Jay Shri Mahaveer Balaji Jyotish Kendra Prayagraj

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11/04/2022

पूजा पाठ रोज कर रहे फिर भी जीवन में दुःख ही दुःख क्यों है ?
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जब जीवन में कष्ट संघर्ष आते हैं तो पूजा -पाठ ,मंदिर -गुरुद्वारा ,भगवान -देवी ,ज्योतिषी -तांत्रिक अधिक दिखाई देते हैं |हम जीवन में कष्टों का समाधान अक्सर वहां खोजते हैं जहाँ सीधा कष्ट का कोई मतलब नहीं होता |कष्ट -दुःख होने पर हम अपनी शक्ति बढाने ,कष्टों का कारण जान उन्हें हल करने की बजाय भगवान् की कृपा से उसे हटाने का प्रयास करते हैं पर अक्सर हमें असफलता मिलती है |बहुत प्रयास के बाद भी जब कोई अंतर नहीं आता तो हम अक्सर लोगों को कहते सुनते हैं की इतनी पूजा -आराधना करते हैं किन्तु कोई लाभ नजर नहीं आता ,पता नहीं भगवान् है भी की नहीं ,या वह हमारी सुनता क्यों नहीं |हम तो रोज पूरे श्रद्धा से इतनी देर तक पूजा करते हैं |पर हमारे कष्ट कम होते ही नहीं |पाप करने वाले ,पूजा न करने वाले सुखी हैं और हम इतनी सदाचारिता से रहते हैं ,पूजा-पाठ करते हैं ,अपने घर में भगवान् को बिठाये हैं पर हम कष्ट ही कष्ट उठा रहे हैं |हमने अपने पिछले अंक में कुछ कारणों का विश्लेष्ण इस सम्बन्ध में किया है |कुछ अन्य कारणों का विश्लेषण हम अपने इस अंक में करने का प्रयत्न करते हैं |
अधिकतर लोग भगवान् या देवी /देवता को मनुष्य मानकर चलते हैं जबकि वास्तविकता यह है की यह सब उर्जाये या शक्तियाँ हैं ,जिनके विशिष्ट गुणों के कारण हमने काल्पनिक रूप से उन्हें अपने जैसा मानकर ,अपने से जोड़ने के लिए उन्हें विशिष्ट आकृति ,विशिष्ट हथियार ,विशिष्ट रूप दिए हैं |इन्हें अपनी बात सुनाने के लिए इनके पद्धति के अनुसार ही पूजा ,अर्चना करनी होती है या भावनात्मक रूप से भी तब यह सुनती हैं जब आपकी भावना मीरा जैसी गहन हो जाए की कृष्ण को आना ही पड़े |यह उक्ति की "कलयुग केवल नाम अधारा "कष्टों -दुखों में फंसे होने पर पुकारने पर काम नहीं आती |आपकी पुकार में इतनी शक्ति होनी चाहिए की भगवान् नामक ऊर्जा आपसे जुड़ जाए |आपकी पूजा -अर्चना -साधना में इतनी शक्ति होनी चाहिए की सम्बंधित शक्ति का संपर्क आपके ऊर्जा से हो जाए |जब यह शक्ति संतुलन आपको कष्ट दे रहे समस्या के ऊर्जा से अधिक होगी तभी आपके कष्ट कम होंगे |भगवान् की आपसे जुडी शक्ति अगर कम हुई तो कष्ट कम नहीं होंगे |भगवान् की शक्ति सबसे बड़ी होती है पर महत्त्व यह रखता है की उसकी कितनी शक्ति आपसे जुडी है |इसे ही कहते हैं पुकार पर सुनना |जब अधिक शक्ति आपसे जुडती है तो वह शक्ति आपके मनोभावों के अनुसार क्रिया करती है और आपकी सफलता बढती है ,कार्य सफल होते हैं ,कष्ट कम होते हैं |[Mukti Marg]
अधिकतर लोगों के कष्ट उनके भाग्य में भी नहीं होते ,अपितु इसके कारण उन्हें प्रभावित कर रहे नकारात्मक प्रभाव होते हैं |भाग्य तो ग्रहों ,नक्षत्रों के संयोग से उत्पन्न प्रभाव हैं |यह प्रभाव पूरा मिले तो कहते हैं की पूरा भाग्य मिल रहा |ऐसे में ज्योतिषी की सारी भविष्यवाणी सही होती है |पर कितने लोगों के लिए ज्योतिषी की भविष्यवाणी सही होती है ?,कुछ बाते सही हो जाती हैं और कुछ नहीं |अच्छी बातें कम सही होती हैं और बुरी बातें जितना बताते हैं उससे भी अधिक सामने आती हैं |ऐसा नकारात्मक प्रभावों के कारण होता है |इनके कारण ही आपके कष्ट बढ़ जाते हैं |कारण यह होते हैं और लोग दोष भगवान् को देते हैं |भगवान् तो नहीं कहता की आप वास्तु दोष उत्पन्न करें ,आप पितरों को असंतुष्ट रखें ,आप भूत -प्रेत -आत्माओं को पूजें ,आप कुल देवता /देवी को भूल जाएँ |जब आप ऐसा करते हैं तो भगवान् को क्यों दोष दे रहे |किसी ने आप या आपके परिवार पर किसी प्रकार का अभिचार ,टोना -टोटका ,भूत -प्रेत भेज दिया ,आपकी किसी गलती से ब्रह्म -जिन्न -पिशाच आपके या आपके परिवार को प्रभावित करने लगा ,आपकी पूजा में इतनी शक्ति है नहीं की भगवान् की ऊर्जा आपसे इतनी जुड़े की इन शक्तियों को हटा सके तो यह आपको प्रभावित करेंगे ही |इसमें भगवान की कोई गलती नहीं |सच है की वह सर्वशक्तिमान है ,पर उसे पूरी शक्ति से आप बुलायेंगे तभी वह आएगा और आपसे जुड़ेगा |
