Occult of Utopia's Master of Possibilities

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26/05/2026

दूसरे भाव (2nd House) में

राहु का होना वाणी और धन के मामले में बहुत ही मिश्रित और अक्सर चुनौतीपूर्ण परिणाम देता है।

आपकी बात काफी हद तक ज्योतिषीय मान्यताओं से मेल खाती है।यहाँ राहु की इस स्थिति के बारे में विस्तार से बताया है:

1. मीठी जीभ लेकिन खतरनाक शब्द (Sweet Tongue, Dangerous Words)मायावी वाणी: राहु दूसरे भाव में व्यक्ति को बहुत ही चतुर वक्ता बनाता है। ऐसे लोग अक्सर बहुत मीठा और प्रभावित करने वाला बोलते हैं।
दोगलापन: ये अपनी बातों से दूसरों को फंसा सकते हैं। मीठी बातों के पीछे अक्सर कोई छिपा हुआ स्वार्थ होता है

।अचानक कड़वाहट: ये लोग कब अपनी मीठी बातों से बदलकर खतरनाक या अपमानजनक शब्द बोल दें,

कहना मुश्किल होता

।2. बिना अपराधबोध के झूठ (Lying Without Guilt)राहु का प्रभाव:

दूसरे भाव का राहु झूठ बोलने की प्रवृत्ति (habit) दे सकता है।बिना ग्लानि के: जैसा आपने कहा, ऐसे जातक झूठ बोलते समय कोई अपराधबोध (guilt) या हिचकिचाहट महसूस नहीं करते। उनके लिए सच और झूठ के बीच की रेखा बहुत धुंधली होती है

।3. झूठ से पतन (Downfall due to Lying)अति का अंत: राहु जब दूसरे भाव में बहुत ज्यादा झूठ बुलवाता है, तो एक समय ऐसा आता है जब झूठ की परतें खुलने लगती हैं।पतन (Downfall): यही झूठ व्यक्ति की प्रतिष्ठा, करियर और रिश्तों के पतन का कारण बनता है।

वह राहु के इस "छल" वाले गुण को दर्शाता है। यह व्यक्ति जानबूझकर बात को घुमाकर या झूठ बोलकर अपने फायदे के लिए गलत जानकारी दे रहा था।क्या करें?

(उपाय/सावधानी)राहु की इस स्थिति के लिए कुछ सावधानियां बरतनी चाहिए:दूसरों की बातों पर आंख बंद करके भरोसा न करें: विशेषकर पैसों के मामलों में।झूठ से बचें: जातक को अपनी वाणी पर संयम रखना चाहिए और झूठ बोलने से बचना चाहिए, क्योंकि यह अंततः उन्हें ही नुकसान पहुँचाएगा।वाणी की शुद्धि: हमेशा सच बोलने का प्रयास करें और अपशब्दों का प्रयोग न करें।

निष्कर्ष: ज्योतिष के अनुसार, राहु दूसरे भाव में वाणी के माध्यम से जीवन में उतार-चढ़ाव लाता है। आपके भाई को उस व्यक्ति की मीठी बातों में न आकर तथ्यात्मक जांच (fact-check) करनी चाहिए।
रवि आनंद ज्योतिष, न्यूमरोलॉजिस्ट, टैरो कार्ड रीडर, रेकी मास्टर, लाल किताब रेमेडी मास्टर Mob +919726351246
नोट- अगर आप अपना भविष्य जानना चाहते हैं तो ऊपर दिए गए मोबाइल नंबर पर कॉल करके या व्हाट्स एप पर मैसेज भेजकर अपना अपॉइंटमेंट फिक्स करे अगर आप एस्ट्रोलॉजी सीखने में या जानने में विश्वास रखते हैं तो मेरे ग्रुप. https://www.facebook.com/groups/658700770950079/ 👍 लाइक कीजिए और ज्वाइन कीजिए https://chat.whatsapp.com/FdfyhoiaJgr7sRsp4AbSGG

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09/05/2026
24/04/2026

कैसा होगा या रहेगा अंत समय।

अंत समय कैसा रहेगा,अंत समय सुखद होगा या कष्टकारी होगा, कैसी स्थिति रहने वाली है मृत्यु के समय और अंत समय कष्टकारी रहने वाला है तो क्या उपाय करले या करे जिससे अंत समय अच्छा हो जाये आदि इसी बारे में बात करते है।

कुंडली का 8वा भाव अंत समय(मृत्यु या मृत्यु समय) कैसा रहने वाला है, कैसा रहेगा आदि इसी बात से सम्बंधित हैं।अब 8वे भाव का स्वामी और 8वे भाव पर शुभ ग्रहो और कुंडली के शुभ भाव स्वामियों का प्रभाव या संबध है या कुंडली मे ग्रहो से बनने वाले शुभ योगो का संबध 8वे भाव, 8वे भाव स्वामी से है तब अंत समय सुखद होगा, समय अंत समय निकल जायेगा,...अब जबकि 8वे भाव ,8वे भाव स्वामी पर शनि राहु केतु मंगल का ज्यादा से ज्यादा एक साथ प्रभाव पड़ रहा या सम्बन्ध बन रहा है तब अंत समय कष्टकारी रहने वाला है इसके अलावा 8वे भाव या 8वे भाव स्वामी से ज्यादा से ज्यादा अशुभ योग बन रहे हैं तब भी अंत समय कष्टकारी रहेगा, ऐसी स्थिति यदि हैं तब 8वे भाव संबधि ग्रहो को उपाय करके पहले से ही शुभ और अनुकूल बना लेने से अंत समय अच्छा हो जाएगा, मृत्यु कष्टकारी नही होगा, तड़पना नही पड़ेगा आदि।।

अब इन सभी फलों को कुछ उदाहरणों से समझते है कैसा रहने वाला है अंत समय और खराब रहने वाला है तो क्या उपाय करने से सुखद निकल जायेगा अंत समय आदि।

