National Institute For Environment & Agriculture

National Institute For Environment & Agriculture NIEA is a non-profit voluntary organization. It was registered in 1990 under Societies Registration Act, 1860 at Azamgarh.

In the assessment year 2004-05 the objective and name of the organization revised under the umbrella of high professionals of various fields such as environment, forest, agriculture, social anchors. The organization’s major commitments are to uplift the weaker and underprivileged sections of the society and to conserve our Natural Resources for ecological and economical wealth of the Nation and fo

r sustainable all round development of society. Since its inception in year 1990 National Institute For Environment & Agriculture has been working on different issues like Health, Education, Women empowerment, Agriculture & NRM etc, at present Institute is working with Hesperian Foundation, MoEF, on the issues like Environmental health Education, Safe drinking water (Awareness on Arsenic Content in ground water), and Women empowerment, Special Education for dropout children, Environment & Natural resource management.

22/11/2019

#पराली_प्रबंधन- धान की पराली कुछ लोगों के लिए मुसीबत बनी है तो कुछ किसान इसका शानदार उपयोग कर फायदा उठा रहे हैं। पंजाब में पटियाला के किसान गुरुदेव सिंह लोगों से पराली न जलाने की अपील करते हुए इसके लाभ समझा रहे हैं। गुरुदेव सिंह का कहना है कि इससे बिना लागत के फसल तो अच्छी होंगी ही पर्यावरण भी बचेगा।

"मैं धान का फूस (पराली) जलाने के बजाए उसे कटने के बाद इकट्ठा कर लेता हूं, और जब गेहूं बोता हूं तो उसमें इसी पराली की मल्चिंग (खेत में बिछा देना) कर देता हूं। जमीन तक धूप न पहुंचने से गेहूं में उगने वाले कई खरपतवार (नदीन) उग नहीं पाते और पराली में डिकंपोस्जर डालने से वो अच्छी खाद का काम करते हैं।' गुरुदेव सिंह फोन पर गांव कनेक्शन को बताते हैं।

केंद्र सरकार की नौकरी से रिटायर्ड गुरुदेव सिंह के पंजाब में दिल्ली-अमृतसर रोड पर पटियाला जिले में खेत हैं। अपने 4 एकड़ खेत में वो जैविक तरीकों से खेती करते हैं। सोशल मीडिया पर सक्रिय गुरुदेव सिंह ने अपने फेसबुक पर खेत में पराली की फोटो पोस्ट करते हुए लिखा कि पराली को खेत मे जलाना धरती माता और इंसानियत के खिलाफ बहुत ही घिनौना पाप है। इसलिये हम अपने रसायन मुक्त फार्म पर कंबाईन से फसल काटने के पश्चात पराली को इकठ्ठा कर लेते हैं और खेत में प्रयोग करते हैं।

गुरुदेव सिंह अपनी खेती की विधि बताते हैं, "कंबाइन मशीन जीरी (धान) को एक फीट ऊपर से काटती है। बाकी फसल के दाने निकालकर वो फूस (बेकार पराली) निकाल देती है। हम उसे इकट्टा करकर मेढ़ पर लगवा देते हैं। खेत को दो बार हैरो से जुतवाने के बाद पानी लगाते हैं। फिर कुछ दिनों बार गेहूं बोते हैं। उसी दिन उसमें पराली बिछवा देते हैं।'

पराली जो काफी किसानों और आबोहवा के लिए संकट बनती है वो गुरुदेव सिंह के खेत में पहले खरपतावर रोकने का जरिया और बाद में अच्छी कंपोस्ट खाद बन जाती है। पराली और डिकंपोजर के फायदे गिनाते हुए वो कहते हैं, "हर फसल के साथ कुछ खरपतवार जरूर जमते हैं। ज्यादातर ये खेत के ही होते हैं जो अपने समय पर जम जाते हैं। लेकिन मेरे गेहूं और धान में 2 साल से कोई खरपतवार नहीं जमा। क्योंकि मैं उसमे लगातार डिकंपोजर का छिड़काव करता हूं। पराली की मल्चिंग से गेहूं के पौधे दमदार होते हैं वो ऊपर निकल आते हैं लेकिन धूप न पड़ने से खरपतवार नहीं जम पाता। और गेहूं जमने के 20-25 दिन बाद उसमें डीकंपोजर डाल देता हैं। जिससे वो अंदर ही सड़ जाते हैं। दूसरी बुवाई तक पराली भी सड़कर खाद बन जाती है।"

