Ajeet Mishra

Ajeet Mishra "जिस दौर से हम गुजरे है !!!
तुम गुजरते "",,,,,,

05/09/2025
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25/10/2023

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क्या आप भी बेवकूफ बन रहे हैं ? आजकल बड़े बड़े रेस्ट्रोरेंट में पकवानों के नाम 'अंग्रेज़ी' में रखकर यह साबित किया जाता है...
22/08/2023

क्या आप भी बेवकूफ बन रहे हैं ?

आजकल बड़े बड़े रेस्ट्रोरेंट में पकवानों के नाम 'अंग्रेज़ी' में रखकर यह साबित किया जाता है कि "जब तक हम जैसे समझदार बेवकूफ रहेंगे ये होशियार कभी भूखे नहीं मरेंगे...

अब देखिये कुछ डिश के नाम.......

🔸रोसेटो अल्जफर्नो- और ये डिश है भात और लाल साग मिला हुआ..दाम 375 रूपये..
🔸नाचोस विथ सालसा- यह है नमकीन खस्ता..कच्चे टमाटर की चटनी के साथ... दाम 195 रूपये..
🔸अब खस्ता और टमाटर चटनी बोलने से कोई 195 रूपये तो नहीं देगा न..
"कच्चे टमाटर की चटनी के साथ खस्ता खा रहे हैं "
बोलने में शर्म आती है...
🔸 सिनोमिना सुफले - सूजी का हलवा है दाम Rs 175...
चावल के मांड़ को भी राइस सूप विथ लेमन ग्रास- बोलकर 150 में परोस देते हैं..
और ये कूल ड्यूड बड़े इतरा कर बोलते हैं
"I am having rice soup with NACHOS WITH SALSA....LOL!!!" अब यह कोई थोड़े ही बोलेगा क़ि - माँड़ पी रहें हैं खस्ता के साथ..
🔸 एक डिश है इंडिलाचा- सब्जी से भरे हुए पराठा को कहते हैं... 200 रूपये का..
🔸'सतुआ' बोलोगे तो लोग गंवार बोल बड़ी हीन दृष्टि से देखेंगे लेकिन ...Gram juice with pepper' बोलने से स्टैंडर्ड बढ़ जायेगा..

कुकर में उबला हुआ 5 रूपया के भुट्टे को 50 रूपया में 'स्वीट कॉर्न' बोलकर बेच देते हैं और लोग भी शान से खाते हैं….

Moral of the story -

जब तक बेवक़ूफ़ ज़िन्दा हैं अक़्लमन्द भूखे नहीं मरेंगे...!!

बहुत समय पहले की बात है एक बुजुर्ग आदमी भुख से व्याकुल था,वो एक तालाब पर जाता है और बड़ी मशक्कत से एक मछली पकड़ता है कि ...
03/08/2023