उदाहरण_अनुसार_वृष_लग्न1:-
वृष लग्न में 8वे भाव का स्वामी गुरु बलवान होकर शुभ स्थिति में बैठा है या फिर गुरु और 8वा भाव शुक्र बुध या चन्द्र के साथ है तब अंत समय सुखद रहकर मृत्य होगी,अब जबकि 8वे भाव स्वामी गुरु और 8वे भाव दोनो से राहु केतु या शनि मंगल का सम्बन्ध है तब प्राण कष्ट से निकलेंगे इसके अंत समय कष्टकारी रहेगा।ऐसी स्थिति में गुरु पर और 8वे भाव पर जो ग्रह कष्ट की स्थिति बन रहे है उनकी शांति के उपाय कर लेना ही अंत समय अच्छा बनाएगा।।

उदाहरण_अनुसार_कन्या_लग्न2:-
कन्या लग्न में 8वे भाव स्वामी मंगल है अब मंगल और 8वा भाव यहाँ राहु केतु शनि से संबध में है तब अंत समय निश्चित ही बहुत शारीरिक कष्ट देने वाला रहने वाला है, अंत समय मृत्यु कष्ट देगी बीमारी से अंत समय आएगा।इसके अलावा मंगल और 8वा भाव यहाँ बलवान है किसी तरह का शुभ योग बनाकर बैठा है या फिर मंगल और 8वा भाव शुभ ग्रहों बलवान गुरु शुक्र बुध चन्द्र इन ग्रहो से संबध में हैं तब अंत समय कोई कष्ट परेशानी नही होगी, सुखद मृत्यु होकर अंत समय ठीक होगा।।

उदाहरण_अनुसार_मीन_लग्न3:-
मीन लग्न में 8वे भाव स्वामी शुक्र और 8वा भाव बलवान और शुभ स्थिति में है तब अंत समय अच्छा व सुख रहेगा, जबकि शुक्र या 8वे भाव पर ज्यादा से ज्यादा पाप ग्रहों या फिर अशुभ योगो का सम्बन्ध है तब अंत समय कष्ट देगा, छठे भावस्वामी सूर्य का अशुभ प्रभाव यहाँ 8वे भाव या शुक्र पर रोग बीमारी से कष्टकारी समय हो जाने से अंत समय कष्ट देगा काफी, ऐसी स्थिति में 8वे भाव को कष्ट दे रहे ग्रहो की शांति के उपाय पहले से कर लेने से अंत समय कष्टकारी न होकर अपने पैरों पर खड़े होकर ही सुख अंत समय हो जाएगा।।

अब यदि 8वे भाव ,8वे भाव स्वामी पर अशुभ योगो, अशुभ पाप ग्रहों का प्रभाव होने से अंत समय कष्टकारी बन गया है या बना हुआ है तब पहले से ही कष्ट देने वाले ग्रहो की शांति के उपाय और 8वे भाव ,भाव स्वामी को शुभ कर लेने के उपाय कर लेने से अंत समय सुखद और अच्छा चला जायेगा।।
रवि आनंद ज्योतिष, न्यूमरोलॉजिस्ट, टैरो कार्ड रीडर, रेकी मास्टर, लाल किताब रेमेडी मास्टर Mob +919726351246
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24/04/2026

कुण्डली के बारह भाव में शुक्र और प्रभाव :

प्रथम_भाव_में_शुक्र_का_प्रभावः
लग्न में शुक्र की स्थिति से जातक प्रायः उत्तम कोटि के कपड़े पहनना पसंद करता है एवं रहन-सहन में नजाकता नफासत पसंद होता है ! जातक अपने सौंदर्य का विशेष ध्यान रखता है एवं सौंदर्य प्रसाधनों का शौकीन होता है ! स्त्रियों की जन्म पत्रिका में लग्नस्थ् शुक्र के प्रभाव से वह अति सुन्दर होती हैं !
वहीं शत्रु राशि में स्थित होने पर शौक श्रंगार करने व तड़क भड़क वाले कपड़े पहनने का कोई शौक नहीं होता है ! पत्नी फिर भी खूबसूरत मिलती है, परन्तु विचारों में भिन्नता हो सकती है !

द्वितीय_भाव_में_शुक्र_का_प्रभावः
स्वभावः
द्वितीय स्थान में स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक मिष्ठान प्रिय, यशस्वी, सुखी, कलाप्रिय एवं भाग्यशाली होता है ! वह कर्त्तव्य में चतुर और अच्छा वक्ता भी होता है !
पूर्ण दृष्टिः
द्वितीय शुक्र की पूर्ण दृष्टि अष्टम भाव पर पड़ती है जिससे जातक सामान्य या गुप्त रोगी हो सकता है ! जातक कफ व वात रोगों से भी प्रभावित होता है ! शुक्र की अष्टम स्थान पर दृष्टि से जातक पर्यटनशील एवं विदेशवासी होता है !
मित्र/शत्रु राशिः
शुक्र के स्व, उच्च या मित्र राशियों में होने से जातक उत्तम सुख प्राप्त करता है ! मित्र राशियों में होने से जातक को धन, यश, लोकप्रियता व बड़े कुटुम्ब की प्राप्ति होती है ! शत्रु व नीच राशि में शुक्र के होने पर शुभ फल में न्यूनता आती है ! शत्रु राशि का शुक्र होने पर जातक का धन संचय नहीं होता ! जातक को पैतृक सम्पत्ति की प्राप्ति में भी अनेक बाधाएँ आती हैं ! जातक के पारिवारिक सुख में भी न्यूनता आती है !
भाव विशेषः
द्वितीयस्थ शुक्र के प्रभाव से जातक धन का अर्जन व बचत करता है ! जातक मित्रों के लिए हितैषी होता है ! शुक्र के प्रभाव से जातक पारिवारिक व्यवसाय को आगे बढ़ाता है ! कला के क्षेत्र में जातक प्रसिद्धि प्राप्त करता है ! प्रतिकूल प्रभाव से कुमित्रों की संगति के कारण बर्बाद हो सकता है ! जातक में धैर्य नही होता, जिससे वह बिना सोचे समझे निर्णय ल लेेता है एवं अनेक कष्ट उठाता है !

