11/08/2026
लीची में स्टिंक बग का बढ़ा खतरा: पूरे इलाके में एक साथ स्प्रे पर जोर, तभी थमेगा कीट का प्रसार
पटना: लीची के बागानों में तेजी से बढ़ रही स्टिंक बग की समस्या से निपटने के लिए राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र ने तैयारी शुरू कर दी है। पिछले वर्ष मीनापुर, मेहसी और पूर्वी चंपारण के कुछ लीची उत्पादक क्षेत्रों में स्टिंक बग के अधिक प्रकोप को देखते हुए अब इसकी रोकथाम के लिए सिर्फ एक-दो बागानों में छिड़काव के बजाय पूरे क्षेत्र में एक साथ सिंक्रोनाइज्ड स्प्रे कराने की रणनीति पर जोर दिया जा रहा है।
भाकृअनुप–राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र, मुशहरी की ओर से बिहार बागवानी विकास सोसाइटी, पटना के प्रायोजन में 10-11 अगस्त को ‘लीची स्टिंक बग के सर्वेक्षण एवं समेकित प्रबंधन पर क्षमता निर्माण’ विषय पर दो दिवसीय प्रशिक्षण आयोजित किया गया। इसमें जिला उद्यान पदाधिकारी, सहायक निदेशक पौधा संरक्षण, प्रखंड उद्यान पदाधिकारी, प्रखंड तकनीकी प्रबंधक, सहायक तकनीकी प्रबंधक एवं कृषि समन्वय, किसान सलाहकारों को कीट की पहचान, सर्वेक्षण, निगरानी और वैज्ञानिक प्रबंधन के बारे में प्रशिक्षित किया गया।
एक बागान में स्प्रे से नहीं रुकेगा स्टिंक बग
राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र के निदेशक डॉ. बिकाश दास ने बताया कि स्टिंक बग की प्रवासी एवं अत्यधिक गतिशील प्रकृति के कारण एक किसान द्वारा अपने बागान में किया गया उपचार पर्याप्त नहीं है। यदि आसपास के बागानों में कीट मौजूद है तो दोबारा संक्रमण की आशंका बनी रहती है।
इसीलिए सामुदायिक स्तर पर सभी लीची बागानों में निर्धारित समय पर समन्वित प्रबंधन और सिंक्रोनाइज्ड स्प्रे जरूरी है। पूरे क्षेत्र में एक साथ वैज्ञानिक तरीके से प्रबंधन करने पर कीट की आबादी और उसके पुनः संक्रमण की संभावना को कम किया जा सकता है।
पिछले साल कई इलाकों में दिखा था ज्यादा असर
डॉ. दास के अनुसार पिछले वर्ष मीनापुर, मेहसी और पूर्वी चंपारण के कुछ लीची उत्पादक क्षेत्रों में स्टिंक बग का प्रकोप काफी अधिक देखा गया था। कई जगहों पर इसके कारण लीची के फलन एवं उत्पादन पर भी प्रतिकूल असर पड़ा।
इसे देखते हुए केंद्र ने इस बार प्रकोप के बाद नियंत्रण के बजाय पहले से निगरानी और रोकथाम की रणनीति अपनाई है। केंद्र की योजना इस विषय पर कुल पांच क्षमता निर्माण प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करने की है, जिससे लीची उत्पादक क्षेत्रों में तकनीकी कर्मियों का मजबूत नेटवर्क तैयार किया जा सके।
ग्रीस बैंडिंग से लेकर नियमित निगरानी तक पर जोर
प्रशिक्षण में स्टिंक बग के एकीकृत कीट प्रबंधन (IPM) के बारे में जानकारी दी गई। इसमें पेड़ों के तनों पर ग्रीस बैंडिंग, बागान की नियमित साफ-सफाई, कीट की नियमित निगरानी और सर्वेक्षण जैसे उपायों को महत्वपूर्ण बताया गया।
इसके साथ ही केंद्र की वैज्ञानिक अनुशंसा के अनुसार आवश्यक होने पर उचित कीटनाशी का वैज्ञानिक तरीके से प्रयोग करने की जानकारी भी दी गई। प्रशिक्षणार्थियों को कीट की पहचान, जीवन चक्र और प्रकोप के शुरुआती लक्षणों की जानकारी दी गई, ताकि किसान समय रहते प्रबंधन शुरू कर सकें।
अब प्रखंड से पंचायत और गांव तक पहुंचेगी जानकारी
राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र ने प्रशिक्षण प्राप्त तकनीकी पदाधिकारियों और किसान सलाहकारों से कहा कि वे यहां मिली वैज्ञानिक जानकारी को अपने-अपने प्रखंड, पंचायत और गांव स्तर तक पहुंचाएं।
किसानों को विशेष रूप से यह समझाने पर जोर दिया गया कि स्टिंक बग की समस्या से निपटने के लिए बागान स्तर पर अलग-अलग प्रयास के बजाय पूरे क्षेत्र के किसानों को एक साथ आना होगा।
सभी मिलकर काम करेंगे, तभी स्थायी समाधान
डॉ. बिकाश दास ने जोड़ देते हुए कहा कि “लीची स्टिंक बग की समस्या का स्थायी एवं प्रभावी समाधान तभी संभव है, जब वैज्ञानिक संस्थान, कृषि विभाग के तकनीकी पदाधिकारी, किसान सलाहकार और लीची उत्पादक किसान मिलकर सामूहिक रूप से कार्य करें।”
उन्होंने कहा कि आगामी लीची मौसम से पहले किसानों तक सही वैज्ञानिक जानकारी पहुंचाना केंद्र की प्राथमिकता है। इससे कीट की समय पर पहचान, निगरानी और उसके प्रसार को रोकने में मदद मिलेगी।
पांच प्रशिक्षणों से बनेगा लीची उत्पादक क्षेत्रों में नेटवर्क
केंद्र की ओर से आयोजित किए जा रहे पांच प्रशिक्षण कार्यक्रमों का उद्देश्य लीची उत्पादक जिलों में ऐसा तकनीकी नेटवर्क तैयार करना है, जो किसानों को स्टिंक बग की निगरानी और प्रबंधन में लगातार सहयोग दे सके।
प्रशिक्षित कर्मी अपने-अपने क्षेत्रों में किसानों से समन्वय स्थापित करेंगे। इस पहल में वैज्ञानिक अनुसंधान, किसान जागरूकता, नियमित निगरानी, सामुदायिक स्तर पर सिंक्रोनाइज्ड प्रबंधन को स्टिंक बग नियंत्रण की प्रमुख रणनीति बनाया गया है।
📸 Raushan Kumar (राज्य अध्यक्ष)
कृषि जागरण, बिहार व एग्रीकल्चर जर्नलिस्ट एसोसिएशन ऑफ इंडिया (अजय), बिहार एवं कृषि/किसान पत्रकार – बिहार
Indian Council of Agricultural Research | Ministry of Agriculture & Farmer’s Welfare, Government of India | Department of Agriculture, Government of Bihar