बहुत समय पहले की बात है एक बुजुर्ग आदमी भुख से व्याकुल था,वो एक तालाब पर जाता है और बड़ी मशक्कत से एक मछली पकड़ता है कि चलो इससे मैं भूख मिटा सकुंगा।
तभी वहां एक लड़का आता है और उस बुजुर्ग को परेशान करने के लिए बुजुर्ग के हाथ से मछली छीन लेता है साथ ही आगे आगे भागकर परेशान करने लगता है।
बुजुर्ग में इतनी ताकत तो थी नहीं कि उस जवान लड़के के पीछे भागकर उससे मछली छिन ले, वो उस लड़के को कहते हैं, मेरी मछली दे दो मैं बहुत भुखा हूँ।
लेकिन लड़का नहीं मानता वो और अधिक परेशान करने लग जाता है,हार कर वो बुजुर्ग आंखों में आंसू लिए ऊपर की तरफ देखकर कुछ बोलते हैं और आगे बढ़ जाते हैं! तभी उस लड़के के हाथ में मछली का कांटा चुभ जाता है,वो दर्द से कराहता हुआ मछली को फेंक घर चला जाता है।
लड़का घाव पर दवा लगाता है पर उसका घाव ठीक नहीं होता, कई दिन बीत जाने पर भी घाव ठीक नहीं होता तब लड़का डॉक्टर के पास जाता है, डॉक्टर कहता है तुम्हारे अंगुठे में जहर फैल चुका है इसे काटना पड़ेगा, लड़के का अंगुठा काट दिया गया, फिर भी लड़के का अंगूठा ठीक नहीं होता ना घाव भरता है ना दर्द कम होता है,लडका बहुत परेशान रहता है।
कुछ दिनों बाद लड़का दूसरे डॉक्टर के पास जाता है वो डॉक्टर भी कहता है तुम्हारा जख्म बहुत बढ़ गया है सारे अंगों में जहर ना फैल जाए इसलिए इस पंजे को काटना पड़ेगा, लड़के का पंजा काट दिया जाता है।
जब वो लड़का अपना पंजा कटवाकर घर लौट रहा था तो रास्ते में उसे वही बुजुर्ग दिखाई देता है वो दौड़कर उसी बुजुर्ग की तरफ जाता है और अपने किए की माफी मांगता है,और पुछता है कि मेरे एक सवाल का जवाब दे दीजिए,आपने उस दिन ऊपर की तरफ देखकर मन ही मन क्या कहा कि मेरे साथ ये सब घटना घटी।
बुजुर्ग पहले तो हंसे फिर गंभीर होकर कहते हैं मैंने ईश्वर को सिर्फ यही कहा "मैं मजबूर हुं मेरे साथ बुरा करने वाले का मैं कुछ नहीं कर सकता,अब मैं इसे तेरे हवाले करता हुं, मुझे न्याय चाहिए" सच्चे दिल से निकली आह ने देखो तुम्हारा ये हाल कर दिया।
"कर्मा जरूर लौटता है, ईश्वर की अदालत में जैसा का तैसा मिलता है, हाथ के बदले हाथ, आंख के बदले आंख,धोखे के बदले धोखा, कर्म से कोई नहीं बच सकता।"
"हम अपने साथ बुरा करने वाले हर इंसान को पूरी तरह से ईश्वर/प्रकृति के हवाले कर अपने आपको मुक्त करते हैं,।"

पत्रकार राहुल शुक्ला अस्पताल में ज़िंदगी और मौत से जंग लड़ते हार गये। पिछले कुछ दिनों से लखनऊ के एक चिकित्सालय में दुर्घ...
18/07/2023

पत्रकार राहुल शुक्ला अस्पताल में ज़िंदगी और मौत से जंग लड़ते हार गये। पिछले कुछ दिनों से लखनऊ के एक चिकित्सालय में दुर्घटना के चलते एडमिट थे। सोचा जाकर मिलूँ कुछ उनकी मदद करूँ! उनकी सोशल प्रोफ़ाइल से उनके नंबर पर बात करने का प्रयास किया पर सब के सब नंबर बंद बात भी नहीं हो सकी। सोचा आगे जाऊँगा। पर हो न सका। हालाँकि पत्रकार राहुल शुक्ला से मेरा कोई परिचय नहीं था पर बस्ती के होने के नाते एक स्वतः लगाव हुआ।ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दें।
आख़िर चलते चलते एक बात और समाज की समस्याओं पर अग्रणी भाव से समर्पित पत्रकार भाइयों के साथ यह समस्या पहली बार की नहीं विपदा की घड़ी में अक्सर देखा है सहायता की अपील करनी पड़ती है। संकट के समय संसाधनों का टोटा पैसे की कमी से दो चार होना पड़ता है। ऐसी स्थिति क्यों? क्यों आज तक एक ऐसा मैकेनिजम विकसित नहीं किया गया कि इन परिस्थितियों का सामना करने से पहले ही एक फंड का प्रबंध हो अगर सरकारी स्तर पर नहीं तो कम से कम हम आप सब आगे आकर ऐसा तंत्र विकसित करें।

भावपूर्ण श्रद्धांजलि

Rahul Shukla

हारे हुए लोग कहाँ जायेंगे ? ? हारे हुए लोगों के लिए कौन दुनिया बसाएगा ? उन पराजित योद्धाओं के लिए ,तमाम शिकस्त खाए लोगों...
18/07/2023

हारे हुए लोग कहाँ जायेंगे ? ?
हारे हुए लोगों के लिए कौन दुनिया बसाएगा ?
उन पराजित योद्धाओं के लिए ,
तमाम शिकस्त खाए लोगों के लिए।

प्रेम में टूटे हुए लोग,
सारी जिंदगी को कहीं दांव लगाकर हारे हुए लोग
थके-हारे लोग, गुमनाम लोग