तृतीय_भाव_में_शुक्र_का_प्रभावः
स्वभावः
तृतीय स्थान में स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक मनोरंजन प्रिय, सुखी, धनी, यात्रा प्रिय, विद्वान और कला प्रिय होता है ! जातक मिलनसार और विपरीत लिंग के व्यक्ति के प्रति सहज रूप से आकर्षित होता है ! जातक को बहनों का विशेष सहयोग मिलता है !
पूर्ण दृष्टिः
तृतीय भाव में स्थित शुक्र की पूर्ण दृष्टि नवम स्थान पर होती है जो जातक के लिए शुभ फलदायक होती है ! नवम स्थान पर शुक्र की दृष्टि से जातक सरपंच, ग्रामाधिपति व अपने कुल व समाज में उच्च पद व प्रतिष्ठान प्राप्त करता है ! जातक की धर्म के प्रति अत्यंत आस्था होती है ! जातक की कीर्ति दूर-दूर फैलती है ! रंगमंच, होटल व्यवसाय व मनोरंजन के क्षेत्र में जातक को विशेष सफलता प्राप्त होती है !
मित्र/शत्रु राशिः
मित्र, स्व व उच्च राशि में स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक का व्यक्तित्व आकर्षक होता है व उसे भाई-बहनों का सहयोग प्राप्त होता है ! वह पराक्रमी एवं अपने पुरूषार्थ से सफलता प्राप्त करता है ! स्वराशि में जातक लम्बी यात्राएं अपने आनंद के लिए करता है ! शत्रु व नीच राशि में शुक्र के प्रभाव से विपरीत फल प्राप्त होता है ! जातक को भाईयों व बहनों से सहयोग नहीं मिलता ! उसमें साहस की कमी रहती है !
भाव विशेषः
तृतीय भाव भाई-बहन व पराक्रम से सम्बंध रखता है इसलिए तृतीय भाव में शुक्र की स्थिति से जातक को भाईयों विशेषकर बहनों का सुख व सहयोग प्राप्त होता है ! जातक पराक्रमी होता है एवं अपने स्वयं के पराक्रम से प्रगति करता है ! तृतीय स्थान पर शुक्र की स्थिति जातक को भाग्यशाली भी बनाती है ! जातक चित्रकारी में विशेष रूचि रखता है ! जातक को पर्यटन में विशेष आनंद आता है !

चतुर्थ_भाव_में_शुक्र_का_प्रभाव :
स्वभावः
चतुर्थ स्थान में स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक सुखी, दीर्घायु, सुसंतानों से युक्त, साहित्य प्रेमी, धनी, यशस्वी, पुत्रवान, अपने मकान की साज-सज्जा में विशेष रुचि रखने वाला और प्रसन्नचित्त होता है ! जातक को उत्तम वाहन सुख प्राप्त होता है !
पूर्ण दृष्टिः
जातक की जन्म पत्रिका में स्थित चतुर्थ भाव के शुक्र की सप्तम दृष्टि दसवें भाव पर पड़ती है जिसके प्रभाव से जातक कला, रंगमंच, मदिरालय (बीयर बार) जुआघर (कैसिनों), सौन्दर्य प्रसाधन व स्त्री उपयोगी वस्तुओं सम्बंधी व्यापार व व्यवसाय में सफल होता है व स्थिति के अनुसार लाभ प्राप्त भी करता है !
मित्र/शत्रु राशिः
मित्र, स्व और उच्च काशि में चतुर्थस्थ शुक्र फलदायक होता है ! जमीन जायदाद, पिता, माता और वाहन का सुख जातक उत्तम प्राकार से प्राप्त करता है ! शत्रु व नीच राशि में व्यर्थ की विलासिता पूर्ण वस्तुओं में जातक अपना अर्जित धन व्यय करता है माता से विशेष प्रेम होने के बाद भी अनबन व वैचारिक मदभेद होने से माता को अपने आप बिना विचार के कष्ट होता है !
भाव विशेषः
चतुर्थस्थ शुक्र के प्रभाव से जातक के माता से अच्छे सम्बंध होते हैं एवं उसे उनका सहयोग सदैव मिलता रहता है ! चतुर्थ स्थान में शुक्र की स्थिति से जातक परोपकारी व व्यवहारकुशल होता है ! जातक पुत्रवान, सुंदर, सुखी एवं दीर्घायु होता है ! जातक को समस्त प्रकार के सुख, उच्च कोटि का मकान, श्रेष्ठ वाहन सुख एवं जमीन-जायदाद का सुख चतुर्थ स्थान में शुक्र की अच्छी स्थिति के कारण प्राप्त होता है !

पंचम_भाव_में_शुक्र_का_प्रभावः
स्वभावः
पंचम स्थान में स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक उदार, कला प्रेमी एवं अनेक संतानों से युक्त होता है ! वह चतुर, दयालु, विद्वान, संगीत प्रेमी, स्नेही स्वभाव वाला और मधुर भाषी भी होता है !
पूर्ण दृष्टिः
पंचम स्थान स्थित शुक्र की सप्तम दृष्टि एकादश स्थान पर होती है, जिसके प्रभाव से जातक की आय में वृद्धि होती है ! जातक का स्त्रियों की सहायता से धनार्जन होता है !
मित्र/शत्रु राशिः
मित्र, स्व व उच्च राशि का शुक्र होने पर जातक को उच्च शिक्षा प्राप्त होती है ! उसे कला सम्बंधी क्षेत्रों में प्रसिद्धि मिलती है ! जातक को संतान का सुख प्राप्त होता है ! जातक विद्वान होता है ! जातक यद्यपि कि बहुत पढ़ा लिखा नही होता पर उसे विद्वानों सा आदर प्राप्त होता है ! जातक सहज और सरल होता है ! शत्रु व नीच राशि का शुक्र होने पर जातक की शिक्षा-दीक्षा में बाधाएँ आती हैं ! उसे कार्यक्षेत्र में असफलता मिलती है !
विशेषः
पंचमस्थ शुक्र के प्रभाव से जातक को परिवार से लाभ होता है ! जातक कला के क्षेत्रो में जैसे संगीत, वादन, इत्यादि में प्रसिद्ध होता है ! सुखी, भोगी एवं लाभवान होता है ! जातक दूसरों का विशेष ख्याल रखता है ! जातक न्या.वान, दानी उदार एवं सद्गुणी होता है ! जातक व्यवसायी एवं प्रतिभाशाली होता है !

