Manoj Narnoliya Satnali

Manoj Narnoliya Satnali समाजसेवा

15/05/2026
आज मेरी छोटी बहन का हरियाणा Hssc में क्लर्क पद पर चयन हो गया है। मेहनत एक दिन जरूर रंग लाती है आगे भी मेहनत करती रहो। बह...
17/10/2024

आज मेरी छोटी बहन का हरियाणा Hssc में क्लर्क पद पर चयन हो गया है। मेहनत एक दिन जरूर रंग लाती है आगे भी मेहनत करती रहो। बहुत बहुत बधाई फिर से 💐💐👑👑🎉🎉

आज मेरी छोटी बहन का हरियाणा Hssc में क्लर्क के पद पर चयन हो गया है भगवान इसको ढेर सारी खुशियां दे। बहुत बहुत बधाई आगे भी...
17/10/2024

आज मेरी छोटी बहन का हरियाणा Hssc में क्लर्क के पद पर चयन हो गया है भगवान इसको ढेर सारी खुशियां दे। बहुत बहुत बधाई आगे भी और मेहनत करती रहो। 💐💐🎉🎉👑👑

ये कोई कहानी नही बल्कि आँखों देखी सच्ची घटना है....!!मेरी छोटी बुआ….!!!!रक्षाबंधन का त्यौहार पास आते ही मुझे सबसे ज्यादा...
19/08/2024

ये कोई कहानी नही बल्कि आँखों देखी सच्ची घटना है....!!

मेरी छोटी बुआ….!!!!

रक्षाबंधन का त्यौहार पास आते ही मुझे सबसे ज्यादा जमशेदपुर (झारखण्ड )वाली बुआ जी की राखी के कूरियर का इन्तेज़ार रहता था.

कितना बड़ा पार्सल भेजती थी बुआ जी.

तरह-तरह के विदेशी ब्रांड वाले चॉकलेट,गेम्स, मेरे लिए कलर फूल ड्रेस , मम्मी के लिए साड़ी, पापाजी के लिए कोई ब्रांडेड शर्ट.

इस बार भी बहुत सारा सामान भेजा था उन्होंने.

पटना और रामगढ़ वाली दोनों बुआ जी ने भी रंग बिरंगी राखीयों के साथ बहुत सारे गिफ्टस भेजे थे.

बस रोहतास वाली जया बुआ की राखी हर साल की तरह एक साधारण से लिफाफे में आयी थी.

पांच राखियाँ, कागज के टुकड़े में लपेटे हुए रोली चावल और पचास का एक नोट.

मम्मी ने चारों बुआ जी के पैकेट डायनिंग टेबल पर रख दिए थे ताकि पापा ऑफिस से लौटकर एक नजर अपनी बहनों की भेजी राखियां और तोहफे देख लें...

पापा रोज की तरह आते ही टी टेबल पर लंच बॉक्स का थैला और लैपटॉप की बैग रखकर सोफ़े पर पसर गए थे.

"चारो दीदी की राखियाँ आ गयी है...

मम्मी ने पापा के लिए किचन में चाय चढ़ाते हुए आवाज लगायी थी...

"जया का लिफाफा दिखाना जरा...

पापा जया बुआ की राखी का सबसे ज्यादा इन्तेज़ार करते थे और सबसे पहले उन्हीं की भेजी राखी कलाई में बांधते थे....

जया बुआ सारे भाई बहनो में सबसे छोटी थी पर एक वही थी जिसने विवाह के बाद से शायद कभी सुख नहीं देखा था.

विवाह के तुरंत बाद देवर ने सारा व्यापार हड़प कर घर से बेदखल कर दिया था.

तबसे फ़ूफा जी की मानसिक हालत बहुत अच्छी नहीं थी. मामूली सी नौकरी कर थोड़ा बहुत कमाते थे .

बेहद मुश्किल से बुआ घर चलाती थी.

इकलौते बेटे श्याम को भी मोहल्ले के साधारण से स्कूल में डाल रखा था. बस एक उम्मीद सी लेकर बुआ जी किसी तरह जिये जा रहीं थीं...

जया बुआ के भेजे लिफ़ाफ़े को देखकर पापा कुछ सोचने लगे थे...

"गायत्री इस बार रक्षाबंधन के दिन हम सब सुबह वाली पैसेंजर ट्रेन से जया के घर रोहतास (बिहार )उसे बगैर बताए जाएंगे...

"जया दीदी के घर..!!

मम्मी तो पापा की बात पर एकदम से चौंक गयी थी...

"आप को पता है न कि उनके घर मे कितनी तंगी है...

