Manish Kumar Gupta

Manish Kumar Gupta Chartered Accountant and Insolvency Professional

जम्मू कश्मीर: एक दशक तक वित्तीय तस्वीर, केंद्रीय सहायता और आर्थिक चुनौतियाँभारत आजाद हुए लगभग 78 साल बीत चुके हैं और जम्...
14/01/2026

जम्मू कश्मीर: एक दशक तक वित्तीय तस्वीर, केंद्रीय सहायता और आर्थिक चुनौतियाँ
भारत आजाद हुए लगभग 78 साल बीत चुके हैं और जम्मू कश्मीर (अब एक केंद्रीय शासित प्रदेश) की आर्थिक कहानी जितनी संवेदनशील है, उतनी ही स्पष्ट है।
यह लेख आपको बताएगा कि कैसे जम्मू कश्मीर की राज्य/यूटी सरकार ने अपनी राजस्व जरूरत का केवल एक छोटा हिस्सा ही खुद जुटाया, जबकि बुनियादी खर्चों और विकास के लिए वह लगातार केंद्र की सहायता पर निर्भर रहा।
1. जम्मू कश्मीर का वित्तीय ढांचा: राजस्व बनाम केंद्र सहायता
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि जम्मू कश्मीर का अपने स्तर पर राजस्व जुटाने वाला हिस्सा सीमित रहा है:
• 2025-26 के लिए अनुमानित राज्य की अपनी टैक्स राजस्व क्षमता लगभग ₹21,550 करोड़ है।
यह Jammu & Kashmir के GSDP के साथ तुलना में अपेक्षाकृत कम है। PRS Legislative Research
• 2025-26 के लिए कुल राजस्व प्राप्तियाँ लगभग ₹90,535 करोड़ हैं, लेकिन इसमें से ₹40,619 करोड़ केंद्रीय सहायता है जिसे मुख्य रूप से संसाधन अंतर (resource gap) भरने के लिए दिया जाता है। PRS Legislative Research+1
• एक्सटर्नल डेटा के अनुसार 2025 में कुल राजस्व प्राप्तियाँ लगभग ₹9,77,191 करोड़ थीं, जिसमें
– अपने टैक्स और गैर-टैक्स राजस्व बहुत छोटा हिस्सा था
– केंद्रीय अनुदान (ग्रांट) सबसे बड़ा भाग था।
विशेषकर ₹6,71,326 करोड़ के अनुदान के रूप में केंद्रीय सहायता शामिल है। CEIC Data
संक्षेप में, जम्मू कश्मीर की सरकार राजस्व का बड़ा हिस्सा खुद नहीं जुटा पाती है। यह केंद्रीय अनुदान पर निर्भरता एक स्टेबल स्टेट नहीं, बल्कि संस्थागत कमजोरी का संकेत है।
2. दशकों का केंद्रीय सहायता का इतिहास (अनुमानित आकड़े)
पूरे आजादी के बाद से जम्मू कश्मीर को अलग-अलग योजनाओं और सहायता के जरिए बड़े पैकेज मिले हैं। सटीक दशकवार सरकारी संकलन उपलब्ध नहीं है, लेकिन केंद्रीय बजट और योजना दस्तावेज़ बताते हैं कि हर दशक में सहायता बढ़ती रही:
• 1950-60 के दशक से 1980 तक मॉडल फेयर और सिंधु जल संधि योजनाओं से लेकर विकास पैकेज तक, लगातार अनुदान मिलता रहा (आंकड़े केंद्र वित्त आयोग के हिस्से और इतिहास पर आधारित हैं)। Wikipedia
• 1990 के दशक में संघर्ष के चलते सुरक्षा और प्रशासनिक खर्च भारी रहा — विकास के बजाए खर्चे भारी रहे।
• 2000 के दशक और 2010 के दशक में विशेष विकास पैकेज और कल्याण योजनाओं के रूप में केंद्र की सहायता निरंतर रही।
• 2020 के बाद 2019 में 370 अनुच्छेद हटने के बाद से केंद्र सहायता का अनुपात और स्पष्टता के साथ बढ़ा। शोध से पता चलता है कि केंद्र स्थानांतरण (central transfers) अब GSDP का लगभग 28% तक पहुँच गया है, जबकि अपने कर राजस्व का हिस्सा भी कुछ बढ़ा। jiae.ub.ac.id
आंकड़ों का एक मोटा लेकिन विश्वसनीय अनुमान बताता है कि आजादी से अब तक जम्मू कश्मीर को केंद्र से लाखों करोड़ रुपए का अनुदान मिला है, जिसका मूल्य वर्तमान मुद्रास्फीति समायोजित रुप में आज भी बहुत अधिक है। यह अनुदान केवल सामान्य सहायता नहीं है, बल्कि सुरक्षा, प्रशासन, और विकास की आवश्यकता की देन रहा है।
