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01/03/2021

~केतु{ Dragon Tail}

वैदिक ज्योतिष में केतु ग्रह बहुत ही महत्व रखता है। केतु (Ketu) को ज्योतिष में छाया ग्रह माना जाता है। इस लेख में हम राहु ग्रह के ज्योतिषीय महत्व के साथ ही इसके पौराणिक मान्यता के बारे में जानेंगे। लेख में केतु यंत्र, मंत्र, जड़, रत्न के बारे में भी बताया जाएगा। जो आपके लिए काफी लाभदायक साबित होगा। तो आइये जानते हैं केतु ग्रह के बारे में -

केतु ग्रह का देखा जाए तो खगोलीय दृष्टि के कोई अस्तित्व नहीं हैं। वैदिक ज्योतिष में ही इस ग्रह की उपस्थिति को बतलाया गया है। वो भी एक छाया ग्रह ग्रह के रुप में जो स्थिति व अपने साथ बैठे ग्रह के अनुरूप फल देता है। केतु कुंडली में किस भाव में बैठा है। यह इसके परिणाम पर काफी प्रभाव डालता है। कुछ भाव ऐसे भी हैं जिनमें केतु का होना शुभ परिणाम तो कुछ में नकारात्मक परिणाम देता है। इसलिए ज्योतिष में इसका महत्व और भी बढ़ जाता है।
केतु ग्रह को वैदिक ज्योतिष में एक अशुभ ग्रह माना जाता है, लेकिन ऐसा नहीं है कि केतु हमेशा जातक को बुरे ही फल देता है। ज्योतिषियों की माने तो केतु ग्रह से जातक को शुभ फल भी प्राप्त होते हैं। वैदिक ज्योतिष में केतु को आध्यात्म, वैराग्य, मोक्ष तथा तांत्रिक विद्या कारक माना गया है। ज्योतिष में केतु (Ketu) को किसी भी राशि का स्वामित्व प्राप्त नहीं है। लेकिन धनु केतु की उच्च राशि है, जबकि मिथनु में यह नीच भाव में होता है।
वैदिक ज्योतिष में मान्य 27 नक्षत्रों में से केतु अश्विनी, मघा और मूल नक्षत्र का स्वामी है। यह एक अशुभ ग्रह है। वैदिक शास्त्रों के अनुसार केतु ग्रह स्वरभानु राक्षस का धड़ है। जबकि इसके सिर के भाग को राहु कहते हैं। ज्योतिष की माने तो राहु और केतु दोनों किसी जातक की जन्म कुण्डली में काल सर्प दोष का निर्माण करने का कारक होते हैं, तो वहीं दिशाओं में केतु (Ketu) का प्रभाव वायव्य कोण में माना गया है।

सबसे पहले बात करते हैं शरीर संरचना व गुण – अवगुण की। जातक में केतु (Ketu) अग्नि तत्व का प्रतिनिधित्व करता है। केतु के कारण ही जातक का स्वभाव कठोर होता है। जातक त्वरीत आक्रोशित हो जाता है। ज्योतिष शास्त्र में केतु ग्रह का कोई निश्चित राशि नहीं बताया गया है। इसलिए केतु जिस भी राशि में विराजता है वह उसी के अनुसार जातक को परिणाम देता है। इसलिए ज्योतिष के मुताबिक जातक की कुंडली में केतु का प्रथम भाव अथवा लग्न में विराजना व उसका परिणाम उस भाव स्थित राशि प्रभावित करती है। हालाँकि कुछ ज्योतिषियों का मानना है कि लग्न का केतु जातक को स्वाभाव से साधू बनाता है व आध्यात्म की ओर ले जाता है। जातक सांसारिक सुखों से दूर हो जाता है।
यदि किसी जातक की कुंडली में केतु तीसरे, पांचवें, छठवें, नवें एवं दसवें भाव में विराजमान हो तो जातक को इसके शुभ परिणाम प्राप्त होते हैं। अगर जातक की कुंडली में केतु गुरु ग्रह के साथ युति बनाता है तो जातक इसके प्रभाव से राजा के सामान जीवनयापन करने में सक्षम बनता है। यदि यही युति मंगल के साथ केतु की हो तो जातक को यह साहस प्रदान करती है।

