07/07/2021
मंदी का इतना हौवा क्यों बनाया जा रहा है ?
एक व्यापारी से मेरी बात हो रही थी । वह कह रहा था कि धंधा मन्दा है , लगता है मकान बेचना पड़ेगा ।मैंने सोचा एक ही मकान है वह भी बिक रहा है तो मैने बोला अरे कोई बात नहीं मकान फिर खरीद लेना । बोला वह बात नहीं है , मकान तो मेरे पास चार हैं लेकिन रेट सही नहीं मिल रहे हैं । उसे व्यापार में आए कुल 15 साल हुए थे और 4 मकान बना लिए । ऐसे व्यक्तियों को धंधा इसलिए मन्दा लग रहा है क्योंकि पहले की तरह कमाई नहीं हो रही है और पांचवां मकान खरीदने की जगह चौथा बेचना पड़ रहा है ।
इस सरकार ने सब्सिडी को चुनाव जीतने का अस्त्र बना कर खर्चे बढ़ा लिए हैं और टैक्स की वसूली नहीं हो रही है तो उसने रिज़र्व बैंक से 176000 करोड़ ले कर अपना काम चला लिया ।
बाकी भुगतने के लिए बची जनता जो तेजी हो या मंदी , हर हाल में भुगतती है।
जब हम कार स्टार्ट करते हैं तो शून्य से 60 किमी की स्पीड में पहुंचने में सिर्फ कुछ सेकंड लगते हैं क्योंकि हम इंजिन की पूरी ताकत इस्तेमाल कर लेते हैं । लेकिन उसके बाद हम उसी स्पीड पर चलते रहते हैं जिसे हम मंदी कह सकते हैं क्योंकि फिर और स्पीड नहीं बढ़ती है या फिर गाड़ी ही बन्द हो जाती है ।
जब नई परिस्थितियां पैदा होतीं हैं तो अर्थव्यवस्थाओं में पहले तेजी आती है । जब तेजी आती है तो उस से हर व्यक्ति फायदा उठाने के चक्कर में योग्य न होने पर भी उस में घुस जाता है । भीड़ बढ़ने पर उसमें अराजकता पैदा होने लगती है और फिर सरकार उसको नियंत्रित और टैक्स वसूलने के लिए नियम लाती है जिसके बाद भीड़ वहां से छंटने लगती है , उसका आकर्षण कम होने लगता है और लोग उसे मंदी का नाम दे देते हैं ।
शेयर मार्केट की तेजी मंदी, रियल इस्टेट की तेजी मंदी इसका उदाहरण है । यह विश्व भर में होता रहता है लेकिन भारत में इसमें सरकार , व्यापारी , उद्योगपति , जनता सभी शामिल हैं जिनकी वजह से यहां मंदी देर तक चलती है और ज्यादा नुकसान होता है ।
भारत में किसी भी क्षेत्र में पहले से कोई नियम , कानून या प्लानिंग की ही नहीं जाती है । जब किसी क्षेत्र में तेजी आ रही होती है तो हर कोई उसमें घुस रहा होता है , सरकार खुश हो रही होती है कि टैक्स मिलेगा, लोगों को रोज़गार मिलेगा , वित्तीय संस्थाएं मुनाफे का सोचती हैं । कोई नहीं सोचता है कि कुछ महीनों या साल बाद जब इसमें मंदी आएगी , घपले बाहर आएंगे तो क्या होगा और क्या करना पड़ेगा । यहां आग लगने के बाद कुआं खोदना शुरु किया जाता है ।
1987 में रिलायंस की लिस्टिंग के बाद बॉम्बे शेयर मार्केट बढ़नी शुरू हुई और नई कम्पनियों ने IPO को बढ़ावा देना शुरू किया । सरकार सोती रही और 1992 में 5000 करोड़ ( अब के 75000 करोड़ ) का हर्षद मेहता घोटाला हो गया । उसके बाद सरकार सो कर उठी । पारदर्शिता के लिए नए नियम बनाने शुरू किए , SEBI बनाई गई , NSE , डिपाजिटरी बनाई गई , इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग शुरू की गई । कहने का मतलब बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज के ख़ानदानी दलालों के ऊपर लगाम कसी गई। नतीजा यह रहा कि 1992 से 1999 तक शेयर मार्केट में मंदी छाई रही । लोगों को नए नियम कानूनों से तालमेल बिठाने में समय लगा और बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज के पुराने दलालों का धंधा बन्द हो गया और सबसे बड़े एक्सचेंज का दर्जा नए बने NSE को मिल गया ।
