14/01/2026
जम्मू कश्मीर: एक दशक तक वित्तीय तस्वीर, केंद्रीय सहायता और आर्थिक चुनौतियाँ
भारत आजाद हुए लगभग 78 साल बीत चुके हैं और जम्मू कश्मीर (अब एक केंद्रीय शासित प्रदेश) की आर्थिक कहानी जितनी संवेदनशील है, उतनी ही स्पष्ट है।
यह लेख आपको बताएगा कि कैसे जम्मू कश्मीर की राज्य/यूटी सरकार ने अपनी राजस्व जरूरत का केवल एक छोटा हिस्सा ही खुद जुटाया, जबकि बुनियादी खर्चों और विकास के लिए वह लगातार केंद्र की सहायता पर निर्भर रहा।
1. जम्मू कश्मीर का वित्तीय ढांचा: राजस्व बनाम केंद्र सहायता
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि जम्मू कश्मीर का अपने स्तर पर राजस्व जुटाने वाला हिस्सा सीमित रहा है:
• 2025-26 के लिए अनुमानित राज्य की अपनी टैक्स राजस्व क्षमता लगभग ₹21,550 करोड़ है।
यह Jammu & Kashmir के GSDP के साथ तुलना में अपेक्षाकृत कम है। PRS Legislative Research
• 2025-26 के लिए कुल राजस्व प्राप्तियाँ लगभग ₹90,535 करोड़ हैं, लेकिन इसमें से ₹40,619 करोड़ केंद्रीय सहायता है जिसे मुख्य रूप से संसाधन अंतर (resource gap) भरने के लिए दिया जाता है। PRS Legislative Research+1
• एक्सटर्नल डेटा के अनुसार 2025 में कुल राजस्व प्राप्तियाँ लगभग ₹9,77,191 करोड़ थीं, जिसमें
– अपने टैक्स और गैर-टैक्स राजस्व बहुत छोटा हिस्सा था
– केंद्रीय अनुदान (ग्रांट) सबसे बड़ा भाग था।
विशेषकर ₹6,71,326 करोड़ के अनुदान के रूप में केंद्रीय सहायता शामिल है। CEIC Data
संक्षेप में, जम्मू कश्मीर की सरकार राजस्व का बड़ा हिस्सा खुद नहीं जुटा पाती है। यह केंद्रीय अनुदान पर निर्भरता एक स्टेबल स्टेट नहीं, बल्कि संस्थागत कमजोरी का संकेत है।
2. दशकों का केंद्रीय सहायता का इतिहास (अनुमानित आकड़े)
पूरे आजादी के बाद से जम्मू कश्मीर को अलग-अलग योजनाओं और सहायता के जरिए बड़े पैकेज मिले हैं। सटीक दशकवार सरकारी संकलन उपलब्ध नहीं है, लेकिन केंद्रीय बजट और योजना दस्तावेज़ बताते हैं कि हर दशक में सहायता बढ़ती रही:
• 1950-60 के दशक से 1980 तक मॉडल फेयर और सिंधु जल संधि योजनाओं से लेकर विकास पैकेज तक, लगातार अनुदान मिलता रहा (आंकड़े केंद्र वित्त आयोग के हिस्से और इतिहास पर आधारित हैं)। Wikipedia
• 1990 के दशक में संघर्ष के चलते सुरक्षा और प्रशासनिक खर्च भारी रहा — विकास के बजाए खर्चे भारी रहे।
• 2000 के दशक और 2010 के दशक में विशेष विकास पैकेज और कल्याण योजनाओं के रूप में केंद्र की सहायता निरंतर रही।
• 2020 के बाद 2019 में 370 अनुच्छेद हटने के बाद से केंद्र सहायता का अनुपात और स्पष्टता के साथ बढ़ा। शोध से पता चलता है कि केंद्र स्थानांतरण (central transfers) अब GSDP का लगभग 28% तक पहुँच गया है, जबकि अपने कर राजस्व का हिस्सा भी कुछ बढ़ा। jiae.ub.ac.id
आंकड़ों का एक मोटा लेकिन विश्वसनीय अनुमान बताता है कि आजादी से अब तक जम्मू कश्मीर को केंद्र से लाखों करोड़ रुपए का अनुदान मिला है, जिसका मूल्य वर्तमान मुद्रास्फीति समायोजित रुप में आज भी बहुत अधिक है। यह अनुदान केवल सामान्य सहायता नहीं है, बल्कि सुरक्षा, प्रशासन, और विकास की आवश्यकता की देन रहा है।
3. मोदी सरकार से पहले और बाद: तुलना
मोदी सरकार से पहले (2014 से पहले)
• राजस्व क्षमता सीमित थी और केंद्र सहायता का अनुपात भी ऊँचा था।
