Tanan kitchen-Garden

Tanan   kitchen-Garden //अब सब्जी बाजार से नहीं सीधे आपके किचन

13/07/2017

यदि 5 सेकंड के लिए धरती से ऑक्सीजन गायब हो जाए तो क्या होगा ?

5 सेकंड के लिए धरती बहुत, बहुत ठंडी हो जाएगी.
जितने भी लोग समुद्र किनारे लेटे है उन्हें तुरंत सनबर्न होने लगेगा.
दिन में भी अंधेरा छा जाएगा.
हर वह इंजन रूक जाएगा जिनमें आंतरिक दहन होता है. रनवे पर टेक ऑफ कर चुका प्लेन वही क्रैश हो जाएगा.
धातुओ के टुकड़े बिना वैल्डिंग के ही आपस में जुड़ जाएगे. ऑक्सीजन न होने का यह बहुत रोचक साइड इफेक्ट होगा.
पूरी दुनिया में सबके कानों के पर्दे फट जाएगे. क्योंकि 21% ऑक्सीज़न के अचानक लुप्त होने से हवा का दबाव घट जाएगा. सभी का बहरा होना पक्का है.
कंक्रीट से बनी हर बिल्डिंग ढेर हो जाएगी.
हर जीवित कोशिका फूलकर फूट जाएगी. पानी में 88.8% ऑक्सीज़न होती है. ऑक्सीजन ना होने पर हाइड्रोजन गैसीय अवस्था में आ जाएगी और इसका वाॅल्यूम बढ़ जाएगा. हमारी साँसे बाद में रूकेगी, हम फूलकर पहले ही फट जाएँगे.
समुंद्रो का सारा पानी भाप बनकर उड़ जाएगा. क्योंकि बिना ऑक्सीजन पानी हाइड्रोजन गैस में बदल जाएगा और यह सबसे हल्की गैस होती है तो इसका अंतरिक्ष में उड़ना लाज़िमी है.
ऑक्सीजन के अचानक गुम होने से हमारे पैरों तले की जमीन खिसककर 10-15 किलोमीटर नीचे चली जाएगी.
इस लिए अपने जीवनकाल में कुछ वृक्ष जरूर लगाएं......

13/08/2016
04/02/2016

जानिए मिनरल वॉटर की हक़ीकत – अवशय पढ़ें व सभी को बताए
(www.facebook.com/thalimezahar)
भारत में एक आम बात हो गई है कि हर आदमी नल के पानी को छोड़कर बोतल का पानी पीना चाहता है क्योंकि दावा किया जाता है कि वह ‘मिनरल वॉटर’ होता है और ‘शुद्ध’ भी होता है| बात कुछ ठीक भी लगती है क्योंकि पानी की बोतल ख़रीदने वाले हर व्यक्ति के मन में कहीं ये विश्वास ज़रूर होता है कि वह ऐसा पानी पी रहा है जो उसकी सेहत के लिए बहुत लाभदायक है| या यूँ भी कहें कि पानी की बोतलें बनाने वाली कंपनियों ने एक सुनियोजित प्रचार के ज़रिए लोगों के दिलों में ये बात बिठा दी है कि पैसे से ख़रीदकर पिया गया पानी ही सेहत के लिए ठीक है और आम नल का पानी सेहत के लिए बहुत ख़तरनाक़ है|

लेकिन क्या हो जब आपको ये पता चले कि जो पानी की बोतल आप दूध के भाव ख़रीदते हैं उस बोतल में शुद्ध जल के बजाय ऐसा पानी होता है जो सेहत के लिए किसी ज़हर से कम नहीं| आपका भरोसा हिल सकता है और यह स्वभाविक भी है क्योंकि उसकी ठोस वजह है| वजह ये है कि आमतौर पर हर दुकान, बस अड्डों और रेलवे स्टेशनों पर बिकने वाली पानी की बोतलों की जाँच में पाया गया है कि उनमें ख़तरनाक़ हद तक कीटनाशक रसायन तक मिले होती हैं| भला हो भी क्यों नहीं, आखिर एक पानी की बोतल की एक्स्पायरी डेट 6 महीने तक होती है, अब आप ही बताइये कि गंगाजल को छोड़ कर दुनिया का ऐसा कौनसा पानी है जो 6 महीने बिना कीड़े पड़े बच सकता है|