दूसरा उदाहरण निर्माण क्षेत्र का है । 2004 से सरकार ने होमलोन पर व्याज पर छूट शुरू की और बैंकों ने घर बनाने के लिए हर किसी को लोन देना शुरू कर दिया । मौका देखकर हर व्यापारी समूह ( किराने वाला , पान मसाले वाला, अखबार छापने वाला ) फ्लैट बनाने चल दिया और कहानी 2009 तक चलती रही । फिर डिफ़ॉल्ट होने शुरू हुए । बिल्डरों ने जनता से भी एडवांस लिया और बैंकों से भी लोन लिया और पूरा पैसा और ज़मीनें खरीदने में लगा दिया । सरकार इस बीच सोती रही ।
जब बैंकों के NPA और बिल्डरों के घोटाले सामने आने लगे तो RERA बनाने के बारे में सोचा गया । लेकिन तब तक ग्राहकों का विश्वास उठ चुका होता है तो फिर बरसों मंदी रहना ही है । जनता ने फिर से किराए के घर में रहने को अच्छा समझना शुरू कर दिया । अब सरकार, बैंक और बिल्डर रोते रहें ।
बिना सोचे पहले खेतों में नेताओं और व्यापारियों को एक लाख इंजीनियरिंग , लॉ , एम बी ए के कॉलेज खोलने की परमिशन दे दो जिनमें 10 लाख रुपए और कुछ साल खर्च कर जब 2 करोड़ अधकचरे (नकल से पास )अज्ञानी डिग्री धारक निकलें , जो हर महीने 50 हज़ार मासिक पगार वाली सरकारी नौकरी मांगें तब उनको बोलो कि अपना व्यवसाय खुद करें । अब इन कालेजों के मालिक छात्रों के प्रवेश और उनसे होने वाली कमाई को तरसने लगे हैं , लेकिन इन्हें अपने झूठे फूल पेज के नौकरी दिलाने और गारंटीड प्लेसमेंट दावों के विज्ञापन याद नहीं आएंगे , बस मोदी और मंदी को कोसेंगे .
इस सरकार ने भी एक लाख करोड़ रुपए के मुद्रा लोन बिना गारंटी के कागजी बेरोजगारों को बांट रखे हैं सरकारी बैंकों से । अगला घोटाला मुद्रा लोन का होगा क्योंकि उसे वापस करने का इरादा लोगों का पहले दिन से ही नहीं है ।और बेरोजगारी तो दूर हुई नहीं ।
सरकार चाहे तो विकसित देशों की तरह पहले नियम और नियामक संस्थान बनाए फिर धंधा शुरू करने की इजाज़त दे तो वर्षों की मंदी कभी न आए । लेकिन छुटभैये नेताओं वाली मानसिकता की सरकारें बड़े बड़े धन्नासेठों के चंदे से ही चलती है तो उन्हें वह कैसे नाराज़ कर सकती है । इनकी दूरदर्शी सोच तो होती ही नहीं है सिर्फ अगले चुनाव को जीतने से मतलब होता है ।तो सरकार डैम के गेट की तरह किसी धंधे को खोल कर सो जाती है । फिर जब नुकसान होता है तो आग बुझाने के कार्य में जुट जाती है ।
2004 से 2014 तक मौन रह कर प्रधानमंत्री पद सँभालने वाले मनमोहन सिंह भी अब बोल रहे हैं , शायद मैडम ने परमिशन दे दी है . 86 साल की उम्र में 6 साल के लिए दुबारा राज्यसभा सांसद बनाए जाने का हक अदा करते हुए मनमोहन जी ने अपना अर्थ व्यवस्था का ज्ञान और सरकार को क्या करना चाहिए यह बताना शुरू किया है . लेकिन उसमें भी अपने वित्तमंत्री चिदंबरम को छुड़ाने की वकालत भी कर डाली . 2013 की मंदी में यह ज्ञान पता नहीं कहाँ चला गया था .
