14/12/2025
बालाघाट जिला अस्पताल में डिलीवरी के नाम पर पैसे का आरोप: एक डॉक्टर का मामला या पूरी व्यवस्था की असल तस्वीर?
बालाघाट जिला अस्पताल में डिलीवरी के बदले ₹5,000 मांगने के आरोप में डॉ. गीता बारमाटे के निलंबन का मामला अब सिर्फ एक डॉक्टर तक सीमित नहीं रह गया है। हाल की अन्य घटनाओं और मीडिया रिपोर्टों को साथ रखकर देखें, तो यह साफ होता है कि यह मामला जिला अस्पताल की पूरी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, एक गर्भवती महिला से डिलीवरी कराने के लिए ₹5,000 की मांग की गई। परिजनों का आरोप है कि पैसा न देने पर इलाज में देरी हुई और नवजात की मौत हो गई। मामला सामने आने के बाद जिला प्रशासन ने डॉ. गीता बारमाटे को निलंबित कर दिया और कलेक्टर की ओर से हाईकोर्ट में कैविएट भी दायर की गई, ताकि निलंबन पर तुरंत रोक न लग सके। यह कार्रवाई यह दिखाती है कि प्रशासन मामले को हल्के में नहीं ले रहा, लेकिन असली सवाल यह है कि क्या सिर्फ निलंबन से भविष्य में ऐसी घटनाएँ रुक जाएँगी?
इसी पृष्ठभूमि में जिला अस्पताल से जुड़ा एक और हालिया मामला सामने आया, जिसकी खबर स्थानीय और राष्ट्रीय मीडिया में प्रकाशित हुई। इस मामले में परिजनों का आरोप था कि डिलीवरी के दौरान मौजूद महिला डॉक्टर ने यह कहते हुए इलाज से मना कर दिया कि उनकी ड्यूटी खत्म हो चुकी है। दूसरे डॉक्टर के आने में देरी हुई और महिला ने मृत शिशु (स्टिल बर्थ) को जन्म दिया। हालांकि संबंधित डॉक्टर ने आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि महिला को जब अस्पताल लाया गया तब तक गर्भ में बच्चे की धड़कन बंद हो चुकी थी और वह सुबह 10 बजे तक ड्यूटी पर थीं।
यह एक वाक्य — “ड्यूटी खत्म हो चुकी है” — अपने आप में कई गंभीर सवाल खड़े करता है। क्या इसका मतलब यह है कि उस समय अस्पताल में केवल एक ही डॉक्टर उपलब्ध था? अगर ऐसा है, तो क्या इतने बड़े जिला अस्पताल में, जहाँ रोज कई डिलीवरी के मामले आते हैं, एक समय में सिर्फ एक डॉक्टर होना पर्याप्त माना जा सकता है? और अगर पर्याप्त डॉक्टर हैं, तो अतिरिक्त डॉक्टर उपलब्ध क्यों नहीं थे? यह घटना सिर्फ किसी एक डॉक्टर की लापरवाही का आरोप नहीं है, बल्कि यह अस्पताल की ड्यूटी प्लानिंग और बैक-अप व्यवस्था की असल स्थिति की ओर इशारा करती है।
इस पूरी तस्वीर को और स्पष्ट करती है Free Press Journal की रिपोर्ट। इस रिपोर्ट के अनुसार, मार्च 2024 से शुरुआती 2025 के बीच बालाघाट जिले में करीब 2,000 से अधिक गर्भवती महिलाओं को सरकारी अस्पताल की बजाय निजी अस्पतालों में डिलीवरी के लिए जाना पड़ा। रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि कई मामलों में वार्डबॉय या जरूरी सहयोग उपलब्ध नहीं होने के कारण मरीजों को बाहर ले जाना पड़ा। यह आंकड़ा यह बताता है कि समस्या किसी एक दिन या एक मरीज की नहीं, बल्कि लंबे समय से चली आ रही व्यवस्था की कमजोरी है।
