Akhand Seva for Helpless Children & Senier Citizens Trust

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17/07/2019

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17/09/2018

चुभन

🔶 पुरानी साड़ियों के बदले बर्तनों के लिए मोल भाव करती शारदा ने अंततः दो साड़ियों के बदले एक टब पसंद किया। "नही दीदी, बदले में तीन साड़ियों से कम तो नही लूँगा।" बर्तन वाले ने टब को वापस अपने हाथ में लेते हुए कहा।

🔷 "अरे भैया, एक एक बार की पहनी हुई तो हैं..बिल्कुल नये जैसी। एक टब के बदले में तो ये दो भी ज्यादा हैं, मैं तो फिर भी दे रही हूँ।" "नही नही, तीन से कम में तो नही हो पायेगा।" वह फिर बोला।

🔶 एक दूसरे को अपनी पसंद के सौदे पर मनाने की इस प्रक्रिया के दौरान गृह स्वामिनी को घर के खुले दरवाजे पर देखकर सहसा गली से गुजरती अर्द्धविक्षिप्त महिला ने वहाँ आकर खाना माँगा।

🔷 आदतन हिकारत से उठी शारदा की नजरें उस महिला के कपड़ो पर गयी। अलग अलग कतरनों को गाँठ बाँध कर बनायी गयी उसकी साड़ी उसके वृद्ध शरीर को ढँकने का असफल प्रयास कर रही थी। एकबारगी उसने मुँह बिचकाया पर सुबह सुबह का याचक है सोचकर अंदर से रात की बची रोटियां मंगवायी।

🔶 उसे रोटी देकर पलटते हुए उसने बर्तन वाले से कहा "तो भैय्या क्या सोचा? दो साड़ियों में दे रहे हो या मैं वापस रख लूँ !"

🔷 बर्तन वाले ने उसे इस बार चुपचाप टब पकड़ाया और अपना गठ्ठर बाँध कर बाहर निकला। अपनी जीत पर मुस्कुराती हुई शारदा दरवाजा बंद करने को उठी तो सामने नजर गयी। गली के मुहाने पर बर्तन वाला अपना गठ्ठर खोलकर उसकी दी हुई साड़ियों में से एक साड़ी उस वृद्धा को दे रहा था।

🔶 हाथ में पकड़ा हुआ टब उसे अब चुभता हुआ सा महसूस हो रहा था......

23/04/2018

धर्म का प्रथम आधार और इसकी पृष्ठभूमि

🔷 धर्म का प्रथम आधार है - आस्तिकता, ईश्वर विश्वास । परमात्मा की सर्वव्यापकता, समदर्शिता और न्यायशीलता पर आस्था रखना, आस्तिकता की पृष्ठभूमि है । यह मान्यता मनुष्य की दुष्प्रवृत्तियों पर अंकुश रख सकने में पूर्णतया समर्थ होती है । सर्वव्यापी ईश्वर की दृष्टि में हमारा गुप्त-प्रकट कोई आचरण अथवा भाव छिप नहीं सकता । समाज की, पुलिस की आँखों में धूल झोंकी जा सकती है, पर घट-घटवासी परमेश्वर से तो कुछ छिपाया नहीं जा सकता ।

🔶 सत्कर्मों का या दुष्कर्मों का दण्ड आज नहीं तो कल मिलेगा ही, यह मान्यता वैयक्तिक एवं सामाजिक जीवन में नीति और कर्त्तव्य का पालन करते रहने की प्रेरणा देती है । सत्कर्म करने वाले को यदि प्रशंसा, मान्यता या सफलता नहीं मिली है तो ईश्वर भविष्य में देगा ही, यह आस्था उसे निराश नहीं होने देती और असफलताएँ मिलने पर भी वह सदाचरण के पथ पर आरूढ़ बना रहता है । इसी प्रकार कुकर्मी निर्भय नहीं हो पाता ।

🔷 आस्तिकता धर्म का इसलिए प्रथम आवश्यक एवं अनिवार्य अंग माना गया है कि उससे हमारा सदाचरण अक्षुण्य बना रह सकता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग निर्माण योजना - दर्शन, स्वरूप व कार्यक्रम-६६ (६.१०)

Food Distribution for Poor Children with lunchbox
23/04/2018

Food Distribution for Poor Children with lunchbox

Akhand Seva for Helpless Children & Senier Citizens Trust ke Or se Food Distribution for Poor Children with lunchbox

06/02/2018

एक आदमी ने एक बहुत ही खूबसूरत लड़की से शादी की. शादी के बाद दोनो की ज़िन्दगी बहुत प्यार से गुजर रही थी. वह उसे बहुत चाहता था और उसकी खूबसूरती की हमेशा तारीफ़ किया करता था. लेकिन कुछ महीनों के बाद लड़की चर्मरोग (skin Disease) से ग्रसित हो गई और धीरे-धीरे उसकी खूबसूरती जाने लगी. खुद को इस तरह देख उसके मन में डर समाने लगा कि यदि वह बदसूरत हो गई, तो उसका पति उससे नफ़रत करने लगेगा और वह उसकी नफ़रत बर्दाशत नहीं कर पाएगी.