हम तीन लोगों का नास्ता-खाना भी जया दीदी के लिए कितना भारी हो जाएगा....वो कैसे सबकुछ मैनेज कर पाएगी.

पर पापा की खामोशी बता रहीं थीं उन्होंने जया बुआ के घर जाने का मन बना लिया है और घर मे ये सब को पता था कि पापा के निश्चय को बदलना बेहद मुश्किल होता है...

रक्षाबंधन के दिन सुबह वाली धनबाद टू डेहरी ऑन सोन पैसेंजर से हम सब रोहतास पहुँच गए थे.

बुआ घर के बाहर बने बरामदे में लगी नल के नीचे कपड़े धो रहीं थीं....

बुआ उम्र में सबसे छोटी थी पर तंग हाली और रोज की चिंता फिक्र ने उसे सबसे उम्रदराज बना दिया था....

एकदम पतली दुबली कमजोर सी काया. इतनी कम उम्र में चेहरे की त्वचा पर सिलवटें साफ़ दिख रहीं थीं...

बुआ की शादी का फोटो एल्बम मैंने कई बार देखा था. शादी में बुआ की खूबसूरती का कोई ज़वाब नहीं था. शादी के बाद के ग्यारह वर्षो की परेशानियों ने बुआ जी को कितना बदल दिया था.

बेहद पुरानी घिसी सी साड़ी में बुआ को दूर से ही पापा मम्मी कुछ क्षण देखे जा रहे थे...

पापा की आंखे डब डबा सी गयी थी.

हम सब पर नजर पड़ते ही बुआ जी एकदम चौंक गयी थी.

उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि वो कैसे और क्या प्रतिक्रिया दे.

अपने बिखरे बालों को सम्भाले या अस्त व्यस्त पड़े घर को दुरुस्त करे.उसके घर तो बर्षों से कोई मेहमान नहीं आया था...

वो तो जैसे जमाने पहले भूल चुकी थी कि मेहमानों को घर के अंदर आने को कैसे कहा जाता है...

बुआ जी के बारे मे सब बताते है कि बचपन से उन्हें साफ सफ़ाई और सजने सँवरने का बेहद शौक रहा था....

पर आज दिख रहा था कि अभाव और चिंता कैसे इंसान को अंदर से दीमक की तरह खा जाती है...

अक्सर बुआ जी को छोटी मोटी जरुरतों के लिए कभी किसी के सामने तो कभी किसी के सामने हाथ फैलाना होता था...

हालात ये हो गए थे कि ज्यादातर रिश्तेदार उनका फोन उठाना बंद कर चुके थे.....

एक बस पापा ही थे जो अपनी सीमित तनख्वाह के बावजूद कुछ न कुछ बुआ को दिया करते थे...

पापा ने आगे बढ़कर सहम सी गयी अपनी बहन को गले से लगा लिया था.....

"भैया भाभी मन्नू तुम सब अचानक आज ?

सब ठीक है न...?

बुआ ने कांपती सी आवाज में पूछा था...

"आज वर्षों बाद मन हुआ राखी में तुम्हारे घर आने का..

तो बस आ गए हम सब...

पापा ने बुआ को सहज करते हुए कहा था.....

"भाभी आओ न अंदर....

मैं चाय नास्ता लेकर आती हूं...

जया बुआ ने मम्मी के हाथों को अपनी ठण्डी हथेलियों में लेते हुए कहा था.

"जया तुम बस बैठो मेरे पास. चाय नास्ता गायत्री देख लेगी."

हमलोग बुआ जी के घर जाते समय रास्ते मे रूककर बहुत सारी मिठाइयाँ और नमकीन ले गए थे......

मम्मी किचन में जाकर सबके लिए प्लेट लगाने लगी थी...

उधर बुआ कमरे में पुरानी फटी चादर बिछे खटिया पर अपने भैया के पास बैठी थीं....

बुआ जी का बेटा श्याम दोड़ कर फ़ूफा जी को बुला लाया था.

राखी बांधने का मुहूर्त शाम सात बजे तक का था.मम्मी अपनी ननद को लेकर मॉल चली गयी थी सबके लिए नए ड्रेसेस खरीदने और बुआ जी के घर के लिए किराने का सामान लेने के लिए....

शाम होते होते पूरे घर का हुलिया बदल गया था

नए पर्दे, बिस्तर पर नई चादर, रंग बिरंगे डोर मेट, और सारा परिवार नए ड्रेसेस पहनकर जंच रहा था.