इन सभी घटनाओं को जोड़कर देखें तो एक बड़ा कारण साफ दिखता है — डॉक्टरों और सुविधाओं की सीमित उपलब्धता। इसे एक साधारण उदाहरण से समझा जा सकता है। मान लीजिए एक रात में डिलीवरी या ऑपरेशन के लिए 10 महिलाएं हैं, लेकिन ड्यूटी पर एक ही डॉक्टर, सीमित नर्सिंग स्टाफ और एक ही ऑपरेशन थिएटर है। ऐसे में सवाल उठता है कि पहले किसे लिया जाए और किसे प्राथमिकता मिले। इस स्थिति में डॉक्टरों और नर्सों पर न सिर्फ काम का भारी दबाव होता है, बल्कि अक्सर फोन कॉल का दबाव भी होता है — कभी किसी बड़े व्यक्ति या नेता का, कभी किसी प्रभावशाली रिश्तेदार का। ऐसे माहौल में अगर कोई परिवार यह सोचता है कि ₹5–10 हजार देने से उनका केस पहले लिया जाएगा और बच्चे की जान सुरक्षित रहेगी, तो यह व्यवहार अस्वाभाविक नहीं लगता। यह रिश्वत को सही ठहराना नहीं है, बल्कि सिस्टम की सच्चाई को समझने का प्रयास है।
सरकार खुद इस कमी को मानती है, इसी वजह से मध्य प्रदेश में “You Quote – We Pay” जैसी योजना लाई गई। इस योजना के तहत जिन जिलों में विशेषज्ञ डॉक्टर नहीं मिल रहे, वहाँ डॉक्टर अपनी शर्तों पर काम करने को तैयार होते हैं और सरकार उन्हें उस हिसाब से भुगतान करती है। उदाहरण के तौर पर, भोपाल जिले के बेरसिया क्षेत्र में इस योजना के तहत एनेस्थेटिस्ट की नियुक्ति की गई, ताकि ऑपरेशन और डिलीवरी जैसी सेवाएँ डॉक्टरों की कमी के कारण रुकें नहीं। इस तरह की योजनाएं विशेषज्ञों को दूरदराज़ जिलों में लाने का प्रयास हैं, ताकि डिलीवरी और अन्य इमरजेंसी सेवाएँ 24×7 उपलब्ध रह सकें।
सवाल यह है कि बालाघाट जैसे आदिवासी और दूरस्थ जिले में इस योजना का पूरा इस्तेमाल क्यों नहीं हुआ? अगर पर्याप्त विशेषज्ञ डॉक्टर उपलब्ध होते, तो क्या “ड्यूटी खत्म हो गई” जैसी स्थिति बनती? क्या तब परिवारों को पैसे देकर प्राथमिकता खरीदने की जरूरत पड़ती? क्या पर्याप्त बैक-अप डॉक्टर और स्टाफ होने पर इन tragic घटनाओं को रोका जा सकता था?
डॉ. गीता बारमाटे का निलंबन निश्चित रूप से एक कड़ा संदेश देता है और कुछ हद तक डर भी पैदा करता है, लेकिन क्या यही समाधान है? अगर डॉक्टरों की संख्या वही रहे, सुविधाएँ वही रहें और दबाव वही बना रहे, तो सिर्फ डक्टर निलंबन से व्यवस्था नहीं बदलेगी। सवाल यह भी है कि बालाघाट के जनप्रतिनिधि इस दिशा में क्या कर रहे हैं — क्या जिले में मेडिकल कॉलेज खोलने या स्वास्थ्य सुविधाएँ बढ़ाने के लिए ठोस प्रयास हो रहे हैं? क्या राज्य और केंद्र स्तर पर ऐसे कदम उठाए जा रहे हैं जिससे भविष्य में डॉक्टरों और विशेषज्ञों की कमी दूर हो सके?
यह मामला सिर्फ एक डॉक्टर या एक परिवार का नहीं है। यह बालाघाट की उस असलियत को सामने लाता है, जहाँ संसाधन कम हैं, जिम्मेदारी ज़्यादा है और आम आदमी अपने बच्चे की जान के लिए किसी भी हद तक जाने को मजबूर हो जाता है। अगर इस पूरे सिस्टम को ठीक नहीं किया गया, तो आज का यह मामला कल फिर किसी नए नाम और नए परिवार के साथ सामने आ सकता है।
सूत्र / Sources:
Padmesh News (बालाघाट)
मध्य प्रदेश हलचल न्यूज़
टीवी/डिजिटल वीडियो रिपोर्ट्स (बालाघाट)
Free Press Journal
जिला प्रशासन, बालाघाट
Jansampark, मध्य प्रदेश शासन