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Gold biggest sell: रूस ने 25 साल बाद अचानक 14 टन सोना बेच दिया, सोचिए… एक बहुत बड़ा घर है. उस घर का मालिक बहुत ताकतवर है...
28/03/2026

Gold biggest sell:
रूस ने 25 साल बाद अचानक 14 टन सोना बेच दिया,

सोचिए… एक बहुत बड़ा घर है. उस घर का मालिक बहुत ताकतवर है. उसके पास नकदी भी है, जमीन भी है, और सबसे खास-एक तिजोरी भरी हुई है सोने से.वह सोना सिर्फ दिखावे के लिए नहीं, बल्कि मुश्किल वक्त के लिए रखा गया है.लेकिन अब हालात ऐसे हो गए हैं कि उस तिजोरी को खोलना पड़ रहा है…यह कहानी है Russia की....जब खर्च बढ़े और आमदनी घटे…रूस पिछले कुछ सालों से लगातार भारी सैन्य खर्च कर रहा है. युद्ध लंबा खिंचता गया और खर्च भी बढ़ता गया.दूसरी तरफ, तेल की कीमतों में गिरावट और अमेरिका के सख्त प्रतिबंधों ने आमदनी पर चोट कर दी.पहले जहां तेल और गैस से सरकार की कमाई मजबूत रहती थी, अब वह घटकर सिर्फ करीब 20% रह गई-यानी आधी से भी कम.

अब सोचिए… खर्च बढ़ता जाए और कमाई घटती जाए, तो क्या होगा?घाटा बढ़ेगा.रूस के साथ भी यही हुआ. 2025 में सरकार का घाटा 2.6% GDP तक पहुंच गया, जबकि शुरुआत में सिर्फ 0.5% का अनुमान था.

तिजोरी खुली… और सोना बिकने लगा

अब कहानी का सबसे अहम मोड़ आता है.करीब 25 साल बाद रूस ने पहली बार अपनी तिजोरी से “असली सोने की ईंटें” निकालकर बाजार में बेचनी शुरू कर दीं.पहले क्या होता था? सिर्फ कागजों में ट्रांजैक्शन होते थे-सोना तिजोरी में ही रहता था.लेकिन अब हालात बदल गए हैं.जनवरी 2026 में रूस ने 3 लाख औंस सोना बेचा.फरवरी में 2 लाख औंस और यानी सिर्फ दो महीनों में करीब 14 टन सोना बाजार में उतार दिया गया.

इतना सोना क्यों बेचा गया?

अब सवाल-जब सोना सबसे सुरक्षित संपत्ति माना जाता है, तो उसे बेचने की नौबत क्यों आई?असल में, यह “कैश की जरूरत” की कहानी है.रूस को अपने बढ़ते खर्च और घाटे को संभालने के लिए तुरंत पैसे चाहिए थे.और जब नकदी कम पड़ने लगी, तो उसने सबसे मजबूत संपत्ति-सोना-बेचना शुरू किया.

महंगा सोना बना मौका भी

एक दिलचस्प बात और है.इस समय सोने की कीमत $5,000 प्रति औंस के पार पहुंच चुकी है...यानी रूस को अपने सोने की अच्छी कीमत मिल रही है.इससे उसके कुल रिजर्व की वैल्यू भी बढ़कर $800 अरब से ज्यादा हो गई है.यानी एक तरफ मजबूरी है, तो दूसरी तरफ अच्छा मौका भी.

लेकिन चिंता क्यों बढ़ रही है?

रूस के पास अभी भी 2,000 टन से ज्यादा सोना है और वह दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा गोल्ड होल्डर है.फिर भी चिंता इसलिए है क्योंकि-रिजर्व का इस्तेमाल अब सीधे हो रहा है,सोना बेचकर कैश जुटाना पड़ रहा है,युद्ध चौथे साल में पहुंच चुका है यानी “सेफ्टी कुशन” धीरे-धीरे कम हो रहा है.

आगे क्या?

अब पूरी दुनिया की नजर इस बात पर है कि

क्या युद्ध जल्दी खत्म होगा?

क्या तेल की कीमतें संभलेंगी?

और क्या रूस को और ज्यादा सोना बेचना पड़ेगा?

क्योंकि अगर ऐसा हुआ, तो यह सिर्फ रूस की कहानी नहीं रहेगी-यह पूरी दुनिया की इकोनॉमी को प्रभावित कर सकती है.

सवाल 1: आखिर रूस ने ऐसा क्या किया है?

जवाब:Russia ने करीब 25 साल बाद पहली बार अपनी तिजोरी में रखा असली सोना (gold bars) बाजार में बेचना शुरू किया है. पहले सिर्फ कागजों में सोने का लेन-देन होता था, लेकिन अब फिजिकल सोना बेचा जा रहा है.

सवाल 2: रूस को सोना बेचने की जरूरत क्यों पड़ी?

जवाब:सीधा कारण है-बढ़ता सरकारी खर्च और घटती आमदनी.रूस का सैन्य खर्च लगातार बढ़ रहा है, जबकि तेल और गैस से होने वाली कमाई घट गई है. ऊपर से प्रतिबंधों (sanctions) ने भी दबाव बढ़ा दिया. ऐसे में सरकार का बजट घाटा बढ़ गया, जिसे भरने के लिए सोना बेचना पड़ा.

सवाल 3: कितना सोना बेचा गया है?

जवाब:2026 के पहले दो महीनों में ही रूस ने जनवरी में 3 लाख औंस,फरवरी में 2 लाख औंस,यानी कुल मिलाकर करीब 14 टन सोना बेच दिया. यह पिछले कई सालों में सबसे बड़ा सेल है.

सवाल 4: क्या रूस के पास अब सोना कम हो गया है?

जवाब:हां, लेकिन पूरी तरह नहीं.रूस के पास अभी भी करीब 74.3 मिलियन औंस सोना बचा है, जो 4 साल में सबसे कम स्तर है. फिर भी कुल मिलाकर रूस के पास 2,000 टन से ज्यादा सोना है और वह दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा गोल्ड होल्डर है.

सवाल 5: क्या सिर्फ मजबूरी है या कोई रणनीति भी?

जवाब:दोनों.मजबूरी इसलिए क्योंकि घाटा बढ़ रहा है.रणनीति इसलिए क्योंकि अभी सोने की कीमत $5,000 प्रति औंस से ऊपर है.यानी रूस को अपने सोने की अच्छी कीमत मिल रही है, जिससे ज्यादा कैश जुटाया जा सकता है.

सवाल 6: रूस का बजट घाटा कितना बढ़ गया है?