भारत के माने हुए विज्ञान और पर्यावरण केंद्र यानि सीएसई ने अनेक ब्राँडों वाली पानी की बोतलों की जाँच की| केंद्र की निदेशक सुनीता नारायण बताती हैं कि सहयोगियों में ही यह विचार सामने आया कि बाज़ार में बिकने वाली खाने की चीज़ों और पानी की बोतलों की क्यों न जाँच की जाए कि इनका स्तर क्या होता है|इसके बाद दिल्ली और मुंबई के बाज़ार में बिक रहे बोतलबंद पानी के कई नमूने जमा किए गए| ये नमूने न केवल बाज़ार से बल्कि उन फ़ैक्टरियों से भी लिए गए जहाँ पानी की बोतलें भरी जाती हैं|

पानी की इन बोतलों की जाँच प्रयोगशाला में अमरीकी तकनीक और अत्याधुनिक पद्धति और उपकरणों का इस्तेमाल करते हुए की गई| विज्ञान और पर्यावरण केंद्र के एक अन्य वैज्ञानिक प्रोफ़ेसर एच बी माथुर बताते हैं कि नमूनों की कई बार और प्रामाणिक तरीक़े से जाँच की गई| निदेशक सुनीता नारायण कहती हैं, “जाँच के बाद जो जानकारी सामने आई वो बहुत ही भयानक है|”34 नमूनों की जाँच में लगभग सभी बोतलों में मुख्य रूप से लिंडेन, डीडीटी, डीडीई, एंडोसल्फान, मेलाथियान और क्लोर पायरीफ़ोस नामक कीटनाशक सामान्य से 400 गुना अधिक मात्रा तक पाये गए| पूरी दुनिया के डॉक्टर एवं वैज्ञानिक जानते है कि डीडीटी, लिंडेन, एंडोसल्फान, मेलाथियान, क्लोर पायरीफ़ोस नामक कीटनाशकों से कैंसर बहुत व्यापक पैमाने पर होता देखा गया है| और यह बहुत चिंता की बात है कि पानी की बोतलों में कैंसर की बीमारी पैदा करने वाले रसायन मिले| ये वैज्ञानिक बताते हैं कि मुम्बई से ज्यादा दिल्ली के नमूनों में कीटनाशक रसायनों की मात्रा पाई गई| लेकिन यह हाल तो पूरे देश का है, कहीं कम, कहीं ज्यादा लेकिन कीटनाशक है तो सभी में|मिनरल वॉटर और शुद्ध पेय जल के नाम पर बेची जाने वाली बोतलों में कीटनाशक पाए गए हैं| और सब जानते हैं कि कीटनाशक मनुष्य एवं सभी जीव-जंतुओं के लिए ज़हर हैं| चौंकाने वाली बात ये है कि कीटनाशक सभी कंपनियों की बोतलों में मिले है| और हर बोतल में कीटनाशकों की मात्रा सामान्य से कई गुना तक ज्यादा मिली है|

चिंता की बात ये है कि ग़रीब आदमी भी अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा ख़र्च करके ये पानी ख़रीदता है और उसे मिलता क्या है – कैंसर का ख़तरा| यहाँ सवाल ये भी उठता है कि सरकार इस बारे में क्या कर रही है? जब तक आम आदमी की सेहत के बारे में बनाए गए नियम क़ानून और मानक लागू नहीं किए जाते, तब तक कुछ नहीं हो सकता| मुद्दा ये भी है कि पानी की बोतलें बनाने वाली कंपनियों के स्थान पर आम आदमी की सेहत का ज़्यादा ध्यान रखा जाना चाहिए|

कुछ समय पूर्व भारतीय रेल्वे ने भी रेल्वे स्टेशनों पर पेयजल की उपलब्धता एवं गुणवत्ता पर काम करने की बजाए ‘रेल नीर’ ब्रांड का बोतलबंद पानी का व्यापार आरंभ कर दिया| पिछले वर्ष सरकार ने अंग्रेजों द्वारा वर्ष 1867 में बनाया गया सराय एक्ट भी समाप्त कर दिया। इसके तहत यह बाध्यता थी कि किसी भी पड़ाव, सराय, होटल या अन्य ऐसा स्थान जहां ग्राहक आकर रूकते हों उसके मालिक को ग्राहक के लिए आते ही पानी का गिलास पेस करना होगा और उसका कोई पैसा ग्राहक से नहीं लिया जाएगा। ऐसा न करने वाले पर जुर्माने का प्रावधान था।