छठवे_भाव_में_शुक्र_का_प्रभावः
स्वभावः
षष्ठ स्थान में शुक्र के प्रभाव से जातक संकीर्ण मनोवृत्ति वाला होता है ! वह गुप्त रोगों से ग्रसित, स्त्री सुख से हीन और फिजूल खर्ची होता है !
पूर्ण दृष्टिः
षष्ठ स्थान पर स्थित शुक्र की पूर्ण दृष्टि द्वादश स्थान पर पड़ती है जिसके प्रभाव से जातक विवादास्पद कार्यो में व्यय करने वाला होता है ! जातक का बीमारियों में अधिक व्यय होता है !
मित्र/शत्रु राशिः
शुक्र के मित्र, स्व व उच्च राशि में होने पर जातक को मध्यम फल प्राप्त होते हैं एवं शत्रु व नीच राशि में होने से अशुभ फल की प्राप्ति होती है ! मित्र राशि में शुक्र के होने पर जातक को मामा पक्ष से लाभ होता है ! जातक के अनेक मित्र होते हैं ! शत्रु राशि के शुक्र से जातक को लाभ होता है ! जातक दुखी एवं अस्वस्थ रहता है ! जातक को गुप्तरोगी, मूत्ररोग व वीर्य सम्बंधी रोग हो सकते हैं !
भाव विशेषः
षष्ठ भाव में स्थित शुक्र को प्रभाव से जातक वैभवहीन व दुखी होता है ! जातक के शत्रु नही होते और यदि होते हैं तो वह जातक से पराजित होते हैं ! जातक स्त्री के प्रति आकर्षित होता है किंतु उसे उसकी पत्नी का सुख पूर्ण प्राप्त नही होता है ! जातक दुराचारी भी हो सकता है एवं अनैतिक कार्यों मे संलग्न रहता है ! स्त्रियों में गर्भाशय सम्बंधी कष्ट होते हैं !

सप्तम_भाव_में_शुक्र_का_प्रभावः
स्वभावः
सप्तम भाव में स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक स्नेही, धनी, सौंदर्य प्रेमी और सुखी होता है ! जातक सुखी वैवाहिक जीवन वाला, साहित्य प्रेमी, जीवन के सभी सुखों का आनंद उठाने वाला होता है ! जातक के अनेक मित्र होते हैं और वह मिलनसार होता है ! सप्तम भाव में शुक्र के प्रभाव से जातक बुद्धिमान, चंचल और वह (विपरीत लिंग के अनुसार) स्त्री या पुरुष प्रेमी भी होता है !
पूर्ण दृष्टिः
शुक्र की पूर्ण दृष्टि लग्न पर होती है जिसके प्रभाव से जातक सुन्दर, भाग्यवान, चतुर, भोग-विलास में रुचि रखने वाला और विपरीत लिंग के व्यक्ति की ओर विशेष आकर्षण रखता है !
मित्र/शत्रु राशिः
मित्र, स्व व उच्च राशि में स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक का स्वतंत्र व्यवसाय होता है ! स्त्री राशि का होने पर स्त्री जातक अति सुंदर होती है ! जातक को व्यापार व व्यवसाय दोनों से ही लाभ होता है, परन्तु साझेदारी में प्रायः हानि उठाना पड़ता है ! शत्रु व नीच राशि का शुक्र होने पर जातक चरित्रवान होता है और उसे शत्रुओं से कष्ट उठाने पड़ते हैं ! जातक को स्त्री से सुख में भी कमी-आती है !
भाव विशेषः
सप्तम स्थान के शुक्र की स्थिति से जातक का स्वतंत्र व्यवहार और किसी के दबाव में न रहने का स्वभाव होता है ! जातक सुंदर, आकर्षक व्यक्तित्व और सेक्स के प्रति अधिक रुचि रखता है ! जातक बुद्धिमान, सहज, धैर्यवान और दूसरो के सहज ही मोहित कर लेता है ! जातक उदार और लोकप्रिय होता है ! जातक का भाग्योदय विवाह के बाद होता है ! जातक भाग्यवान, विलासी एवं चंचल होता है !

अष्टम_भाव_में_शुक्र_का_प्रभावः
स्वभावः
अष्टम भाव में स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक कामी स्वभाव का और गुप्त कार्यों में रत रहने वाला होता है ! जातक आलसी होता है पर प्रसिद्धि प्राप्त करता है ! प्रेम सम्बंधों में जातक को प्रायः असफलता प्राप्त होती है ! जातक की रुचि आध्यात्म, तंत्र, मंत्र और गुप्त विद्याओं में होती है !
पूर्ण दृष्टिः
द्वितीय स्थान पर स्थित शुक्र की पूर्ण दृष्टि द्वितीय भाव पर पड़ती है जिसके प्रभाव से जातक परिवार का सुख और धन धान्य को प्राप्त करता है ! जातक क्रोधी एवं निर्दयी भी होता है !
मित्र/शत्रु राशिः
स्व, मित्र एवं उच्च राशियों में अष्टम भाव में शुक्र जातक को सुखी, धनी तथा सहज बनाता है ! जातक का जीवन साथी उससे पूरा सहयोग करता है ! जीतक दीर्घायु होता है ! शत्रु व नीच राशि का शुक्र होने पर जातक को आर्थिक और शारीरिक कष्ट होते हैं ! जातक को व्यवसाय में अव्यवस्था तथा अस्थिरता होती है !
भाव विशेषः
अष्टम भाव स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक ज्योतिष विद्या के प्रति अध्ययनरत रहता है ! जातक मनस्वी होता है ! जातक का परस्त्री से सम्बंध व आकर्षण रहता है ! अष्टम शुक्र जातक को निर्दयी रोगी एवं दुखी बनाता है ! जातक की पर्यटन में विशेष रूचि होती है !