जवाब:2025 में रूस का बजट घाटा करीब 2.6% GDP तक पहुंच गया, जबकि शुरुआत में सिर्फ 0.5% का अनुमान था. कुछ एक्सपर्ट्स के मुताबिक असली घाटा 3.4% के करीब हो सकता है.

सवाल 7: तेल और गैस का इसमें क्या रोल है?

जवाब:बहुत बड़ा रोल है.पहले रूस की आमदनी का बड़ा हिस्सा तेल और गैस से आता था. लेकिन अब यह घटकर सिर्फ करीब 20% रह गया है. यानी कमाई कम और खर्च ज्यादा-यही असली समस्या है.

सवाल 8: क्या रूस के पास और भी पैसे जुटाने के तरीके हैं?

जवाब:हां, रूस कई रास्ते अपना रहा है:National Welfare Fund से पैसा निकालना-सरकारी बॉन्ड (OFZ) ज्यादा जारी करना,VAT टैक्स बढ़ाना,लेकिन इन सबके बावजूद दबाव बना हुआ है, इसलिए अब सोना भी बेचना पड़ रहा है.

सवाल 9: क्या यह चिंता की बात है?

जवाब:हां, क्योंकि जब कोई देश अपनी “सेफ्टी रिजर्व” यानी सोना बेचने लगे, तो यह संकेत होता है कि आर्थिक दबाव बढ़ रहा है.यह दिखाता है कि नकदी की जरूरत ज्यादा हो गई है.

सवाल 10: आम आदमी इसे कैसे समझे?

जवाब:मान लीजिए आपके घर में सोना या FD है, जिसे आप सिर्फ मुश्किल समय के लिए रखते हैं.अगर आप उसे बेचने या तोड़ने लगते हैं, तो इसका मतलब है कि खर्च और आमदनी का बैलेंस बिगड़ गया है.रूस अभी उसी स्थिति से गुजर रहा है.

सवाल 11: आगे क्या होगा?

जवाब:सब कुछ इस बात पर निर्भर करेगा

युद्ध कब खत्म होता है

तेल की कीमतें क्या होती हैं

और रूस की आमदनी कब सुधरती है.

अगर हालात नहीं सुधरे, तो रूस को आगे भी और सोना बेचना पड़ सकता है.

बैंकों में पड़ा 73000 करोड़ का लावारिस पैसा बांट रही है सरकार, लिस्ट में ऐसे चेक करें अपना नामभारत के बैंकिंग और वित्तीय...
27/03/2026

बैंकों में पड़ा 73000 करोड़ का लावारिस पैसा बांट रही है सरकार, लिस्ट में ऐसे चेक करें अपना नाम
भारत के बैंकिंग और वित्तीय क्षेत्र से एक ऐसी खबर सामने आई है जो लाखों परिवारों के चेहरे पर मुस्कान ला सकती है। विभिन्न बैंकों, बीमा कंपनियों और म्यूचुअल फंड हाउसों के पास इस समय लगभग 73,000 करोड़ रुपये ऐसी राशि पड़ी है, जिसका कोई दावेदार नहीं है। इसे 'अनक्लेम्ड डिपॉजिट' (Unclaimed Deposits) कहा जाता है। केंद्र सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) अब सक्रिय रूप से प्रयास कर रहे हैं कि यह पैसा उसके असली मालिकों या उनके कानूनी वारिसों तक पहुंच जाए। अगर आपके पूर्वजों या परिवार के किसी सदस्य का कोई पुराना बैंक खाता था जिसे आप भूल चुके हैं, तो संभव है कि इस विशाल खजाने में आपका भी हिस्सा छिपा हो। ऐसे में आइए आपको बताते हैं आप कैसे बैंकों और अन्य संस्थानों में लावारिस पड़ा पैसा कैसे निकाल सकते हैं?
क्या होता है अनक्लेम्ड डिपॉजिट?

नियमों के अनुसार, यदि किसी बैंक बचत या चालू खाते में 10 वर्षों तक कोई लेनदेन नहीं होता है, तो उसमें जमा राशि को 'अनक्लेम्ड' मान लिया जाता है। इसी तरह, सावधि जमा (FD) के मैच्योर होने के 10 साल बाद भी अगर पैसा नहीं निकाला जाता, तो उसे भी इसी श्रेणी में डाल दिया जाता है। बैंक इस पैसे को आरबीआई के 'डिपॉजिटर एजुकेशन एंड अवेयरनेस' (DEA) फंड में ट्रांसफर कर देते हैं। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि यह पैसा सरकार का हो गया है; असली मालिक या वारिस कभी भी उचित दस्तावेज दिखाकर इस पर अपना दावा ठोक सकते हैं।

RBI का 'उद्गम' (UDGAM) पोर्टल

पहले अलग-अलग बैंकों में जाकर लावारिस पैसे का पता लगाना एक बेहद कठिन काम था, लेकिन अब आरबीआई ने UDGAM (Unclaimed Deposits – Gateway to Access Information) नाम से एक सेंट्रलाइज्ड वेब पोर्टल शुरू किया है। इस पोर्टल के जरिए आप एक ही जगह पर देश के कई प्रमुख बैंकों में पड़े अपने लावारिस पैसे की जानकारी ले सकते हैं। आपको बस इस पोर्टल पर जाकर अपना रजिस्ट्रेशन करना होगा और अपना नाम, पैन कार्ड, आधार या मोबाइल नंबर जैसी सामान्य जानकारी दर्ज करनी होगी। इसके बाद सिस्टम आपको बता देगा कि आपके नाम पर कहीं कोई भूली-बिसरी रकम तो जमा नहीं है।
बीमा और म्यूचुअल फंड का पैसा भी है शामिल

सिर्फ बैंक ही नहीं, बल्कि एलआईसी (LIC) जैसी बीमा कंपनियों और विभिन्न म्यूचुअल फंड स्कीमों में भी हजारों करोड़ रुपये बिना किसी दावेदार के पड़े हैं। कई बार पॉलिसी धारक की मृत्यु के बाद परिवार को जानकारी नहीं होती, या पता बदलने के कारण मैच्योरिटी का चेक उन तक नहीं पहुँच पाता। बीमा नियामक इरडा (IRDAI) ने भी सभी बीमा कंपनियों को अपनी वेबसाइट पर एक विशेष सर्च लिंक देने का निर्देश दिया है, जहाँ पॉलिसी नंबर या नाम डालकर अनक्लेम्ड अमाउंट चेक किया जा सकता है।

पैसा वापस पाने का क्या है तरीका?

