17/10/2026
A True story. Must read.It is my humble request. Only 5 minutes.🙏
"मेरे पति आज भी हर महीने की पहली तारीख को पैसे भेजते हैं" - प्रिया की जुबानी
मेरा नाम प्रिया है। उम्र अड़तालीस साल। लोग मुझसे कहते हैं - "बहन, तुम बहुत किस्मत वाली हो।"
मैं हँस देती हूँ।
किस्मत वाली नहीं हूँ मैं। मेरे पति समझदार थे। बस इतनी सी बात है।
और सबसे बड़ी बात ये है कि उस समझदारी का मैंने सबसे ज्यादा विरोध किया था।
वो दिन, जब मैंने अपने पति से झगड़ा किया था
बात 2006 की है। मेरे पति सुरेश लाल जी की बिजली के सामान की छोटी-सी दुकान थी। कमाई ठीक-ठाक थी, पर कोई ऐश नहीं थी।
एक शाम वो एक LIC Advisor को घर ले आए। चाय-नाश्ता हुआ, फाइलें खुलीं, और उन्होंने कहा -
"प्रिया, मैं जीवन का लाभ पॉलिसी ले रहा हूँ। पच्चीस लाख की। पच्चीस साल के लिए।"
मैंने प्रीमियम पूछा।
करीब साढ़े ग्यारह हजार रुपये महीना।
मेरे होश उड़ गए।
मैंने उसी रात उनसे झगड़ा किया। खूब बोली।
"इतने पैसे? दुकान का किराया है, बच्चों की फीस है, मेरी सास की दवाई है। और आप हर महीने साढ़े ग्यारह हजार किसी कागज में डाल देंगे?"
"कोई जरूरत नहीं है इसकी। भगवान की दया से सब ठीक चल रहा है।"
"ये पैसा हमें चाहिए आज, बाद में नहीं।"
वो चुपचाप सुनते रहे। फिर उन्होंने सिर्फ एक बात कही, जो आज भी मेरे कानों में गूँजती है -
"प्रिया, अगर मैं रहा, तो ये पैसा ब्याज के साथ वापस आ जाएगा। और अगर मैं न रहा... तो ये पैसा मेरा नाम लेकर तुम्हारे पास आएगा।"
मैंने गुस्से में कहा - "ऐसी बातें मत किया करिए।"
उन्होंने पॉलिसी ले ली। मैं महीनों नाराज रही।
वो रात
पाँच साल बाद। 2011।
वो माल लेने दूसरे शहर गए थे। रात को लौट रहे थे। हाईवे पर एक ट्रक ने सामने से टक्कर मार दी।
रात के ग्यारह बजे फोन आया था।
मैं बता नहीं सकती कि उस रात मुझ पर क्या बीती।
उस वक्त मेरी बेटी श्रेया पंद्रह साल की थी। बेटा आर्यन बारह साल का। दोनों रो-रोकर सो गए थे, और मैं पूरी रात बैठी रही - बिना आँसुओं के, बिना किसी सोच के। बस खाली।
तेरह दिन तक घर में भीड़ रही।
फिर चौदहवें दिन सब चले गए। और वो सन्नाटा शुरू हुआ, जो सबसे ज्यादा डराता है।
जो बातें मैंने उन दिनों सुनीं
"दुकान बेच दो बहन, औरत से नहीं चलेगी।"
"बच्चों को सरकारी स्कूल में डाल दो, अब वो महँगे स्कूल अफोर्ड नहीं होंगे।"
"लड़की को ज्यादा मत पढ़ाना, शादी करके फर्ज से उतर जाना।"
"मायके चली जाओ, वहाँ भाई संभाल लेंगे।"
और एक रिश्तेदार ने तो सीधे पूछ लिया - "कुछ बचाकर रखा था इन्होंने, या सब खत्म?"
मैं कुछ नहीं बोल पाई। क्योंकि मुझे खुद नहीं पता था।
और फिर वो आदमी आया
ठीक उन्नीसवें दिन, वही Advisor साहब मेरे घर आए - जिनसे मैं पाँच साल पहले नाराज हुई थी।
उन्होंने कागज निकाले और कहा, "प्रिय जी, क्लेम का काम शुरू करना है।"
मैंने थके मन से कहा, "भाईसाहब, रहने दीजिए। अब क्या होगा।"
वो बोले, "प्रिय जी, सुरेश भाई ने ये काम आपके लिए ही किया था। मुझे बस आपकी एक दस्तखत चाहिए।"
डेढ़ महीने बाद वो फिर आए।
हाथ में एक चेक था।
अट्ठावन लाख रुपये।
पच्चीस लाख पॉलिसी की रकम। पच्चीस लाख एक्सीडेंट बेनिफिट। और करीब आठ लाख बोनस।
मेरे हाथ काँप रहे थे। मैंने जिंदगी में कभी इतने पैसे नहीं देखे थे।
मैं उस चेक को देखती रही, देखती रही... और फिर फूट-फूटकर रोने लगी।
मैं पैसे देखकर नहीं रो रही थी।
मुझे वो रात याद आ रही थी, जब मैंने उनसे झगड़ा किया था। जब मैंने कहा था - "कोई जरूरत नहीं है इसकी।"
वो आदमी जो मेरे सामने नहीं था, वो उस दिन भी मेरे घर का खर्च चला रहा था।
सबसे बड़ा फैसला
जैसे ही खबर फैली, सलाह देने वाले आ गए।
कोई बोला, "प्लॉट खरीद लो, दोगुना होगा।"
कोई बोला, "मेरे धंधे में लगा दो, हर महीने पच्चीस हजार दूँगा।"
मेरे अपने एक रिश्तेदार ने दस लाख उधार माँग लिए।