नवम_भाव_में_शुक्र_का_प्रभावः
स्वभावः
नवम भाव में स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक आस्तिक, गुणी और मनोरंजन प्रिय होता है ! वह यशस्वी, प्रतिभाशाली, उदार एवं सबके प्रति सहानुभूति रखता है ! जातक आशावादी और सर्वसुख प्राप्त करने वाला होता है ! जातक बुद्धिमान, चंचल और भाग्यशाली होता है !
पूर्ण दृष्टिः
नवम भाव में स्थित शुक्र की तृतीय स्थान पर पूर्ण दृष्टि के प्रभाव से जातक महत्वाकाँक्षी, अधिक बहनों वाला, सुखी तथा पराक्रमी होता है !
मित्र/शत्रु राशिः
स्व, मित्र एवं उच्च राशियों में स्थित शुक्र जातक के लिए शुभ फलदायक होता है ! जातक का विवाह के बाद भाग्योदय होता है ! व्यवसाय के लिए महिलाओं सें जातक को विशेष सहयोग प्राप्त होता है ! शत्रु एवं नीच राशिगत नवम शुक्र जातक को भाग्यहीन बनाता है ! जातक को सुख प्राप्त नहीं होता !
भाव विशेषः
जातक नवमस्थ शुक्र के प्रभाव से अत्यंत आशावादी, उच्चाधिकारियों का कृपापात्र और सुखी वैवाहिक जीवन व्यतीत करने वाला होता है ! जातक का भाग्य पूर्ण रूप से उसका साथ देता है ! जातक को नवमस्थ शुक्र के प्रभाव से पत्नी एवं सम्बंधियो द्वारा धन प्राप्त होता है। विदेश से व्यापारिक सम्बंधो से विशेष लाभ होता है ! कलात्मक और साहित्यिक क्षेत्रों में सफलता प्राप्त होती है ! जातक आस्तिक, दयालु, गुणी होता है एवं तीर्थ यात्राएँ करता हैं !

दशम_स्थान_में_शुक्र_का_प्रभाव :
स्वभावः
दशम भाव में स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक विद्वान और तर्क वितर्क में कुशल होता है ! जातक मातृ पितृ भक्त, धार्मिक कार्यो में रुचि रखने वाला, विलासी, भाग्यशाली, पराक्रमी, गुणी, दयालु, न्यायप्रिय, धनी और सम्पत्ति से युक्त होता है !
पूर्ण दृष्टिः
चतुर्थ स्थान में स्थित शुक्र की पूर्ण दृष्टि चतुर्थ भाव पर पड़ती है जिसके प्रभाव से जातक सुखी होता है ! जातक को माता का उत्तम सुख व कृपा प्राप्त होती है ! जातक उत्तम प्रकार के भवन व वाहन का सुख प्राप्त करता है।
मित्र/शत्रु राशिः
स्व, मित्र और उच्च राशि में स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक की उन्नति होती है ! स्त्रियों से विशेष कर माता से जातक को धन की प्राप्ति अवश्य होती है ! स्त्री राशि में होने पर जातक का भाग्योदय विवाह के बाद होता है ! जातक स्वयं के व्यवसाय से लाभ प्राप्त करता है ! शत्रु व नीच राशि का शुक्र स्त्रियों द्वारा धनहानि करवाता है ! जातक कई प्रकार के व्यवसाय करना पसंद करता है ! सभी व्यवसायों में जातक को सफलता प्राप्त नही होती ! जातक के पिता से तनावपूर्ण सम्बंध होते हैं !
भाव विशेषः
दशमस्थ शुक्र जातक के राज्य भाव में वृद्धि करता है ! व्यापार व व्यवसाय में स्त्रियों से व स्त्रियों द्वारा लाभ होता है ! जातक को व्यवसाय में अपनी माता से भी सहायता प्राप्त होती है ! सौंदर्य प्रसाधन, अभिनय, इत्यादि सम्बंधी कार्यो में जातक को विशेष सफलता प्राप्त होती है !