हममें से बहुत से लोग घंटों पूजा करते हैं |कुछ लोग कई घंटे पूजा करते हैं फिर भी उनके कष्ट कम नहीं होते ,कुछ लोगों के कष्ट बढ़ते ही जाते हैं जितना अधिक वह पूजा करते हैं |यहाँ दो बातें होती हैं या तो उनके घर में इतनी शक्तिशाली नकारात्मक शक्ति है की वह पूजा पर दिक्कत उत्पन्न कर रही या तो उनकी पूजा में कहीं छोटी सी ही सही त्रुटी या गलती हो रही जिससे परिणाम ,दुस्परिनाम में बदल जा रहे |जितना पूजा कीजिये बिलकुल शिद्ध -सही ,त्रुटी रहित कीजिये तभी परिणाम मिलेंगे ,अगर गलती होती है तो दुष्परिणाम की मात्र कई गुना अधिक मिलने से आप और कष्ट पाने लगते हैं |एक बात और ध्यान देने की है आप अधिक पूजा कर रहे तो जिस शक्ति या देवता को बुला रहे वह जल्दी तो आएगा किन्तु तब आपको भी उसके अनुसार अपने आपको बदलना होगा |अपना आचार ,व्यवहार ,मानसिक स्थिति ,शारीरिक अवस्था ऐसा बनाना होगा की वह आपसे सामंजस्य बना सके ,ऐसा न होने पर विक्षोभ उत्पन्न होगा और आपके कष्ट बढ़ेंगे |भावना अपनी जगह है और आप भले माने की यह तो माता -पिता है कभी कष्ट नहीं दे सकते किन्तु यह शक्तियाँ हैं और उर्जा जब इनकी आती है और अपने अनुकूल वातावरण नहीं पाती तो आपके जीवन में उथल पुथल होती है इससे आपकी दिक्कत बढती है |यह नहीं दिक्कत करते आपकी स्थिति दिक्कत उत्पन्न करती है |
जब लोगों को बताया जाता है की आप पर या घर पर नकारात्मक उर्जा का प्रभाव है जिसके कारण कष्ट आ रहे हैं तो कुछ लोग यह भी कहते मिलते हैं की हम तो शिव ,हनुमान ,कृष्ण ,दुर्गा आदि की पूजा करते हैं रोज नियमित फिर हमें कष्ट क्यों है ,नकारात्मकता कैसे है |क्या यह भगवान् इसे नहीं हटा सकते ,या कोई तांत्रिक अभिचार कर रहा है तो क्यों ये देवी देवता रक्षा नहीं कर रहे |हमारे कष्ट क्या उन्हें दिखाई नहीं देते |क्यों वे हमारी नहीं सुन रहे |कुछ अंध श्रद्धालु इसे पूर्व जन्म का दोष देकर अपने को संतुष्ट रखने का प्रयत्न करते हैं की यह हमारे पूर्व जन्म के दोष हैं जिससे कोई पूजा पाठ नहीं लग रहा |
जब हम इसका विश्लेषण करते हैं तो इसके कई कारण मिलते हैं |अक्सर घरों में या मेट्रो शहरों में या कहीं और से स्थानांतरित होकर कहीं और बसे लोग अपने कुल देवता /देवी को भूल गए हैं या इनकी सही पूजा पद्धति ही भूल गए हैं ,जो की उनके कुल की रक्षा का कार्य करते थे तथा यही आपकी पूजा भगवान् तक पहुचाते थे |इससे दो दिक्कतें हुई |एक तो आपकी पूजा भगवान् को नहीं मिल रही दुसरे किसी प्रकार की बाहरी बाधा पर आपके पास कोई सुरक्षा घेरा नहीं रहा |यह काम कुल देवता /देवी करते हैं |कुल देवता /देवी के अभाव में यदि किसी तरह कोई भूत -प्रेत -ब्रह्म -जिन्न -पिशाच आपके यहाँ आ गया तो आपकी पूजा वह ले सकता है और अपनी शक्ति बढ़ा आपको ही परेशान कर सकता है |कोई भी आप पर किसी भी प्रकार का टोना -टोटका -अभिचार कर या करवा सकता है ,इनका प्रभाव कोई रोकने वाला नहीं होता |
