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"मेरे कंप्यूटर में वायरस आ गया है" अगर आपके पास कभी अपना कंप्यूटर रहा है तो ये वाक्य आपने भी कभी ना कभी अवश्य ही बोला हो...
15/09/2018

"मेरे कंप्यूटर में वायरस आ गया है" अगर आपके पास कभी अपना कंप्यूटर रहा है तो ये वाक्य आपने भी कभी ना कभी अवश्य ही बोला होगा, वायरस चीज ही ऐसी है। एक अनुमान के अनुसार शायद ही कोई कंप्यूटर प्रयोगकर्ता हो जिसने अपने कंप्यूटर में वायरस के प्रकोप को ना झेला हो।

आज हम इस लेख में इसी विषय पर चर्चा करेंगे कि ये कंप्यूटर वायरस होते क्या हैं। तो आइए जांचते हैं कुछ कंप्यूटर वायरसों और उनकी वंशावली को और देखते हैं किस प्रकार समय के साथ उनके परिवार में अन्य सदस्य जुड़ते चले गए।

गूगल देवता द्वारा बताई गई परिभाषा के अनुसार "कंप्‍यूटर का वायरस किसी कंप्‍यूटर प्रोग्राम में डाला गया वह निर्देश है जिसके प्रभाव से कंप्‍यूटर काम करना बंद कर देता है और संचित सूचना नष्‍ट हो जाती है" लेकिन ये बड़ी सतही परिभाषा है। किसी भी प्रोग्राम में ऐसे निर्देश हो सकते हैं जो उस प्रोग्राम को चलाते समय आयी किसी अस्थाई त्रुटि (जैसे Run time error) की वजह से कंप्यूटर को खराब कर सकते हैं। मसलन ऐसे कंप्यूटर प्रोग्राम जो हार्ड डिस्क ड्राइव (HDD) को किसी प्रकार की कमियों के लिये जांचते हैं, किसी त्रुटि की वजह से HDD से सारी जानकरियों का सफाया कर सकते हैं, मगर हम इसे कंप्यूटर वायरस की संज्ञा नहीं दे सकते। सही अर्थ में कंप्यूटर वायरस ऐसा कोई प्रोग्राम होता है जिसे "जानबूझ" कर कंप्यूटर में कोई अवांछित कार्य करने के लिए बनाया गया हो (ध्यान दें "जानबूझ" कर)।

किसी कंप्यूटर वायरस को एक से दूसरे कंप्यूटर में जाने के लिए किसी माध्यम की जरूरत होती है इसलिए शुरुआत में कंप्यूटर वायरस फ्लॉपी डिस्क से ही फैलते थे क्योंकि उन दिनों फ्लॉपी डिस्क ही कंप्यूटर डेटा को शेअर करने का एक मात्र माध्यम थीं। कंप्यूटर नेटवर्क के प्रचलित होने पर वायरस बनाने वालों ने भी नई-नई युक्तियां इस्तेमाल की और वायरसों को कंप्यूटर नेटवर्क द्वारा फैलाने के तरीके ईजाद किये, मगर इंटरनेट/ईमेल के आने पर सब बदल गया और हमने ऐसे कंप्यूटर वायरस देखे जिनके फैलने के तरीकों में बड़ी ही रोचक तकनीकों का इस्तेमाल किया गया, इस समय में कंप्यूटर वायरस बनाने वालों ने जिस स्तर की बौद्धिक कल्पनाओं का सहारा लिया वह अपने आप में अद्भुत हैं।