वो बूढ़े पिता जो अब अकेले रह गए हैं
वो कल्पनाओं में खोया रहने वाला बच्चा
जो परीक्षा में फेल हो गया है
वो लड़की जो तेज कदमों से घर की तरफ लौट रही है
वो बूढ़ा गुब्बारे वाला जो कांपते हाथों से पैसे गिनता है

एक असफल लेखक
मैच हार गया खिलाड़ी
इंटरव्यू से वापस लौटा युवा

और ऐसे तमाम लोग
जिन्हें पता था कि वे सफल हो सकते हैं
मगर उन्होंने असफलताओं से भरा रास्ता चुना,

वो लोग जिन्होंने
हमेशा गलत राह पर चलने का जोखिम उठाया
वो लोग जिन्होंने
गलत लोगों पर भरोसा किया
वो जिन्होंने
चोट खाई, धोखा खाया, ठोकर खाई
गिरे और धूल झाड़कर खड़े हुए
वे कहां जाएंगे ?

क्या कोई ऐसी दुनिया होगी
जहां दो हारे हुए इंसान
एक-दूसरे की हथेलियां थामे
कई पलों तक खामोश रह सकते हों
अपनी चुप्पी में तकलीफ बांटते हुए।

जिन्होंने इकारस की तरह
सूरज की तरफ उड़ान भरी
और उनके पंख पिघल गए
हारे हुए लोगों के लिए कोई जगह नहीं है
न किसी घर में, न समाज में, न किसी देश में।

क्या जो विजेता थे
वो इनसे बेहतर हैं? बेहतर थे?

नहीं, वही हारा जिसने जिंदगी की अनिश्चितता पर यकीन किया
वही जिसने अनजान रास्तों पर चलने का जोखिम उठाया
जिसने गलती करनी चाही , जो मक्कार चुप्पियों के पीछे छिपा नहीं।
जो बोल सकता था मगर बोला नहीं

उसने वो चुना जिसे चुनने का कोई तर्क नहीं था
सिवाय उसकी आत्मा के
जो हारा आखिर वो भी एक नायक था।

एक पराजित नायक के दर्द को
कौन समझना चाहेगा?

जाएंगे कहाँ सूझता नहीं
चल पड़े मगर रास्ता नहीं
क्या तलाश है कुछ पता नहीं
बुन रहे हैं दिल ख़्वाब दम-ब-दम।

 #मक्खन नहीं जहर ह यह।आजकल किसी भी ढाबे पर जाओ मक्खन दिल खोल कर खिला रहा है. खाने के साथ कटोरी में या परांठों के ऊपर मक्...
15/07/2023

#मक्खन नहीं जहर ह यह।
आजकल किसी भी ढाबे पर जाओ मक्खन दिल खोल कर खिला रहा है. खाने के साथ कटोरी में या परांठों के ऊपर मक्खन के बड़े से क्यूब रख दिए जाते हैं या फिर इस मक्खन को दाल और सब्जियों के ऊपर गार्निश की तरह डाल दिया जाता है.
खाने वाले गदगद हो जाते हैं की देखो क्या कमाल का होटल है पूरा पैसा वसूल करवा रहा है.

ये मक्खन नहीं सबसे घटिया पाम आयल से बनी मार्जरीन है.
बटर टोस्ट, दाल मखनी, बटर ऑमलेट, परांठे, पाव भाजी, अमृतसरी कुल्चे, शाही पनीर, बटर चिकन और ना जाने कितने ही व्यंजनों में इसे डेयरी बटर की जगह इस्तेमाल किया जा रहा है और आपसे दाम वसूले जा रहे हैं डेयरी बटर के.
कुछ लोगों को ढाबे पर दाल में मक्खन का तड़का लगवाने और रोटियों को मक्खन से चुपड़वा कर खाने की आदत होती है. उनकी तड़का दाल और बटर रोटी में भी यही घटिया मार्जरीन होती है.

लोगों को बेवकूफ बनाने के लिए इसे जीरो कैलेस्ट्रोल का खिताब भी हासिल है. क्योंकि मेडिकल लॉबी ने लोगों के दिमाग में ठूंस दिया है कि बैड कोलेस्ट्रॉल ह्रदय घात का प्रमुख कारण है.
इसीलिये आजकल जिस भी चीज पर जीरो कोलेस्ट्रॉल लिखा होता है जनता उसे तुरंत खरीद लेती है.