आपके पित्र असंतुष्ट हैं तो वह आपकी शान्ति में विघ्न उत्पन्न करते हैं |इनमे कुछ अकाल मृत्यु से मरे लोगों की आत्माएं भी होती है जो अपनी शान्ति के लिए भी आपसे कुछ कर्म चाहते हैं ,आप ध्यान नहीं देते तो यह आपकी परेशानी बढाते हैं |इनके साथ अन्य मृतक आत्माएं भी जुडती है जिन्हें आपके घर से कोई लगाव नहीं होता अतः ये दूसरी आत्माएं आपका शोषण कर अपनी संतुष्टि करती है अथवा अपनी अतृप्त इच्छाएं पूर्ण करने का प्रयत्न करती हैं |आपके घर में चार लोग हैं पर खर्च होता है दस लोगों के बराबर |आय व्यय का संतुलन बिगड़ जाता है ,रोग -दुर्घटनाएं बढ़ जाती हैं |कभी आपने या आपके किसी पूर्वज ने किसी आत्मा ,मजार या ब्रह्म आदि को पूजना शुरू कर दिया जिससे उसका आपके घर में स्थायी डेरा हो गया |अब वह आपकी पूजा ले लेगा और आपकी पूजा कभी भगवान् तक नहीं पहुचेगी ऐसे में भगवान् आपकी नहीं सुनेगा ,चाहे आप जितना मंदिर में माथा पटको |आप कहीं भी चले जाएँ वह शक्ति आपसे हर जगह पूजा चाहेगी |पूजा छोड़ने पर परिवार को परेशान करेगी |किसी ने आप या आपके परिवार पर कोई अभिचार या टोना टोटका कर दिया ,जिससे आपके यहाँ नकारात्मक ऊर्जा बढ़ गयी ऐसे में भी आपकी उन्नति -सुख -शान्ति प्रभावित हो जाती है |केवल प्रार्थना से भगवान् इन्हें नहीं हटाता अपितु विशेष ऊर्जा इन्हें हटाने के लिए चाहिए होती है क्योकि यह एक शक्ति का प्रक्षेपण होता है |आपके पास बुलेटप्रूफ जैकेट नहीं तो गोली तो आपको लगेगी ही |यह कुछ ऐसी ही क्रिया होती है | ऐसे में आप चार घंटे रोज पूजा करो मिलेगा कुछ नहीं |
आपने मकान बनाया है जिसमे वास्तु दोष हो गया है |आप पूजा करके रोज १०० ग्राम शक्ति उत्पन्न करते हैं ,जबकि वास्तु से एक किलोग्राम नकारात्मक शक्ति उत्पन्न हो रही |जब 900 ग्राम अधिक बुरी ऊर्जा उत्पन्न हो रही तो वह आपको पीछे ही तो ले जायेगी और आपकी परेशानी बढ़ाएगी ही |भगवान् तो अपना काम कर रहा ,आपकी जितनी पूजा उतनी ऊर्जा आपको दे रहा पर नकारात्मकता अधिक हो रही तो भगवान् क्या करेगा |आपके मकान के नीचे किसी तरह का हड्डी ,या शव दबा है जिससे कोई शक्ति जुडी है ,तो वह तो परेशान करेगी ही जब आप उस मकान में रहेंगे |कोई किसी मकान ,स्थान पर जलाकर ,डूबकर या दुर्घटना में मरा है तो वह उस स्थान से जुडा रहता है |चूंकि वह खुद अतृप्त /असंतुष्ट होता है अतः वहां रहने वालों को भी परेशान करता है या अपनी तृप्ति का प्रयास करता है |जब तक उसे हटाने लायक शक्ति न लगाईं जाए या ,सुरक्षा की व्यवस्था न की जाए या विशेष तकनीक न अपनाई जाए ,मात्र प्रार्थना -पूजा से भगवान् उन्हें नहीं हटाता |ऐसे में आप पूजा करते रहते हैं फिर भी आपको परेशानी होती रहती है |यहाँ एक दिक्कत और है आप पूजा सात्विक देवी देवता की कर रहे जबकि इन शक्तियों को हटाने के लिए उग्र देवी /देवता चाहिए |सात्विक देवी देवता सकारात्मक ऊर्जा बढ़ा तो सकते हैं पर इन्हें हटाने को तो उग्र शक्तियां ही चाहिए वह भी पूरी शक्ति के साथ |
यह सब ऊर्जा का खेल है |देवी/देवता सब उर्जायें हैं |जो जितनी शक्ति से इन्हें जो दिखाता है उनसे वैसा करा लेता है |यह पूजा -साधना करने वालों की आँखों से ,उसके मनोभावों से सब देखती है |यह तब होता है जब वह व्यक्ति से जुडती हैं |मात्र पूजा करने ,माथा पटकने से यह नहीं देखती |इन्हें कुछ दिखाने के लिए ,इन्हें सुनाने के लिए इन्हें खुद से जोड़ना होता है और खुद से इन्हें जोड़ना आसान नहीं होता |जब आप इतना डूब जाएँ उनके भाव में की वह और आप एकाकार हो जाएँ तब वह आपसे जुड़ता है और तभी वह आपकी सुनता है |इसके पहले तक आप जितनी ऊर्जा उत्पन्न कर रहे और आपको जितनी ऊर्जा विपरीत प्रभावित कर रही इसके शक्ति संतुलन पर ही आपका जीवन चलता है |यह उपरोक्त कुछ कारण हैं जो लोगों की पूजा के अपेक्षित परिणाम में बाधक होते हैं |यद्यपि और भी कारण होते हैं पर अधिकतर कष्ट के और पूर्ण परिणाम न मिलने के ये कारण हैं |इन पर अगर ठीक से ध्यान दिया जाए तो लाभ बढ़ सकती है |[Mukti Marg].....................................................................हर-हर महादेव