इस कानून के जाने को शक की निगाह से देखा जाए तो लगता है कि कहीं जानबूझ कर तो नहीं सराय कानून को मिटा दिया गया है। संदेह करने का कारण कतई स्पष्ट है कि वर्तमान में जिस प्रकार से पानी का बाजारीकरण हुआ उसमें कहीं न कहीं सराय कानून कानूनन बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के बिजनेस पर असर डाल रहा था। ये कम्पनियां उस प्रत्येक दरवाजे को बंद कर देना चाहती हैं जो कि इनकी कमाई के आड़े आता हो।

सराय कानून का चले जाना इसी षड़यंत्र का नतीजा है। क्योंकि प्याऊ लगाने वाली संस्कृति के देश भारत को सराय एक्ट से नई उर्जा मिली थी कि हमारी एक संस्कृति को अंग्रेजों द्वारा कानूनन भी बाध्य कर दिया गया है। लेकिन आजाद देश के हमारे कर्णधारों उसी संस्कृति को मिटाने के लिए उतारू हैं। आखिर ऐसा क्या नुकसान हो जाता अगर सराय कानून बना रहता? आखिर कौन सा पहाड़ टूट पड़ता अगर इस कानून को निरस्त नहीं किया जाता, लेकिन भविष्य के बड़े बिजनेस पर निगाह गड़ाए बैठी कम्पनियों की नजर में यह कानून खटक रहा था।

हमने इस कानून से अपनी संस्कृति को जोड़ लिया था लेकिन कानून की सख्ताई समाप्त होने पर हम संस्कृति से भी हाथ न धो बैठें।

क्या आपको पता है किस तरह से कीटनाशकों के अंधाधुंध प्रयोग से हम लोगों की सेहत को ख़तरा है, किस तरह से लोग किस्म किस्म की बीमारियों से जूझ रहे हैं, बच्चे व्याधियों के साथ पैदा होते हैं और यहाँ तक कि माँ का दूध जो कि एक बच्चे के लिए सर्वोत्तम आहार माना जाता है उसमें भी खाने के रास्ते ज़हर चला गया। डर तो यह है कि अगर हम जल्द ही नहीं समझे तो हमारी आने वाली पीढ़ी पता नहीं किन किन व्याधियों के साथ जन्म लेगी।

04/02/2016

******** प्याली में जहर *********
पर्यावरण से जुड़े मसलों पर काम करने वाली कुछ गैरसरकरी संस्थाओ ने अपने हाल के शोध में पाया है कि भारत में जितनी भी महत्वपूर्ण ब्रांडेड कंपनियां चाय का उत्पादन करती हैं, उनमें से अधिकांश चाय में रासायनिक कीटनाशक मिलाती हैं। इस शोध के मुताबिक आधे से अधिक चाय के मनूनों में वैसे कीटनाशक तत्व मौजूद हैं, जिसके इस्तेमाल की अनुमति चाय उत्पादकों को नहीं है।

चाय उत्पादन में भारत दूसरे स्थान पर है, जबकि यह विश्व का चौथा सबसे बड़ा चाय निर्यातक देश है। भारत हर साल तकरीबन 40.7 अरब अमेरिकी डॉलर का कारोबार करता है। देश में मौजूद दो मशहूर ब्रांड-हिंदुस्तान यूनीलीवर लिमिटेड, जो बहुराष्ट्रीय कंपनी यूनीलीवर का हिस्सा है और दूसरा टाटा ग्लोबल बेवरेजेज लिमिटेड का बाजार के आधे हिस्से पर कब्जा है।

इस शोध में देश में उत्पन्न और तैयार की जाने वाली 49 ब्रांड की चाय के नमूने का इस्तेमाल किया गया। इसे पिछले साल जून 2013 से मई 2014 के बीच दिल्ली, कोलकाता, बंगलुरु और मुंबई के दुकानों से खरीदा गया और उसे एक स्वतंत्र प्रयोगशाला में जांच करने के लिए कहा गया। इन नमूनों में देश में सबसे अधिक बिकने वाली आठ ब्रांड के चाय को शामिल किया गया था।