इस प्रकार के उत्पाद जो किसी असली चीज का भ्रम देते हैं उनपर सरकार को कोई ठोस नियम बनाना चाहिए.
सरकार को चाहिये इस मार्जरीन का रंग डेयरी बटर के रंग सफ़ेद और हल्के पीले के स्थान पर भूरा आदि करने का नियम बनाये जिससे लोगों को इस उत्पाद को पहचानने में सुविधा हो ताकि उन्हें मक्खन के नाम पर कोई मार्जरीन ना खिला सके...
आप मार्जरीन के बारे मे और अधिक गूगल पर सर्च कर सकते है यह मखख्न नही है

घर का बना मख्खन ही उतम है

ये कहाँ आ गये हम ??==============    मित्रों, आज से करीब 30-40 साल पूर्व चलें तो हम पाएंगे कि गार्जियन ने जो विवाह तय कर...
06/07/2023

ये कहाँ आ गये हम ??
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मित्रों, आज से करीब 30-40 साल पूर्व चलें तो हम पाएंगे कि गार्जियन ने जो विवाह तय कर दिया, वही फाइनल हो गया। अन्तिम सांस तक ये विवाह निभता था, यानि सेपरेशन की कहीं से कोई गुंजाइश नही। रिश्तेदार लोग ही अगुवाई कर, बातचीत कर विवाह सम्पन्न कराते थे। उस समय ज्यादा लोग अशिक्षित और थोड़े बहुत साक्षर हुआ करते थे, सुशिक्षित तो ना के बराबर थे। हर पत्नी अपने पति की परछाईं बनकर एक धर्मपत्नी की तरह रहती थी। पति-पत्नी भरे पूरे परिवार मे बड़े खुश रहते थे। विवाह तय करने मे लड़के/कन्या की मां, बुआ, मौसी, चाची, मामी, बहन इत्यादि की दखलंदाजी ना के बराबर होती थी। गार्जियन के तौर पे पिताजी स्वयं अकेले या मामा जी को साथ लेते थे और लड़का या लड़की देखकर विवाह तय कर आते थे। किसी को कोई आपत्ति नही होती थी। बड़े मजे से चट मंगनी पट शादी सम्पन्न हो जाती थी।

फिर नया दौर आया और सभी हाई टेक हो गए। इन्टरनेट, ई-मेल, फेसबुक, इंस्टाग्राम, व्हाट्सऐप, टेलीग्राम, फोनपे, पेटीएम और गूगल पे इत्यादि के साथ सभी लोग कंप्यूटर, टैबलेट और स्मार्ट फ़ोन डिवाइस से लैस होकर चिपक गए। इनके बिना जिन्दगी अधूरी सी लगने लगी और ये लोगों के जीवनसाथी बन गए।

आर्थिक विकास के साथ आज लोगों की सुख सुविधाएं बहुत बढ़ गईं हैं। लड़के एवम कन्याएं सभी सुशिक्षित और वेल सेटल्ड होकर समाज मे अपने माता-पिता का नाम रौशन करने लगे हैं। सबकी सुविधा के लिए ढेरों मैरिज ब्यूरो, शादी डॉट कॉम, जीवन साथी डॉट कॉम, पेड और फ्री के वैवाहिक व्हाट्सऐप ग्रुप इत्यादि स्थापित हो गए हैं, अब तो सबका शादी विवाह आसानी से हो जाना चाहिए लेकिन इन्सान की दिक्कतें रोज बढ़ती ही जा रही हैं। लोगों की आसमान चूमती महत्वाकांक्षा इसका सबसे बड़ा कारण है। परिवारों मे सामंजस्य नही है। विवाह सम्पन्न भी हो जाय तो कुछ लोग सेपरेशन के डर से डरते रहते हैं। *पहले लोग विवाह तय करने के लिए घर से बाहर निकलते थे और ज्यादातर एक ही बार मे फाइनल कर आते थे लेकिन आज जैसे आलू, प्याज, बैंगन इत्यादि सब्जियां बाजार जाकर काटते छांटते हैं वैसे ही ज्यादातर लोग लड़के और कन्याओं को अपने बच्चे के विवाह के लिए छांटते बराते हैं। मां, बुआ, चाची, मौसी, मामी, बहन इत्यादि इसमे दखलंदाजी कर विवाह को और जटिल बना देते हैं। वो अपने विवाह की स्थितियों को भूला देते हैं। इसका परिणाम सभी लोग भुगत रहे हैं। सभी जानते हैं कि इन्सान का विवाह इन्सान से ही सम्पन्न होगा, इसके लिए स्वर्ग से कोई देवता या अप्सरा तो पृथ्वी पे पधारेंगे नही।