मैं उलझ गई।
तब एडवायजर साहब ने मुझसे एक बात कही, जिसने मेरे बच्चों की जिंदगी बना दी -
"भाभी जी, ये पैसा आपके पति की पूरी जिंदगी की कीमत है। ये एक बार खर्च होने के लिए नहीं है। इसे ऐसी जगह रखिए जहाँ से ये हर महीने आपके पास लौटकर आए। आपको एकमुश्त रकम नहीं, हर महीने की तनख्वाह चाहिए।"
उन्होंने मुझे जीवन की पेंशन के बारे में समझाया।
मैंने पूरे अट्ठावन लाख उसमें जमा कर दिए।
और उसके अगले महीने की पहली तारीख को मेरे खाते में पैसे आए -
पैंतीस हजार रुपये।
पंद्रह साल
उस दिन के बाद से आज तक, हर महीने की पहली तारीख को मेरे फोन पर वही मैसेज आता है।
पैंतीस हजार।
बारिश हो या महामारी, नोटबंदी हो या मंदी - वो मैसेज कभी नहीं रुका।
मेरे बच्चे छोटे थे, तब उन्हें लगता था पापा कहीं दूर नौकरी करने गए हैं और पैसे भेजते हैं। मैंने कभी उन्हें गलत नहीं कहा।
क्योंकि सच यही था।
उन पंद्रह सालों में -
मुझे दुकान नहीं बेचनी पड़ी।
बच्चों का स्कूल नहीं बदलना पड़ा।
मुझे अपने भाई के घर नहीं जाना पड़ा।
और सबसे बड़ी बात - मुझे आज तक किसी के आगे हाथ नहीं फैलाना पड़ा।
एक विधवा औरत के लिए इससे बड़ी इज्जत कुछ नहीं होती।
आज
मेरी बेटी श्रेया आज डॉक्टर है। अपने पति के साथ शहर में प्रैक्टिस करती है।
मेरा बेटा आर्यन इंजीनियर है। अच्छी कंपनी में है, बहू बहुत प्यारी है, और पिछले साल मैं दादी बन गई।
दोनों के घर बसे हुए हैं। दोनों खुश हैं।
और मैं आज भी उसी घर में रहती हूँ, जहाँ उनके पिता ने वो पॉलिसी ली थी।
अब मुझे पैसों की जरूरत नहीं। बच्चे कहते हैं, "मम्मी, आप हमारे पास आ जाओ।"
लेकिन वो पैंतीस हजार मैं आज भी लेती हूँ।
क्योंकि वो पैसा नहीं है। वो मेरे पति की चिट्ठी है, जो हर महीने की पहली तारीख को आती है।
अब मुझे वो बात कहनी है, जिसके लिए मैंने ये सब सुनाया
दो बातें हैं। एक औरतों से, एक उन लोगों से जो ये काम करते हैं।
पहली बात - हर उस पत्नी से, जो आज मेरी जैसी गलती कर रही है
जब आपके पति पॉलिसी लेकर आएँ, तो प्रीमियम देखकर झगड़ा मत कीजिए।
मैंने किया था। और आज मैं उस झगड़े को याद करके शर्मिंदा होती हूँ।
वो आदमी उस दिन अपने ऊपर खर्च नहीं कर रहा था। वो अपने जाने के बाद की चिंता कर रहा था। और हम औरतें उसी को रोकती हैं।
साढ़े ग्यारह हजार महीना - यानी रोज के करीब पौने चार सौ रुपये।
रोज के पौने चार सौ रुपये ने मेरी बेटी को डॉक्टर बनाया और मेरे बेटे को इंजीनियर।
आज हिसाब लगाती हूँ तो सिहर जाती हूँ - उन्होंने कुल मिलाकर करीब सात लाख रुपये जमा किए थे। और मुझे अब तक पेंशन के रूप में तिरसठ लाख से ज्यादा मिल चुके हैं।
और पेंशन अब भी चालू है।
दूसरी बात - उन एडवाइजर भाई-बहनों से, जो रोज धूप में हमारे लिए घूमते हैं
मुझे पता है आप लोगों को कईं बार न भी सुनना पड़ता है।
मैंने भी वही कहा था। मैंने भी उस आदमी को मना किया था। मैंने भी कहा था "कोई जरूरत नहीं।"
आज भी मैं उस आदमी की रिस्पेक्ट करती हूँ।
आज मेरे पति नहीं हैं। लेकिन वो मेरे पति के भेजे हुए एक ऐसे इंसान हैं जिन्होंने मेरी ऐसे वक़्त में मदद करी जब किसी ने मदद नहीं करी
इसलिए आपसे हाथ जोड़कर कहती हूँ -
जब कोई आपसे झगड़ा करे, तो हार मत मानिए। क्योंकि हो सकता है कल आपकी फैमिली की जिंदगी आपके उसी LIC ke कागज से चले।
आप जानते नहीं कि आज जिस आदमी को आप समझा रहे हैं, उसके घर में एक पंद्रह साल की लड़की है जो डॉक्टर बनना चाहती है।
उसका सपना आपकी फाइल में रखा है।
मेरे पति पंद्रह साल पहले चले गए थे। लेकिन उन्होंने जाने से पहले मेरे नाम एक वादा छोड़ दिया था - और वो वादा आज तक एक महीना भी नहीं टूटा।
जो आदमी जिंदा रहकर परिवार पालता है वो अच्छा इंसान है। लेकिन जो जिंदा न रहने के बाद भी परिवार पालता है, उसे पति कहते हैं।
🙏
Rajesh bhardwaj
9891331335
Apka life advisor