pushkar Upadhyay

pushkar Upadhyay जय श्री कृष्णा

12/03/2023

सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा
इतना मत चाहो उसे, वो बेवफ़ा हो जाएगा

हम भी दरिया हैं, हमें अपना हुनर मालूम है
जिस तरफ भी चल पड़ेंगे, रास्ता हो जाएगा

कितनी सच्चाई से मुझ से ज़िन्दगी ने कह दिया
तू नहीं मेरा, तो कोई दूसरा हो जाएगा

मैं ख़ुदा का नाम लेकर पी रहा हूँ दोस्तो
ज़हर भी इसमें अगर होगा, दवा हो जाएगा

सब उसी के हैं हवा, ख़ुश्बू, ज़मीनो-आसमाँ
मैं जहाँ भी जाऊँगा, उसको पता हो जाएगा॥

बशीर बद्र

मैं और रवि
03/03/2023

मैं और रवि

18/02/2023

देश का सिपाही गांव से ....

मैं का मतलब एक सिपाही,प्रहरी एक बेटा एक भाई एक पिता इत्यादि से है। चुकी मेरी कहानी का नायक सिपाही है इस लिए मैं आप सब को आश्वस्त कर दूं कि मैं किसी पुरुष या स्त्री के संदर्भ में बात नहीं करूंगा। हां ये सच है कि मैं जन्म से ही पुरुष हूं। लेकिन मेरे मन में जरा सा भी कुंठा नहीं है कि स्त्री आज किसी भी क्षेत्र में हमसे कमजोर व पीछे हैं। मैं सिपाही आज स्त्री कि बात नहीं कर रहा हूं इस लिए नहीं क्योंकि सम्पूर्ण व्याख्यान पूरा हो गया है हां सही है कि नारी पर बहुत बिद्वान पंडित लिख चुके हैं मैं तो बस इतना कह रहा हूं मेरी मां जाननी व बहन बेटी पत्नी ये सभी वीरांगना के बारे में कितनी भी लिखा जाय कम है। मैं संघर्षशील परिवार में जन्म लिया इसलिए हमने गरीबी को नहीं देखा। लेकीन अमिरी से भी वंचित रहा । मेरा गांव कि जनसंख्या ज्यादा नहीं है । लगभग साठ घरों कि बस्ती में मेरा घर गांव के मध्य में है । मैं इस गांव में पला बढ़ा इस लिए यहां से हमें प्रेम बहुत है । जो शायद मानव स्वभाव को दर्शाता है। गांव के लोग हमारे परिवार के बारे में कभी कभी बात भी करते हैं । वो भी केवल उदाहरण के लिए । क्यूं कि हमारा परिवार किसी समय में एक जमींदार परिवार हुआ करता था लेकिन समयचक्र ने ऐसी कहानी गढ़ी कि अपने ही लोगों के द्वारा सारी जमीन मूर्खता से बेच दिया गया। जिससे घर में ऐसी स्थिति बनी कि परिवार दाने-दाने की मोहताज हो गया। जो हमें अपनी दादी के द्वारा कहानी जैसा सुनाया गया जो सत्य था। हलांकी मेरी कहानी के महानायक कोई और नहीं मेरे पिताश्री कवि, कथाकार और एक शिक्षक थे। जिसने बचपन से लेकर अंतिम समय तक संघर्ष करते रहें । इनके ही अथक प्रयास से गरीबिमुक्त पिर्ष्ठभूमी मिला। जिससे हमारी जन्म संघर्षशील परिवार में हुआ। मुझे ठीक-ठीक याद है कि बचपन से ही मैं औरों से भिन्न था। जिस कारण छोटे-बड़े सभी के लिए उपहास का पात्र बनता रहता था । बच्चों में उपहास किसी के लिए सुखद तो किसी के लिए दुखद होता है। एक बात तो है उपहास से बर्दास्त करने कि प्रबल शक्ति विकसित हो जाता है जो भविष्य के लिए अच्छा है। ये भी एक तरह का संघर्ष हि है और ये बात भी सही है “संघर्ष जितना कठिन होता है जीत उतनी ही शानदार होती है।” जिसके परिणाम स्वरूप मैं अर्ध सैनिक बल में सिपाही पद पा सका जो मेरे लिए सौभाग्य कि बात है । मूझे तनिक भी घमंड नहीं है कि हमारे गांव में हमसे पहले कोई जवान वीर योद्धा नहीं था। पर वे जवान थे, शायद उनके जज्बात वीर योद्धा का नहीं था। मैं इतना उपहास का पात्र बना था कि मुझे जरा भी यकीन नहीं था कि मैं सिपाही पद पालूंगा लेकीन मैं जब सिपाही बना तो मुझे खुशी का ठिकाना न रहा । मैं ईश्वर को बहुत बहुत धन्यवाद दिया। और मुझे विश्वास हो गया कि ये सब ईश्वर के मर्जी के बिना संभव नहीं था। लेकीन हमे ये भी मालूम था कि ईश्वर भी उसी का मदद करेगा जो सचाई, विश्वास और समतोल संघर्ष करेगा। तो उपलब्धी भी कदम चूमेगी। मैं इस तरह गांव के जवान से देश का वीर सिपाही बना बस इती सी मेरी कहानी है !
पुष्कर उपाध्याय के0रि0पु0 बल के सिपाही का प्रथम लेख पर आप सभी का मार्गदर्शन विनम्रता से स्वीकार है। जय हिन्द

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