3. मोदी सरकार से पहले और बाद: तुलना
मोदी सरकार से पहले (2014 से पहले)
• राजस्व क्षमता सीमित थी और केंद्र सहायता का अनुपात भी ऊँचा था।
• GSDP और राजस्व अनुपात पहले कम था।
• सुरक्षा पर अधिक खर्च के कारण विकास और राजस्व सृजन के लिए संसाधन कम बचे।
मोदी सरकार के बाद (2019 के पुनर्गठन के बाद) • कुछ सुधार दिखते हैं:
– अपने टैक्स राजस्व का हिस्सा बढ़ कर लगभग 9% तक पहुंचा है।
– केंद्र सहायता का GSDP में हिस्सा लगभग 28% तक रहने लगा है।
– Capital expenditures और CSS (centrally sponsored schemes) पर खर्च बढ़ा है।
ये दोनों बदलाव इस ओर इंगित करते हैं कि राज्य की वित्तीय क्षमता थोड़ी मजबूत हो रही है, लेकिन पूरी तरह आत्मनिर्भर बनने से अभी काफी दूरी है। jiae.ub.ac.id
4. जनसंख्या के अनुपात में सरकारी कर्मचारी और प्रशासनिक बोझ
इस विषय पर विस्तृत केंद्र/राज्य स्तर पर कुल कर्मचारी डेटा उपलब्ध नहीं है, लेकिन यह तथ्य कई विश्लेषण दस्तावेज़ों में आया है कि जम्मू कश्मीर में प्रति व्यक्ति सरकारी कर्मचारी व्यय और संख्या कई बड़े राज्यों की तुलना में अधिक है। यह 1990 के दशक से अपेक्षाकृत जारी रहा — कारण सुरक्षा, प्रशासनिक लागत और बेरोजगारी संबंधी योजनाओं की डिमांड। इसी वजह से राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit) अपेक्षाकृत बड़ा रहा है।
5. राजकोषीय घाटा: समस्या और उसके कारण
2025-26 के बजट में • राजकोषीय घाटा लगभग 5.6% GSDP के लक्ष्य पर है। • हालांकि एक राजस्व सरप्लस दिखाया गया है, लेकिन यह स्थायी नहीं है जब तक राजस्व वृद्धि संरचित ढंग से न हो। PRS Legislative Research
मुख कारण:
• बड़ी संख्या में सरकारी कर्मियों की सैलरी, पेंशन और प्रशासनिक खर्च
• सुरक्षा-प्रशासनिक लागत भारी
• निजी निवेश और उद्योग कम होने के कारण टैक्स आधार संकुचित
• पर्यटन, कृषि और मैन्युफैक्चरिंग में पर्याप्त वैल्यू एडिशन नहीं
6. समाधान के व्यावहारिक उपाय यहाँ कुछ सिफारिशें हैं जिनका हर नीति-निर्माता और सरकार को ध्यान में रखना चाहिए:
a. राजस्व निर्माण पर जोर
– कृषि आधारित वैल्यू एडिशन (प्रोसेसिंग, पैकेजिंग)
– पर्यटन के इको-टूरिज्म, एडवेंचर पर्यटन पर टैक्स बेस बढ़ाना
– बिजली, खनन और सेवा शुल्क में दक्षता बढ़ाना
b. खर्चों में पारदर्शिता और प्राथमिकता
– फिजूल-खर्ची जैसे बिना काम के भत्तों पर रोक
– प्रशासनिक खर्च का ऑडिट
c. निजी निवेश आकर्षित करना
– स्पेशल टैक्स-छूट, लॉजिस्टिक सहायता
– फूड प्रोसेसिंग जो भारत के बड़े बाजार के साथ सीधे जुड़े
d. केंद्रीय सहायता का प्रभावी उपयोग
– केवल सुरक्षा या सैलरी पर खर्च न हो
– इंफ्रास्ट्रक्चर, स्मार्ट सिटीज, रोजगार पर नीतिगत निवेश
निष्कर्ष जम्मू कश्मीर की अर्थव्यवस्था और बजट की कहानी यही कहती है कि यह क्षेत्र केंद्र की सहायता पर बहुत अधिक निर्भर रहा है और अपनी खुद की राजस्व क्षमता अभी तक सीमित है। यह स्थिति सुरक्षा-प्रबंधन के कारण समझी जा सकती है, लेकिन राजकोषीय घाटा कम करना और आर्थिक ऑटोनॉमी बढ़ाना अब समय की मांग है।
जैसे ही नया बजट आता है, यह जरूरी है कि
• केंद्र और राज्य मिलकर विकास-उन्मुख नीतियाँ बनायें,
• राजस्व आधार को विस्तारित करें,
• सरकारी खर्च को प्राथमिकता के हिसाब से पुनर्गठित करें,
ताकि जम्मू कश्मीर आत्मनिर्भर और संतुलित वित्तीय स्थिति की दिशा में वास्तविक प्रगति कर सके।