शुक्र_का_ग्यारहवे_भाव_में_प्रभाव :
स्वभावः
ग्यारहवें स्थान में शुक्र के प्रभाव से जातक गुणवान, धनवान, यशस्वी, पुत्रवान, प्रभावशाली, उदार कलाप्रिय और मित्रों से युक्त होता है ! जातक ईश्वर से प्रीति रखने वाला और भौतिक जीवन में सफल होता है !
पूर्ण दृष्टिः
एकादश स्थान पर शुक्र की पूर्ण दृष्टि पंचम स्थान पर पड़ती है, जिसके प्रभाव से जातक संतान और विद्या से परिपूर्ण और कई पुत्रों का पिता होता है ! जातक गुणवान होता है !
मित्र/शत्रु राशिः
मित्र, स्व व उच्च राशि का शुक्र जातक के लिए उन्नति दायक और आय को बढ़ाने वाला होता है ! जातक की आय व खर्च दोनों ही अधिक होते हैं ! जातक अनुशासित जीवन व्यतीत करता है ! शत्रु व नीच राशि में शुक्र होने से आय और यश दोनों में न्यूनता होती है ! जातक अनावश्यक खर्च करता है ! मित्रों से जातक को हानि उठानी पड़ती है !
भाव विशेषः
एकादश भाव स्थित शुक्र जातक को स्थिर लक्ष्मीवान बनाता है ! जातक धनवान, परोपकारी एवं लोकप्रिय होता है ! जातक विलासी एवं कामी भी होता है ! जातक को पुत्र सुख प्राप्त होता है ! जातक को कर्म क्षेत्र में महिला पक्ष का विशेष सहयोग मिलता है, जिससे आय के क्षेत्र में विशेष उन्नति होती है ! ग्यारहवें स्थान में स्थित शुक्र के प्रभाव से कला के विभिन्न क्षेत्रों से जातक धनार्जन करता है ! लेखन, कविता लेखन, पाठन, व्यंगकार, नाटक तथा अभिनय में रुचि रखने वाला होता है ! प्रायः अभिनेता, अभिनेत्री, फिल्म निर्माता तथा इस क्षेत्र से सम्बद्ध लोगों की पत्रिका में एकादश शुक्र होता है ! प्रायः अभिनेता, अभिनेत्री, फिल्म निर्माता तथा इस क्षेत्र से सम्बद्ध लोगों की पत्रिका में एकादश भाव में शुक्र होता है ! श्वेत वस्तुओं तथा रत्नों के व्यापार से भी जातक को लाभ होता है !

द्वादश_भाव_में_शुक्र_का_प्रभाव :
स्वभावः
द्वादश भाव में स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक अत्यंत विलासी पर भाग्यशाली होता है ! जातक मनोरंजन ओर स्त्रियों पर व्यय करता है ! जातक अत्यंत धनी होता है ! साहसी और नित्य नये कार्य करना चाहता है !
पूर्ण दृष्टिः
द्वादश भाव पर स्थित शुक्र की पूर्ण दृष्टि छठे स्थान पर पड़ने से जातक भाग्यशाली एवं शत्रुओं पर विजय पाने वाला होता है ! जातक गुप्त रोगी और वीर्य विकारी होता है !
मित्र/शत्रु राशिः मित्र, स्व व उच्च राशि का शुक्र शुभ फलदायक हो सकता है ! जातक को धन, यश और अन्य सुख प्राप्त होता है ! शत्रु व नीच राशि में शुक्र होने पर जातक गरीब, कामी व्यवसायी, दुर्बुद्धि और स्वार्थी होता है ! उसकी आय से व्यय अधिक होता है ! अतः वह जमीन में कई प्रकार के कष्ट उठाता है !
भव विशेषः
द्वादश भाव में स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक राजा के समान उच्च अधिकार प्राप्त होता है ! धन, मान सम्मान आदि प्रचुर मात्रा में जातक को प्राप्त होता है ! जातक क्षणिक आवेश में बिना सोचे समझे कार्य करता है अतः मानसिक तनाव रहता है ! सेक्स में जातक विशेष रुचि रखता है ! जातक व्यसनी होता है ! जातक कटुभाषी, अविश्वासी एवं आलसी भी होता है !
रवि आनंद ज्योतिष, न्यूमरोलॉजिस्ट, टैरो कार्ड रीडर, रेकी मास्टर, लाल किताब रेमेडी मास्टर Mob +919726351246
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24/04/2026

कब होगा आपका भाग्योदय -

भाग्य के साथ देने पर व्यक्ति का पुरूषार्थ भी सफल होता है। एक स्वस्थ, सुशिक्षित, धनी, सुशील पत्नी तथा पुत्रों सहित सुखी जीवन का आनंद लेते व्यक्ति को देखकर सभी उसे भाग्यशाली कहते हैं। प्रत्येक व्यक्ति अपना भाग्य (भविष्य) जानने के लिए उत्सुक रहता है। भाग्य व्यक्ति के प्रारब्ध (पिछले जन्म के कर्मफल) को दर्शाता है।

जन्मकुंडली के नवम् भाव को भाग्य स्थान माना गया है। नवम् भाव से भाग्य, पिता, पुण्य, धर्म, तीर्थ यात्रा तथा शुभ कार्यों का विचार किया जाता है।

नवम भाव कुंडली का सर्वोच्च त्रिकोण स्थान है। उसे लक्ष्मी का स्थान माना गया है। नवम भाव, एकादश (लाभ) भाव से एकादश होने के कारण ‘लाभ का लाभ’, अर्थात जातक के जीवन की बहुमुखी समृद्धि दर्शाता है।

‘मानसागरी’ ग्रंथ के अनुसार:- ‘‘विहाय सर्वं गणकैर्विचिन्त्यो भाग्यालयः केवलमन्न यलात्।’’

अर्थात्’ ‘‘एक ज्योतिषाचार्य को दूसरे सब भावों को छोड़कर केवल नवम् भाव का यत्नपूर्वक विचार करना चाहिए, क्योंकि नवम् भाव का नाम भाग्य है।

जब नवम भाव अपने स्वामी या शुभ ग्रहों से युक्त अथवा दृष्ट हो तो मनुष्य भाग्यशाली होता है। नवमेश भी शुभ ग्रहों से युक्त अथवा दृष्ट हो तो सर्वदा शुभकारी होता है।

यदि पाप ग्रह भी अपनी, मित्र, मूल त्रिकोण अथवा उच्च राशि में नवम् भाव में स्थित हो तो अपने बलानुसार शुभ फल देता है। जैसे शनि भाग्येश होकर भाग्य भाव में स्थित हो तो जातक जीवन पर्यन्त भाग्यशाली रहता है।