कुंडली में केतु (Ketu) के कमजोर होने पर जातक को कई प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इसमें जातक आवेश व गुस्से वाला हो जाता है। जातक का कार्य आसानी से सिद्ध नहीं हो पाता, उसे छोटे से छोटे कार्यों को भी पूरा करने के लिए जरूरत से ज्यादा परिश्रम करना पड़ता है। जातक के सामने अचानक से कोई न कोई बाधा आ जाती है। कुंडली में राहु-केतु की स्थिति कालसर्प दोष निर्माण करती है, जो वैदिक ज्योतिष में घातक दोष माना जाता है।
केतु ग्रह की पौराणिक मान्यता की बात करें तो इसका संबंध समुंद्र मंथन है। स्वरभानु नाम के राक्षस का धड़ है केतु ग्रह, कथा के अनुसार अमृत पान करने के कारण नारायण ने इनका सुदर्शन चक्र से सिर काट दिया था, जिसके बाद एक सिर का नाम राहु व धड़ का नाम केतु पड़ा। इसके पिछे सुर्य व चंद्र थे जिसके चलते ये दोनों मिलकर सूर्य व चंद्र को ग्रहण लगाते हैं ऐसा माना जाता है।

यंत्र - केतु यंत्र
मंत्र - ओम स्रां स्रीं स्रौं सः केतवे नमः
जड़ी - अश्वगंधा की जड़
रत्न - लहसुनिया
रंग – भूरा
उपाय - केतु के अशुभ प्रभाव से बचने के लिए जातकों को केतु ग्रह की शांति के उपाय करने चाहिए। इसके अलावा जातक केतु (Ketu) यंत्र व मंत्र का भी उपयोग कर सकता है।

-Astro Shastri

25/02/2021

राहू कि महादशा में नवग्रहों कि अंतर्दशाओं का फल एवं उपाय

राहु की महादशा में नवग्रहों की अंतर्दशाओं का फल एवं उपाय राहु मूलतः छाया ग्रह है, फिर भी उसे एक पूर्ण ग्रह के समान ही माना जाता है। यह आद्र्रा, स्वाति एवं शतभिषा नक्षत्र का स्वामी है। राहु की दृष्टि कुंडली के पंचम, सप्तम और नवम भाव पर पड़ती है। जिन भावों पर राहु की दृष्टि का प्रभाव पड़ता है, वे राहु की महादशा में अवश्य प्रभावित होते हैं।

राहु की महादशा 18 वर्ष की होती है। राहु में राहु की अंतर्दशा का काल 2 वर्ष 8 माह और 12 दिन का होता है। इस अवधि में राहु की महादशा से प्रभावित जातक को अपमान और बदनामी का सामना करना पड़ सकता है। विष और जल के कारण पीड़ा हो सकती है। विषाक्त भोजन, से स्वास्थ्य प्रभावित हो सकता है।

इसके अतिरिक्त अपच, सर्पदंश, परस्त्री या पर पुरुष गमन की आशंका भी इस अवधि में बनी रहती है। अशुभ राहु की इस अवधि में जातक के किसी प्रिय से वियोग, समाज में अपयश, निंदा आदि की संभावना भी रहती है। किसी दुष्ट व्यक्ति के कारण उस परेशानियों का भी सामना करना पड़ सकता है। उपाय: भगवान शिव के रौद्र अवतार भगवान भैरव के मंदिर में रविवार को शराब चढ़ाएं और तेल का दीपक जलाएं। शराब का सेवन कतई न करें। लावारिस शव के दाह-संस्कार के लिए शमशान में लकड़िया दान करें।

अप्रिय वचनों का प्रयोग न करें। राहु में बृहस्पति: राहु की महादशा में गुरु की अंतर्दशा की यह अवधि दो वर्ष चार माह और 24 दिन की होती है। राक्षस प्रवृत्ति के ग्रह राहु और देवताओं के गुरु बृहस्पति का यह संयोग सुखदायी होता है। जातक के मन में श्रेष्ठ विचारों का संचार होता है और उसका शरीर स्वस्थ रहता है। धार्मिक कार्यों में उसका मन लगता है। यदि कुंडली में गुरु अशुभ प्रभाव में हो, राहु के साथ या उसकी दृष्टि में हो तो उक्त फल का अभाव रहता है। ऐसी स्थिति में निम्नांकित उपाय करने चाहिए। किसी अपंग छात्र की पढ़ाई या इलाज में सहायता करें। शैक्षणिक संस्था के शौचालयों की सफाई की व्यवस्था कराएं।