मनीष कुमार गुप्ता
चार्टर्ड अकाउंटेंट
9810 7714 77
[email protected]

हरियाणा बजट 2025-26: विकास की रफ्तार या कर्ज की सीमा?हरियाणा का आगामी बजट 2025-26 कई मायनों में अहम है। यह 2024 के अंत म...
09/01/2026

हरियाणा बजट 2025-26: विकास की रफ्तार या कर्ज की सीमा?

हरियाणा का आगामी बजट 2025-26 कई मायनों में अहम है। यह 2024 के अंत में बनी नई सरकार का पहला पूर्ण बजट होगा। ऐसे में स्वाभाविक है कि जनता और राजनीतिक गलियारों की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि यह बजट केवल घोषणाओं तक सीमित रहेगा या वास्तव में ज़मीन पर बदलाव की दिशा तय करेगा।

संकल्प पत्र से बजट तक

सरकार के सामने सबसे बड़ी कसौटी उसका चुनावी संकल्प पत्र है। महिलाओं के लिए ₹2100 प्रतिमाह (लाडो लक्ष्मी योजना), गैस सिलेंडर पर सब्सिडी और सामाजिक सुरक्षा से जुड़े वादे—इन सबको लेकर उम्मीद है कि यह बजट सिर्फ इरादे नहीं, बल्कि ठोस बजटीय प्रावधान दिखाएगा। मौजूदा सरकार यह दावा करती है कि उसने पहले दिन से “घोषणा नहीं, क्रियान्वयन” की नीति अपनाई है।

अंत्योदय: अंतिम व्यक्ति तक लाभ

हरियाणा सरकार की पहचान “अंत्योदय” को केंद्र में रखने की रही है। बुढ़ापा पेंशन ₹3000 प्रतिमाह तक पहुंचाना—जो देश में सबसे अधिक है—और आयुष्मान भारत का विस्तार कर चिरायु हरियाणा शुरू करना, इसी नीति का हिस्सा है। डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) के माध्यम से लाभ सीधे खाते में पहुंचाने का मॉडल बिचौलियों पर लगाम लगाने में सफल रहा है। इस बजट में समाज कल्याण योजनाओं के लिए आवंटन बढ़ने की पूरी संभावना है।

किसान: नारा नहीं, नीति

किसानों के मुद्दे पर हरियाणा खुद को अलग राज्य के रूप में पेश करता है। 14 फसलों पर MSP पर खरीद करने वाला यह देश का एकमात्र राज्य है। भावांतर भरपाई योजना और क्षतिपूर्ति पोर्टल के जरिए किसानों को फसल नुकसान का मुआवजा सीधे खाते में मिलता है। जहां कई राज्यों में किसान मंडियों में भटकते हैं, वहीं हरियाणा में 48–72 घंटे में भुगतान होने का दावा सरकार करती है। आने वाले बजट में सिंचाई, माइक्रो-इरिगेशन और कृषि इनपुट लागत कम करने पर विशेष ध्यान दिए जाने की जरूरत है।