(भाग्य योग करें सौरे स्थिते च जन्मनि। – मानसागरी)।

लग्नेश यदि भाग्य भाव में स्थित हो तब भी जातक परम भाग्यशाली होता है। बृहस्पति नवम भाव का कारक ग्रह है। जब बलवान बृहस्पति नवम भाव में हो, या लग्न, तृतीय अथवा पंचम भाव में स्थित होकर नवम् भाव पर दृष्टिपात करें तो विशेष भाग्यकारक होता है। नवम भाव में सुस्थित बृहस्पति यदि शुक्र और बुध के साथ हो तो पूर्ण शुभ फलदायक होता है। परंतु इन पर शनि, मंगल व राहु की दृष्टि हो तो आधा ही शुभ फल मिलता है। नवम् भाव व नवमेश निर्बल अथवा पीड़ित हो तो जातक भाग्यहीन होता है।

भाग्य भाव से पंचम भाव लग्न भाव होता है। अतः उसका स्वामी (लग्नेश) भी भाग्यकारक होता है। ‘भावात् भावम्’ सिद्धांत के अनुसार नवम् से नवम् अर्थात पंचम भाव और पंचमेश भी भाग्यकारक होते हैं। ज्ञातव्य है कि नवम और पंचम (त्रिकोण भाव) को लक्ष्मी स्थान की संज्ञा दी गई है। जब ये तीनों ग्रह (नवमेश, लग्नेश और पंचमेश) बलवान हों तथा शुभ भाव में अपनी स्वयं, उच्च, अथवा मूलत्रिकोण राशि में शुभ दृष्ट हों, तो व्यक्ति जीवन पर्यन्त भाग्यशाली होता है। कारक बृहस्पति का संबंध शुभ फल में वृद्धि करता है।

भाग्योदय काल

त्रिक भावों (6, 8, 12) के अतिरिक्त अन्य भाव में स्थित नवमेश अपने बलानुसार उस भाव के कारकत्व के फल में वृद्धि करता है। नवमेश, नवम भाव स्थित ग्रह तथा नवम भाव पर दृष्टि डालने वाले ग्रहों की दशा में भाग्योदय होता है। ‘फलित मार्तण्ड’ ग्रंथ के अनुसार नवमेश, नवम भाव स्थित ग्रह व नवम भाव पर दृष्टिपात करने वाले बलवान ग्रह अपने निर्धारित वर्ष में जातक का भाग्योदय करते हैं।

ग्रहों के भाग्योदय वर्ष इस प्रकार हैंः- सूर्य- 22, चंद्रमा- 24, मंगल- 28, बुध-32, बृहस्पति -16 (40), शुक्र-21 (25), शनि-36, राहु-42 और केतु -48 वर्ष।

बृहत पाराशर होरा शास्त्र ग्रंथ के अनुसार

1. भाग्य स्थान में बृहस्पति और भाग्येश केंद्र में हो तो 20वें वर्ष से भाग्योदय होता है।

2. यदि नवमेश द्वितीय भाव में और द्वितीयेश नवम भाव में हो तो 32वें वर्ष से भाग्योदय, वाहन प्राप्ति और यश मिलता है।

3. यदि बुध अपने परमोच्चांश (कन्या राशि-150 ) पर और भाग्येश भाग्य स्थान में हो तो जातक का 36वें वर्ष से भाग्योदय होता है।

सौभाग्यकारी गोचर

1. जब गोचर में नवमेश की लग्नेश से युति हो, या फिर परस्पर दृष्टि विनिमय हो अथवा लग्नेश का नवम भाव से गोचर हो तो भाग्योदय होता है। परंतु उस समय नवमेश निर्बल राशि में हो तो शुभ फल नहीं मिलता।

2. नवमेश से त्रिकोण (5, 9) राशि में गुरु का गोचर शुभ फलदायक होता है।

3. जब जन्म राशि से नवम्, पंचम या दशम भाव में चंद्रमा आए उस दिन जातक को शुभ फल की प्राप्ति होती है।
रवि आनंद ज्योतिष, न्यूमरोलॉजिस्ट, टैरो कार्ड रीडर, रेकी मास्टर, लाल किताब रेमेडी मास्टर Mob +919726351246
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24/04/2026

कुंडली में सरकारी नौकरी के योग

वैदिक ज्योतिष शास्त्र के अनुसार कुंडली व्यक्ति के जन्म, समय और स्थान के आधार पर बनाई जाती है. कुंडली के माध्यम से जातक के भाग्य और आने वाले जीवन की भविष्यवाणी की जाती है. कुंडली में विभिन्न ग्रहों की स्थिति और उनके आपसी संयोग से उत्पन्न योग जातक के जीवन में अलग-अलग फल प्रदान करते हैं. यहां कुछ सरकारी नौकरी के शुभ योग है, जो जातक की कुंडली में होने से व्यक्ति को सरकारी नौकरी मिल सकती हैं.

व्यक्ति को कब मिलता है सरकारी नौकरी

केंद्र और त्रिकोण स्थान: ज्योतिष शास्त्र में केंद्र और त्रिकोण भाव बहुत महत्वपूर्ण माना जाता हैं, क्योंकि जब दशम भाव का स्वामी, जो कार्यक्षेत्र का भाव है, इन दोनों में से किसी एक भाव में होता है, तो यह धन योग बनाता है, जो सरकारी नौकरी में सफलता दिलाने का काम करता है.

राजयोग: ज्योतिष शास्त्र में यह योग सबसे शक्तिशाली योगों में से एक है. यह तब बनता है, जब चंद्रमा ग्यारहवें भाव में और गुरु तीसरे भाव में स्थित होते है. यह योग सरकारी नौकरी के लिए शुभ होता है.

गजकेसरी योग: यह योग बृहस्पति और चंद्रमा के कारण बनता है. यह योग सरकारी नौकरी सहित किसी के करियर में ज्ञान, बुद्धि और सफलता ला सकता है.

अमला योग: किसी व्यक्ति की जन्मकुंडली में बुध, शुक्र, गुरु ग्रह दसवें भाव में होते है, तो जातक की कुंडली में धन लाभ के योग बनते है और यह योग सरकारी नौकरी दिलाने का काम करता है.

