आपका उद्देश्य क्या है ?"शनि ने अहंकार पूर्वक उत्तर दिया- 'मैं परम तेजस्वी सूर्य का परम पराक्रमी पुत्र शनि हूँ। जगत् मेरा नाम सुनते ही काँप उठता है। मैंने तुम्हारे बल-पौरुष की कितनी ही गाथाएँ सुनी हैं। इसलिये मैं तुम्हारी शक्ति की परीक्षा लेना चाहता हूँ। सावधान हो जाओ, मैं तुम्हारी राशि पर आ रहा हूँ।'हनुमान जी ने अत्यन्त विनम्रतापूर्वक कहा- 'शनिदेव! मैं वृद्ध हो गया हूँ और अपने प्रभु का ध्यान कर रहा हूँ। इसमें व्यवधान मत डालिये। कृपया अन्यत्र चले जाइये।' मदमत्त शनि ने गर्व से कहा-'मैं कहीं जाकर लौटना नहीं जानता और जहाँ जाता हूँ, वहाँ अपना प्रभाव स्थापित कर ही देता हूं।' हनुमान जी ने शनिदेव से बार-बार प्रार्थना की- 'महात्मन्! मैं वृद्ध हो गया हूँ। युद्ध करने की शक्ति मुझमें नहीं है। मुझे अपने भगवान् श्रीराम का स्मरण करने दीजिये। आप यहाँ से जाकर किसी और को ढूँढ लीजिये। मेरे भजन-ध्यान में विघ्न उपस्थित मत कीजिये। 'कायरता तुम्हें शोभा नहीं देती।' अत्यन्त उद्धत शनि ने हनुमान जी की अवमानना के साथ व्यंग्य पूर्वक तीक्ष्ण स्वर में कहा-"तुम्हारी स्थिति देखकर मेरे मन में करुणा का संचार हो रहा है, किंतु मैं तुमसे युद्ध अवश्य करूँगा।' इतना कहकर, शनि ने हनुमान जी का हाथ पकड़ लिया और उन्हें युद्ध के लिये ललकारने लगे। हनुमान ने झटककर अपना हाथ छुड़ा लिया। शनि पुनः हनुमान जी का हाथ पकड़कर उन्हें युद्ध के लिये खींचने लगे।'आप नहीं मानेंगे।' धीरे-से कहते हए हनुमान जी ने अपनी पूंछ बढाकर शनि को उसमे लपेटना शुरू किया। कुछ ही क्षणों में हनुमान जी की पूंछ में शनि बंध गये। उनका अहंकार, उनकी शक्ति एवं उनका पराक्रम व्यर्थ सिद्ध हुआ। शनिदेव असहाय होकर दृढ़ बन्धन की पीड़ा से छटपटा रहे थे।'अब रामसेतु की परिक्रमा का समय हो गया।'हनुमान जी उठे और दौड़ते हए सेतू की परिक्रमा करने लगे। शनिदेव सम्पूर्ण शक्ति से भी अपना बन्धन शिथिल न कर सके। वीर हनुमान् दौड़ते हुए जान-बूझकर अपनी पूँछ शिलाखण्डों पर पटक रहे थे। इससे शनि की दशा बड़ी दयनीय हो गई थी।शिलाखण्डों पर पटके जाने से उनका शरीर रक्त से लथपथ हो गया। उनकी पीड़ा की सीमा नहीं थी और हनुमान जी की परिक्रमा में कहीं विराम नहीं दीख रहा था।तब शनि अत्यन्त कातर स्वर में प्रार्थना करने लगे- 'करुणामय भक्तराज! मुझ पर कृपा करें। अपनी उद्दण्डता का दण्ड मैं पा लिया। आप मुझे मुक्त कीजिये।'दयामूर्ति हनुमान जी रुक गए। शनि का अंग-प्रत्यंग लहूलुहान हो गया था। उनकी रग-रग में असह्य पीड़ा हो रही थी। हनुमान जी ने शनि से कहा-'यदि तुम मेरे भक्त की राशि पर कभी न जाने का वचन दो तो मैं तुम्हें मुक्त कर सकता हूँ और यदि तुमने ऐसा नहीं किया तो मैं तुम्हें कठोरतम दण्ड प्रदान करूंगा।' भक्तराज ! निश्चय ही मैं आपके भक्त की राशि पर कभी नहीं जाऊँगा।' पीड़ा से छटपटाते हुए शनि ने अत्यन्त आतुरता से प्रार्थना की—'आप कृपापूर्वक मुझे शीघ्र बन्धनमुक्त कर दीजिये।' हनुमान जी ने शनि को छोड़ दिया। शनि ने अपना शरीर सहलाते हुए हनुमान जी के चरणों में सादर प्रणाम किया और वे चोट की असह्य पीड़ा से व्याकुल होकर अपनी देह पर लगाने के लिये तेल माँगने लगे। उन्हें जो तेल प्रदान करता है, उनसे वे सन्तुष्ट होकर आशीष देते हैं। कहते हैं, इसी कारण अब भी शनिदेव को तेल चढ़ाया जाता है।