न जाने कितने सालों बाद आज जया बुआ की रसोई का भंडार घर लबालब भरा हुआ था....

धीरे धीरे एक आत्म विश्वास सा लौटता दिख रहा था बुआ के चेहरे पर....

पर सच तो ये था कि उसे अभी भी सब कुछ स्वप्न सा लग रहा था....

बुआ जी ने थाली में राखियाँ सज़ा ली थी

मिठाई का डब्बा रख लिया था

जैसे ही पापा को तिलक करने लगी पापा ने बुआ को रुकने को कहा.

सभी आश्चर्यचकित थे...

" दस मिनट रुक जाओ तुम्हारी दूसरी बहनें भी बस पहुँचने वाली है. "

पापा ने मुस्कुराते हुए कहा तो सभी पापा को देखते रह गए....

तभी बाहर दरवाजे पर गाड़ियां के हॉर्न की आवाज सुनकर बुआ ,मम्मी और फ़ूफ़ा जी दोड़ कर बाहर आए तो तीनों बुआ का पूरा परिवार सामने था....

जया बुआ का घर मेहमानों से खचाखच भर गया था.

महराजगंज वाली नीलम बुआ बताने लगी कि कुछ समय पहले उन्होंने पापा को कहा था कि क्यों न सब मिलकर चारो धाम की यात्रा पर निकलते है...

बस पापा ने उस दिन तीनों बहनो को फोन किया कि अब चार धाम की यात्रा का समय आ गया है..

पापा की बात पर तीनों बुआ सहमत थी और सबने तय किया था कि इस बार जया के घर सब जमा होंगे और थोड़े थोड़े पैसे मिलाकर उसकी सहायता करेंगे.

जया बुआ तो बस एकटक अपनी बहनों और भाई के परिवार को देखे जा रहीं थीं....

कितना बड़ा सरप्राइस दिया था आज सबने उसे...

सारी बहनो से वो गले मिलती जा रहीं थीं...

सबने पापा को राखी बांधी....

ऐसा रक्षाबन्धन शायद पहली बार था सबके लिए...

रात एक बड़े रेस्त्रां में हम सभी ने डिनर किया....

फिर गप्पे करते जाने कब काफी रात हो चुकी थी....

अभी भी जया बुआ ज्यादा बोल नहीं रहीं थीं.

वो तो बस बीच बीच में छलक आते अपने आंसू पोंछ लेती थी.

बीच आंगन में ही सब चादर बिछा कर लेट गए थे...

जया बुआ पापा से किसी छोटी बच्ची की तरह चिपकी हुई थी...

मानो इस प्यार और दुलार का उसे वर्षों से इन्तेज़ार था.

बातें करते करते अचानक पापा को बुआ का शरीर एकदम ठंडा सा लगा तो पापा घबरा गए थे...

सारे लोग जाग गए पर जया बुआ हमेशा के लिए सो गयी थी....

पापा की गोद में एक बच्ची की तरह लेटे लेटे वो विदा हो चुकी ..

पता नही कितने दिनों से बीमार थीं....

और आज तक किसी से कही भी नही थीं...

आज सबसे मिलने का ही आशा लिये जिन्दा थीं शायद...!!😥😥😥😥😩

27/07/2024

पत्नी है तो दुनिया में सब कुछ है। राजा की तरह जीने और आज दुनिया में अपना सिर ऊंचा रखने के लिए अपनी पत्नी का शुक्रिया अदा कीजिए। आपकी सुविधा-असुविधा, आपके बिना कारण के क्रोध को संभालती है। तुम्हारे सुख से सुखी है और तुम्हारे दुःख से दुःखी है। आप रविवार को देर से बिस्तर पर रहते हैं लेकिन इसका कोई रविवार या त्योहार नहीं होता है। चाय लाओ, पानी लाओ, खाना लाओ। ये ऐसा है और वो ऐसा है। कब अक्कल आएगी तुम्हें? ऐसे ताने हम मारते हैं। उसके पास बुद्धि है और केवल उसी के कारण तो आप जीवित हैं। वरना दुनिया में आपको कोई भी नहीं पूछेगा।

अब जरा इस स्थिति की सिर्फ कल्पना करें:
एक दिन *पत्नी* अचानक रात को गुजर जाती है!
घर में रोने की आवाज आ रही है। पत्नी का *अंतिम दर्शन* चल रहा था। उस वक्त पत्नी की आत्मा जाते-जाते जो कह रही है, उसका वर्णन:

"मैं अभी जा रही हूँ, अब फिर कभी नहीं मिलेंगे। जिस दिन शादी के फेरे लिए थे, उस वक्त साथ-साथ जीने का वचन दिया था, पर अब अकेले जाना पड़ रहा है, यह मुझको पता नहीं था। मुझे जाने दो। अपने आंगन में अपना शरीर छोड़ कर जा रही हूँ। बहुत दर्द हो रहा है मुझे, लेकिन मैं मजबूर हूँ, अब मैं जा रही हूँ। मेरा मन नहीं मान रहा, पर अब मैं कुछ नहीं कर सकती। मुझे जाने दो।

बेटा और बहू रो रहे हैं, देखो। मैं ऐसा नहीं देख सकती और उनको दिलासा भी नहीं दे सकती हूँ। पोता 'बा बा बा' कर रहा है, उसे शांत करो, बिल्कुल ध्यान नहीं दे रहे हो। हाँ, और आप भी मन मजबूत रखना और बिल्कुल ढीले न होना। मुझे जाने दो।

अभी बेटी ससुराल से आएगी और मेरा मृत शरीर देखकर बहुत रोएगी। उसे संभालना और शांत करना। और आप भी बिल्कुल नहीं रोना। मुझे जाने दो। जिसका जन्म हुआ है, उसकी मृत्यु निश्चित है। जो भी इस दुनिया में आया है, वह यहाँ से ऊपर गया है। धीरे-धीरे मुझे भूल जाना, मुझे बहुत याद नहीं करना। और इस जीवन में फिर से काम में डूब जाना। अब मेरे बिना जीवन जीने की आदत जल्दी से डाल लेना। मुझे जाने दो।

आपने इस जीवन में मेरा कहा कभी नहीं माना है। अब जिद छोड़कर व्यवहार में विनम्र रहना। आपको अकेला छोड़कर जाते हुए मुझे बहुत चिंता हो रही है, लेकिन मैं मजबूर हूँ। मुझे जाने दो।

आपको BP और डायबिटीज है। गलती से भी मीठा नहीं खाना, अन्यथा परेशानी होगी। सुबह उठते ही दवा लेना न भूलना। चाय अगर आपको देर से मिलती है तो बहू पर गुस्सा न करना। अब मैं नहीं हूँ, यह समझकर जीना सीख लेना। मुझे जाने दो।

बेटा और बहू कुछ बोले तो चुपचाप सब सुन लेना। कभी गुस्सा नहीं करना। हमेशा मुस्कुराते रहना, कभी उदास नहीं होना। मुझे जाने दो। अपने बेटे के बेटे के साथ खेलना। अपने दोस्तों के साथ समय बिताना। अब थोड़ा धार्मिक जीवन जीएं ताकि जीवन को संयमित किया जा सके। अगर मेरी याद आये तो चुपचाप रो लेना लेकिन कभी कमजोर नहीं होना। मुझे जाने दो।

मेरा रूमाल कहां है, मेरी चाबी कहां है, अब ऐसे चिल्लाना नहीं। सब कुछ ध्यान से रखने और याद रखने की आदत डालना। सुबह और शाम नियमित रूप से दवा ले लेना। अगर बहू भूल जाये तो सामने से याद कर लेना। जो भी खाने को मिले, प्यार से खा लेना और गुस्सा नहीं करना। मेरी अनुपस्थिति खलेगी, पर कमजोर नहीं होना। मुझे जाने दो।

बुढ़ापे की छड़ी भूलना नहीं और धीरे-धीरे चलना। यदि बीमार हो गए और बिस्तर में लेट गए तो किसी को भी सेवा करना पसंद नहीं आएगा। मुझे जाने दो। शाम को बिस्तर पर जाने से पहले एक लोटा पानी मांग लेना। प्यास लगे तो ही पानी पी लेना। अगर आपको रात को उठना पड़े तो अंधेरे में कुछ लगे नहीं, इसका ध्यान रखना। मुझे जाने दो।

शादी के बाद हम बहुत प्यार से साथ रहे। परिवार में फूल जैसे बच्चे दिए। अब उस फूलों की सुगंध मुझे नहीं मिलेगी। मुझे जाने दो। उठो, सुबह हो गई, अब ऐसा कोई नहीं कहेगा। अब अपने आप उठने की आदत डाल लेना, किसी की प्रतीक्षा नहीं करना। मुझे जाने दो।

और हाँ, एक बात तुमसे छिपाई है, मुझे माफ कर देना। आपको बिना बताए बाजू की पोस्ट ऑफिस में बचत खाता खुलवाकर 14 लाख रुपये जमा किये हैं। मेरी दादी ने सिखाया था। एक-एक रुपया जमा करके कोने में रख दिया। इसमें से पाँच-पाँच लाख बहू और बेटी को देना और अपने खाते में चार लाख रखना अपने लिए। मुझे जाने दो।