इस बीच में दुनियां अमेज़ॉन , गूगल ,इंटरनेट ,यूट्यूब , ऑटोमेशन, अंतरार्ष्ट्रीय व्यापार संधियों से बदलती जा रही है , लेकिन हमारी सरकार, व्यापारी और जनता तो 1980 वाले दौर में ही जी रहे हैं । उन्हें नोटबन्दी , GST , कंप्यूटर सबसे डर लगता है । इन्हें ग्लोबलाइजेशन का फायदा भी चाहिए , इम्पोर्टेड सामान , व्हाट्सअप , लेटेस्ट मोबाइल भी चाहिए लेकिन धंधा , नौकरी में तो पुराने वाले तरीके ही चाहिए।
GST, ऑनलाइन व्यवस्थाएं , नियम , कानून तो पिछले 5–6 साल से चर्चा में हैं लेकिन लोग उन्हें अभी भी अपनाने से कतरा रहे हैं , व्यापारी , अफसर उनकी काट ढूंढ रहे हैं बजाए उसे मानने के तो भाई टैक्स तो बढ़ने से रहा ।
नोटबन्दी सरकार का अच्छा कदम था , ठीक वैसे ही जैसे अनुच्छेद 370 का हटना । लेकिन उसको अरबपतियों ने जनता का , गरीबों का नाम ले लेकर कोसना शुरू किया । खुद मीडिया , व्यापारी , नौकरशाही , नेता उसमें फंसे थे जो आज गिरफ़्तारियों से स्पष्ट है । पर उस समय जनता से ले कर बैंक कर्मचारियों, उच्चतम न्यायालय ने हस्तक्षेप किया और पूरी प्रक्रिया निर्णायक दौर में पहुंची ही नहीं । और उसकी विफलता पर प्रश्न मोदीजी से पूंछे जाते हैं ।
आज अगर कश्मीर में जैसी सख्ती सरकार दिखा रही है और उच्चतम न्यायालय उसको समर्थन दे रहा है , वैसा ही अगर नोटबन्दी में एक महीने हुआ होता तो NPA , मल्ल्या , नीरव मोदी का किस्सा हुआ ही नहीं होता। ये लोग उसी वक्त पकड़ में आ गए होते । और सरकार को 176000 करोड़ टैक्स पहले ही मिल गया होता ।
जुलाई 2017 में GST शुरू हुआ तो जनता को बताया गया कि अब उसे 28% की जगह 18% टैक्स देना होगा तो वस्तुएं सस्ती होंगी । लेकिन न तो निर्माता ने दाम घटाए, न सरकार ने कोई सख्ती की । मुझे याद है होटल में जुलाई 2017 से पहले 22% टैक्स लग कर जो बिल आता था वह 18%GST लगने के बाद भी कम नहीं हुआ था । फिर सरकार ने उसे 5% कर दिया था लेकिन रेस्टोरेंट वालों ने रातों रात दाम बढ़ाकर उसे बराबर कर दिया और ग्राहक के लिए दाम में कोई कमी नहीं हुई ।
GST से पहले ये लोग वैट टैक्स ग्राहक से वसूलते तो थे पर जमा एकमुश्त फिक्स्ड टैक्स करते थे तो बाकी टैक्स इनकी जेब में जाता था । GST लगने पर इनको टैक्स देना पड़ गया तो इन्होंने अपना मुनाफा घटाए बिना दाम बढ़ा दिए । जनता दोनो ओर से ठगी गई ।
ऐसा ही केबल और DTH वालों ने किया । सरकार का कहना था अपना चैनल चुनकर जनता अपना बिल कम करेगी , लेकिन DTH वालों ने कारीगरी करके बिल पहले से भी ज्यादा कर दिया ।
मल्टीप्लेक्स वाले अब 2 घंटे की फिल्म के 200–300 रुपए वसूलते हैं( ऑनलाइन बुकिंग चार्ज अतिरिक्त ) और उसके बाद भी इंटरवल ब्रेक में आधा घंटा विज्ञापन दिखा कर लोगों का समय नष्ट करते हैं जबकि 15 बीस दिन बाद हॉटस्टार , अमेज़ॉन प्राइम पर वह पिक्चर घर बैठे मुफ्त में देखी जा सकती है और अभी उसको जिओ पहले दिन ही दिखाने को तैयार हो रहा है .