शुरुआत में कंप्यूटर वायरस, कंप्यूटर प्रोग्रामरों द्वारा केवल हंसी मजाक के लिए बनाए जिनका मकसद अपनी प्रोग्रामिंग क्षमताओं को जाँचना और अपने को दूसरों से बेहतर दिखाना भर होता था। ये वायरस ज्यादातर एक मजाकिया संदेश, एनीमेशन या कोई चिन्ह दिखा कर बंद हो जाते थे, जैसे "क्रीपर" (creeper) वायरस कंप्यूटर स्क्रीन पर एक संदेश "मैं क्रीपर हूँ, अगर मुझे पकड़ सकते हो तो पकड़ो" दिखता था, "कास्केड" (cascade) वायरस द्वारा संक्रमित होने पर स्क्रीन पर आ रहे अक्षर एक एक कर गिरने लगते थे, वहीं "जोशी" वायरस कंप्यूटर को संक्रमित करने पर हर 5 जनवरी को कंप्यूटर को शुरू होते समय रोक देता और "हैप्पी बर्थडे जोशी" टाइप करने के लिए कहता था, टाइप करने के बाद ही कंप्यूटर आगे चलता था। ये वायरस कोई नुकसान ना पहुंच कर सरदर्द ज्यादा होते थे क्योंकि एक बार वायरस के सक्रिय होने पर कंप्यूटर को बन्द कर फिर से चलाना होता था जिससे जरूरी काम करते समय उसमें विघ्न पड़ता था। सबसे पहला कंप्यूटर वायरस कौन सा था इस पर कंप्यूटर विशेषज्ञ एक मत नहीं हैं, कोई कहता है ये क्रीपर(creeper) था तो दूसरे एलक क्लोनेर(Elk cloner) को पहला वायरस बताते हैं, परंतु पहला वायरस जिसे खोजा गया था पाकिस्तानी भाइयों द्वारा सन 1986 में बनाया गया पाक ब्रेन (pak brain) या ब्रेन वायरस था जो उन्होंने अपने बनाये सॉफ्टवेयर की अनाधिकृत प्रतिलिपि करने से रोकने के लिए बनाया था। इस समय तक वायरस किसी को कोई नुकसान नहीं पहुंचा रहे थे, फिर सन 1991 में मिकेलंगेलो (michelangelo) नामक एक वायरस आया जो 6 मार्च को कंप्यूटर पर आक्रमण कर HDD को पूरी तरह से साफ कर हर तरह के डेटा को मिटा देता था और इसके साथ ही एक भयावह दौर की शुरुआत हो गई। कुछ सालों तक ऐसे ही चलता रहा, इस समय में ऐसे वायरस ही बन रहे थे जो प्रोग्राम फाइलों को अपना निशाना बनाते थे, दरअसल ये वायरस अपने आपको किसी एक्सीक्यूट होने वाली फाइलों (.com, .exe) में छुपा लेते थे और प्रोग्राम को चलाने पर ये भी स्वतः ही चल जाते थे। सन 1995 में Windows95 के आने के बाद मैक्रो वायरसों का प्रादुर्भाव हुआ जो माइक्रोसॉफ्ट ऑफिस में बनी फाइलों को अपनी गिरफ्त में लेते थे। मैक्रो (Macro) माइक्रोसॉफ्ट ऑफिस की एक ऐसी सुविधा थी जिससे किसी फ़ाइल में बार बार किये जाने वाले क्रियाकलापों को स्वचालित करने के लिए प्रोग्रामिंग की जा सकती थी। वायरस बनाने वालों ने इसे एक मौके की तरह देखा और मैक्रो वायरस बनाये, एक मैक्रो वायरस मेलिसा (Melissa) ने तो भयानक तबाही मचाई, एक अनुमान के मुताबित सन 1999 में इसने वैश्विक रूप से $80 मिलियन का नुकसान पहुंचाया वहीं सन 2003 में ब्लास्टर वायरस ने अपना ख़ौफ़नाक रूप दिखाते हुए माइक्रोसॉफ्ट को अपनी विंडोज अपडेट वेबसाइट को बंद करने के लिये ही विवश कर दिया था।