अगर आपको पोर्टल या बैंक की लिस्ट में अपना नाम मिल जाता है, तो अगला कदम 'क्लेम' (Claim) करने का है। इसके लिए आपको संबंधित बैंक की शाखा में जाकर एक क्लेम फॉर्म भरना होगा। आपको अपने केवाईसी (KYC) दस्तावेज जैसे आधार, पैन, और एड्रेस प्रूफ जमा करने होंगे। यदि आप किसी मृतक के वारिस के तौर पर दावा कर रहे हैं, तो आपको मृत्यु प्रमाण पत्र और कानूनी वारिस होने का सबूत (Succession Certificate) देना होगा। बैंक आपके दस्तावेजों की जांच करेगा और वेरिफिकेशन पूरा होते ही ब्याज सहित आपकी रकम आपके खाते में ट्रांसफर कर दी जाएगी।

25/03/2026

रुपया गिरना इकोनॉमी के लिए अच्छा होता है।

Dividend Stocks: शेयर बाजार में इस हफ्ते कई कंपनियों में कॉरपोरेट एक्शन देखने को मिलेगा। कुछ कंपनियां निवेशकों को डिविडे...
23/03/2026

Dividend Stocks: शेयर बाजार में इस हफ्ते कई कंपनियों में कॉरपोरेट एक्शन देखने को मिलेगा। कुछ कंपनियां निवेशकों को डिविडेंड दे रही हैं, तो कहीं बोनस शेयर और स्टॉक स्प्लिट का ऐलान हुआ है। Castrol India, PFC, Angel One और Vedanta समेत कुल 13 कंपनियां इसमें शामिल हैं। इन सभी के लिए रिकॉर्ड डेट निवेशकों के लिए बेहद अहम रहने वाली है।
Castrol India
कैस्ट्रॉल इंडिया ने दिसंबर 2025 को खत्म वित्त वर्ष के लिए 5 रुपये फेस वैल्यू वाले प्रति शेयर पर 5.25 रुपये का फाइनल डिविडेंड देने का ऐलान किया है। इसके लिए रिकॉर्ड डेट 23 मार्च तय की गई है। पात्र शेयरधारकों को यह डिविडेंड 27 अप्रैल तक मिल जाएगा।
India Glycols
कंपनी ने वित्त वर्ष 2026 के लिए 5 रुपये फेस वैल्यू वाले प्रति इक्विटी शेयर पर 7.5 रुपये का पहला इंटरिम डिविडेंड देने का फैसला किया है। इसके लिए रिकॉर्ड डेट 23 मार्च तय की गई है और घोषणा के 30 दिनों के भीतर भुगतान कर दिया जाएगा।
Power Finance Corporation
सरकार कंपनी PFC ने वित्त वर्ष 2026 के लिए 10 रुपये फेस वैल्यू वाले प्रति शेयर पर 3.25 रुपये का चौथा इंटरिम डिविडेंड मंजूर किया है। इसके लिए रिकॉर्ड डेट 23 मार्च रखी गई है और योग्य शेयरधारकों के खातों में यह रकम 16 अप्रैल तक जमा कर दी जाएगी।
TIL
कंपनी ने अपने राइट्स इश्यू के लिए 23 मार्च को रिकॉर्ड डेट तय की है। इस इश्यू का प्राइस 165 रुपये प्रति शेयर रखा गया है और फेस वैल्यू 10 रुपये है। एंटाइटलमेंट रेशियो 11:64 है, यानी 64 शेयर रखने वाले निवेशक 11 नए शेयर रियायती कीमत पर खरीद सकेंगे। यह इश्यू 30 मार्च से खुलेगा और 8 अप्रैल को बंद होगा।
Kilitch Drugs
फार्मा कंपनी ने 1:1 के अनुपात में बोनस शेयर जारी करने की घोषणा की है। इसके लिए रिकॉर्ड डेट 24 मार्च तय की गई है। जिन निवेशकों का नाम उस दिन कंपनी के रिकॉर्ड में होगा, उन्हें बोनस शेयर मिलेंगे। शेयरों का आवंटन 25 मार्च को माना जाएगा।
Times Green Energy
टाइम्स ग्रीन एनर्जी ने 1:1 बोनस इश्यू की घोषणा की है। यानी निवेशकों को उनके पास मौजूद हर एक शेयर के बदले एक अतिरिक्त पूरी तरह चुकाया हुआ इक्विटी शेयर मिलेगा। इसके लिए रिकॉर्ड डेट 24 मार्च तय की गई है।
Gujarat Intrux
कंपनी के बोर्ड ने वित्त वर्ष 2026 के लिए पहला इंटरिम डिविडेंड घोषित किया है। यह 10 रुपये फेस वैल्यू वाले प्रति शेयर पर 7.5 रुपये होगा। इसके लिए रिकॉर्ड डेट 25 मार्च तय की गई है।
Regal Entertainment and Consultants
NBFC कंपनी ने अपने राइट्स इश्यू के लिए 25 मार्च को रिकॉर्ड डेट तय की है। इस इश्यू का प्राइस 14 रुपये रखा गया है और एंटाइटलमेंट रेशियो 19:10 है। यह इश्यू 7 अप्रैल से खुलेगा और 20 अप्रैल को बंद होगा।
V2 Retail
रिटेल कंपनी ने 10:1 स्टॉक स्प्लिट की घोषणा की है। इसके लिए रिकॉर्ड डेट 26 मार्च तय की गई है। इस स्प्लिट के तहत 10 रुपये फेस वैल्यू का एक शेयर टूटकर 1 रुपये फेस वैल्यू के 10 शेयरों में बदल जाएगा।
Angel One
ब्रोकिंग कंपनी ने 1 रुपये फेस वैल्यू वाले प्रति शेयर पर 1.75 रुपये का दूसरा इंटरिम डिविडेंड घोषित किया है। इसके लिए रिकॉर्ड डेट 27 मार्च तय की गई है और भुगतान 18 अप्रैल तक कर दिया जाएगा।
Avax Apparels and Ornaments
कंपनी ने 2:1 स्टॉक स्प्लिट की घोषणा की है। इसके लिए रिकॉर्ड डेट 27 मार्च तय की गई है। इस स्प्लिट के तहत 10 रुपये फेस वैल्यू का एक शेयर टूटकर 5 रुपये फेस वैल्यू के दो शेयरों में बदल जाएगा।
Samvardhan Motherson
ऑटो कंपोनेंट कंपनी वित्त वर्ष 2026 के लिए 1 रुपये फेस वैल्यू वाले प्रति इक्विटी शेयर पर 0.35 रुपये का इंटरिम डिविडेंड देगी। इसके लिए रिकॉर्ड डेट 27 मार्च तय की गई है।
Vedanta
अनिल अग्रवाल की कंपनी का बोर्ड 23 मार्च को बैठक करेगा। इसमें वित्त वर्ष 2026 के लिए तीसरे इंटरिम डिविडेंड पर विचार किया जाएगा। अगर डिविडेंड मंजूर होता है तो इसकी रिकॉर्ड डेट 28 मार्च तय की जाएगी।