29/10/2021

🌹🌹🌹🌹🌹जय राधा माधव🌹🌹🌹🌹🌹*दिवाली की रात में कहां-कहां दीपक लगाने चाहिए।*

*👉🏿1- पीपल के पेड़ के नीचे दीपावली की रात एक दीपक लगाकर घर लौट आएं। दीपक लगाने के बाद पीछे मुड़कर नहीं देखना चाहिए। ऐसा करने पर आपकी धन से जुड़ी समस्याएं दूर हो सकती हैं।*

*👉🏿2- यदि यह संभव ना हो तो किसी सुनसान इलाके में स्थित मंदिर में दीपक लगा सकते हैं।*

*👉🏿3- धन प्राप्ति की कामना करने वाले व्यक्ति को दीपावली की रात मुख्य दरवाजे की चौखट के दोनों ओर दीपक अवश्य लगाना चाहिए।*

*👉🏿4- हमारे घर के आसपास वाले चौराहे पर रात के समय दीपक लगाना चाहिए। ऐसा करने पर पैसों से जुड़ी समस्याएं समाप्त हो सकती हैं।*

*👉🏿5- घर के पूजन स्थल में दीपक लगाएं, जो पूरी रात बुझना नहीं चाहिए। ऐसा करने पर महालक्ष्मी प्रसन्न होती हैं।*

*👉🏿6- किसी बिल्व पत्र के पेड़ के नीचे दीपावली की शाम दीपक लगाएं। बिल्व पत्र भगवान शिव का प्रिय वृक्ष है। अत: यहां दीपक लगाने पर उनकी कृपा प्राप्त होती है।*

*👉🏿7- घर के आसपास जो भी मंदिर हो वहां रात के समय दीपक अवश्य लगाएं। इससे सभी देवी-देवताओं की कृपा प्राप्त होती है।*

*👉🏿8- घर के आंगन में भी दीपक लगाना चाहिए। ध्यान रखें यह दीपक भी रातभर बुझना नहीं चाहिए।*

*👉🏿9- घर के पास कोई नदी या तालब हो तो बहा पर रात के समय दीपक अवश्य लगाएं। इस से दोषो से मुक्ति मिलती है !*

*👉🏿10- तुलसी जी और के पेड़ और सालिगराम के पास रात के समय दीपक अवश्य लगाएं। ऐसा करने पर महालक्ष्मी प्रसन्न होती हैं।*

*👉🏿11- पित्रो का दीपक गया तीर्थ के नाम से घर के दक्षिण में लगाये ! इस से पितृ दोष से मुक्ति मिलती है।लक्ष्मी प्राप्ति के सूत्र :-*

*🗣प्रत्येक गृहस्थ इन सूत्रों-नियमों का पालन कर जीवन में लक्ष्मी को स्थायित्व प्रदान कर सकता है। आप भी अवश्य अपनाएं -*

*👉🏿1. जीवन में सफल रहना है या लक्ष्मी को स्थापित करना है तो प्रत्येक दशा में सर्वप्रथम दरिद्रता विनाशक प्रयोग करना ही होगा। यह सत्य है की लक्ष्मी धनदात्री हैं, वैभव प्रदायक हैं, लेकिन दरिद्रता जीवन की एक अलग स्थिति होती है और उस स्थिति का विनाश अलग ढंग से सर्वप्रथम करना आवश्यक होता है।*

*👉🏿2. लक्ष्मी का एक विशिष्ट स्वरूप है "बीज लक्ष्मी"। एक वृक्ष की ही भांति एक छोटे से बीज में सिमट जाता है - लक्ष्मी का विशाल स्वरूप। बीज लक्ष्मी साधना में भी उतर आया है भगवती महालक्ष्मी के पूर्ण स्वरूप के साथ-साथ जीवन में उन्नति का रहस्य।*

*👉🏿3. लक्ष्मी समुद्र तनया है, समुद्र से उत्पत्ति है उनकी, और समुद्र से प्राप्त विविध रत्न सहोदर हैं उनके, चाहे वह दक्षिणवर्ती शंख हो या मोती शंख, गोमती चक्र, स्वर्ण पात्र, कुबेर पात्र, लक्ष्मी प्रकाम्य क्षिरोदभव, वर-वरद, लक्ष्मी चैतन्य सभी उनके भ्रातृवत ही हैं और इनकी गृह में उपस्थिति आह्लादित करती है, लक्ष्मी को विवश कर देती है उन्हें गृह में स्थापित कर देने को।*