सरकारी नौकरी का योग: यदि व्यक्ति के लग्न मेष, मिथुन, सिंह, वृश्चिक, वृषभ, तुला राशि है और शनि ग्रह, गुरु एक-दूसरे से केंद्र या त्रिकोण में होने पर सरकारी नौकरी का योग बनता हैं.

सूर्य ग्रह: अगर जातक की कुंडली में सूर्य मजबूत होते है, तो व्यक्ति को सरकारी नौकरी प्राप्त होगी.

चंद्रमा ग्रहः अगर जातक की कुंडली में चंद्रमा मजबूत होते है, तो व्यक्ति को सरकारी नौकरी मिलेगी.

शनि ग्रह: अगर जातक की कुंडली में शनि मजबूत होते है, तो व्यक्ति को सरकारी नौकरी मिलेगी.

मंगल ग्रह: अगर जातक की कुंडली में मंगल मजबूत होते है, तो व्यक्ति को सरकारी नौकरी प्राप्त होगी.

दशम भावः दशम भाव को कर्म भाव कहा जाता है और इसे सरकारी नौकरी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है. दशम भाव सरकारी नौकरी, राजनीति, उच्च पदों या कारोबार में सफलता के लिए महत्वपूर्ण होता हैं. दशम भाव का स्वामी शनि ग्रह है और शनि संवेगी और धैर्यपूर्ण ग्रह हैं, जो कर्तव्य, उद्योग और संघर्ष को दर्शाते हैं, इसलिए शनि का संयोग दशम भाव में सरकारी नौकरी के लिए बहुत महत्वपूर्ण माना जाता हैं.R Ravindra Kumar Mindful Speaker, Trainer and Spritual Life Coach , Reiki Grand Master, Hypnotherapist, Mind Programmer, Yoga & NLP Practicener, Tarot Card Reader, Astrologer. 📲+919726351246 is Chief Mentor of UTOPIA'S MASTER OF
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24/04/2026

शनि का त्रिषडाय भावों में प्रभाव –

ज्योतिष शास्त्र में तृतीय, षष्ठ और एकादश भाव को त्रिषडाय भाव कहा जाता है। ये भाव जीवन के संघर्ष, परिश्रम, ऋण, शत्रु और इच्छाओं से जुड़े होते हैं। सामान्यतः इन्हें कष्टकारी भाव माना जाता है, परंतु एक गूढ़ सत्य यह है कि जब शनि जैसे क्रूर ग्रह इन भावों में स्थित होते हैं, तो वे इन भावों की नकारात्मकता को नियंत्रित करके शुभ फल देने लगते हैं।
तृतीय भाव में शनि
तृतीय भाव साहस, पराक्रम और प्रयास का प्रतीक है।
जब शनि यहाँ स्थित होता है, तो व्यक्ति को अद्भुत धैर्य, मजबूत इच्छाशक्ति और कठिन परिस्थितियों से लड़ने की क्षमता प्रदान करता है।
ऐसा व्यक्ति जीवन में चुनौतियों से घबराता नहीं, बल्कि उन्हें पार करने की क्षमता रखता है।
परंतु — छोटे भाई-बहनों के साथ संबंधों में दूरी या सुख में कमी देखी जा सकती है।
षष्ठ भाव में शनि
षष्ठ भाव रोग, शत्रु, ऋण और विवाद का प्रतिनिधित्व करता है।
इस भाव में शनि व्यक्ति को अपने शत्रुओं पर विजय दिलाने की क्षमता देता है।
नौकरी और सेवा क्षेत्र में यह स्थिति अत्यंत शुभ मानी जाती है, क्योंकि शनि परिश्रम और अनुशासन का कारक है।
ऐसा व्यक्ति मेहनती होता है और धीरे-धीरे आर्थिक स्थिरता प्राप्त करता है।
परंतु — मामा पक्ष से सुख में कमी आ सकती है।
एकादश भाव में शनि
एकादश भाव आय, लाभ और इच्छाओं की पूर्ति का संकेत देता है।
यहाँ स्थित शनि व्यक्ति की आय को स्थिर करता है और समय के साथ बड़े लाभ देता है।
यदि व्यक्ति धर्म और सदाचार के मार्ग पर चलता है, तो उसकी इच्छाएँ अवश्य पूर्ण होती हैं।
परंतु — बड़े भाई-बहनों के साथ संबंधों में दूरी या कमी संभव है।
सप्तम भाव में शनि (दिग्बली शनि)
सप्तम भाव पश्चिम दिशा का प्रतिनिधित्व करता है, और शनि पश्चिम का स्वामी है, इसलिए यहाँ शनि दिग्बली (अत्यंत शक्तिशाली) हो जाता है।
यह स्थिति स्थायी और गंभीर संबंध प्रदान करती है।
जीवनसाथी शांत, गंभीर और अंतर्मुखी स्वभाव का हो सकता है।
व्यापार में व्यक्ति अत्यंत मेहनती और धैर्यवान होता है।
दशम भाव में शनि
दशम भाव कर्म, करियर और प्रतिष्ठा का प्रतिनिधित्व करता है।
कालपुरुष कुंडली में यह मकर राशि का स्थान है, जिसका स्वामी स्वयं शनि है।
यहाँ शनि व्यक्ति को कर्मयोगी बनाता है।
जीवन में धीरे-धीरे परंतु स्थायी सफलता मिलती है।
ऐसा व्यक्ति अपने कार्य में ईमानदार और अनुशासित होता है।
निष्कर्ष
शनि को अक्सर अशुभ ग्रह माना जाता है, परंतु सत्य यह है कि वह न्यायाधीश की तरह कार्य करता है।
विशेषकर त्रिषडाय भावों में शनि व्यक्ति को संघर्ष के माध्यम से सफलता और स्थिरता प्रदान करता है।
रवि आनंद ज्योतिष, न्यूमरोलॉजिस्ट, टैरो कार्ड रीडर, रेकी मास्टर, लाल किताब रेमेडी मास्टर Mob +919726351246
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