5000 रुपये की मंथली SIP और आप बन जाएंगे करोड़पति 2 करोड़ फंड तैयार करने का सीक्रेट फॉर्मूलाहर महीने 5000 रुपये निवेश करक...
21/02/2026

5000 रुपये की मंथली SIP और आप बन जाएंगे करोड़पति 2 करोड़ फंड तैयार करने का सीक्रेट फॉर्मूला

हर महीने 5000 रुपये निवेश करके क्या आप करोड़पति बन सकते हैं? यह सुनने में अविश्वसनीय लगता है, लेकिन रणनीति इसे हकीकत में बदल सकती है।

यह फॉर्मूला खासतौर पर उन लोगों के लिए है जो लंबी अवधि में रिटायरमेंट के लिए मजबूत कॉर्पस बनाना चाहते हैं।

अगर कोई व्यक्ति 15 साल तक हर महीने 5000 रुपये की SIP करता है, तो उसका कुल निवेश मात्र 9 लाख रुपये होगा। लेकिन असली खेल यहीं से शुरू होता है। इन 15 साल के बाद निवेश रोककर उस जमा राशि को अगले 15 साल तक बिना छेड़े बढ़ने दिया जाए। यानी कुल 30 साल में कंपाउंडिंग का पूरा फायदा मिलता है।

12% रिटर्न पर क्या बनेगा फंड?
अगर निवेश पर औसतन 12% सालाना रिटर्न मिलता है, तो 15 साल में 5000 रुपये की मासिक SIP लगभग 14.8 लाख रुपये बन जाएगी। इसके बाद यदि इस राशि को अगले 15 साल तक ऐसे ही बढ़ने दिया जाए, तो कुल कॉर्पस करीब 1.30 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है। यानी 9 लाख रुपये का निवेश करोड़ के पार जा सकता है।

13% और 14% रिटर्न का कमाल
अगर औसत रिटर्न 13% हो, तो 15 साल में यह राशि लगभग 25.93 लाख रुपये तक पहुंच सकती है। अगले 15 साल में यही फंड बढ़कर 1.62 करोड़ रुपये से ज्यादा हो सकता है। वहीं, 14% सालाना रिटर्न की स्थिति में 15 साल बाद कॉर्पस 28.26 लाख रुपये तक पहुंच सकता है। और यदि इसे 15 साल और बढ़ने दिया जाए, तो कुल फंड करीब 2.02 करोड़ रुपये तक हो सकता है। यही कंपाउंडिंग की असली ताकत है।

क्या है SIP और क्यों है फायदेमंद?
SIP यानी सिस्टेमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान एक अनुशासित निवेश तरीका है, जिसमें निवेशक हर महीने एक निश्चित रकम म्यूचुअल फंड में लगाते हैं। इससे बाजार के उतार-चढ़ाव का असर औसत हो जाता है और लंबी अवधि में बेहतर रिटर्न मिलने की संभावना बढ़ती है। छोटे निवेशकों के लिए SIP एक आसान और प्रभावी तरीका है, जिससे धीरे-धीरे बड़ा फंड तैयार किया जा सकता है।

एमसीएक्स में ट्रेडिंग का समय बदलने जा रहा है, सोने-चांदी और क्रूड ऑयल ट्रेड करने वालों के लिए ये बड़ी खबर है. अगर आप कमो...
19/02/2026

एमसीएक्स में ट्रेडिंग का समय बदलने जा रहा है, सोने-चांदी और क्रूड ऑयल ट्रेड करने वालों के लिए ये बड़ी खबर है. अगर आप कमोडिटी मार्केट में पैसा लगाते हैं, तो यह जानकारी आपके काम की है. मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज यानी एमसीएक्स ने ट्रेडिंग टाइमिंग में बदलाव का ऐलान किया है. यह बदलाव 9 मार्च 2026 से लागू हो जाएगा. इसकी वजह ये है कि अमेरिका का डेलाइट सेविंग टाइम है. इससे भारत और अमेरिका के बीच समय का अंतर बढ़ जाता है, और एमसीएक्स इसको ध्यान में रखकर ट्रेडिंग का समय एडजस्ट कर रहा है ताकि भारतीय ट्रेडर्स को इंटरनेशनल मार्केट की कीमतों पर ज्यादा देर तक नजर रखने का मौका मिले.

एमसीएक्स ने एक सर्कुलर जारी किया है, जिसमें नई टाइमिंग बताई गई है. नॉन-एग्री कमोडिटीज यानी सोना, चांदी, क्रूड ऑयल, बेस मेटल्स जैसी चीजों के लिए ट्रेडिंग अब सुबह 9 बजे से रात 11:30 बजे तक चलेगी. क्लाइंट कोड मॉडिफिकेशन यानी अपनी पोजीशन बदलने या मैनेज करने का काम सुबह 9 बजे से रात 11:45 बजे तक किया जा सकेगा. मतलब ट्रेडर्स रात के 11:45 तक भी अपनी ट्रेडिंग चेक कर सकेंगे और जरूरत पड़ने पर एक्शन ले सकेंगे.
एग्री कमोडिटीज के लिए भी टाइमिंग अलग

यह बदलाव खासकर उन लोगों के लिए फायदेमंद है जो ग्लोबल मार्केट की हर छोटी-बड़ी खबर पर नजर रखते हैं, क्योंकि अमेरिका और यूरोप के मार्केट भारतीय समय के मुताबिक देर रात तक खुले रहते हैं. DST के कारण पहले समय कम पड़ जाता था, लेकिन अब एक्स्ट्रा घंटे मिलने से ट्रेडर्स बेहतर फैसले ले पाएंगे. एग्री कमोडिटीज के लिए भी टाइमिंग अलग-अलग है. चुनिंदा एग्री कमोडिटीज जैसे कॉटन, कॉटन ऑयल और कपास के लिए ट्रेडिंग सुबह 9 बजे से रात 9 बजे तक होगी, और क्लाइंट कोड मॉडिफिकेशन रात 9:15 बजे तक हो सकेगा. बाकी सभी एग्री कमोडिटीज के लिए ट्रेडिंग सुबह 9 बजे से शाम 5 बजे तक रहेगी, और CCM शाम 5:15 बजे तक. ध्यान देने वाली बात यह है कि ट्रेडिंग के घंटे कम नहीं किए गए हैं, बल्कि नॉन-एग्री सेगमेंट में बढ़ाए गए हैं ताकि ग्लोबल कनेक्शन मजबूत हो.