जो महत्त्वपूर्ण ब्रांड की चाय जांच के लिए भेजी गई वे थीं- हिंदुस्तान यूनिलीवर लिमिटेड, टाटा ग्लोबल बेवरेज लिमिटेड, बाघ बकरी चाय, गुडरिक चाय, ट्वाइनिंग्स, गोल्डन टिप्स, खो चाय और गिरनार। इन चायों में चौंतीस प्रकार के कीटनाशक मिले। उनसठ फीसद चाय में दस से अधिक प्रकार के कीटनाशकों के अवशेष मिले, जबकि एक में तो बीस तरह के कीटनाशक थे। इसी तरह उनसठ फीसद चाय में यूरोपियन यूनियन द्वारा निर्धारित मापदंड से एक अधिक कीटनाशक मिले, जबकि सैंतीस फीसद चाय में यह पचास फीसद से अधिक था।

कीटनाशकों के प्रयोग को लेकर आपसी हित के टकराव इतने ज्यादा हैं कि उसके लिए बनाए गए कायदे-कानूनों को लागू करना बहुत मुश्किल हो जाता है। हालांकि शोध के जितने तरह के नमूने लिए गए थे, उनमें पाया गया कि जिन चौंतीस कीटनाशकों का इस्तेमाल चाय की खेती में किया जाता है, उसमें अड़सठ फीसद कीटनाशक इस काम के लिए पंजीकृत ही नहीं है। चाय की खेती के लिए ट्रियाजोफोस का इस्तेमाल प्रतिबंधित है, लेकिन यह कीटनाशक टाटा, हिंदुस्तान यूनीलीवर और बाघ बकरी द्वारा बनाई गई चाय ब्रांडों में पाए गए।

इस कीटनाशक को भी विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अत्यंत खतरनाक सूची में रखा है। टेबुफेनप्रायट नामक कीटनाशक भारत में पंजीकृत भी नहीं है, इसलिए इसका इस्तेमाल गैरकानूनी है। लेकिन यह हिंदुस्तान यूनिलीवर के चाय के एक नमूने में पाया गया। टेबुफेनप्रायट एक जहरीला कीटनाशक है, जो लीवर के लिए हानिकारक होता है।

चाय के इन नमूनों में डीडीटी भी मिला है, जिसे भारत में 1989 से खेती-बाड़ी में इस्तेमाल के लिए प्रतिबंधित कर दिया गया था। इसे विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी खतरनाक कीटनाशक के रूप में चिह्नित कर रखा है। इसी तरह के कीटनाशक में साइपरमेथरिन को भी रखा गया है, जिससे सांस की बीमारी होती है। इसके अलावा निओनिकोटिन और इमीडेक्लोप्रिड नामक कीटनाशक भी साठ फीसद से अधिक चाय में पाई गई। इससे पशुओं की प्रजनन क्षमता पर असर पड़ता है।

शोध से इस बात का संकेत मिलता है कि चाय उत्पादन में आज भी बहुतायत मात्रा में कीटनाशक का इस्तेमाल हो रहा है, जिससे मानवीय स्वास्थ्य और पर्यावरण पर प्रतिकूल असर पड़ता है। भारत इससे पहले भी कीटनाशक का इस्तेमाल किए बगैर सफलतापूर्वक कृषि आंदोलन का साक्षी रहा है, जिसकी शुरुआत संयुक्त आंध्र प्रदेश में हुई थी। अगर इस मामले में सरकार पूरी ईमानदारी और इच्छाशक्ति से काम करे, तो इसे पूरे देश में भी लागू किया जा सकता है।

04/02/2016

जैव विविधता बचाएं भाग-2
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जैव रूपांतरित खाद्य पदार्थ मानव शरीर के अनुकूल नहीं...
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जैव संशोधित फसलों के फील्ड ट्रायल की अनुमति की सुगबुगाहट मिलते ही लोगों के बीच में इनके फायदे-नुकसान को लेकर चर्चा शुरू हो गई है. लोग जानना चाहते हैं कि जैव रूपांतरित या जैव संशोधित (जीएम) खाद्य मानव शरीर के लिए अनुकूल हैं या नहीं. इन सभी खाद्यान्नों के मानव शरीर के ऊपर प्रभाव में बारे में जब तक दीर्घकालीन शोध नहीं होते तब तक कुछ भी निष्कर्ष निकलना जल्दबाजी होगी. बिना ठोस प्रमाण के इनके उत्पादन और उपयोग की अनुमति देना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं. प्रयोगशाला में चूहे, खरगोश या बन्दर को मात्र ९० दिन तक जैव रूपांतरित भोजन खिलाकर उसके परिणाम देखकर निष्कर्ष निकालना न तो तर्कसंगत है और न ही विश्वसनीय.