अब इन स्मार्ट लोगों और सरकार को जनता जवाब दे रही है खरीद कम करके । जो महीने में 4 बार रेस्टोरेंट जाते थे वे एक दो बार जा रहे हैं और दुकानदार मक्खियां मार कर मंदी का रोना रो रहे हैं । लोग DTH का कनेक्शन कटवा कर इंटरनेट पर चैनल ,यूट्यूब जिओ पर देख रहे हैं और DTH , फोन वाले रो रहे हैं । लीवर और बाकी कम्पनियां मंदी की वजह से सामानों के दाम घटा रही हैं जो इन्होंने GST के टाइम भी नहीं किया था।
मंदी कुछ नहीं है । यह आम जनता का बदला है व्यापारियों और सरकार से जो सोने के अंडे देने वाली मुर्गी को एक ही बार में मार के खाना चाहते हैं ।गांधी जी भी यही कहते थे , जो चीज मंहगी हो , उसका त्याग कर दो या उसका प्रयोग कम कर दो , मुनाफाखोर व्यापारी और सरकार अपने आप ठीक हो जाएंगे .
वैसे भी अब जनता के पास टाइम पास करने , यातायात के साधनों के , मनोरंजन के , ऑफलाइन और ऑनलाइन से देश और विदेशों से सामान खरीदने के विकल्प बढ़ रहे हैं , ऐसे में परम्परागत तरीकों में मन्दी आनी ही है और जो मंहगा बेचेगा उसकी तो दूकान ही बंद हो जाएगी .
गीता में कहा गया है कि संशयात्मा विनश्यति अर्थात जो दुविधा में रहता है वह नष्ट हो जाता है । तो इस बार की मंदी में 1980 की लालची सोच से 2020 में सरकार चलाने वाले, व्यवसाय और नौकरी करने वालों का नुकसान होना तय है । इनके साथ में आम जनता को बेरोजगारी झेलनी पड़ेगी ।
नोट : पूरे उत्तर में जहां जहां सरकार शब्द है वह देश और राज्यों की अब तक बनी सभी सरकारों को एक साथ दोषी ठहराता है । भाजपा भी केंद्र में 11 साल और विभिन्न राज्यों में 10–15 साल सत्ता में रह चुकी है तो वह भी इसमें आनुपातिक रूप से शामिल रही है । मेरे सभी उत्तरों में ज्यादातर मेरे व्यक्तिगत अनुभव हैं और मैं किसी भी दल से कभी सम्बंधित नहीं रहा हूँ न मेरी ऐसी कोई इच्छा है ।लेकिन केंद्र सरकार में काम करने का 24 वर्षों का अनुभव जरूर है तो सरकार कैसे चलनी चाहिए उन नियम कानूनों का पता है .
इस उत्तर को नकल बता कर एक बार छुपाया गया पर विरोध दर्ज करने पर वापस लाया गया ।
मूलस्रोत : स्वयं का अनुभव व स्वतन्त्र चिंतन
1 वृद्धि विनाश की जननी है।
2 आती लक्ष्मी देखकर मन सरोज बढ़ जाये घटत-२ पुनि न घटे बरु समूल कुम्भलाय। अर्थात अत्याधिक विस्तार के पश्चात मात्र विनाश ही अवश्यम्भावी है।
उपरोक्त दोनों का सार यह है कि बेतहाशा किसी भी चीज की वृद्धि विनाश में बदल जाती है।
हर उद्यमी बिक्री को देख कर बिना सोचे समझे अपने उद्योग को बढ़ाने लगता है, CCD, DEC, IBM, HP, SONY आदि कि तरह।
Expansion करते समय लोग पता नहीँ यह क्योँ भूल जाते हैँ कि जब वह वस्तु अधिकतर के पास उपलब्ध हो जायेगी तो लोग फिर क्योँ वह वस्तु खरीदेंगे?