शुरू में वायरस बनाने वाले मानव स्वभाव की कुछ विशेषताओं जैसे अज्ञान/उत्सुकता/लालच/आलास का फायदा उठाते और उनका इस्तेमाल वायरस को फैलाने के लिए करते थे। जैसे कुछ वायरस जो फ्लॉपी डिस्क से फैलते थे उन्हें एक छोटी सी सावधानी बरत कर फ्लॉपी डिस्क को राइट-प्रोटेक्ट बना फैलने से रोका जा सकता था। हम समझ सकता हूँ कि आप में से कुछ ने फ्लॉपी डिस्क कभी इस्तेमाल नहीं किया होगी, उन्हें बता दें कि फ्लॉपी डिस्क के एक कोने में एक छोटा सा स्लॉट होता था जिसे ऊपर नीचे करके फ्लॉपी डिस्क को राइट प्रोटेक्टेड बनाया जा सकता था। दरअसल होता ये था कि जब किसी वायरस से संक्रमित कंप्यूटर में फ्लॉपी से कुछ कॉपी किया जाता तो जो फ्लॉपी राइट प्रोटेक्टेड नहीं होती थीं उनमें वायरस अपने आप को कॉपी कर लेता था और फिर जब इस फ्लॉपी डिस्क का उपयोग किसी दूसरे कंप्यूटर पर किया जाता तो वायरस उस कंप्यूटर को भी संक्रमित कर देता था। परंतु जैसे जैसे समय बीतता गया और कंप्यूटर शिक्षा का प्रचार प्रसार होता गया वायरस बनाने वालों के लिये मुश्किलें बढ़ने लगीं क्योंकि कम्प्यूटर प्रयोगकर्ता अब वायरसों से बचने की सावधानीयां बरतने लगे थे। नेटवर्किंग और इंटरनेट के चलन के साथ ही वायरस बनाने वालों ने भी बदलते रुख को पहचाना और वायरसों के एक अन्य प्रकार "वर्म" (worm) का जन्म हुआ जो अपने आप को किसी कंप्यूटर नेटवर्क द्वारा फैला सकते थे।

एक अनुमान के मुताबिक सन 1990 तक वायरस संख्या में 200 से 500 तक ही थे जो सन 1991 में जारी आंकडों के अनुसार 600 से 1,000 हो गए। सन 1992 के उत्तरार्ध में, अनुमानित संख्या 1,000 से 2,300 वायरस तक पहुंच गई। सन 1994 के मध्य में यह संख्या 4,500 से 7,500 से अधिक वायरस तक हो गयी और सन 1996 में यह संख्या 10,000 से अधिक चढ़ गई। सन 1998 में 20,000 और सन 2000 में इसमें 50,000 की वृद्धि हुई। अप्रैल 2008 में, बीबीसी ने बताया कि सिमेंटेक (Nortan एन्टी-वायरस बनाने वाली कम्पनी) दावा करता है कि "उसके के एंटी-वायरस प्रोग्राम 1,122,311 वायरस का पता लगा सकते हैं"

वायरसों की संख्या को लेकर भ्रम आंशिक रूप से मौजूद है क्योंकि वायरसों की गणना करने के तरीके से सहमत होना मुश्किल है, जैसे कोई वायरस अक्सर मौजूदा वायरस को लेकर उसमें थोड़ा सा फेर बदल कर भी बनाया जा सकता है। एक स्टोन्ड नाम का वायरस जो कंप्यूटर स्क्रीन पर "आपका पीसी अब पत्थर हो गया है" का संदेश छोड़ता था इसे "डोनाल्ड डक झूठ है" कहने के लिए बदलकर डोनाल्ड डक वायरस बना दिया गया। क्या यह एक नया वायरस है? ज्यादातर विशेषज्ञ हां कहते हैं, लेकिन, यह एक छोटा बदलाव है जिसे दो मिनट से भी कम समय में किया जा सकता है। अधिकतर वायरस खोजने वाली कम्पनियां इन दोनों को एक ही मानती हैं।