भगवान की भक्ति और पूजा करना भूलना नहीं। अब फिर कभी नहीं मिलेंगे! मुझसे कोई भी गलती हुई हो तो मुझे माफ कर देना।"

इस आत्मीय संदेश में पत्नी की भावनाएं और उसकी देखभाल की जिम्मेदारी को दर्शाया गया है, जो उसके जाने के बाद भी परिवार को संभालने का संदेश देती है।* मनोज कुमार*

मनोहर जी जल्दी-जल्दी बिस्तर पर छूट गई पेशाब को साफ करने में लगे थे ताकि बहू-बेटा ना देख लें। कल ही तो बहू काजल ने नई चाद...
26/07/2024

मनोहर जी जल्दी-जल्दी बिस्तर पर छूट गई पेशाब को साफ करने में लगे थे ताकि बहू-बेटा ना देख लें। कल ही तो बहू काजल ने नई चादर बिछाई थी और बेटे रवि को सुनाया था कि अगर पापा जी ने फिर से चादर खराब की, तो वह नहीं साफ करेगी, भले ही घर छोड़ना पड़े। मनोहर जी को किडनी की समस्या के चलते ऐसा कभी-कभी हो जाता है। बेचारे मनोहर जी को अफसोस भी बहुत होता था।

जल्दी से चादर हटाकर मनोहर जी बाथरूम में उसे धोने लगे, यह सोचकर कि बहू आज बेटे के साथ अपने भाई की शादी के कपड़े लेने गई है, तो देर से लौटेगी। भूख भी लग रही थी, पर मन का डर उनके हाथों को तेजी से काम करने को कह रहा था। चादर भीगने के बाद उठाई नहीं जा रही थी, और उनकी सांसें फूलने लगीं। तभी उन्होंने सामने अचानक बेटे-बहू को खड़ा पाया। वे बस इतना बोले, "बहू, अब नहीं होगा... मैंने साफ कर दी है।"

बेटे रवि ने अपने पिता को सहारा देकर कुर्सी पर बैठाया। बहू ने नाराजगी से कहा, "देख लो, फिर तुम्हारे पिता ने बिस्तर खराब कर दिया। कितनी बदबू आ रही है। इन्हें अस्पताल में भर्ती करवाओ।" रवि ने बहू को शांत करते हुए कहा, "तुम अपने मायके जा सकती हो। उस बाप को कैसे छोड़ सकता हूँ, जिसने मेरी पैंट तक साफ की थी जब मैं कच्छे में पोटी कर देता था। उस बाप का पेशाब नहीं साफ होगा, जिसकी यूनिफॉर्म पर मैंने उस दिन टॉयलेट कर दी थी जब पिता जी अपने सम्मान समारोह में जा रहे थे।"

रवि ने अपने पिता को संभालते हुए कहा, "चलिये पापा, आप कितने गीले हो गए हैं। ठंड लग जाएगी। आपके लिए चाय बनाता हूँ।" बेटे ने दीवान से नई चादर निकालकर बिस्तर पर बिछाई, मनोहर जी को बैठाया, उनके कपड़े बदले और अपने हाथों से चाय पिलाने लगा। मनोहर जी के कंपकंपाते हाथ बेटे के सिर पर आशीर्वाद देने के लिए आ गए। उनकी आँखों से आँसू बह निकले, जिन्हें वे धोती के कोने से पोंछते जा रहे थे। उन्होंने अपनी पत्नी की तस्वीर को देख मन ही मन कहा, "देख ले विमला, तू कहती थी मैं चला जाऊंगा तो कौन ख्याल रखेगा मेरा। हमारा रवि देख कैसे तेरे बुढ़ऊँ की सेवा कर रहा है।"

दरवाजे पर खड़ी बहू काजल भी पश्चाताप के आँसू बहा रही थी। इस घटना ने उसे अहसास दिलाया कि परिवार का हर सदस्य, चाहे कितना भी कमजोर क्यों ना हो, अपने स्नेह और सम्मान के हकदार होते हैं। * मनोज कुमार*

उसका काला टीका किसी सुदर्शन चक्र से कम नहींमाँ एक ऊंगली काजल से सारी बलायें टाल देती है.!
12/02/2024

उसका काला टीका किसी सुदर्शन चक्र से कम नहीं

माँ एक ऊंगली काजल से सारी बलायें टाल देती है.!

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