एमसीएक्स में नॉन-एग्री कमोडिटीज की ट्रेडिंग का नया समय क्या होगा?
Aसुबह 9 बजे से रात 11:30 बजे तक
Bसुबह 10 बजे से रात 10:30 बजे तक
Cसुबह 8 बजे से रात 12:00 बजे तक
Dसुबह 9 बजे से शाम 5 बजे तक

क्यों किया गया ये बदलाव?
यह बदलाव इसलिए जरूरी है क्योंकि सोना-चांदी और क्रूड ऑयल जैसी कमोडिटीज की कीमतें पूरी तरह इंटरनेशनल मार्केट से जुड़ी होती हैं. अगर अमेरिका में कोई बड़ा इवेंट होता है या कीमतें तेजी से बदलती हैं, तो भारतीय ट्रेडर्स को तुरंत रिएक्ट करने का मौका मिलेगा. इससे रिस्क मैनेजमेंट बेहतर होगा और प्रॉफिट के चांस बढ़ेंगे. ब्रोकर्स और ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म्स को भी अपने सॉफ्टवेयर और शेड्यूल को इस नई टाइमिंग के हिसाब से अपडेट करना होगा. एमसीएक्स ने सभी सदस्यों और निवेशकों को सर्कुलर में कहा है कि वे अपनी प्लानिंग बदल लें और नई टाइमिंग फॉलो करें.

बेकाबू हो रहा AI; जिस सेक्टर ने पाला-पोसा, अब उसी के बिजनेस मॉडल पर बोला हमलाभारत की IT इंडस्ट्री दशकों से देश की अर्थव्...
13/02/2026

बेकाबू हो रहा AI;
जिस सेक्टर ने पाला-पोसा, अब उसी के बिजनेस मॉडल पर बोला हमला

भारत की IT इंडस्ट्री दशकों से देश की अर्थव्यवस्था का मजबूत स्तंभ रही है, लेकिन अब एक नए और डेंजर्स दौर से गुजर रही है. खतरा कोई और नहीं, बल्कि आईटी कंपनियों द्वारा बनाया गया आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) ही है. AI के तेजी से उभरने के कारण IT कंपनियों के शेयरों में भारी गिरावट देखी जा रही है. जहां पहले सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट, टेस्टिंग और सर्विसेज जैसी सेवाओं पर निर्भर कंपनियां चमक रही थीं, उनके बुरे दिन शुरू हो चुके हैं. बुरे दिन इसलिए, क्योंकि अब उन तमाम कार्यों को AI ऑटोमेटेड करके सीधा उनके बिजनेस मॉडल को ही चुनौती दे रहा है
भारत में IT कंपनियों की गिरावट: आंकड़ों में
जनवरी-फरवरी 2026 में भारतीय IT सेक्टर में भारी सेल-ऑफ देखा गया है. प्रमुख IT कंपनियों को ट्रैक करने वाला Nifty IT इंडेक्स 2025 की शुरुआत से अब तक लगभग 20 प्रतिशत तक गिर चुका है. फरवरी के पहले हफ्ते में ही इस इंडेक्स में 7 प्रतिशत की गिरावट आई, जो चार महीनों में सबसे खराब प्रदर्शन है. कुल मिलाकर, भारतीय IT स्टॉक्स से $22.5 बिलियन से अधिक (लगभग ₹2 लाख करोड़) का नुकसान हुआ है. इसी साल एक महीने (जनवरी 12 से फरवरी 12 तक) के भीतर IT सेक्टर की मार्केट कैपिटलाइजेशन में लगभग 2.5 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है, और यह नुकसान केवल तीन ही दिनों में हुआ है. ध्यान रहे ये आंकड़ा 12 फरवरी 2026 तक का है. आज 13 फरवरी को भी आईटी सेक्टर में फ्री-फॉल देखने को मिला है. आज भी आईटी इंडेक्स 3 प्रतिशत गिरा हुआ है.

4 फरवरी को Nifty IT इंडेक्स लगभग 5.9 फीसदी गिरकर बंद हुआ, जो अप्रैल 2025 के बाद सबसे बड़ी एक-दिवसीय गिरावट है. प्रमुख कंपनियों में Infosys के शेयर 7.37 प्रतिशत गिरे, TCS 6.99%, HCL Tech 4.58%, Tech Mahindra 4.52%, और Wipro 3.79% धड़ाम हुआ. AI के कारण भारत की $283 बिलियन की IT इंडस्ट्री पर गहरा संकट मंडरा रहा है. भारतीय IT इंडस्ट्री मुख्यत: लेबर-इंटेंसिव मॉडल पर निर्भर है.

लेबर-इंटेंसिव मॉडल बोले तो क्या?
लेबर-इंटेंसिव मॉडल पर आधारित होने का मतलब है कि इसकी ग्रोथ बड़े पैमाने पर कम लागत वाले इंजीनियर्स और डेवलपर्स पर निर्भर रही है. कंपनियां जैसे TCS, Infosys आदि ग्लोबल क्लाइंट्स के लिए आउटसोर्सिंग सर्विसेज प्रदान करती हैं, जिसमें कोडिंग, टेस्टिंग, मेंटेनेंस, सपोर्ट और एप्लिकेशन डेवलपमेंट जैसे रूटीन और रिपीटेटिव काम शामिल होते हैं.

ये काम ज्यादातर मैनपावर-हैवी होते हैं. प्रोजेक्ट्स की सफलता और रेवेन्यू बिल किए जा सकने लायक घंटों और कर्मचारियों की संख्या पर टिका होता है. अब तक, भारत की बड़ी युवा आबादी और कम वेतन के कारण ये मॉडल लाभदायक रहा है, जिसे अक्सर “बॉडी शॉपिंग” या स्टाफिंग-बेस्ड आउटसोर्सिंग कहा जाता है. AI के उभरने से ये रूटीन जॉब्स ऑटोमेट हो रहे हैं, जिससे इस मॉडल को चुनौती का सामना करना पड़ रहा है.

TCS और Infosys: कौन से काम प्रभावित हो रहे हैं?
ये कंपनियां AI से सबसे ज्यादा प्रभावित हो रही हैं. खासकर एंट्री-लेवल जॉब्स और बेसिक टास्क में. AI टूल्स अब बेसिक डेवलपमेंट, टेस्टिंग, और डेटा एनालिसिस जैसे कार्यों को ऑटोमेट कर रहे हैं, जो पहले इन कंपनियों के एंट्री-लेवल स्टाफ द्वारा किए जाते थे. TCS का वित्त वर्ष 26 की तीसरी तिमाही में AI-संबंधित रेवेन्यू $1.8 बिलियन पहुंच गया है, जो कंपनी के कुल रेवेन्यू का 5.8% है. लेकिन इससे जॉब्स कम हो रही हैं. TCS में हेडकाउंट 20,000-30,000 तक कम हुआ है. Infosys ने FY26 के लिए रेवेन्यू ग्रोथ गाइडेंस 3 से 3.5% बढ़ाई, लेकिन AI से ERP इम्प्लीमेंटेशन जैसे ट्रेडिशनल कार्यों पर दबाव है.

