31/07/2026
*मुझे बहुत दूर मत ब्याहना...!*
(एक बेटी की पिता से माँग)
रात के ग्यारह बजे थे। डाइनिंग टेबल पर चाय ठंडी हो चुकी थी। बाबा मोबाइल पर एक के बाद एक रिश्ते देख रहे थे -- “देखो, ये लड़का कनाडा में है, ये वाला लंदन में, और ये साल का सत्तर लाख कमाता है।”
बेटी मुस्कुराई, फिर धीरे से मोबाइल उनकी ओर से सरका दिया -- “बाबा! मेरा रिश्ता तय करने से पहले मेरी एक बात सुनोगे?”
बाबा ने हँस कर कहा, “आज तक तेरी कौन-सी बात टाली है?”
वह कुछ पल चुप रही। फिर बोली, “मुझे बहुत दूर मत ब्याहना, बाबा…!”
बाबा ने सहज होकर कहा, “अब दूरियाँ कहाँ रहीं बेटा? चार घंटे की फ्लाइट है, वीडियो कॉल है, हर दिन बात हो जाएगी।”
बेटी ने सिर हिलाया, “वीडियो कॉल पर जब रोते हैं न बाबा, तो सामने वाला आँसू नहीं पोंछ सकता।”
कमरे में सन्नाटा भर गया, “ऐसी जगह मत भेजना, जहाँ आप बीमार पड़ो और मैं टिकट बुक करती रह जाऊँ। जहाँ माँ की तबीयत ख़राब हो और मैं सिर्फ़ स्क्रीन पर उनका चेहरा देख कर खुद को समझाती रहूँ कि ‘सब ठीक हो जाएगा।’ जहाँ किसी त्योहार पर घर आने से पहले मुझे छुट्टियाँ, किराया और कैलेंडर का हिसाब लगाना पड़े।”
बाबा पहली बार कुछ नहीं बोले। बेटी आगे कहती रही, “और हाँ! लड़का कितना कमाता है? ये बाद में देखना। पहले ये देखना, कि क्या वह अपनी माँ को सिर्फ़ ‘मदर्स डे’ पर याद करता है या रोज़ उनका हाल पूछता है?"
"क्या उसे लगता है, कि रसोई सिर्फ़ औरत की ज़िम्मेदारी है, या वह चाय बना कर भी, किसी का दिन आसान कर सकता है?"
"क्या किसी वेटर, ड्राइवर या चौकीदार से बात करते हुए, उसकी आवाज़ बदल जाती है?"
"क्या उसे पेड़ों से प्यार है? क्या उसे जानवरों पर दया आती है? क्या उसे ‘माफ़ करना’ कहना आता है? क्या उसे किसी के सपनों से डर नहीं लगता?"
"और बाबा! अगर किसी दिन मैं नौकरी छोड़ना चाहूँ या नौकरी करना चाहूँ, तो क्या वह दोनों फ़ैसलों में मेरे साथ खड़ा रहेगा?”
बाबा की आँखें भर आईं। उन्हें पहली बार समझ आया, कि बेटियाँ शादी के लिए लड़का नहीं चुनतीं। वे अपने बचे हुए पूरे जीवन का मौसम चुनती हैं।
कुछ दिनों बाद एक रिश्ता आया। न विदेश, न करोड़ों का पैकेज। पहली मुलाक़ात में लड़के ने बेटी से सिर्फ़ एक सवाल पूछा, “शादी के बाद तुम क्या खोना नहीं चाहती...?”
बेटी ने बिना सोचे कहा, “अपने माँ- बाप तक बिना झिझक पहुँचने का रास्ता...!”
लड़का मुस्कुराया, “वो रास्ता कभी बंद नहीं होगा, घर बदल सकता है, मायका नहीं...!”
बाबा ने उसी दिन रिश्ता तय कर दिया। विदाई का दिन था। बेटी कार में बैठ चुकी थी। लोग चावल उछाल रहे थे। ढोल बज रहे थे। फोटो ग्राफ़र बार-बार कह रहा था, “सर, इधर देखिए, एक स्माइल प्लीज़!”
लेकिन बाबा की नज़र सिर्फ़ अपनी बेटी पर थी। कार चलने ही वाली थी, कि लड़का अचानक नीचे उतरा। वह बाबा के पास आया और बोला, “पापा! एक बात कहनी थी।”
बाबा ने उसकी ओर देखा। उसने कार की चाबी, बाबा के हाथ पर रख दी। और मुस्कुरा कर बोला, “ये गाड़ी जो आप मुझे गिफ्ट दे रहे, आज से आपकी है। जब भी अपनी बेटी की याद आए, किसी से पूछ कर आने की ज़रूरत मत पड़ने दीजिएगा। दरवाज़ा भी आपका है और रास्ता भी...!”
इतना सुनते ही बाबा की आँखों से आँसू बह निकले। उन्हें पहली बार लगा, उन्होंने अपनी बेटी को किसी के घर नहीं भेजा, किसी बेटे के घर भेजा है।
कार धीरे- धीरे आगे बढ़ गई। बेटी पीछे मुड़ कर देख रही थी। बाबा वहीं खड़े थे। इस बार उनकी आँखों में बेटी को खो देने का दुख नहीं था। उसे खोने का डर ख़त्म हो जाने की शांति थी। उस शाम पहली बार उन्हें अपनी बेटी की बरसों पुरानी बात पूरी तरह समझ आई।
"बाबा! मुझे बहुत दूर मत ब्याहना…!" क्योंकि दूरी किलो मीटर में नहीं होती। दूरी वहाँ होती है, जहाँ बेटी अपने दुख से पहले यह सोचती है, “पापा को बताऊँ या उन्हें परेशान न करूँ...?”
🙏साभार🙏