शिव मंदिर में नित्य झाड़ू लगाएं। पीले रंग के फूलों से शिव पूजन करें। राहु में शनि: राहु में शनि की अंतदर्शा का काल 2 वर्ष 10 माह और 6 दिन का होता है। इस अवधि में परिवार में कलह की स्थिति बनती है। तलाक भाई, बहन और संतान से अनबन, नौकरी में या अधीनस्थ नौकर से संकट की संभावना रहती है। शरीर में अचानक चोट या दुर्घटना के दुर्योग, कुसंगति आदि की संभावना भी रहती है। साथ ही वात और पित्त जनित रोग भी हो सकता है।

दो अशुभ ग्रहों की दशा-अंतर्दशा कष्ट कारक हो सकती है। इससे बचने के लिए निम्न उपाय अवश्य करने चाहिए। भगवान शिव की शमी के पत्रों से पूजा और शिव सहस्रनाम का पाठ करना चाहिए। महामृत्युंजय मंत्र के जप स्वयं, अथवा किसी योग्य विद्वान ब्राह्मण से कराएं। जप के पश्चात् दशांश हवन कराएं जिसमें जायफल की आहुतियां अवश्य दें।

नवचंडी का पूर्ण अनुष्ठान करते हुए पाठ एवं हवन कराएं। काले तिल से शिव का पूजन करें। राहु में बुध: राहु की महादशा में बुध की अंतर्दशा की अवधि 2 वर्ष 3 माह और 6 दिन की होती है। इस समय धन और पुत्र की प्राप्ति के योग बनते हैं। राहु और बुध की मित्रता के कारण मित्रों का सहयोग प्राप्त होता है। साथ ही कार्य कौशल और चतुराई में वृद्धि होती है। व्यापार का विस्तार होता है और मान, सम्मान यश और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। उपाय: भगवान गणेश को शतनाम सहित दूर्वाकुंर चढ़ाते रहें। हाथी को हरे पत्ते, नारियल गोले या गुड़ खिलाएं। कोढ़ी, रोगी और अपंग को खाना खिलाएं। पक्षी को हरी मूंग खिलाएं।

राहु में केतु: राहु की महादशा में केतु की यह अवधि शुभ फल नहीं देती है। एक वर्ष और 18 दिन की इस अवधि के दौरान जातक को सिर में रोग, ज्वर, शत्रुओं से परेशानी, शस्त्रों से घात, अग्नि से हानि, शारीरिक पीड़ा आदि का सामना करना पड़ता है। रिश्तेदारों और मित्रों से परेशानियां व परिवार में क्लेश भी हो सकता है। उपाय: भैरवजी के मंदिर में ध्वजा चढ़ाएं। कुत्तों को रोटी, ब्रेड या बिस्कुट खिलाएं। कौओं को खीर-पूरी खिलाएं। घर या मंदिर में गुग्गुल का धूप करें। राहु में शुक्र: राहु की महादशा में शुक्र की प्रत्यंतर दशा पूरे तीन वर्ष चलती है। इस अवधि में शुभ स्थिति में दाम्पत्य जीवन में सुख मिलता है।

वाहन और भूमि की प्राप्ति तथा भोग-विलास के योग बनते हैं। यदि शुक्र और राहु शुभ नहीं हों तो शीत संबंधित रोग, बदनामी और विरोध का सामना करना पड़ सकता है। इस अवधि में अनुकूलता और शुभत्व की प्राप्ति के लिए निम्न उपाय करें- सांड को गुड़ या घास खिलाएं। शिव मंदिर में स्थित नंदी की पूजा करें और वस्त्र आदि दें।

एकाक्षी श्रीफल की स्थापना कर पूजा करें। स्फटिक की माला धारण करें। राहु में सूर्य: राहु की महादशा में सूर्य की अंतर्दशा की अवधि 10 माह और 24 दिन की होती है, जो अन्य ग्रहों की तुलना में सर्वाधिक कम है। इस अवधि में शत्रुओं से संकट, शस्त्र से घात, अग्नि और विष से हानि, आंखों में रोग, राज्य या शासन से भय, परिवार में कलह आदि हो सकते हैं। सामान्यतः यह समय अशुभ प्रभाव देने वाला ही होता है। उपाय: इस अवधि में सूर्य को अघ्र्य दें।

