03/11/2025
गाँव का मौसम बदल रहा था — धान की बालियाँ झूम रही थीं, और हवा में बारिश की खुशबू थी।
देवर आदित्य महीनों बाद शहर से लौटा था। खेतों की मिट्टी से सनी पगडंडी पर चलते हुए उसे अपने घर का आँगन नज़र आया — जहाँ भाभी सविता तुलसी के पास दीपक जला रही थीं।
वो दृश्य जैसे वक्त को रोक देता था — वही सादगी, वही मुस्कुराता चेहरा।
“भाभी, लगता है इस बार बारिश ने आपसे पहले गाँव को सँवार दिया,” आदित्य ने मुस्कुराते हुए कहा।
भाभी ने पलटकर देखा, आँखों में खुशी थी —
“अरे, तू आ गया! तेरे बिना घर कितना सूना था।”
भाभी ने उसे खाना परोसा — वही बचपन वाला स्वाद, वही स्नेह।
आदित्य ने चुपचाप देखा, भाभी के हाथों में अभी भी वही लाल चूड़ियाँ थीं, जिनकी खनक कभी उसे नींद में भी सुनाई देती थी।
रात गहराई, बाहर बारिश शुरू हो गई।
आँगन में बिजली चमकी, और दोनों बरामदे में बैठ गए।
भाभी ने धीरे से कहा —
“तेरी माँ कहा करती थीं, तू सबसे अलग है। आज भी वैसा ही है तू, आदित्य।”
आदित्य ने उनकी ओर देखा —
“आप तो माँ जैसी ही हो भाभी… बस फर्क इतना है कि माँ डाँटती थीं, और आप समझा देती हैं।”
भाभी मुस्कुराईं —
“और तू हमेशा ऐसा ही रहा, जो सबके दिल को छू लेता है।”
कुछ पल दोनों चुप रहे। बाहर बारिश तेज़ थी, और दीये की लौ काँप रही थी।
आदित्य ने हल्के स्वर में कहा —
“भाभी, जब भी शहर में थक जाता हूँ, तो आपकी मुस्कान याद आती है। जैसे इस गाँव की मिट्टी, जो हमेशा साथ रहती है।”
भाभी ने उसकी तरफ देखा, आँखों में नमी थी —
“कुछ रिश्ते नाम से नहीं, एहसास से बनते हैं आदित्य… और वही सबसे पवित्र होते हैं।”
आदित्य बस मुस्कुरा दिया।
वो जानता था, ये रिश्ता शब्दों से परे है — एक ऐसी डोर, जिसमें सम्मान और प्रेम दोनों जुड़े हैं।
बारिश थम गई थी।
भाभी उठीं और बोलीं,
“चल, दूध पी ले… फिर सो जा। सुबह खेत में चलना है।”
आदित्य ने देखा — दीये की रोशनी में भाभी का चेहरा चमक रहा था।
वो पल शायद हमेशा के लिए उसकी यादों में ठहर गया।