डीकंपोजर एक प्रकार का कचरा अपघटक है जिसे गाजियाबाद स्थित राष्ट्रीय जैविक खेती केंद्र ने गाय के गोबर आदि से तैयार किया था। दही के जामन की तरह काम करते है। इससे पहले भी कुछ कंपनियों और किसान अपने तरीकों से गोबर, खाद और फसलों को अपशिष्ट के सड़ाते रहे हैं। लेकिन, जैविक खेती केंद्र ने इसे मात्र 20 रुपए में तैयार किया है। वेस्ट डी कंपोजर दही में जामन की तरह काम करता है इसकी एक शीशी कई वर्षों लगातार तरल जैविक खाद और कचरा अपघटक बना सकती है।

गुरुदेव सिंह अपने एक एकड़ खेत में 200 लीटर वेस्ट डीकंपोजर डालते हैं। उनके मुताबिक गेहूं में दूसरी सिंचाई तक पराली गलकर खाद बन जाती है। इसके साथ ही धान के जो पौधे बचे रह जाते हैं वो भी गल जाते हैं। इनती ही नहीं पराली की मल्चिंग के चलते खेत पर सीधे धूप नहीं पड़ती, जिससे खेत में नमी ज्यादा दिन तक बनी रहती है।

गुरुदेव सिंह जैविक खेती करते हैं इसलिए वो खेत में डीएपी-यूरिया और किसी तरह का कीटनाशक नहीं डालते। वो कहते हैं, किसान पहले तो खेत जला देते हैं फिर पैदावार लेने के लिए फर्टीलाइजर छोड़ते हैं, जलाने से मित्र कीट भी मर जाते हैं, जब फसल में रोग लगते हैं तो कीटनाशक डालते हैं, इन सब में पैसे तो खर्च होते ही हैं अनाज भी जहरीला होता जाता है, तो क्यों खेतों को फूंका जाए?' उन्होंने अपनी फेसबुक पोस्ट पंजाब और हरियाणा के किसानों से अपनी भी कि है कि वो राजनेताओं झांसे में आकर पराली न जलाएं। ऐसा न हो कि हमारी आने वाले नस्लों के लिए खेत अनाज पैदा करने काबिल न रह जाएं।

अपने तर्क के समर्थन में वो खुद के खेतों का उदाहरण देते हुए कहते हैं, "2016 के बाद मैंने धान और गेहूं के किसी भी प्रकार का फसल अवशेष नहीं जलाए। इसके साथ ही लगातार वेस्ट डीकंपोजर का छिड़काव किया, इसका फायदा ये हुआ कि ढाई- तीन वर्षों से हमारे खेतों मडूसी और दूसरे नदीन (खरपतवार) पैदा नहीं हो रहे, और फसल में कोई रोग भी नहीं लग रहा। इसी को कहते हैं हिंग्ग लगे न फटकड़ी।"

एक एकड़ में रायानिक खेती पर त्वरित खर्च
गुरुदेव सिंह के मुताबिक पंजाब में ज्यादातर किसान एक एकड़ गेहूं में 1 बोरी डीएपी, 2 बोरी यूरिया कुछ दूसरे खादें और कीटनाशक का छिड़काव करते हैं। अगर डीएपी (1400 और यूरिया करीब 600 रुपए) यूरिया पर ही 2000 रुपए कम से खर्च होते हैं। जबकि पराली के सही उपयोग से खेत, पैसा और सेहत तीनों बचे रहेंगे।

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रोजगार तथा आजीविका सृजन में इसके उच्‍चांश के कारण कृषि को भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था का मूलाधार माना जाता है। यह 52 प्रतिशत कार्यबल को रोजगार उपलब्‍ध कराकर आधे बिलियन से अधिक लोगों को सहारा देता है। राष्‍ट्र के सकल घरेलू उत्‍पाद में इसका योगदान वर्ष 2006-07 में लगभग 18.5 प्रतिशत है। यह कच्‍ची सामग्री का भी एक महत्‍वपूर्ण स्रोत है तथा अनेक औद्योगिक उत्‍पादों विशेषत: उर्वरक, कीटनाशी, कृषि औजार तथा अनेक प्रकार की उपभोक्‍ता वस्‍तुओं के लिए इसकी भारी मांग है।

02/06/2014

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