इंफ्रास्ट्रक्चर: रेवड़ी नहीं, निवेश

यह बजट केवल लोकलुभावन योजनाओं तक सीमित नहीं रहने वाला, ऐसा सरकार का संकेत है। KMP एक्सप्रेसवे जैसे लंबे समय से अटके प्रोजेक्ट का पूरा होना, गुरुग्राम मेट्रो विस्तार और हरियाणा ऑर्बिटल रेल कॉरिडोर जैसी योजनाएं राज्य की कनेक्टिविटी और औद्योगिक क्षमता को बढ़ाती हैं। हर जिले में मेडिकल कॉलेज का लक्ष्य भी दीर्घकालिक मानव संसाधन निवेश का उदाहरण है।

आर्थिक ताकत का तर्क

सरकार के पक्ष में सबसे मजबूत आंकड़ा प्रति व्यक्ति आय है। लगभग ₹3.25–3.30 लाख की सालाना प्रति व्यक्ति आय के साथ हरियाणा बड़े राज्यों में शीर्ष पर है। देश की आबादी में केवल 2% हिस्सेदारी होने के बावजूद राष्ट्रीय GDP में लगभग 4% योगदान—यह आर्थिक प्रबंधन की सफलता का संकेत माना जाता है।

लेकिन सवाल भी उतने ही ज़रूरी
बढ़ता कर्ज: चिंता की लकीर

विकास के इस चित्र के पीछे एक सख्त सवाल खड़ा है—कर्ज। अनुमान है कि हरियाणा का कुल कर्ज ₹3.15 लाख करोड़ के पार जा सकता है। राज्य के राजस्व का बड़ा हिस्सा हर साल सिर्फ ब्याज चुकाने में खर्च हो रहा है। ऐसे में सरकार से अपेक्षा है कि वह श्वेत पत्र या स्पष्ट रोडमैप पेश करे—ताकि यह भरोसा बने कि विकास केवल कर्ज के सहारे नहीं चल रहा।

रोजगार: अस्थायी बनाम स्थायी

कौशल रोजगार निगम (HKRN) के तहत दी जा रही नौकरियां तात्कालिक राहत हैं, लेकिन युवा वर्ग की असली मांग स्थायी सरकारी भर्ती है। CET प्रणाली ने भर्ती प्रक्रिया को पारदर्शी बनाया है, परंतु परीक्षाओं में देरी और सीमित भर्तियां निराशा भी पैदा करती हैं। बजट में स्पष्ट होना चाहिए कि इस वर्ष कितनी पक्की नौकरियां निकलेंगी और भर्ती कैलेंडर क्या होगा।

डिजिटल सुधार और जमीनी हकीकत

परिवार पहचान पत्र (PPP) और प्रॉपर्टी ID जैसी योजनाएं प्रशासनिक सुधार की दिशा में बड़ा कदम हैं, लेकिन तकनीकी खामियों के कारण आम लोगों को परेशानी भी होती है। बजट में आईटी इंफ्रास्ट्रक्चर और शिकायत निवारण तंत्र को मजबूत करने की जरूरत है, ताकि डिजिटल सुविधा बोझ न बने।

शहरी हरियाणा की अनदेखी

ग्रामीण विकास जरूरी है, लेकिन गुरुग्राम, फरीदाबाद और रोहतक जैसे शहर आज भी जलभराव, सीवरेज और ट्रैफिक की समस्याओं से जूझ रहे हैं। स्मार्ट सिटी योजनाओं को कागज़ से बाहर निकालकर ज़मीन पर उतारना इस बजट की बड़ी जिम्मेदारी होगी।

निष्कर्ष

हरियाणा का बजट 2025-26 एक संतुलन की परीक्षा है। प्रति व्यक्ति आय और इंफ्रास्ट्रक्चर बताते हैं कि राज्य आर्थिक रूप से मजबूत है, जबकि बढ़ता कर्ज और बेरोजगारी चेतावनी देते हैं कि सतर्कता जरूरी है। यह बजट तय करेगा कि सरकार अल्पकालिक राहत को प्राथमिकता देती है या दीर्घकालिक पूंजी निर्माण को।

आखिरकार, सवाल सिर्फ यह नहीं कि बजट कितना बड़ा है—
सवाल यह है कि वह हरियाणा को किस दिशा में ले जाता है।