• GSDP और राजस्व अनुपात पहले कम था।
• सुरक्षा पर अधिक खर्च के कारण विकास और राजस्व सृजन के लिए संसाधन कम बचे।
मोदी सरकार के बाद (2019 के पुनर्गठन के बाद) • कुछ सुधार दिखते हैं:
– अपने टैक्स राजस्व का हिस्सा बढ़ कर लगभग 9% तक पहुंचा है।
– केंद्र सहायता का GSDP में हिस्सा लगभग 28% तक रहने लगा है।
– Capital expenditures और CSS (centrally sponsored schemes) पर खर्च बढ़ा है।
ये दोनों बदलाव इस ओर इंगित करते हैं कि राज्य की वित्तीय क्षमता थोड़ी मजबूत हो रही है, लेकिन पूरी तरह आत्मनिर्भर बनने से अभी काफी दूरी है। jiae.ub.ac.id
4. जनसंख्या के अनुपात में सरकारी कर्मचारी और प्रशासनिक बोझ
इस विषय पर विस्तृत केंद्र/राज्य स्तर पर कुल कर्मचारी डेटा उपलब्ध नहीं है, लेकिन यह तथ्य कई विश्लेषण दस्तावेज़ों में आया है कि जम्मू कश्मीर में प्रति व्यक्ति सरकारी कर्मचारी व्यय और संख्या कई बड़े राज्यों की तुलना में अधिक है। यह 1990 के दशक से अपेक्षाकृत जारी रहा — कारण सुरक्षा, प्रशासनिक लागत और बेरोजगारी संबंधी योजनाओं की डिमांड। इसी वजह से राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit) अपेक्षाकृत बड़ा रहा है।
5. राजकोषीय घाटा: समस्या और उसके कारण
2025-26 के बजट में • राजकोषीय घाटा लगभग 5.6% GSDP के लक्ष्य पर है। • हालांकि एक राजस्व सरप्लस दिखाया गया है, लेकिन यह स्थायी नहीं है जब तक राजस्व वृद्धि संरचित ढंग से न हो। PRS Legislative Research
मुख कारण:
• बड़ी संख्या में सरकारी कर्मियों की सैलरी, पेंशन और प्रशासनिक खर्च
• सुरक्षा-प्रशासनिक लागत भारी
• निजी निवेश और उद्योग कम होने के कारण टैक्स आधार संकुचित
• पर्यटन, कृषि और मैन्युफैक्चरिंग में पर्याप्त वैल्यू एडिशन नहीं
6. समाधान के व्यावहारिक उपाय यहाँ कुछ सिफारिशें हैं जिनका हर नीति-निर्माता और सरकार को ध्यान में रखना चाहिए:
a. राजस्व निर्माण पर जोर
– कृषि आधारित वैल्यू एडिशन (प्रोसेसिंग, पैकेजिंग)
– पर्यटन के इको-टूरिज्म, एडवेंचर पर्यटन पर टैक्स बेस बढ़ाना
– बिजली, खनन और सेवा शुल्क में दक्षता बढ़ाना
b. खर्चों में पारदर्शिता और प्राथमिकता
– फिजूल-खर्ची जैसे बिना काम के भत्तों पर रोक
– प्रशासनिक खर्च का ऑडिट
c. निजी निवेश आकर्षित करना
– स्पेशल टैक्स-छूट, लॉजिस्टिक सहायता
– फूड प्रोसेसिंग जो भारत के बड़े बाजार के साथ सीधे जुड़े
d. केंद्रीय सहायता का प्रभावी उपयोग
– केवल सुरक्षा या सैलरी पर खर्च न हो
– इंफ्रास्ट्रक्चर, स्मार्ट सिटीज, रोजगार पर नीतिगत निवेश
निष्कर्ष जम्मू कश्मीर की अर्थव्यवस्था और बजट की कहानी यही कहती है कि यह क्षेत्र केंद्र की सहायता पर बहुत अधिक निर्भर रहा है और अपनी खुद की राजस्व क्षमता अभी तक सीमित है। यह स्थिति सुरक्षा-प्रबंधन के कारण समझी जा सकती है, लेकिन राजकोषीय घाटा कम करना और आर्थिक ऑटोनॉमी बढ़ाना अब समय की मांग है।
जैसे ही नया बजट आता है, यह जरूरी है कि
• केंद्र और राज्य मिलकर विकास-उन्मुख नीतियाँ बनायें,
• राजस्व आधार को विस्तारित करें,
• सरकारी खर्च को प्राथमिकता के हिसाब से पुनर्गठित करें,
ताकि जम्मू कश्मीर आत्मनिर्भर और संतुलित वित्तीय स्थिति की दिशा में वास्तविक प्रगति कर सके।
मनीष कुमार गुप्ता
चार्टर्ड अकाउंटेंट
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