जब मनुष्य शरीर लगभग 5000 वर्षों पूर्व हुए प्राकृतिक रूप से होने वाले जैव रूपांतरण के अनुकूल अभी तक भी नहीं बन पाया है तो फिर मानव निर्मित जैव-संशोधित खाद्यों के प्रति अनुकूलन होना अभी मात्र कोरी कल्पना ही होगी. सच तो ये है कि जैव संशोधित खाद्य मानव ही नहीं किसी भी जीव के लिए उपयोगी नहीं है.

चलिए एक उदहारण लेकर उपरोक्त कथन की पुष्टि करते हैं. विश्व भर में गाय की अलग अलग नश्लों से जो दूध प्राप्त होता है उसे 2 श्रेणियों में वर्गीकृत किया जाता हैं. पहली श्रेणी में भारत में पाई जाने वाली देशी गायों द्वारा प्राप्त दूध है जोकि A2 दूध कहलाता है. दूसरी श्रेणी में A1 दूध आता है जोकि विदेशी नस्ल की गाय से प्राप्त होता है. A2 दूध पौष्टिक और सुरक्षित है तथा इसका मानव स्वास्थ्य पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पाया जाता. A2 दूध में मूल रूप से पाया जाने वाला A2-बीटा कैसिन प्रोटीन पाया जाता है. यह बीटा कैसिन 229 एमिनो एसिड से बना होता है. सभी 229 एमिनो एसिड विशेष क्रम में जुड़कर एक चैन बनाते है. लगभग आज से 5000 साल पहले कुछ यूरोपीय गायों की नस्ल में यह A2-बीटा कैसिन प्रोटीन जैव रूपांतरित होकर A1-बीटा कैसिन प्रोटीन में बदल गया. (A2-बीटा कैसिन प्रोटीन में 67 वें क्रम पर प्रोलाइन नामक एमिनो एसिड होता है वहीं A1-बीटा कैसिन में हिस्टिडीन नामक एमिनो एसिड). संक्षेप में कह सकते हैं की कुछ प्रजातियों में A2 मिल्क का 5000 वर्ष पूर्व A1 मिल्क में जैव रूपांतरण हुआ है.

इस जैव रूपांतरित A1 मिल्क को मानव के अनुकूल नहीं माना जाता. ये अलग बात है की हम ज्यादा दूध उत्पादन के लिए विदेशी होलेस्टीन या ऐसी ही गाय पालकर A1 मिल्क का उत्पादन कर रहे है. और लोग ख़ुशी ख़ुशी इसे पी भी रहे है. तर्क ये है की आज हम देश के लोगों को दूध (दूध के रूप में जहर) उपलब्ध करवाने में सक्षम है. परन्तु किस कीमत पर..

आज सभी लोग जानते है कई बीमारियाँ तो केवल इसी जैव रूपांतरित A1 दूध को पीने से हो रही है. (बीमारियों की चर्चा यहाँ करना व्यर्थ है इस विषय पर फिर कभी....). सब कुछ जानते हुए भी हमने A1 दूध को स्वीकार कर लिया है. कहीं ऐसा न हो की हमको भ्रम में रखते हुए हमारी थाली में जैव रूपांतरित या जैव संशोधित (जीएम) भोजन परोस दिया जाये. और हम थाली की सजावट और मसालों की खुशबू में इतना खो जाये कि हमको पता भी न चले की हमने जहर खा लिया...!!

तो फिर आप भी जागरूक उत्पादक/उपभोक्ता बनिए और जैव रूपांतरित खाद्यान के दुष्प्रभाव से बचने-बचाने के लिए दुसरो को भी जागरूक करिए...!!
डॉ जितेंद्र सिंह
(98933-59141)
साकेत परिवार

25/10/2015

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