12/09/2019
अनंत से अनंत ऐश्वर्य की यात्रा का महापर्व - अनंत चतुर्दशी
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भगवान श्री हरि विष्णु के दश अवतारों जिसमें कच्छप, कूर्म, वाराह, नरसिंह. वामन, परशुराम, श्रीराम, और श्री कृष्ण के बारे में तो हम सभी जानते हैं। लेकिन इन अवतारों के अलावा भी भगवान ने कई ऐसे अवतार लिए हैं जिनकी जानकारी आज भी बहुत कम लोगों को है। ऐसे अवतारों में नर- नारायण अवतार, मोहिनी अवतार, कपिल मुनि और अनंत अवतार प्रमुख हैं। भगवान का अनंत अवतार समुद्र मंथन से निकला है। इस अवतार के साथ साथ भगवान श्री विष्णु का ऐश्वर्य भी जुड़ा है। कहा जाता है कि जब पांडव जुए में सब कुछ हार बैठे और चौदह साल का वनवास काट कर गरीबी का जीवन व्यतीत कर रहे थे तब भगवान श्री कृष्ण ने उन्हें अपने स्वरुप अनंत का रहस्य बताया था और पांडवो को अनंत चतुर्दशी के दिन व्रत करने को कहा था। महाभारत के मुताबिक भगवान के इसी स्वरुप की अराधना करने की वजह से पांडवों को फिर से अपना राज्य प्राप्त हुआ। भगवान के वैसे तो हरेक अवतार का अपना उद्धेश्य रहा है। दत्तात्रेय अवतार के माध्यम से अगर भगवान गुरु का उद्धेश्य बताते हैं। तो राम के रुप में वो मर्यादा स्थापित करते हैं। वाराह के रुप में वो पृथ्वी के तारण हार बन कर आते हैं तो मत्स्य अवतार ले कर वो वेदों को पुन स्थापित करते हैं। इसी प्रकार अनंत अवतार लेकर वो अपने ऐश्वर्य का परिचय देते हैं। ऐश्वर्य शब्द से ही ईश्वर शब्द बना है। ईश्वर वो है जिसके पास सब कुछ है और सब कुछ देने की क्षमता है। कहा जाता है कि समुद्र मंथन के दौरान भगवान विष्णु के एक अवतार अनंत का प्राकट्य हुआ और उनके साथ ही 14 रत्न भी निकले जिसमें ऐरावत हाथी, उच्चश्रैवा घोड़ा, कौस्तुभ मणि, कल्प वृक्ष, पारिजात वृक्ष, कामधेनु गाय और पाांचजन्य शंख प्रमुख थे । इन सबका संबंध भगवान से है। जिसके पास भी कामधेनु गाय या कल्प वृक्ष या पांचजन्य शंख हो उसके पास किसी भी चीज़ की कमी नहीं हो सकती है। अनंत ऐश्वर्य की प्राप्ति कराने वाला ये व्रत इसी प्रकार के ऐश्वर्य प्राप्ति करने के लिए किया जाता है। इन चौदह रत्नों के प्रतीक के रुप में ही अनंत के धागे में 14 गांठे होती हैं और इसे चौदह दिन तक पहना जाता है। जो भी इस व्रत को करता है और अनंत को पहनता है उसे भगवान अनंत सारी सुख और समृद्धि देते हैं।