*👉🏿4. समुद्र मंथन में प्राप्त कर रत्न "लक्ष्मी" का वरण यदि किसी ने किया तो वे साक्षात भगवान् विष्णु। आपने पति की अनुपस्थिति में लक्ष्मी किसी गृह में झांकने तक की भी कल्पना नहीं कर करतीं और भगवान् विष्णु की उपस्थिति का प्रतीक है शालिग्राम, अनंत महायंत्र एवं शंख। शंख, शालिग्राम एवं तुलसी का वृक्ष - इनसे मिलकर बनता है पूर्ण रूप से भगवान् लक्ष्मी - नारायण की उपस्थिति का वातावरण।*

*👉🏿5. लक्ष्मी का नाम कमला है। कमलवत उनकी आंखे हैं अथवा उनका आसन कमल ही है और सर्वाधिक प्रिय है - लक्ष्मी को पदम। कमल - गट्टे की माला स्वयं धारण करना आधार और आसन देना है लक्ष्मी को आपने शरीर में लक्ष्मी को समाहित करने के लिए।*

*👉🏿6. लक्ष्मी की पूर्णता होती है विघ्न विनाशक श्री गणपति की उपस्तिथि से जो मंगल कर्ता है और प्रत्येक साधना में प्रथम पूज्य। भगवान् गणपति के किसी भी विग्रह की स्थापना किए बिना लक्ष्मी की साधना तो ऐसी है, ज्यों कोई अपना धन भण्डार भरकर उसे खुला छोड़ दे।*

*👉🏿7. लक्ष्मी का वास वही सम्भव है, जहां व्यक्ति सदैव सुरुचिपूर्ण वेशभूषा में रहे, स्वच्छ और पवित्र रहे तथा आन्तरिक रूप से निर्मल हो। गंदे, मैले, असभ्य और बक्वासी व्यक्तियों के जीवन में लक्ष्मी का वास संभव ही नहीं।*

*👉🏿8. लक्ष्मी का आगमन होता है, जहां पौरुष हो, जहां उद्यम हो, जहां गतिशीलता हो। उद्यमशील व्यक्तित्व ही प्रतिरूप होता है भगवान् श्री नारायण का, जो प्रत्येक क्षण गतिशील है, पालन में संलग्न है, ऐसे ही व्यक्तियों के जीवन में संलग्न है। ऐसे ही व्यक्तियों के जीवन में लक्ष्मी गृहलक्ष्मी बनकर, संतान लक्ष्मी बनकर आय, यश, श्री कई-कई रूपों मे प्रकट होती है।*

*👉🏿9. जो साधक गृहस्थ है, उन्हें अपने जीवन मे हवन को महत्वपूर्ण स्थान देना चाहिए और प्रत्येक माह की शुक्ल पंचमी को श्री सूक्त के पदों से एक कमल गट्टे का बीज और शुद्ध घृत के द्वारा आहुति प्रदान करना फलदायक होता है।*

*👉🏿10. आपने दैनिक जीवन क्रम में नित्य महालक्ष्मी की किसी ऐसी साधना - विधि को सम्मिलित करना है, जो आपके अनुकूल हो, और यदि इस विषय में निर्णय - अनिर्णय की स्थिति हो तो नित्य प्रति, सूर्योदय काल में निम्न मन्त्र की एक माला का मंत्र जप तो कमल गट्टे की माला से अवश्य करना चाहिए।*
*मंत्र: ॐ श्रीं श्रीं कमले कमलालाये प्रसीद प्रसीद मम गृहे आगच्छ आगच्छ महालक्ष्म्यै नम
🌹🌹🌹🌹🌹जय राधा माधव🌹🌹🌹🌹🌹

29/10/2021

सफलता के बहुत कारगर उपाय....ज्योतिषी की जरूरत नही....खुद करें
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1 हमेशा कम बोलिए, क्योंकि जितना ज्यादा बोलेंगे उतनी ही ज्यादा शक्ति नष्ट होगी। फल स्वरुप उस शक्ति को पुनः प्राप्त करने के लिए आपको काफी कार्य करना पड़ेगा।
2 मूर्ख अशिक्षित और दुर्बल चित वाले व्यक्तियों की संगत मत कीजिए, क्योंकि वे हर क्षण आप में निराशा की भावना ही भरेंगे। उनका जीवन तो असफल हो ही गया है, दूसरों के जीवन को भी वे असफल बना देते हैं।
3 दिन का कुछ हिस्सा एकांत में व्यतीत कीजिए। उस समय मैं आपसे कोई न बोले और नाकोई आपको व्यवधान दे।
4 अपने मन में जो विचार हैं या किसी का कोई रहस्य है तो उसे प्रकट मत कीजिए।
5- यदि आप को कोई क्रोधित भी करें तब भी अपने आप पर नियंत्रण स्थापित करने का प्रयत्न कीजिए।
6 कई बार हंसी की बात होने पर भी आप प्रयोग करके स्वयं पर नियंत्रण स्थापित करें और बिल्कुल न हंसे।
7 समाज में उस व्यक्ति का सम्मान होता है जो गोपनीयता बनाए रखता है। आपके मित्र या परिचित या कोई रहस्य आपके पास है तो उसे कभी प्रकट मत कीजिए, चाहे उस मित्र या परिचित से झगड़ा ही क्यों न हो जाए। मानवता यह नहीं कहती कि झगड़ा होने पर आप उसके रहस्य को सबके सामने प्रकट कर दें। जो जितना ज्यादा रहस्यमय होता है समाज में उसका उतना ही ज्यादा सम्मान होता है।
8 अपने चेहरे को निर्विकार बनाए रखिए। यदि कोई व्यक्ति आपको रहस्य की बात बताएं और वह रहस्य आपको ज्ञात हो, तब भी आप अपने चेहरे से यह प्रकट मत होने दीजिए आपको वह रहस्य पहले से ही ज्ञात है, अपितु चेहरे को इस प्रकार बनाए रखिए कि आप कोकुछ भी ज्ञात नहीं है और यह बात पहली बार ही सुनी है।
9 अपने मस्तिष्क को विचार शुन्य बनाने का प्रयत्न कीजिए। इसका ज्यादा से ज्यादा प्रयोग करें। इससे आपके चेहरे पर भव्यता आएगी और शरीर में एक विशेष प्रकार का संतुलन आ सकेगा, साथ ही साथ आप की असीम शक्ति बढ़ जाएगी, मस्त बलवान होगा, बुद्धि प्रखर होगी, बुरे विचारों का नाश होगा और मन में अच्छे विचारों का प्राभाव होगा ।