मनीष कुमार गुप्ता
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रूपये की बीस साल की यात्रा और पुराना आर्थिक ढांचाभारत की मुद्रा की कहानी सिर्फ आंकड़ों की कहानी नहीं है। यह उस परिवर्तन ...
11/12/2025

रूपये की बीस साल की यात्रा और पुराना आर्थिक ढांचा

भारत की मुद्रा की कहानी सिर्फ आंकड़ों की कहानी नहीं है। यह उस परिवर्तन की कहानी है जिसमें एक देश धीरे धीरे आयात पर निर्भर अर्थव्यवस्था से आगे बढ़कर आत्मविश्वास और रणनीति पर खड़ी एक उभरती शक्ति बनता है।

स्थिरता की सतह और अंदर छिपी कमजोरियाँ
मनमोहन सिंह के कार्यकाल को लोग स्थिरता का दौर कहते हैं, लेकिन यह स्थिरता ऊपर से दिखने वाली थी। रुपये को मजबूती देने की क्षमता सीमित थी क्योंकि भारत उस समय आयात प्रधान मॉडल पर चल रहा था। पेट्रोल, मशीनें, रसायन, धातु और तकनीक जैसे हर महत्वपूर्ण तत्व विदेशी बाज़ार पर निर्भर थे। वैश्विक वित्तीय संकट, यूरोप के कर्ज संकट और तेल की कीमतों में उथल पुथल ने भारत को लगातार दबाव में रखा। ऐसे माहौल में रुपये को स्थिर रखना ही उस दौर की उपलब्धि थी। मजबूती नाम की कोई संभावना नहीं थी। यही वजह है कि रुपया 45 से 60 के बीच पहुंच गया और यह उस समय परिस्थितियों का स्वाभाविक परिणाम था।

दुनिया बदलती है और भारत अपना रास्ता बदलता है

कहानी असल में तब बदलती है जब भारत अपना आर्थिक रुख बदलना शुरू करता है। रूस अमेरिका तनाव, चीन की आक्रामकता, कोविड के बाद की अव्यवस्था और अमेरिका की ब्याज दरों की उछाल ने लगभग हर देश की मुद्रा को प्रभावित किया। जापान से लेकर यूरोप तक सभी मुद्राएं कमजोर हुईं। रुपया भी दबाव झेल रहा था, लेकिन इस बार स्थिति अलग थी। भारत अब सिर्फ उतार चढ़ाव झेलने वाला देश नहीं रहा, बल्कि अपने आर्थिक ढांचे को नया रूप देने वाला देश बन चुका था।

एक समय भारत उन अर्थव्यवस्थाओं में था जिन्हें Fragile Five कहा जाता था, लेकिन आज भारत उस सूची से बहुत दूर निकल चुका है। रुपये में उतार चढ़ाव जरूर है, मगर अर्थव्यवस्था कहीं अधिक मजबूत खड़ी है। इसी दौर में भारत ने डॉलर पर निर्भरता को चुनौती देना शुरू किया। रूस के साथ रुपये रूबल व्यवस्था, यूएई के साथ ऊर्जा व्यापार में रुपये दिरहम, बांग्लादेश के साथ रुपये टका भुगतान और ब्रिक्स देशों में स्थानीय मुद्रा की पहल यह बताती है कि भारत वैश्विक मुद्रा राजनीति का सक्रिय खिलाड़ी बन रहा है। विदेशी मुद्रा भंडार भी अब विविध हो रहा है। लंबे समय तक भंडार डॉलर पर केंद्रित रहा, लेकिन आज यह समझ बढ़ी है कि एक ही टोकरी पर निर्भर रहना जोखिम भरा है। इसलिए दिरहम, युआन, यूरो, रियाल और रूबल जैसे विकल्प भंडार को ज्यादा स्थिर बनाते हैं, विचार वही है कि सारे अंडे एक ही टोकरी में नहीं रखने चाहिए।