एक और समस्या ऐसे वायरस की गिनती करने में आती है जो खुद को उत्परिवर्तित करके अपने आप को एन्टी-वायरस प्रोग्राम से छुपाने की कोशिश करते हैं। ऐसे वायरस जब भी किसी अन्य फ़ाइल को संक्रमित करते हैं, तो ये स्वयं के एक अलग संस्करण का उपयोग करते हैं। इन वायरस को पॉलिमॉर्फिक वायरस के रूप में जाना जाता है। वहीं कुछ कंपनियां वायरस+वर्म+ट्रोजन को इकाई के रूप में देखती हैं, एक अनुमान के अनुसार, 100,000 से अधिक ज्ञात कंप्यूटर वायरस हैं। हालांकि वर्तमान में सक्रिय वायरसों का इस संख्या में केवल एक छोटा सा प्रतिशत ही है, अधिकांश वायरस संग्रह में ही मौजूद हैं।

तो ये था कंप्यूटर वायरसों का संक्षिप्त सा इतिहास, अगले लेख में हम बूट वायरस, प्रोग्राम वायरस, फ़ाइल वायरस, ईमेल वायरस, ट्रोजन हॉर्स, स्पाईवेयर, मैलवेयर, रैन्समवेयर इत्यादि क्या होते हैं, कैसे काम करते हैं और इनसे बचने के तरीकों पर चर्चा करेंगे।

इंटरनेट से लिये गए प्रस्तुत चित्र में ब्लास्टर वायरस का Hex dump दर्शाया गया है जिसमें इसके जनक द्वारा माइक्रोसॉफ्ट संस्थापक बिल गेट्स को अपने सॉफ्टवेयरों को सुधारने की नसीहत दी गयी है।

13/09/2018

कंप्यूटर सर्वर क्या हैं और कैसे काम करते हैं।

कंप्यूटर सर्वर हार्डवेयर या सॉफ्टवेयर का एक संयोग है जिसे सेवा प्रदान करने के लिए डिज़ाइन किया गया है, सर्वर शब्द का प्रयोग सेवा प्रदान करने में सक्षम किसी सॉफ्टवेयर या संबंधित हार्डवेयर के संदर्भ में होता है। सरल शब्दों में कहें तो सर्वर का मतलब है जो सर्व करे, अब कंप्यूटर सर्वर आपको चाय, कॉफी या पिज़्ज़ा तो सर्व करने से रहे, उनके पास तो बस इन्फॉर्मेशन होती हैं और वही वे बांटते हैं, तो आइए जानते हैं कि सर्वर ऐसा करते कैसे हैं।

कंप्यूटर के छात्र सर्वर का नाम सुनते ही किसी ऐसे विशिष्ट कंप्यूटर की कल्पना करना शुरू कर देते हैं जो घरेलू कंप्यूटर से बिल्कुल अलग हों। ये सच है कि सर्वरों के हार्डवेयर विशिष्ट हो सकते हैं जैसे उनमें हार्ड डिस्क ड्राइव, पावर सप्लाई इत्यादि एक से अधिक हो सकते हैं जो आपातकाल के लिए प्रयोग में आते हैं जिसमें एक के काम करना बंद करने पर दूसरा अपने आप शुरू हो जाता है और कार्यभार संभाल लेते हैं। सर्वरों में लगे कलपुर्जे घरेलू कंप्यूटरों से अधिक टिकाऊ एवं लगातार चलने के लिए बने होते हैं परन्तु इसका यह अर्थ कतई नहीं कि एक घरेलू कंप्यूटर सर्वर का काम नहीं कर सकता। स्लैकवेयर लिनक्स की वेबसाइट "www.slackware.com" का वेबसर्वर जिस कंप्यूटर पर चल रहा है उसमें इंटेल का पेंटियम-III 600 मेगाहेर्ट्स का प्रोसेसर और केवल 512 मेगाबाइट की मैमोरी है जबकि आजकल 2048 मेगाबाइट की मैमोरी स्मार्टफोन में भी आम हो चली है। स्लैकवेयर का यह वेबसर्वर बिना किसी बाधा के कई सालों से लगातार चल रहा है। चूंकि सर्वरों को साधारणतः किसी नेटवर्क से ही एक्सेस किया जाता है इसलिए ये बिना किसी मॉनिटर या इनपुट डिवाइस के चालू रह सकते हैं। इनमें वे सभी सर्विसेज अनुपस्थित रहती हैं जिनकी सर्वर की क्रियाशीलता के लिए जरूरत नहीं। कई सर्वरों में ग्राफ़िकल यूज़र इंटरफ़ेस (GUI) नहीं होते हैं क्योंकि यह अनावश्यक होता है और इससे उन संसाधनों का भी क्षय होता है जो कहीं-न-कहीं GUI के लिए आवंटित होते हैं। इसी तरह, ऑडियो और USB इंटरफ़ेस भी अनुपस्थित रह सकते हैं।