1 SONY VIO नाम का Laptop बनाती थी फिर उसने बनाना बन्द कर दिया।
2 पहले अमीरों के पास साइकिल होना भी बहुत अमीरी मान
#मंदी
आपके द्वारा किए गए प्रश्न को मैं एक मित्र द्वारा अगस्त, 2015 में लिखी गई कहानी द्वारा आपको समझाना चाहूंगा, पूरी कहानी उनके ब्लॉग से ली गई है (ब्लॉग बुलेटिन) जिसका शीर्षक हैं -
मंदी की मार, हुआ बंद व्यापार[1]
एक छोटे से कस्बे मे एक बहुत ही नामी गिरामी कन्हैया लाल सामोसे बेचने वाला था। वो ठेला लगाकर रोज दिन में 500 समोसे खट्टी मीठी चटनी के साथ बेचता था रोज नया तेल इस्तमाल करता था और कभी अगर समोसे बच जाते तो उनको जानवरों को खिला देता, कुल मिलाकर सब कुछ ताजा ही होता था। इसी कारण बासी समोसे या चटनी का प्रयोग बिलकुल नहीं करता था, उसकी चटनी भी ग्राहकों को बहुत पसंद थी जिससे समोसों का स्वाद में चार च
फुटनोट
[1] ब्लॉग बुलेटिन
क्या आपको लगता है कि वर्तमान सरकार अभी आर्थिक मंदी के लिए जिम्मेदार है? क्यूं ?
मंदी बढने का मुख्य कारण क्या है ?
भारत में अश्लीलता का इतना चलन क्यों बढ़ रहा है?
भारत में मंदी का हौव्वा क्यों बना हुआ है?
कटु सत्य ये है कि भारत में मंदी को लेकर कोई खास हौव्वा नहीं है। भारतीय जनता इमरान खान के घिसे पिटे भाषणों का अर्थ समझने में अपनी बुद्धि खपा रही है। मोदीजी का सफाई अभियान मानो देश की उन्नति का एक साक्षात प्रतिबिंब है। कश्मीर और धारा ३७० पर ज्यादातर जनता का ध्यान पूरी तरह से केंद्रित है।आधे लोगों को तो कुछ महसूस ही नहीं होता क्यों कि उनके आसपास सब कुछ पहले जैसा ही तो है। फिल्मों की ताबड़तोड़ कमाई अर्थव्यवस्था की मजबूती का स्पष्ट प्रतीक है। बैंकों का आपस में विलय हो गया तो मानों अर्थव्यवस्था की सारी दिक्कतें ही समाप्त हो गईं हैं। विलय जादू की वह छड़ी है जो
हम अपने आर्थिक इतिहास के सबसे विचित्र दौर से गुज़र रहे हैं. वित्त मंत्री ने हाल ही में कहा कि इस साल भारतीय जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) की विकास दर 9 फ़ीसदी के आसपास रहेगी.
एक सच्चाई ये भी है कि मौजूदा केंद्र सरकार अब तक की अपनी इकलौती उपलब्धि का हवाला देते हुए यही कहती रही है कि भारत दुनिया की सबसे तेज़ गति से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था है.
अगर हम सरकारी बयानों पर भरोसा करें तो दुनिया भर की आर्थिक स्थिति संकट में है लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था उसमें किसी शांत द्वीप समूह की भांति स्थिर है.
इसके मुताबिक़ मनमोहन सिंह की ख़राब अर्थव्यवस्था वाला दौर अब बीत चुका है.