26/05/2021

*पूजापाठ से जुड़ी हुईं महत्वपूर्ण बातें*

★ एक हाथ से प्रणाम नही करना चाहिए।

★ सोए हुए व्यक्ति का चरण स्पर्श नहीं करना चाहिए।

★ बड़ों को प्रणाम करते समय उनके दाहिने पैर पर दाहिने हाथ से और उनके बांये पैर को बांये हाथ से छूकर प्रणाम करें।

★ जप करते समय जीभ या होंठ को नहीं हिलाना चाहिए। इसे उपांशु जप कहते हैं। इसका फल सौगुणा फलदायक होता हैं।

★ जप करते समय दाहिने हाथ को कपड़े या गौमुखी से ढककर रखना चाहिए।

★ जप के बाद आसन के नीचे की भूमि को स्पर्श कर नेत्रों से लगाना चाहिए।

★ संक्रान्ति, द्वादशी, अमावस्या, पूर्णिमा, रविवार और सन्ध्या के समय तुलसी तोड़ना निषिद्ध हैं।

★ दीपक से दीपक को नही जलाना चाहिए।

★ यज्ञ, श्राद्ध आदि में काले तिल का प्रयोग करना चाहिए, सफेद तिल का नहीं।

★ शनिवार को पीपल पर जल चढ़ाना चाहिए। पीपल की सात परिक्रमा करनी चाहिए। परिक्रमा करना श्रेष्ठ है,

★ कूमड़ा-मतीरा-नारियल आदि को स्त्रियां नहीं तोड़े या चाकू आदि से नहीं काटें। यह उत्तम नही माना गया हैं।

★ भोजन प्रसाद को लाघंना नहीं चाहिए।

★ देव प्रतिमा देखकर अवश्य प्रणाम करें।

★ किसी को भी कोई वस्तु या दान-दक्षिणा दाहिने हाथ से देना चाहिए।

★ एकादशी, अमावस्या, कृृष्ण चतुर्दशी, पूर्णिमा व्रत तथा श्राद्ध के दिन क्षौर-कर्म (दाढ़ी) नहीं बनाना चाहिए ।

★ बिना यज्ञोपवित या शिखा बंधन के जो भी कार्य, कर्म किया जाता है, वह निष्फल हो जाता हैं।

★ शंकर जी को बिल्वपत्र, विष्णु जी को तुलसी, गणेश जी को दूर्वा, लक्ष्मी जी को कमल प्रिय हैं।

★ शंकर जी को शिवरात्रि के सिवाय कुमकुम नहीं चढ़ती।

★ शिवजी को कुंद, विष्णु जी को धतूरा, देवी जी को आक तथा मदार और सूर्य भगवानको तगर के फूल नहीं चढ़ावे।

★ अक्षत देवताओं को तीन बार तथा पितरों को एक बार धोकर चढ़ावे।

★ नये बिल्व पत्र नहीं मिले तो चढ़ाये हुए बिल्व पत्र धोकर फिर चढ़ाए जा सकते हैं।

★ विष्णु भगवान को चावल गणेश जी को तुलसी, दुर्गा जी और सूर्य नारायण को बिल्व पत्र नहीं चढ़ावें।

★ पत्र-पुष्प-फल का मुख नीचे करके नहीं चढ़ावें, जैसे उत्पन्न होते हों वैसे ही चढ़ावें।

★ किंतु बिल्वपत्र उलटा करके डंडी तोड़कर शंकर पर चढ़ावें।

★पान की डंडी का अग्रभाग तोड़कर चढ़ावें।

★ सड़ा हुआ पान या पुष्प नहीं चढ़ावे।

★ गणेश को तुलसी भाद्र शुक्ल चतुर्थी को चढ़ती हैं।

★ पांच रात्रि तक कमल का फूल बासी नहीं होता है।

★ दस रात्रि तक तुलसी पत्र बासी नहीं होते हैं।

★ सभी धार्मिक कार्यो में पत्नी को दाहिने भाग में बिठाकर धार्मिक क्रियाएं सम्पन्न करनी चाहिए।