जैसा कि पहले ही बताया गया है कि सर्वर सेवाएं प्रदान करते हैं, ये सेवाएं के तरह की होती हैं और उसी संदर्भ में सर्वरों का नामकरण किया जाता है, जैसे वेबसर्वर, ईमेल सर्वर, फ़ाइल सर्वर, गेम सर्वर, प्रॉक्सी सर्वर, DHCP सर्वर, टाइम सर्वर इत्यादि। ये सारी की सारी सेवाएं केवल एक ही सर्वर से भी प्रदान की जा सकती हैं या हर एक सेवा के लिए पृथक सर्वर का इस्तेमाल किया जा सकता है। ये सर्वर किसी कम्पनी/शहर/देश के अलग-अलग कोनों में भी स्थित हो सकते हैं जो पृथक कंप्यूटर नेटवर्क के द्वारा आपस में जुड़े हों। सेवाओं को ग्रहण करने वाला अमूमन नहीं बता सकता कि ये सेवाएं एक ही सर्वर से प्रदान की जा रही हैं या अलग-अलग सर्वरों से।

सर्वर अपनी सेवाएं किस तरह प्रदान करते हैं उनकी कार्यविधि को समझने के लिए हम एक परिस्थिति की कल्पना करते है। मान लीजिए आप अपने कंप्यूटर/स्मार्टफोन से "विज्ञानविश्व" की वेबसाइट को एक्सेस करना चाहते हैं, आप अपना पसंदीदा वेब ब्राउज़र चलाते हैं और विज्ञानविश्व का एड्रेस vigyanvishwa.in टाइप करते हैं, इस स्थिति में कंप्यूटर सबसे पहले अपने खुद के डेटाबेस में (होस्ट फ़ाइल) में विज्ञानविश्व का पता (IP एड्रेस) ढूंढता है, अगर पता मिल जाता है तो पते की ओर बढ़ता है, पता ना मिलने पर ये एक दूसरे कंप्यूटर, डोमेन नेम सर्वर (DNS) का रुख करता है (DNS इंटरनेट प्रदाता द्वारा प्रदान किये जाते हैं)। जैसे मेरी स्थिति में ये वोडाफोन के DNS के पास जाकर पूछता है "DNS भाई क्या आपको vigyanvishwa.in का पता मालूम है" वोडाफोन का सर्वर जवाब देता है "मुझे विज्ञानविश्व का पता तो नहीं मालूम पर उस DNS का पता मालूम है जो ".in" प्रत्यय वाली वेबसाइटों का लेखाजोखा रखता है"। हमारा ब्राउज़र इस पते को लेकर इस नये सर्वर की ओर रुख करता है और फिर से vigyanvishwa.in का पता इस नये DNS से पूछता है। अगर इस DNS को भी पता मालूम नहीं तो ये कह सकता है कि "भाई मुझे vigyanvishwa.in का पता तो नहीं मालूम, परंतु उस DNS पता मालूम है जो v से शुरू और .in पर खत्म होने वाली वेबसाइटों का लेखाजोखा रखता है" हमारा ब्राउज़र इस DNS के पते को लेकर इस नए DNS के पास जाता है और एक बार फिर से vigyanvishwa.in पता इस DNS से पूछता है, इस बार ये DNS रिप्लाई करता है कि "हाँ मुझे vigyanvishwa.in का पता मालूम है, ये ***.***.***.*** है" (यह एक सामान्य स्थिति है, इस लेख को लिखते समय इंटरनेट पर 1अरब 91 करोड़ 16 लाख 47 हजार से अधिक सक्रिय वेबसाइटें थीं जो लगातार बढ़ रही हैं, कोई भी DNS अकेले ही इतने बड़े डेटाबेस को नहीं संभाल सकता)। ध्यान दें अभी हमें vigyanvishwa.in का पता ही प्राप्त हुआ है, मगर हम तो विज्ञानविश्व की वेबसाइट को देखना चाहते हैं, आगे की कार्यवाही समझने के लिए हमें जानना होगा कि एक सर्वर और हमारा कंप्यूटर आपस में बात कैसे करते हैं।

