21/11/2020
आदेश आदेश
ध्यान और हम
वैसे योग के आठ अंग होते हैं
जो मनुष्य योग के आठ अंग के अनुसार योग करता है वही शुध्द होता है अब ध्यान की बात करे तो ध्यान योग के आठ अंग मेसे सातवें नंबर पर आता है
अधिकतर लोग ध्यान अवश्य करते हैं और उन्हें मानसिक शांति भी मिलती है परंतु थोड़ा दुख होने पर वह पुनः विचलीत हो जाते देखे गए हैं अभी की चलन में जो ध्यान ऐसा हो रहा है
अष्टांग योग (आठ अंगों वाला योग) को आठ अलग-अलग चरणों वाला मार्ग नहीं समझना चाहिए यह आठ आयामों वाला मार्ग है जिसमें आठों आयामों का अभ्यास एक साथ किया जाता है। योग के ये आठ अंग हैं:
१) यम, २) नियम, ३) आसन, ४) प्राणायाम, ५) प्रत्याहार, ६) धारणा ७) ध्यान ८) समाधि
बहुत प्रियजनों ने हमसे कहा है कि ध्यान में ध्यान सुचारु रूप से नही लग पाता है अब क्या उत्तर दे मजबुरन गोल मोल उत्तर देना पड जाता है
ध्यान के लिए सम्पूर्ण रुप से अपनी मनोदशा से बाहर निकलना पडता है जब ही ध्यान में आगे बढ़ सकते हैं
आज ध्यान धरने वाले कुछ इस प्रकार से ध्यान करते हैं
जैसे किसी गाडी में बैठे बैठे धक्का लगते हैं परंतु गाड़ी आगे ही नहीं बड पाती है गाड़ी को अगर धक्का लगाना है तो उस गाड़ी से बाहर निकलकर धक्का लगाना होता है जब कही गाड़ी सनै सनै आगे बढती है
यह गाडी हमारी मनोदशा हैं
और हम इसमें अंदर बैठे बैठे धक्का लगा रहै है
ध्यान के लिए हमारी दिनचर्या एक जरूरी अंग है
जो वस्तु का हम आहार में लाते हैं उसके अनुरूप हमारी इन्द्रियां जो तेज प्रदान करती है उसी तेज के अनुसार मन चलता है
**ध्यान के एक ओर महत्वपूर्ण वस्तु है वह है हमारा शरीर है और शरीर को हमे हमारी मनोदशा से बाहर निकलना होगा
क्योंकि मनोदशा इन्द्रियों के बल के कारण बनती है
ध्यान करने वालो को सर्वप्रथम अपने आहार एंव दिनचर्या की ओर विशेष रूप से ध्यान देना चाहिए जो वस्तु का हम आहार में लाते हैं उसके अनुरूप हमारी इन्द्रियां जो तेज प्रदान करती है उसी तेज के अनुसार मन चलता है
ध्यान करने वालो को सर्वप्रथम अपने आहार एंव दिनचर्या की ओर विशेष रूप से ध्यान देना चाहिए
अशुद्ध ध्यान अल्प समय के लिए ही हमें शांति देता है
शुध्द ध्यान हमारे मरणोपरांत तक हमें शांतचित्त रखता है
जो हमें कभी भी विचलित नहीं होने देता है
ध्यान करने वाले साधक को सर्वप्रथम अपने आहार पर नियंत्रण रखना चाहिए हमारा ध्यान पुर्ण रुप से एकाग्र नहीं होता है इसका कारण यह है कि हमारा आज्ञाचक्र कमजोर है
आज्ञाचक्र के कमजोर होने के कारण हमारा निरंतर नहीं हो पाता है शुरुआत में हमारा ध्यान बिल्कुल एकाग्रता में होता है पर जैसे जैसे समय व्यतीत होने लगता है वैसे वैसे हमारी एकाग्रता भंग होने लगती है एकाग्रता भंग होने का कारण सीधे सीधे हमारे आज्ञाचक्र से है
जब हम संतुलित आहार नहीं करते हैं तो शरीर में व्याप्त इन्द्रियाँ हमे ध्यान के अनुरूप वह बल नहीं देती जिससे हमारा आज्ञाचक्र मजबूत होता है
हमारी आहार नली के धीरे धीरे गंदगी जमा होने लगती है वह गंदगी के कारण आहार का जो शुध्द तत्व है वह पचता नहीं है वह तत्व मल के साथ शरीर से बाहर निकल जाता है
आहार करने से पेट तो भर जाता है परंतु उन तत्व की हमे प्राप्ति नहीं होती है जिसकी हमे आवश्यकता होती है
कुछ क्रिया हैं
नेति धोती वस्ति न्योली वज्रोली यह क्रिया हमारे शरीर की आहार नली में जमी गंदगी को साफ करने के लिए कि जाती है शरीर का अन्दर से स्वच्छ होना जरूरी है जब शरीर स्वच्छ नहीं होगा तो शरीर को तत्व नहीं मिलेंगे जो हमारे शरीर में व्याप्त चक्रो चेतन रखने के लिए आवश्यक है
यह क्रिया गृहस्थ एवं योगी अगर दोनों ध्यान की ओर बड रहै तो य। यह क्रिया अति आवश्यक हो जाती है
आगे के चरण को कल लिखेंगे
आदेश आदेश संतो हरी हर
************नरेशनाथ**********