इस बीच एक दिन पति को किसी काम से शहर से बाहर जाना पड़ा. काम ख़त्म कर जब वह घर वापस लौट रहा था, उसका accident हो गया. Accident में उसने अपनी दोनो आँखें खो दी. लेकिन इसके बावजूद भी उन दोनो की जिंदगी सामान्य तरीके से आगे बढ़ती रही.

समय गुजरता रहा और अपने चर्मरोग के कारण लड़की ने अपनी खूबसूरती पूरी तरह गंवा दी. वह बदसूरत हो गई. लेकिन अंधे पति को इस बारे में कुछ भी पता नहीं था. इसलिए इसका उनके खुशहाल विवाहित जीवन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा. वह उसे उसी तरह प्यार करता रहा.

एक दिन उस लड़की की मौत हो गई. पति अब अकेला हो गया था. वह बहुत दु:खी था. वह उस शहर को छोड़कर जाना चाहता था. उसने अंतिम संस्कार की सारी क्रियाविधि पूर्ण की और शहर छोड़कर जाने लगा. तभी एक आदमी ने पीछे से उसे पुकारा और पास आकर कहा, “अब तुम बिना सहारे के अकेले कैसे चल पाओगे? इतने साल तो तुम्हारी पत्नि तुम्हारी मदद किया करती थी.”

पति ने जवाब दिया, “दोस्त! मैं अंधा नहीं हूँ. मैं बस अंधा होने का नाटक कर रहा था. क्योंकि यदि मेरी पत्नि को पता चल जाता कि मैं उसकी बदसूरती देख सकता हूँ, तो यह उसे उसके रोग से ज्यादा दर्द देता.
इसलिए मैंने इतने साल अंधे होने का दिखावा किया. वह बहुत अच्छी पत्नि थी.
मैं बस उसे खुश रखना चाहता था.”...
सीख--खुश रहने के लिए हमें भी एक दूसरे की कमियो के प्रति आखे बंद कर लेनी चाहिए..
और उन कमियो को नजरन्दाज कर देना चाहिए...

10/01/2018

।।दुश्मन से भी प्यार करना।।
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आप किसी से भी घृणा मत कीजिए।कर्म का मार्ग बड़ा गहन है।शायद आप ही भले-बुरे की पहचान करने में भूल कर रहे हों।कर्म की भलाई बुराई का परीक्षण उसके वाहय रूप से नही, वरन कर्ता की आंतरिक भावना से किया जाता है।बुरों के साथ भी बुराई मत कीजिये।क्योंकि बुराई से बुराई की ही बृद्धि होगी।मेले कपड़े को काजल से नही, साबुन से धोना चाहिए।दुष्ठों को लाठी से नही वरन प्रेम से वश में करना चाहिए।प्लेटो कहा करता था - सबसे बड़ी जीत विरोधी के ह्रदय को जीत लेना है।किसी व्यक्ति से इसलिये घृणा करना, की उससे प्रेम करने से हमारे अन्य सहयोगी नाराज होंगे, कदापि उचित नहीं है।
।।युगऋषि श्रीरामशर्मा आचार्य।।

03/01/2018

माँ की प्रेरणा"*

अमेरिका के राष्ट्रपति एंड्रयू जैक्सन की माता को एक जहाज पर नर्स के रूप में जाना पड़ा। तब जैक्सन चौदह वर्ष के थे। माता ने अपने पुत्र को सन्देश भेजा था, जिसमें लिखा था - *" एंड्रयू, यदि मैं जीवित वापिस न लौटूं , जिंदगी भर मेरी एक बात याद रखना- "इस संसार में हर मनुष्य को अपना रास्ता आप बनाना पड़ता है। आगे बढ़ने के लिए सच्चे दोस्तों की जरूरत पड़ती है और वे उन्ही को मिल सकते हैं, जो स्वयं ईमानदार हैं।"*

-पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
प्रज्ञा पुराण, खण्ड चार
पृष्ठ 20
*"अपना सुधार संसार की सबसे बड़ी सेवा है।"*