★ पूजन करनेवाला ललाट पर तिलक लगाकर ही पूजा करें।

★ पूर्वाभिमुख बैठकर अपने बांयी ओर घंटा, धूप तथा दाहिनी ओर शंख, जलपात्र एवं पूजन सामग्री रखें।

★ घी का दीपक अपने बांयी ओर तथा देवता को दाहिने ओर रखें एवं चांवल पर दीपक रखकर प्रज्वलित करें।

★ गणेशजी को तुलसी का पत्र छोड़कर सब पत्र प्रिय हैं। भैरव की पूजा में तुलसी स्वीकार्य नहीं है।

★ कुंद का पुष्प शिव को माघ महीने को छोड़कर निषेध है।

★ बिना स्नान किये जो तुलसी पत्र जो तोड़ता है उसे देवता स्वीकार नहीं करते।

★ रविवार को दूर्वा नहीं तोड़नी चाहिए।

★ केतकी पुष्प शिव को नहीं चढ़ाना चाहिए।

★ केतकी पुष्प से कार्तिक माह में विष्णु की पूजा अवश्य करें।

★ देवताओं के सामने प्रज्जवलित दीप को बुझाना नहीं चाहिए।

★ शालिग्राम का आवाह्न तथा विसर्जन नहीं होता।

★ जो मूर्ति स्थापित हो उसमें आवाहन और विसर्जन नहीं होता।

★ तुलसीपत्र को मध्यान्ह के बाद ग्रहण न करें।

★ पूजा करते समय यदि गुरुदेव,ज्येष्ठ व्यक्ति या पूज्य व्यक्ति आ जाए तो उनको उठ कर प्रणाम कर उनकी आज्ञा से शेष कर्म को समाप्त करें।

★ मिट्टी की मूर्ति का आवाहन और विसर्जन होता है और अंत में शास्त्रीयविधि से गंगा प्रवाह भी किया जाता है।

★ कमल को पांच रात,बिल्वपत्र को दस रात और तुलसी को ग्यारह रात बाद शुद्ध करके पूजन के कार्य में लिया जा सकता है।

★ पंचामृत में यदि सब वस्तु प्राप्त न हो सके तो केवल दुग्ध से स्नान कराने मात्र से पंचामृतजन्य फल जाता है।

★ शालिग्राम पर अक्षत नहीं चढ़ता। लाल रंग मिश्रित चावल चढ़ाया जा सकता है।

★ हाथ में धारण किये पुष्प, तांबे के पात्र में चन्दन और चर्म पात्र में गंगाजल अपवित्र हो जाते हैं।

★ पिघला हुआ घी और पतला चन्दन नहीं चढ़ाना चाहिए।

★ प्रतिदिन की पूजा में सफलता के लिए दक्षिणा अवश्य चढ़ाएं।

★ आसन, शयन, दान, भोजन, वस्त्र संग्रह, विवाद और विवाह के समयों पर छींक शुभ मानी गई है।

★ जो मलिन वस्त्र पहनकर, मूषक आदि के काटे वस्त्र, केशादि बाल कर्तन युक्त और मुख दुर्गन्ध युक्त हो, जप आदि करता है उसे देवता नाश कर देते हैं।

★ मिट्टी, गोबर को निशा में और प्रदोषकाल में गोमूत्र को ग्रहण न करें।

★ मूर्ति स्नान में मूर्ति को अंगूठे से न रगड़ें।

★ पीपल को नित्य नमस्कार पूर्वाह्न के पश्चात् दोपहर में ही करना चाहिए। इसके बाद न करें।

★ जहां अपूज्यों की पूजा होती है और विद्वानों का अनादर होता है, उस स्थान पर दुर्भिक्ष, मरण और भय उत्पन्न होता है।

★ पौष मास की शुक्ल दशमी तिथि, चैत्र की शुक्ल पंचमी और श्रावण की पूर्णिमा तिथि को लक्ष्मी प्राप्ति के लिए लक्ष्मी का पूजन करें।

★ कृष्णपक्ष में, रिक्तिका तिथि में, श्रवणादी नक्षत्र में लक्ष्मी की पूजा न करें।

★ अपराह्नकाल में, रात्रि में, कृष्ण पक्ष में, द्वादशी तिथि में और अष्टमी को लक्ष्मी का पूजन प्रारम्भ न करें।

★ मंडप के नव भाग होते हैं, वे सब बराबर-बराबर के होते हैं अर्थात् मंडप सब तरफ से चतुरासन होता है, अर्थात् टेढ़ा नहीं होता। जिस कुंड की श्रृंगार द्वारा रचना नहीं होती वह यजमान का नाश करता है।

★ पूजा-पाठ करते समय हो जाए कुछ गलती तो अंत में जरूर बोलें ये एक मंत्र

आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्।
पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वर॥
मंत्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं जनार्दन।
यत्पूजितं मया देव! परिपूर्ण तदस्तु मे॥

20/12/2020
नवग्रह कौनसे है और उनके नाम और महिमा क्या हैकौन कौन से होते है नवग्रह – जाने नाम :सूर्य : भगवान सूर्य जिनके चारो ओर सभी ...
28/05/2020

