23/03/2026
*भक्त और भगत सिंह के प्रशंसक एक साथ नहीं हो सकते*
भारत की हर पीढ़ी भगत सिंह का नाम लेती है। उनके चेहरे वाले पोस्टर सजते हैं, उनके ज्वलंत शब्द सोशल मीडिया पर घूमते हैं, और हर 23 मार्च को उनकी शहादत को औपचारिक रूप से याद किया जाता है। लेकिन इसी श्रद्धा के बीच एक गहरी विडंबना छुपी है: आज जो लोग स्वयं को सत्ता-समर्थक भक्त कहते हैं, वे भी खुद को भगत सिंह का प्रशंसक बताने में संकोच नहीं करते। सच्चाई यह है कि दोनों एक साथ संभव नहीं हैं। भगत सिंह को मानना और साथ ही वह सब करना, जिसके खिलाफ उन्होंने लड़ाई लड़ी—यह सिर्फ ढोंग नहीं, बल्कि उनके इतिहास से विश्वासघात है।
*भगत सिंह का नास्तिकवाद बनाम भक्तों का अंधविश्वास*
भगत सिंह ने साफ कहा था: “मैं ईश्वर के अस्तित्व को नकारता हूँ।” उनके लिए अंधविश्वास जनता को जकड़े रखने का औजार था। उनका मानना था कि प्रगति के लिए तर्क, विज्ञान और विवेक ज़रूरी हैं। आज के भक्त अंधविश्वास और अंधभक्ति पर टिके हैं—नेताओं पर अंधविश्वास, प्रतीकों पर अंधविश्वास, मिथकों पर अंधविश्वास। यह वही प्रवृत्ति है, जिसके खिलाफ भगत सिंह ने कलम और जान दोनों से संघर्ष किया।
*भगत सिंह का अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण बनाम भक्तों का संकीर्ण राष्ट्रवाद*
भगत सिंह ने मार्क्स, लेनिन, बाकुनिन जैसे विचारकों को पढ़ा। वे रूस, आयरलैंड और चीन के मजदूर आंदोलनों से प्रेरित थे। उनके लिए भारत की आज़ादी वैश्विक साम्राज्यवाद-विरोधी संघर्ष का हिस्सा थी। भक्तों की दृष्टि इसके विपरीत संकीर्ण और बहिष्कारी है—धर्म और बहुसंख्यकवादी राष्ट्रवाद तक सीमित। जहाँ भगत सिंह ने दुनिया के मेहनतकशों से एकता की बात की, वहीं भक्त भारत को एक धर्म और एक संस्कृति के क़िले में बदलना चाहते हैं।
*भगत सिंह का धर्मनिरपेक्ष दृष्टिकोण बनाम भक्तों का साम्प्रदायिक एजेंडा*
भगत सिंह ने बार-बार चेताया कि अंग्रेज़ हुकूमत ने साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देकर भारतीयों को बाँटा। उन्होंने उन नेताओं की आलोचना की जो धर्म की भावनाओं से राजनीति करते हैं। आज भक्त राजनीति ही साम्प्रदायिकता पर टिका चुके हैं—अल्पसंख्यकों को निशाना बनाना, इतिहास को तोड़-मरोड़कर पेश करना और नफ़रत फैलाना उनका राजनीतिक हथियार है। भगत सिंह को पूजते हुए सांप्रदायिकता करना, उनके चित्र पर हार चढ़ाकर कांटे सजाने जैसा है।
*भगत सिंह का क्रांतिकारी साहस बनाम भक्तों की चापलूसी*
भगत सिंह ने सिर्फ अंग्रेज़ी साम्राज्यवाद ही नहीं, बल्कि भारतीय समाज के भीतर की ग़लतियों को भी चुनौती दी। वे सवाल पूछने से कभी नहीं डरते थे—even अपने ही नेताओं से। उन्होंने समझौते की राजनीति को नकारा और क्रांति को सर्वोपरि रखा। इसके उलट, भक्त संस्कृति सवाल पूछने से रोकती है, आलोचकों को देशद्रोही कहती है और सत्ता की अंधभक्ति को ही देशभक्ति मानती है।
*आज का संदर्भ*
आज जब असहमति को अपराध बना दिया गया है, जब सत्ता अंधभक्ति मांगती है, जब धर्म को राजनीति का औज़ार बनाया जा रहा है—ठीक इसी समय भगत सिंह की विरासत और भी प्रासंगिक हो जाती है। वे याद दिलाते हैं कि सच्चा देशभक्ति अंधभक्ति नहीं, बल्कि निडर सवाल है; बहिष्कार नहीं, बल्कि एकजुटता है; चुप्पी नहीं, बल्कि प्रतिरोध है।
भगत सिंह कोई शोभा बढ़ाने वाली मूर्ति नहीं हैं जिन्हें सत्ता अपने पक्ष में इस्तेमाल कर ले। वे एक क्रांतिकारी चिंगारी हैं, जो पाखंड को जलाकर राख कर देती है। भक्त और भगत सिंह का प्रशंसक एक साथ होना असंभव है—क्योंकि भगत सिंह वही सब हैं, जिसे भक्त विचारधारा अस्वीकार करती है।
*अगर सचमुच भगत सिंह का सम्मान करना है, तो यह केवल उनके चित्र पर फूल चढ़ाने से नहीं होगा। यह तभी होगा जब हम साम्प्रदायिकता से लड़ेंगे, सत्ता से सवाल पूछेंगे और बराबरी व न्याय पर आधारित समाज बनाएँगे। इससे कम कुछ भी उनकी शहादत का अपमान है*