हालांकि मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद स्
एक tweet मैने देखा जिसमे मंदी की केवल हौवा ही है या यह सच है इसे समझने में आसानी होगी।
उसके पहले हम एक प्रसिद्ध मैनेजमेंट के गुरु पीटर ड्रकर की कहानी सुनते हैं।उन्होंने जब अपनी मैनेजमेंट की डिग्री पूरी की तब 1928 के जमाने की बात होगी जागतिक महामंदी के आसार नजर आ रहे थे।
उन्हें उस जमाने मे इंग्लैंड के एक बड़े शेयर बाजार के अत्यंत यशस्वी और बड़े नाम वाले व्यापारी के यहाँ नौकरी मिल गई। जब नौकरी पे लागू हो गए तो उन्हें एक काम दिया गया कि साहब ने एक किताब लिखी थी उसका विमोचन बड़े मंत्रीजी के हाथों 2 महीनों बाद होना था तो ड्रकर जी का काम था सारे प्रूफ चेकिंग कराकर समय रहते उस किताब को छपवा लेना और सुदंर
क्या भारत आर्थिक मंदी की तरफ़ बढ़ रहा है?
17 जनवरी 2016
हम अपने आर्थिक इतिहास के सबसे विचित्र दौर से गुज़र रहे हैं. वित्त मंत्री ने हाल ही में कहा कि इस साल भारतीय जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) की विकास दर 9 फ़ीसदी के आसपास रहेगी.
एक सच्चाई ये भी है कि मौजूदा केंद्र सरकार अब तक की अपनी इकलौती उपलब्धि का हवाला देते हुए यही कहती रही है कि भारत दुनिया की सबसे तेज़ गति से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था है.
अगर हम सरकारी बयानों पर भरोसा करें तो दुनिया भर की आर्थिक स्थिति संकट में है लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था उसमें किसी शांत द्वीप समूह की भांति स्थिर है.
इसके मुताबिक़ मनमोहन सिंह की ख़राब अर्थव्यवस्था वाला दौर अब ब
मंदी के अनेक रुप हैं, ये बहुरुपिया है। आइये समझते हैं. .
मंदी तब से कुछ अधिक दिखने लगी है जब सीबीआई द्वारा चिदंबरम की गिरफ्तारी के प्रयास शुरू हो गए और जीडीपी उस दिन से भरभरा कर गिर गई जिस दिन दिल्ली उच्च न्यायालय ने चिदंबरम जी को किंगपिन कहकर उनको बेल देने से मना कर दिया। यही मंदी एनडीटीवी में उस दिन से छा गई जब प्रणब रॉय को भारत छोड़कर भागने से कुछ मिनट पहले एयरपोर्ट से दबोच लिया गया। उनके स्टूडियो में स्क्रीन काली करनेवाले मैग्सेसे जी के लिए मंदी इसलिए हो गई क्योंकि उनके भाई पर कई लड़कियों ने मुँहकाला करने का आरोप लगाकर मुकदमा दर्ज करा दिया। अन्य पत्रकार जिन्हें अर्थव्यवस्था और अर्थशास्त्र का
भारत में पिछले कुछ महीनों में कार की बिक्री मे आयी कमी और कुछ क्षेत्रों की उपभोक्ता वस्तुओं की मांग में कमी के चलते देश में मंदी का हो हल्ला मचा हैं। हालांकि देश में मंदी नहीं बल्कि अँग्रेजी वाला slowdown है यानि माँग का धीमापन, लोगो की क्रय शक्ति घटने से कुछ क्षेत्रों में मांग प्रभावित हो रही है, लेकिन ऐसा नहीं है की सब जगह मंदी है।पिछले माह के अन्त में आये केंद्रीय सांख्यिकी विभाग के विकास दर के आंकड़ो के मुताबिक अप्रैल- जून तिमाही में पिछले 6 वर्षों में सबसे कम 5 फीसदी की जीडीपी ग्रोथ दर्ज की गई है। हालांकि भारत की असली growth का अंदाज़ा केवल इन आंकड़ो से लगाना मुश्किल है। इस पर व्यापक समीक्षा की जरूरत है क्योंकि इस धीमेपन के कई कारण है।
"भारती की आर्थिक विकास दर में सुस्ती व धीमापन लेकिन इसे मंदी नहीं कहेंगे अंतरराष्ट्रीय मंदी का असर भारत पर पड़ना शु.....