अब इसमें कोई शक नहीं है कि आने वाले समय में मिडिल मैनेजमेंट और रूटीन टास्क सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे, क्योंकि AI प्रोजेक्ट्स को कम लोगों से पूरा कर सकता है. TCS के पास अब 217,000 AI-स्किल्ड एम्प्लॉयी हैं, जो कंपनी को AI-लेड सर्विसेज की ओर शिफ्ट करने में मदद कर रहा है. फिर भी, विश्लेषकों का अनुमान है कि AI से इंडस्ट्री के 12 प्रतिशत रेवेन्यू पर असर पड़ेगा.

दुनियाभर में IT कंपनियों का हाल
AI का प्रभाव सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है. यह ग्लोबल भी है. यूएस, यूरोप और अन्य बाजारों में भी सॉफ्टवेयर स्टॉक्स की जड़ें भी हिल रही हैं. ग्लोबल प्राइवेट AI इन्वेस्टमेंट 2024 में $109.1 बिलियन पहुंचा, जिसमें जेनरेटिव AI पर $33.9 बिलियन खर्च हुए. 78 प्रतिशत ऑर्गनाइजेशन्स अब AI इस्तेमाल कर रही हैं, जो 2023 से 55% बढ़ा है. लेकिन इससे प्रोडक्टिविटी बढ़ने के साथ जॉब्स पर दबाव है.

McKinsey की रिपोर्ट के अनुसार, जेनरेटिव AI (जैसे ChatGPT, Copilot आदि) दुनिया की अर्थव्यवस्था में हर साल $2.6 से $4.4 ट्रिलियन (लगभग ₹20-35 लाख करोड़) तक जोड़ सकता है. यह उत्पादकता बढ़ाकर होता है. सॉफ्टवेयर, मार्केटिंग और R&D में काम तेज, सस्ता और बेहतर बन सकता है.

लेकिन एक समस्या है कि AI का तेज इस्तेमाल करने से सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग, मैन्युफैक्चरिंग और IT जैसे क्षेत्रों में गलतियां बढ़ रही हैं. क्यों? क्योंकि AI जल्दी कोड/डिजाइन बना देता है, लेकिन इंसान अगर ठीक से चेक न करे तो छोटी-छोटी त्रुटियां छूट जाती हैं, जो बाद में बड़ी समस्या बन सकती हैं. फायदा बड़ा है, लेकिन सावधानी से इस्तेमाल भी जरूरी, वरना क्वालिटी गिर सकती है.

2026 में AI एजेंट्स रूटीन प्रोडक्शन डिसीजन के 11-50 प्रतिशत हैंडल करेंगे, और AI ऑपरेटिंग मार्जिन्स में टॉप थ्री कंट्रीब्यूटर्स में होगा. हालांकि, सिर्फ 21 प्रतिशत कंपनियां पूरी तरह AI-रेडी हैं.

कौन से AI साबित हो रहे हैं काल?
Anthropic’s AI Tool: लीगल, सेल्स, मार्केटिंग और डेटा एनालिसिस को ऑटोमेट करता है, जिससे भारतीय IT फर्म्स के बेसिक टास्क पर असर.
ChatGPT (OpenAI): कोड जनरेशन, कंटेंट क्रिएशन और प्रॉब्लम-सॉल्विंग में माहिर, जो IT कंपनियों के रूटीन वर्क को कम कर रहा है.
GitHub Copilot: कोडिंग असिस्टेंट जो रीयल-टाइम सजेशन देता है, डेवलपर्स की प्रोडक्टिविटी बढ़ाता है लेकिन जॉब्स घटाता है.
DeepSeek और Google Gemini: कोडिंग और मैथेमेटिकल रीजनिंग में सस्ते विकल्प, जो स्टार्टअप्स और डेवलपर्स के लिए अपीलिंग हैं.
ये टूल्स IT इंडस्ट्री के लेबर-इंटेंसिव मॉडल को चुनौती दे रहे हैं.

क्या भविष्य में किसी सॉफ्टवेयर की जरूरत नहीं पड़ेगी?
नहीं ऐसा नहीं है. AI सॉफ्टवेयर को पूरी तरह नहीं खा सकता. विशेषज्ञों का कहना है कि AI ट्रेडिशनल सॉफ्टवेयर को कंप्लीमेंट करेगा, न कि रिप्लेस. ट्रेडिशनल सॉफ्टवेयर $1.2 ट्रिलियन की इंडस्ट्री है, और AI बड़े सिस्टम्स को हैंडल नहीं कर सकता, जहां सेंसिटिव डेटा या रेगुलेशन शामिल हो. AI से प्रोडक्टिविटी बढ़ेगी. सॉफ्टवेयर इंजीनियर्स का रोल बदलकर AI ऑर्केस्ट्रेटर्स का हो जाएगा. मतलब वले AI को काम करने का तरीका सिखाएंगे और कंट्रोल करेंगे. भविष्य में, AI से सॉफ्टवेयर क्रिएशन तेज होगा, लेकिन ह्यूमन ओवरसाइट जरूरी रहेगी.

कौन-कौन से फील्ड नहीं आएंगे AI की चपेट में?
कई क्षेत्र AI से अप्रभावित रहेंगे, क्योंकि वे इमोशनल इंटेलिजेंस, क्रिएटिविटी या फिजिकल स्किल्स पर निर्भर हैं:

हेल्थकेयर: डॉक्टर्स, नर्सेस, थेरेपिस्ट्स- AI सपोर्ट करेगा, लेकिन ह्यूमन टच जरूरी
एजुकेशन: टीचर्स, इंस्ट्रक्टर्स- क्रिएटिव टीचिंग AI से नहीं हो सकती
क्रिएटिव फील्ड्स: आर्टिस्ट्स, राइटर्स, जर्नलिस्ट्स- AI क्रिएटिविटी की नकल नहीं कर सकता
ट्रेड्स: प्लंबर्स, इलेक्ट्रीशियंस, कंस्ट्रक्शन वर्कर्स- फिजिकल वर्क AI नहीं कर सकता
HR और मैनेजमेंट: ऑपरेशंस मैनेजर्स, जहां ह्यूमन जजमेंट जरूरी
अन्य: एथलीट्स, बारटेंडर्स, सोशल वर्कर्स- AI का रिस्क 0%