नया आर्थिक मॉडल, डिजिटल भविष्य और रुपया

सबसे बड़ा बदलाव भारत के आर्थिक मॉडल में आया है। मनमोहन काल में आयात केंद्र में था। मजबूत रुपया आयात को सस्ता बनाता था और निर्यात पीछे छूट जाता था। मोदी सरकार के दौर में यह ढांचा उलट गया। अब लक्ष्य निर्यात, उत्पादन और आपूर्ति श्रृंखला में भारत की पकड़ को बढ़ाना है। ऐसे मॉडल में थोड़ा कमजोर रुपया नुकसान नहीं, बल्कि कई क्षेत्रों में लाभ बन जाता है। सेवाओं का निर्यात, फार्मा, इंजीनियरिंग और तकनीकी क्षेत्र में तेजी से वृद्धि इसी बदलाव का हिस्सा है।

डिजिटल रुपया भी भविष्य की मुद्रा व्यवस्था में बड़ा असर डाल सकता है। यह सीमा पार भुगतान को सरल बना सकता है और डॉलर आधारित अस्थिरता को कम कर सकता है। जब दुनिया डिजिटल भुगतान की दिशा में और आगे बढ़ेगी, भारत पहले से तैयार होगा।

अब सवाल आता है कि क्या मोदी सरकार रुपये को मजबूती से रोक सकती थी। तकनीकी रूप से हां, पर उसका परिणाम अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा नहीं होता। विदेशी भंडार खर्च होता, निर्यात पर चोट पड़ती और यह कृत्रिम मजबूती लंबी नहीं टिकती। सरकार ने दिखावे की बजाय दीर्घकालिक रास्ता चुना और यही वजह है कि रुपये के उतार चढ़ाव के बावजूद अर्थव्यवस्था ज्यादा स्थिर दिखती है।

अगर इस पूरे सफर को एक पंक्ति में समझना हो तो यह है कि मनमोहन सिंह के समय रुपया स्थिर था क्योंकि भारत निर्भर था, और मोदी सरकार के समय रुपया कमजोर दिखता है क्योंकि भारत बदल रहा है। परिवर्तन का यही सार है कि पुरानी कमजोरियों को छोड़ कर नई ताकतों की ओर बढ़ना। रुपया भले आंकड़ों में गिरा दिखता हो, भारत आज पहले से कहीं अधिक ऊंचा और आत्मनिर्भर खड़ा है।

मनीष कुमार गुप्ता
चार्टर्ड अकाउंटेंट
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INSTC — भारत की लागत, समय और सप्लाई चेन दक्षता में निर्णायक बदलावइंटरनेशनल नॉर्थ साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर भारत की व्यापा...
09/12/2025

INSTC — भारत की लागत, समय और सप्लाई चेन दक्षता में निर्णायक बदलाव

इंटरनेशनल नॉर्थ साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर भारत की व्यापारिक रणनीति में संरचनात्मक बदलाव लेकर आता है। चीन बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव के माध्यम से पश्चिम एशिया और यूरोप तक अपनी सप्लाई चेन मजबूत करता गया और भारत को स्वेज नहर पर निर्भर रहना पड़ा। पाकिस्तान के कारण जमीनी रास्ते बंद थे, और समुद्री मार्ग की लंबी दूरी से लागत बढ़ती चली गई। यह स्थिति भारत के एक्सपोर्ट सेक्टर की प्रतिस्पर्धा को प्रभावित कर रही थी क्योंकि लंबे मार्ग, अतिरिक्त पोर्ट शुल्क और स्टोरेज शुल्क मिलकर कुल लॉजिस्टिक्स कॉस्ट को 16–20 प्रतिशत तक बढ़ा देते थे।

INSTC इस ढांचे को तोड़ता है। यह समुद्री, सड़क और रेल तीनों को एक ही नेटवर्क में जोड़ता है। माल मुंबई से ईरान के बंदर अब्बास या चाबहार पहुँचने के बाद शीराज, इस्फ़हान और तेहरान के लॉजिस्टिक कॉरिडोर से गुजरता हुआ बाकू तक जाता है। वहाँ से अस्त्रखान, मॉस्को और फिर यूरोपीय शहरों तक रेल और सड़क मार्ग माल को आगे बढ़ाते हैं। पूरा नेटवर्क लगभग 7,200 किमी लंबा है, जो स्वेज मार्ग की तुलना में करीब 30 प्रतिशत छोटा पड़ता है। इस दूरी की कमी ट्रांजिट समय में औसतन 15–25 दिन की बचत देती है और कई केस में यह 30 दिन तक पहुँचती है। कुल लागत में 25–30 प्रतिशत तक की कटौती अनुमानित है और 15 टन वाले कंटेनर पर लगभग 2,500 डॉलर की बचत एक औसत एक्सपोर्टर की मार्जिन बढ़ाने के लिए काफी है।

