13/01/2022
*हमारे परम लाड़ले, भवसागर के महारत्न।
*"""परम पूज्य श्री गुरुदेव जी"""* *के श्री मुख से श्रवण की गई दिव्य अमृतवाणी को आप सभी गुरु-भक्तों के बीच में प्रस्तुत कर रहा हूं।* *प्रस्तुत दिव्य अनमोल वचन के एक-एक शब्द परम पूज्य श्री गुरुदेव जी के श्री मुख से कहे गए दिव्य रत्न है।*
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*रहता सभी के संग,*
*पर करता न किंचिंत संग है।*
*जो रंग पक्के में रंगा,*
*चढ़ता न कच्चा रंग है।*
*जो भोग आवे भोगता,*
*पर होता न विषयासक्त है।*
*ऐसा विवेकी प्राज्ञ नर,*
*इच्छा बिना ही मुक्त है।।*
रावण द्वारा मारीच को कहना पूज्य गुरुवर की दिव्य वाणी में
*तू चल कर माया मृग बन,*
*जा मैं बाबा जी बन जाऊंगा।*
*तू राम-लखन को बहकाना,*
*मैं सीता को हर लाऊंगा।।*
*मारीच* द्वारा *रावण* को कहना परम पूज्य *श्री गुरुदेव जी* की दिव्य वाणी के द्वारा--
*हरना ही है तो निज दोष हरो,*
*सीता का हरना ठीक नहीं।*
*करना है तो शुभ कार्य करो,*
*चोरी का करना ठीक नहीं।।*
*अच्छे कर्मों के करने से,*
*घर में प्रकाश हो जाता है।*
*और नारी पराई आने से,*
*घर का विनाश हो जाता है।।*
यह वचन *मारीच* के सुनकर *रावण* जब *मारीच* को मारने दौड़ा तो *मारीच* ने निर्णय लिया पूज्य *गुरुवर* की *दिव्य वाणी* के द्वारा---
*परवश तो क्या परवशता है,*
*हर तरह मौत ही आई है।*
*इस और गिरूं तो कुएं में,*
*और इस और गिरूं तो खाई है।।*
*मरना ही है तो रावण के हाथों,*
*मरना निष्फल सा है।*
*प्रभु श्री राम बाण के मरने से,*
*हर तरह पार ये बेड़ा है।।*
और जब मारीच मायावी मृग बनकर पंचवटी की कुटिया में आया तो मां *जानकी* प्रभु श्री राम जी से मृग को पाने का निवेदन करती हैं----
*भला कहीं संसार में,*
*सोने का मृग होय।*
*पर होनहार तो होकर रहे,*
*मिटा सका न कोय।।*
और जब प्रभु *श्री राम* मायावी *मृग* के पीछे- पीछे अपने *धनुष पर प्रत्यंचा* चढ़ाकर चलते हैं तो मन ही मन सोचते हैं-----
*कैसा शिकार और कैसा मृग?*
*वह एक तिलस्मी छाया थी।*
*और मायापति जान रहे थे,*
*वह सब जो होने वाली माया थी।*
*धनुवा पर डोर, डोर पर शर,*
*शर चुटकी में चटकाते थे।*
*और माया मृग के पीछे-पीछे,*
*मायापति भागे जाते थे।।*
श्री लक्ष्मण जी पंचवटी की कुटिया में *लक्ष्मण रेखा* खींचकर जाते हैं और कहते हैं कि
*बोले माता मैं अब जाता हूं,*
*तुम सावधान होकर रहना।*
*आज्ञा के भीतर दास रहा,*
*तुम इस रेखा के भीतर रहना।।*
अब पंचवटी की कुटिया में रावण *बाबा* का रूप धारण करके आता है और *अतिथि* धर्म का पालन करने पर *मां जानकी* *मर्यादा* तोड़ देती है-----
*कितना ऊंचा व्रत है,*
*और कैसा ये भाव विलक्षण है।*
*इस सिया हरण की लीला में,*
*आतिथ्य धर्म ही एक कारण है।*
रावण *बाबा के वेश में* अतिथि बनकर आता है और पंचवटी की कुटिया में बहुत ही अच्छे शब्दों में *भिक्षावृत्ति* की याचना करता है।
परम पूज्य *श्री गुरुदेव जी* के श्री मुख से इस प्रकार है---
ये माई मुझको भिक्षा दे तो,
मस्त बा रहे आला तेरा।
भगवान तुझे जीता रखे,
रहे सदा बोलबाला तेरा।
तू दूधो नहा और पूतो फलो,
और बेटी तू अटल सुहागन हो।
रहे सदा बोलबाला तेरा,
और तू स्वामी की प्रेम पुजारिन हो।
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*🙏सादर जय श्री कृष्ण🙏*
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