बढ़िया से बढ़िया लड़का या लड़की छांटने के चक्कर मे बहुत देर हो जा रही है, फिर सामाजिक लोक लिहाज के डर से येन केन प्रकारेन समझौता कर कहीं भी विवाह कर डालते हैं। सुशिक्षितों और अति समझदारों को कोई समझा सकता है क्या ? अर्थात् कभी नही।

नेक एवम महत्वपूर्ण निवेदन : विवाह के इच्छुक हर ब्राह्मण गार्जियन को पहली नजर मे जहां कहीं भी कोई लड़का या लड़की उत्तम एवम योग्य लगे, जरूरी संवाद कर तुरन्त विवाह सम्पन्न करें। हीला हवाली कर देर करने की कोई जरूरत नही है। याद रहे कि कोई भी गार्जियन अपने बच्चों के भाग्य का मालिक नही हो सकता है।
🌹🌹🙏🙏

पांडेय जी कहिन.......

एक महात्मा जंगल से होकर गुजर रहे थे। उन्होंने ऐसा एक दृश्य देखा कि उनका हृदय करुणा से भर गया और आश्चर्य मिश्रित दुख हुआ।...
03/07/2023

एक महात्मा जंगल से होकर गुजर रहे थे। उन्होंने ऐसा एक दृश्य देखा कि उनका हृदय करुणा से भर गया और आश्चर्य मिश्रित दुख हुआ।

बात यह थी कि एक तोते को पकड़ने वाले शिकारी ने दो बांस अलग-अलग गाड़ रखे थे।

एक रस्सी में बांस के ही छोटे-छोटे पोले पिरोकर, रस्सी के दोनों सिरे दोनों बांस में बाँध दिए, और उसमें तोते का प्रिय भोजन लटका दिया।

जंगली तोते भोजन के लोभ से रस्सी पर आकर जैसे ही बैठते, बांस के पोले वजन से घूम जाते और तोते उलटे लटक जाते। घबराहट में गिरने के डर से वो उड़ते भी नहीं। शिकारी आराम से सबको पकड़कर झोले में डाल देता।

महात्मा ने सोचा- कितना आश्चर्य है, ये भूल जाते हैं कि हम उड़ भी सकते हैं। महात्मा ने दयावश शिकारी से पूछा- भैय्या! ये सब तोते कितने में बेचोगे?

तो शिकारी ने जबाब दिया- बाजार जाने का झंझट बचेगा।
आप जो चाहो दे दो।

और महात्मा ने सब तोते खरीद लिए। अपने आश्रम लाकर सबको सिखाना शुरू किया- भाई! कुछ पाठ सीख लो, जिससे समस्त तोते जाति का कल्याण होगा।

पाठ - 1) शिकारी आएगा जाल बिछाएगा।
पाठ - 2) तुम लोभ में मत फंसना।
पाठ - 3) यदि खाने के लिए बैठ भी जाओ तो डरना मत।
तुम्हारे पंख हैं तुम उड़ जाना।

कुछ दिनों में जब सब तोते पाठ सीख गये और अच्छी तरह बोलने लगे, तो महात्मा ने उसी जंगल में सबको छोड़ दिया और निश्चिन्त हो गए कि अब शिकारी की दाल नहीं गलेगी। ये सब तोते एक-दूसरे को शिक्षा देकर मुक्त कर देंगे।

परन्तु महान आश्चर्य, महात्मा कुछ दिनों बाद उसी जंगल से निकले तो क्या देखा, कि सभी तोते उल्टे लटके रट रहे हैं,
शिकारी जाल बिछाएगा, तुम लोभ में मत फंसना, यदि खाने के लिए बैठ भी जाओ तो डरना मत - तुम्हारे पंख हैं तुम उड़ जाना। परन्तु उनमें से कोई भी उड़ नहीं रहा था और सब के सब लटके हैं।

इसी तरह उसी रटे तोते की तरह हम सब भी आपस में शिक्षा दे रहे हैं, कि संसार माया जाल है, इसके लोभ में मत फंसना, तुम ईश्वर अंश हो और ईश्वर तक पहुंच सकते हो।परन्तु आश्चर्य की बात है, कि कोई भी माया के प्रलोभन से बच नहीं पाता, और ईश्वर से साक्षात्कार नहीं कर पाता है।

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