दरअसल इंटरनेट की लगभग पूरी संरचना सेवार्थी-सेवक (क्लाइंट-सर्वर) मॉडल पर आधारित है, इसमें सर्वर एक ऐसे घर की तरह माना जा सकता है जिसमें कई सारे दरवाजे (पोर्ट) हैं, हरेक दरवाजे पर प्रदान की जाने वाली सर्विस के हिसाब से एक सर्वमान्य पूर्वनिर्धारित नम्बर अंकित होता है जैसे http के लिए 80 नम्बर पोर्ट, https के लिए 443 नम्बर पोर्ट, DNS के लिये 53 नम्बर पोर्ट इत्यादि (कुल 65535 पोर्ट हैं जो भिन्न भिन्न सेवाओं के लिए इस्तेमाल किये जा सकते हैं) जब कोई क्लाइंट किसी विशिष्ट सेवा जैसे http को प्राप्त करना चाहता है तो उसे 80 नम्बर का दरवाजा खटखटाना होता है, दरवाजा खटखटाने के बाद सर्वर के पोर्ट 80 पर चलने वाली सर्विस (जैसे अपाचे वेबसर्वर) जवाब देती है। हालांकि ऐसा कोई नियम नहीं की आप पोर्ट 80 पर कोई और सर्विस चला ही नहीं सकते (इस विषय पर आगे फिर कभी)

जब हमारे कंप्यूटर को vigyanvishwa.in का पता मिल जाता है तो वेब ब्राउज़र उस पते पर जाकर 80 नम्बर पोर्ट को खटखटाता है। दरवाजा खटखटाने पर वेबसर्वर प्रोग्राम किसी सरकारी कर्मचारी की तरह रूखी दृष्टि डालते हुए ब्राउज़र को देखता है और हमारा ब्राउज़र चिल्लाता है vigyanvishwa.in, और फिर वेबसर्वर प्रोग्राम vigyanvishwa.in वेबसाइट के होम पेज का HTML code हमारे ब्राउज़र को पकड़ा देता है। हमारा वेब ब्राउज़र एक आज्ञाकारी सेवक की तरह इस HTML code को लेकर वेबपेज की शक्ल में रूपांतरित कर हमारे सामने प्रस्तुत कर देता है। हर एक नए पेज के लिए हमें vigyanvishwa.in के सर्वर का 80 नम्बर वाला दरवाजा खटखटाना होता है और इच्छित पेज के बारे में बताना होता है, जैसे vigyanvishwa.in/about, vigyanvishwa.in/index इत्यादि। एक बार किसी वेबसाइट का पता मिलने पर कंप्यूटर इसे कुछ समय के लिए स्थानीय रूप से अपने खाते (cache) में अंकित कर लेता है जिससे DNS सर्वर तक जाने की ऊपर बताई गई कार्यवाही बार बार न करनी पड़े।

तो ये था कि हम अपने कंप्यूटर पर एक सर्वर से किसी वेबसाइट को कैसे देखते हैं, हालांकि इस सारी कार्यवाही में एक और महाशय श्रीमान डिफ़ॉल्ट गेटवे की भी बड़ी अहम भूमिका होती जिनके बारे में हम आगे के लेखों में चर्चा करेंगे।

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