नवग्रह कौनसे है और उनके नाम और महिमा क्या हैकौन कौन से होते है नवग्रह – जाने नाम :

सूर्य : भगवान सूर्य जिनके चारो ओर सभी ग्रह चक्कर लगाते है | यह सत्व गुण वाले पर पांच मुख्य देवताओ में आते है |
चन्द्रमा : इनका दूसरा नाम सोम है और सोमवार इनका वार है | चन्द्र देवता भगवान शिव के सिर पर विराजमान है |सत्व गुण वाले है |
मंगल : यह लाल रंग के युद्ध के देवता कहलाते है | पृथ्वी देवी की संतान के रूप में पूजे जाते है और वृश्चिक और मेष राशि के स्वामी कहलाते है | मंगल दोष को दूर करने के उपाय पढ़े
बुध : यह चन्द्र देव और तारा का पुत्र है | यह रजगुण वाले है और व्यापार के देवता कहे जाते है | इनका दिन बुधवार है |
बृहस्पति यह ग्रह देवताओ के गुरु बृहस्पति का प्रतिनिदित्व करता है |
शुक्र :इस ग्रह का स्वामी असुरो के गुरु शुक्राचार्य है |
शनि : तमस प्रकृति का है और शनिवार इसका वार है | शनि देव भगवान सूर्य का पुत्र है और बहुत धीरे चलना वाला ग्रह है | इसके चारो ओर एक रिंग लगी हुई है |
राहू : उत्तर चंद्र आसंधि के देवता हैं | यह सूर्य ग्रहण और चन्द्र ग्रहण का कारण बनते है | यह कटे हुए सिर के अमर दैत्य है | यह दुसरो ग्रहों के साथ मिलकर बुरे परिणाम भाग्य में लाते है
केतु : यह भी राहू की तरह असुर कुल के ग्रह है | इन्हे दक्षिण चंद्र आसंधि का देवता कहा जाता है | यह भी ग्रहण का कारण बनते है |

जानिये, आखिर क्यों की जाती है सबसे पहले गणेश जी की पूजाहिंदू धर्म में किसी भी शुभ कार्य को करने से पहले हमेशा श्रीगणेश क...
26/05/2020

जानिये, आखिर क्यों की जाती है सबसे पहले गणेश जी की पूजा
हिंदू धर्म में किसी भी शुभ कार्य को करने से पहले हमेशा श्रीगणेश की पूजा की जाती है। ज्योतिष के अनुसार ऐसा करने से हर काम में सफलता प्राप्त होती है। इस रिवाज़ के बारे में लगभग सभी जानते हैं लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि आख़िर ऐसा क्यों है। मतलब कि क्यों हर शुभ काम को करने से पहले गणपति की वंदना, पूजन-अर्चन करना ज़रूरी होती है। अगर आप भी उन्हीं लोगों में से एक है, जिन्हें इससे जुड़ा पौराणिक कारण नहीं पता, तो आइए हम आपको बताते हैं। असल में कहा जाता है कि किसी भी प्रकार के पूजन अनुष्ठान आदि में विघ्नों और बाधाओं से मुक्ति पाने के लिए गणेश जी का पूजन करना आवश्यक है। कहा जाता है कि इससे इनकी कृपा प्राप्त होती है।
इससे जुड़ी एक कथा इस प्रकार है प्राचीन समय में एक बार सभी देवताओं में बहस हो गई कि तमाम देवताओं में से सबसे पहले पूजा किसी की जानी चाहिए। सभी देवताओं को आपस में झगड़े देखकर नारद मुनि ने उन्हें भगवान शिव के पास जाने की सलाह दी। सभी देवता अपने झगड़े को लेकर भगवान शिव के पास गए और सारी बात बताई। जब भोलेनाथ को उनके झगड़े का मुख्य कारण पता चला तो उन्होंने एक प्रतियोगिता आयोजित किया। जिस में सभी देवताओं को पूरे ब्राह्माण्ड के चक्कर लगाने को कहा और ये कहा कि जो भी सबसे पहल लौट कर वापिस आऐगा वहीं सर्वप्रथम पूजनीय माना जाएगा।

ये सुनते ही सभी देवता अपने-अपने वाहनों पर बैठकर ब्राह्माण्ड के चक्कर लगाने चले गए। परंतु गणेश जी ने जाने की बजाए अपने माता-पिता यानि शिव-पार्वती की सात परिक्रमा की और उनके आगे हाथ जोड़कर खड़ हो गए। जब तब सभी देवता वापिस लौटकर आते तक भगवान शिव ने गणेश को विजयी घोषित कर दिया। जब सभी देवता वापिस आए तो इस निर्णय को जानकर हैरान हो गए और भगवान शिव से इसका कारण पूछा। तब शिव जी ने बताया कि माता-पिता को पूरे ब्रह्माण्ड और लोक में सबसे श्रेष्ठ माना जाता है। इतना सुनकर सब देवता समझ गए कि गणेश को क्यों सर्वप्रथम देव माना जाता है। मान्यताओं के अनुसार इसके बाद ही भगवान गणेश सबसे पहले पूजे जाने लगे।

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