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03/02/2026

*ब्रेकिंग-*

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सोने की वजह से ‘कंगाल’ होगा अमेरिका  ?? भारत और चीन ने बिगाड़ दिया ट्रंप का पूरा खेल आजकल अगर आप सोने का भाव देखते होंगे ...
02/02/2026

सोने की वजह से ‘कंगाल’ होगा अमेरिका ?? भारत और चीन ने बिगाड़ दिया ट्रंप का पूरा खेल

आजकल अगर आप सोने का भाव देखते होंगे तो सिर चकरा जाता होगा. कभी भाव आसमान छू रहा है, तो कभी अचानक गिर रहा है. आम आदमी सोचता है कि शायद शादियों का सीजन है या बाजार का उतार-चढ़ाव है, लेकिन हकीकत इससे कहीं ज्यादा गहरी और डराने वाली है. ये बात सिर्फ सोने-चांदी की नहीं है, यह कहानी है दुनिया की महाशक्तियों के बीच चल रही एक ‘अदृश्य जंग’ की. पूरी दुनिया में इस वक्त सोना खरीदने की ऐसी होड़ मची है जैसी पहले कभी नहीं देखी गई. चीन ने अपने खजाने में 2303 टन सोना जमा कर लिया है और भारत भी पीछे नहीं है, हमारे पास अब 880 टन सोना रिजर्व में है. ये सब अचानक नहीं हो रहा. इसके पीछे अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आक्रामक नीतियों का डर और अमेरिकी डॉलर की बादशाहत पर उठता भरोसा है. आइए विस्तार से समझते हैं कि आखिर ऐसा क्या हो गया है कि दुनिया अब कागज के नोटों (डॉलर) के बजाय पीली धातु (सोने) पर भरोसा कर रही है?

जब नोट नहीं थे, तब दुनिया कैसे चलती थी?
पूरे मामले को समझने के लिए हमें थोड़ा इतिहास में पीछे जाना होगा. आज से करीब 8 हजार साल पहले. तब न रुपया था, न डॉलर. इंसान खेती करता था और ‘बार्टर सिस्टम’ से काम चलाता था. मतलब, अगर आपके पास गेहूं है और आपको दूध चाहिए, तो आप ऐसे आदमी को ढूंढते थे जिसके पास दूध हो और उसे गेहूं चाहिए हो. लेकिन इसमें बड़ी दिक्कत थी.. कई बार जरूरत का मेल खाना मुश्किल हो जाता था.

फिर 3000 ईसा पूर्व में ‘कमोडिटी मनी’ आई. जौ, ऊन और चांदी जैसी चीजों को पैसे की तरह इस्तेमाल किया जाने लगा. इसके बाद 1200 ईसा पूर्व में चीन ने कौड़ियों को करेंसी माना. 600 ईसा पूर्व में तुर्किये (तब का लिडिया) के राजा ने सोने-चांदी के सिक्के शुरू किए. लेकिन सिक्कों का वजन लेकर सफर करना मुश्किल था. इस समस्या का हल चीन ने निकाला और करीब 1000 साल पहले दुनिया को ‘कागज के नोट’ दिए. चीन के लोग अपना सोना-चांदी जमा करते और बदले में कागज की रसीद (नोट) ले लेते.

कैसे डॉलर बना दुनिया का ‘डॉन’
वक्त का पहिया घूमा और 19वीं सदी तक दुनिया ‘गोल्ड स्टैंडर्ड’ पर आ गई. इसका नियम आसान था, देश उतना ही नोट छाप सकता था, जितना सोना उसके पास रिजर्व में हो. उस वक्त ब्रिटेन का ‘पाउंड स्टर्लिंग’ दुनिया का बॉस था क्योंकि दुनिया के व्यापार का 60% हिस्सा उसी में होता था. लेकिन पहले और दूसरे विश्व युद्ध ने ब्रिटेन की कमर तोड़ दी. युद्ध लड़ने के लिए ब्रिटेन ने अंधाधुंध नोट छापे और सोने का नियम टूट गया. दूसरी तरफ, अमेरिका होशियारी से खेल रहा था. जब यूरोप जल रहा था, अमेरिका उन्हें हथियार, खाना और कच्चा माल बेचकर बदले में सोना ले रहा था. समय बदला दूसरे विश्व युद्ध के खत्म होते-होते दुनिया का दो-तिहाई सोना अमेरिका की तिजोरी में पहुंच गया.

1944 में अमेरिका के ब्रेटन वुड्स शहर में 44 देशों की बैठक हुई. सबने माना कि चूंकि सबसे ज्यादा सोना अमेरिका के पास है, इसलिए अब दुनिया की हर करेंसी की कीमत ‘डॉलर’ से तय होगी और डॉलर की कीमत सोने से तय होगी (35 डॉलर = 1 औंस सोना). बस यहीं से डॉलर दुनिया की ‘ग्लोबल करेंसी’ बन गया.

अमेरिका ने युद्धों में पानी की तरह बहाया पैसा
अमेरिका दुनिया का चौधरी तो बन गया लेकिन अपनी ताकत दिखाने के लिए उसने वियतनाम जैसे युद्धों में पानी की तरह पैसा बहाया. हालात ये हो गए कि अमेरिका ने जितना सोना था, उससे कई गुना ज्यादा डॉलर छाप दिए. दूसरे देशों को शक हुआ. वे अपने डॉलर लेकर अमेरिका पहुंचने लगे और बोले..”हमारा सोना वापस दो.” अमेरिका का गोल्ड रिजर्व खाली होने लगा. तब 1971 में अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने एक ऐसा फैसला लिया जिसने दुनिया को हिला दिया. उन्होंने साफ कह दिया कि अब अमेरिका डॉलर के बदले सोना नहीं देगा. इसे इतिहास में ‘निक्सन शॉक’ कहते हैं. कायदे से डॉलर उसी दिन बेकार हो जाना चाहिए था क्योंकि अब उसके पीछे सोने की गारंटी नहीं थी. इसे ही आज हम ‘फिएट मनी’ (Fiat Money) कहते हैं, यानी वह पैसा जो सिर्फ सरकार के भरोसे पर चलता है

डूबते डॉलर को बचाने क लिए ‘तेल का खेल’
जब डॉलर पर भरोसा टूटने लगा, तो अमेरिका ने एक नई चाल चली. 1974 में अमेरिका ने सऊदी अरब के साथ एक गुप्त समझौता किया. सऊदी अरब के पास अथाह तेल था लेकिन सुरक्षा नहीं थी. अमेरिका ने कहा, “हम तुम्हें हथियार और सुरक्षा देंगे, बदले में तुम अपना तेल सिर्फ और सिर्फ डॉलर में बेचोगे.” यहीं से जन्म हुआ ‘पेट्रोडॉलर’ का. अब दुनिया के हर देश को तेल चाहिए था, इसलिए तेल खरीदने के लिए उन्हें मजबूरी में डॉलर खरीदना पड़ा. इस तरह अमेरिका ने अपनी करेंसी की डिमांड को जबरदस्ती बनाए रखा.