08/11/2017

ईष्ट और संसार:-
ऋषिवर - हॆ वत्स राघव और मनोहर दो बहुत अच्छे मित्र थे उनके मध्य में कोई राज न था दोनो लंगोटीया यार थे एकबार मनोहर ने राघव से पूछा हॆ मित्र मैंने तुम्हे बहुत अच्छे से जाना है की तकदीर ने तुम्हारे साथ बहुत क्रूरतापूर्वक व्यवहार किया पर फिर भी तुम बड़े सहज रहते हो वो कैसे ?
तो राघव ने कहा हॆ मित्र मॆरी माँ की एक शिक्षा ने मुझे हर तूफान में एक नई शक्ति प्रदान की !
शिष्य - क्षमा हॆ नाथ ! कैसी क्रूरता और कैसी अहम शिक्षा ?
ऋषिवर - हॆ वत्स राघव एक लड़की को बेइंतिहा चाहता था और वो लड़की भी उसे चाहती थी राघव ने उसे पाने के लिये अपनी पुरी जिन्दगी बदल दी पर एनवक्त पर उस लड़की ने उसे धोखा दे दिया और वो एक बड़े बिजनिस मॆन के साथ विवाह करके चली गई ! राघव पर मानो वज्र का प्रहार हुआ और वो टूटकर बिखर गया पर "माँ की एक शिक्षा " ने उसे बचा लिया !
फिर एक दिन उसे पता चला की जिस इन्सान को वो देवता की तरह पुजता था उस इन्सान ने एक धोखे से उसका सबकुछ हड़प लिया और वो रोड पे आ गया पर यहाँ भी माँ की शिक्षा ने उसे टूटने न दिया !
गाँव छोड़कर वो शहर आ गया और एक लम्बे संघर्ष के बाद उसने एक अच्छी स्थिति प्राप्त कर ली ! एक दिन अत्यंत धर्मपरायण लड़की से उसका विवाह हुआ और जिन्दगी खूबसुरत होने ही लगी थी की फिर एक तूफान ने दस्तक दी और वो पत्नी उसका सबकुछ लूटकर उसे सोता हुआ छोड़कर अपने प्रेमी के साथ भाग गई और फिर से वो टूटकर बिखरने लगा पर फिर से माँ की सिख उसे बचा गई !
शिष्य - *क्षमा हॆ नाथ ! पर ऐसी क्या शिक्षा थी जो उसे हर जगह बचा लेती थी ?*
ऋषिवर - हॆ वत्स राघव की मरती हुई माँ ने उसे कहा था
*"बेटा तु इस संसार में अब अकेला पड़ने जा रहा है एक बात अच्छी तरह से ध्यान रखना की संसार से भागना मत पर जब संसार और सार अर्थात ईष्ट दोनो जब सामने हो और उनमें से किसी एक को चुनना हो तो आँख बँद करके सारी प्राथमिकता सार को दे देना संसार को नही क्योंकि ये संसार कब किस मोड़ पर क्या खेल खेले कुछ पता नही । प्रारब्ध कब कौनसा जख्म ले आये कुछ पता नही संसार को अहमियत तो देना पर प्राथमिकता केवल ईष्ट को देना और यदि जीवन में कोई " चोट "आये तो समझना की कोई "प्रारब्ध का हिसाब" पूरा हो रहा है और उस हिसाब को इसी जन्म में पुरा हो जाने देना !"*
*माँ की यही सिख उसे टूटने नही देती उसने अपनी प्रेमिका को बेइंतिहा चाहा पर ईष्ट से बढ़कर नही उसने अपने सगों पर बहुत गहरा विश्वास किया पर ईष्ट से बढ़कर नही कुल मिलाकर उसने संसार की कभी उपेक्षा नही की परन्तु ईष्ट से बढ़कर उसने न किसी को चाहा और न ही ईष्ट से बढ़कर किसी को प्राथमिकता दी और उसके ईष्ट ने उसे कभी टूटने नही दिया उसने ईष्ट को इतना मजबुत बनाया की उसके ईष्ट ने कभी उसका अनिष्ट नही होने दिया !*
*संसार को दी गई प्राथमिकता कभी भी डुबो सकती है और ईष्ट को दी गई प्राथमिकता कभी भी डुबने नही देगी !*
*हॆ वत्स तु भी इस शिक्षा को हमेशा याद रखना और अपने ईष्ट को इतना मजबुत इतना मजबुत बनाना की हर तूफान टकराकर चला जाये !*
शिष्य - जी गुरुदेव !
*शुभ प्रभात । आज का दिन आपके लिए शुभ एवं मंगलमय हो।*

23/10/2017

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