स्वेज नहर दुनिया के लगभग 12 प्रतिशत समुद्री व्यापार का मुख्य मार्ग है, लेकिन वहां बार-बार जाम, सुरक्षा सम्बंधित शुल्क, और राजनीतिक जोखिम जुड़े रहते हैं। यह न केवल समय बढ़ाता है बल्कि freight insurance cost भी बढ़ा देता है। समुद्री मार्ग की अनिश्चितता के कारण भारत की डिलीवरी टाइमलाइन पर भी दबाव रहता था। INSTC इस जोखिम को कम करता है क्योंकि यह inland और overland मार्गों के संयोजन से चलने वाला स्थिर नेटवर्क है, जिसमें chokepoint कम हैं और seasonality का प्रभाव न्यूनतम है।

लॉजिस्टिक डेटा इस बदलाव को और बेहतर समझाता है। एक औसत इंडो-यूरोप रूट पर sea freight की कीमत 6,000 से 8,000 डॉलर प्रति कंटेनर तक जाती है, जबकि INSTC का effective cost कई मामलों में 4,500–5,500 डॉलर तक आ सकता है। ट्रांजिट टाइम कम होने से warehousing cost, demurrage charges और container idle time में भी कमी आती है। इससे working capital पर दबाव घटता है और turnaround time बेहतर होता है। यह दक्षता उन उद्योगों के लिए महत्वपूर्ण है जो cost-sensitive हैं जैसे फार्मा, मशीनरी, इंजीनियरिंग गुड्स, स्टील, टेक्सटाइल और केमिकल्स।

ईरान इस कॉरिडोर का केंद्रीय बिंदु है और भारत ने उसके साथ संबंध हमेशा व्यावहारिक रणनीति के आधार पर संभाले हैं। अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद भारत ने चाबहार पोर्ट में निवेश जारी रखा क्योंकि यह पाकिस्तान को बाईपास कर मध्य एशिया तक पहुंचने का एकमात्र प्रभावी मार्ग है। यह निर्णय केवल राजनीतिक नहीं बल्कि आर्थिक तर्क पर आधारित था—छोटा मार्ग, कम जोखिम और कम परिवहन लागत। रूस के साथ भारत की दीर्घकालिक साझेदारी और यूक्रेन युद्ध के बाद रूस का एशिया की ओर बढ़ा झुकाव इस कॉरिडोर को और मजबूती देता है। रूस के ऊर्जा, उर्वरक और मशीनरी सेक्टर भारत के लिए बड़े अवसर हैं और INSTC इन क्षेत्रों में bilateral trade की लागत को कम कर इनका दायरा बढ़ाता है।

इस कॉरिडोर का आर्थिक प्रभाव तीन दिशाओं में उभर रहा है। पहला, निर्यात क्षमता में वृद्धि क्योंकि भारत और रूस ने 2030 तक 100 अरब डॉलर के द्विपक्षीय व्यापार का लक्ष्य रखा है और यह संरचना इस लक्ष्य के लिए आवश्यक आधार तैयार करती है। दूसरा, सप्लाई-चेन सुरक्षा और diversification क्योंकि भारत पाकिस्तान और स्वेज जैसे अवरोधों से निर्भरता हटाकर खुद का स्थिर गलियारा विकसित करता है। तीसरा, लॉजिस्टिक दक्षता जिसमें भारत की global cost competitiveness मजबूत होती है और भारतीय निर्यातकों का प्रति यूनिट लागत घटती है।

INSTC भारत की उस नई आर्थिक दिशा का हिस्सा है जिसमें विकास, स्थिरता और लागत-दक्षता एक साथ चलते हैं। जब यह नेटवर्क पूरी क्षमता से काम करेगा, भारतीय निर्यातकों की unit cost और turnaround time दोनों सुधरेंगे और भारत वैश्विक सप्लाई चेन का एक अधिक विश्वसनीय और प्रभावशाली खिलाड़ी बनेगा।

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