अब क्यों डरी हुई है दुनिया?
अब आते हैं आज के हालात पर. 2008 की मंदी और फिर कोरोना ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था को हिलाया. लेकिन सबसे बड़ा झटका लगा 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान. अमेरिका ने रूस को सबक सिखाने के लिए उसका 300 बिलियन डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार जब्त (फ्रीज) कर दिया.

इस घटना ने पूरी दुनिया की नींद उड़ा दी. चीन, भारत और खाड़ी देशों ने सोचा कि आज रूस के साथ हुआ है, कल अगर हमारा अमेरिका से झगड़ा हुआ, तो हमारे अरबों-खरबों डॉलर भी एक सेकेंड में मिट्टी हो जाएंगे. दुनिया को समझ आ गया कि अमेरिका डॉलर को एक ‘हथियार’ की तरह इस्तेमाल कर रहा है.

इस डर को और हवा दी है डोनाल्ड ट्रम्प ने. ट्रम्प ने ब्रिक्स (BRICS) देशों को खुली धमकी दी है. उन्होंने कहा है कि अगर इन देशों ने डॉलर को छोड़कर अपनी नई करेंसी बनाने की कोशिश की, तो उन पर 100% टैरिफ (टैक्स) लगाया जाएगा.

दुनिया भर के देशों के पास अभी करीब 6.7 लाख करोड़ डॉलर का रिजर्व पड़ा है. ट्रम्प के पिछले रिकॉर्ड को देखें (जैसे ईरान, वेनेजुएला पर प्रतिबंध), तो देशों को डर है कि अमेरिका कभी भी उनका पैसा हड़प सकता है. यही वजह है कि अब कोई भी देश ‘कागज के डॉलर’ पर रिस्क नहीं लेना चाहता.

इसलिए खरीदा जा रहा है अंधाधुंध सोना
भरोसे के इसी संकट के चलते, दुनिया भर के सेंट्रल बैंक अब डॉलर बेचकर सोना खरीद रहे हैं.

चीन: 2000 से 2025 के बीच चीन का गोल्ड रिजर्व 483% बढ़ गया है.
भारत: 2005 में हमारे पास कुल रिजर्व का सिर्फ 4.3% सोना था, जो 2025 में बढ़कर 15% हो गया है.
डॉलर का हाल : 2016 में दुनिया के कुल रिजर्व में 65% डॉलर था, जो अब घटकर 58% रह गया है.
पोलैंड और तुर्किये जैसे देश, जो पहले सोना नहीं रखते थे अब वे भी लाइन में लगकर सोना खरीद रहे हैं. सबको एक ही बात समझ आ गई है मुश्किल वक्त में कागज का नोट रद्दी हो सकता है लेकिन सोना हमेशा सोना तो चमकता ही रहेगा.

डॉलर का रसूख इतनी जल्दी खत्म नहीं होगा
जानकार मानते हैं कि डॉलर का रसूख इतनी जल्दी खत्म नहीं होगा, क्योंकि अभी भी दुनिया का 50% व्यापार डॉलर में ही होता है लेकिन, जिस तरह से रूस और चीन अपनी लोकल करेंसी में व्यापार कर रहे हैं (रूस-चीन का 99% व्यापार अब लोकल करेंसी में है), उससे डॉलर की बादशाहत को चुनौती जरूर मिल रही है. आने वाला समय अनिश्चितताओं से भरा है. अगर ट्रम्प अपने मन से फैसले लेते रहे तो दुनिया की अर्थव्यवस्था में बड़ी उथल-पुथल मचना तय है. तब तक के लिए, हर देश अपनी सुरक्षा के लिए अपनी तिजोरी में ज्यादा से ज्यादा पीली धातु भर लेना चाहता है.

आज अगर आप बाज़ार पर नज़र डालें, तो एक सवाल अपने-आप दिमाग़ में आता है —ये अचानक क्या हो गया?चांदी हो, सोना हो, तांबा हो य...
02/02/2026

आज अगर आप बाज़ार पर नज़र डालें, तो एक सवाल अपने-आप दिमाग़ में आता है —
ये अचानक क्या हो गया?
चांदी हो, सोना हो, तांबा हो या फिर बिटकॉइन…
हर तरफ़ गिरावट ही गिरावट दिख रही है।
चांदी की कीमतों में भारी गिरावट, सोने की चमक फीकी पड़ती हुई,
और बिटकॉइन जैसे डिजिटल एसेट्स भी दबाव में हैं।
कई लोग इसे सिर्फ़ “नंबर का खेल” समझकर आगे बढ़ जाते हैं,
लेकिन हकीकत ये है कि इसके पीछे बड़े फैसले और बड़ी ताक़तें काम करती हैं।
ब्याज दरें, महंगाई का डर, डॉलर की मजबूती और
अमेरिका के फेडरल रिज़र्व के संकेत —
इन सबका असर सीधे हमारी जेब तक पहुंचता है।
इसीलिए सवाल उठता है —
क्या ये सिर्फ़ एक बबल था जो अब फूट रहा है?
या फिर ये पॉवेल इफेक्ट है,
जिसका असर पूरी दुनिया के बाज़ारों पर दिख रहा है?
जो समझदारी से सोचता है, वो घबराता नहीं।
क्योंकि गिरावट सिर्फ़ नुकसान नहीं लाती,
ये हमें सोचने, समझने और सही फैसले लेने का मौका भी देती है।

अमेरिका के जंगी जहाज ईरान पहुंचने पर सोने चांदी में तेज तूफान आ गया सोना आज ₹9000 बढ़ गया और एक लाख 75000 हो गया चांदी आ...
29/01/2026

अमेरिका के जंगी जहाज ईरान पहुंचने पर सोने चांदी में तेज तूफान आ गया
सोना आज ₹9000 बढ़ गया और एक लाख 75000 हो गया
चांदी आज ₹20000 बढ़ गई और 4 लाख 5000 हो गई
कॉपर आज 100 रस किलो बढ़ गया और 1430 हो गया
अगर लड़ाई वर्ल्ड वॉर में बदल गयी तो सब 2 गुना जायेगे

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