उनका पूजन एवं उनके मंत्र का नित्य जप करें। हरिवंश पुराण का पाठ या श्रवण करते रहें। चाक्षुषोपनिषद् का पाठ करें। सूअर को मसूर की दाल खिलाएं। राहु में चंद्र: एक वर्ष 6 माह की इस अवधि में जातक को असीम मानसिक कष्ट होता है। इस अवधि में जीवन साथी से अनबन, तलाक या मृत्यु भी हो सकती है। लोगों से मतांतर, आकस्मिक संकट एवं जल जनित पीड़ा की संभावना भी रहती है। इसके अतिरिक्त पशु या कृषि की हानि, धन का नाश, संतान को कष्ट और मृत्युतुल्य पीड़ा भी हो सकती है। उपाय: राहु और चंद्र की दशा में उत्पन्न होने वाली विषम परिस्थितियों से बचने के लिए माता की सेवा करें।

माता की उम्र वाली महिलाओं का सम्मान और सेवा करें। प्रत्येक सोमवार को भगवान शिव का शुद्ध दूध से अभिषेक करें। चांदी की प्रतिमा या कोई अन्य वस्तु मौसी, बुआ या बड़ी बहन को भेंट करें। राहु में मंगल: राहु की महादशा में मंगल की अंतर्दशा का यह समय एक वर्ष 18 दिन का होता है। इस काल में शासन व अग्नि से भय, चोरी, अस्त्र शस्त्र से चोट, शारीरिक पीड़ा, गंभीर रोग, नेत्रों को पीड़ा आदि हो सकते हंै। इस अवधि में पद एवं स्थान परिवर्तन तथा भाई को या भाई से पीड़ा की संभावना भी रहती है।

किसी भी जातक को राहु अथवा केतु की दशा-अंतर्दशा का फल कुंडली में उसकी स्थितियों, भावों एवं अन्य ग्रहों के संबंधों पर निर्भर करता है। राहु जब शुभ प्रभाव में हो तो अपनी दशा में जातक की भलाई, धन एवं यश की वृद्धि करता है जबकि शुभ प्रभावों में होने पर विभिन्न रोग, संकट एवं शत्रुता देता है। राहु उच्च राशि का हो तो जातक को उच्च पद की प्राप्ति होती है। वह अत्यंत साहसी होता है और उसे मित्रों का सहयोग, स्त्री, पुत्र तथा भाइयों से सुख और यात्रा के अवसर आदि प्राप्त होते हैं। किंतु साथ ही वह बवासीर और सिर दर्द से ग्रस्त तथा अधर्म के प्रति प्रवृत्त होता है। जब राहु नीच राशि का होता है तो जातक को छाती में पीड़ा, शत्रु, अग्नि तथा, शस्त्र का भय और चोटों से हानि होती है।

उसके मित्रों तथा बांधवों का पतन होता है और वह स्वयं शासक वर्ग के कोप का शिकार होता है। इसके अतिरिक्त उसके माता-पिता, स्त्री, संतान, दादा-दादी, नाना-नानी का स्वास्थ्य खराब रहता है और उनकी मृत्यु की संभावना भी रहती है। राहु से युक्त ग्रह बलवान भी हांे तो उसकी दशा में अरिष्ट होता है और दशा के अंत में दुःख, हानि तथा परदेश गमन होता है।

केतु के शुभ प्रभाव में जातक को सर्वत्र विजय मिलती है। क्रूर कार्य करने से या म्लेच्छ राजा से धन की प्राप्ति होती है और शत्रु का नाश होता है। इसके विपरीत यदि केतु पाप प्रभाव में हो तो अत्यधिक कष्ट मिलता है। उसे कार्यों में असफलता शूलरोग, हड्डियों में ज्वर आदि से ग्रस्त होता है। वह ब्राह्मणों से द्वेष रखता है तथा उसका व्यवहार मूर्खतापूर्ण होता है। केतु उच्च का हो तो जातक अत्यधिक साहसी होता है। उसे कार्यों में सफलता तथा उच्च पद की प्राप्ति होती है। उसकी धर्म के प्रति निष्ठा होती है और वह यदा-कदा तीर्थ यात्रा करता है। उसे महात्माओं के दर्शन होते हंै। यदि केतु अच्छे स्थान में स्थित हो तो मनुष्य को मोक्ष भी देता है। यदि केतु नीच का हो तो स्वजन, भाई, चोर, वनपशु, मित्रों तथा बंधु बांधवों के कारण हानि होती है।

इसके अतिरिक्त जातक संग्रहणी, फोड़ा-फंुसी आदि से पीड़ित होता है और उसे कारावास का दंड भी भोगना पड़ता है। महादशा एवं अंतर्दशाओं का फलादेश: राहु का दशाफल: राहु की महादशा में जातक दुःस्वभावी हो जाता है। उसमें सुशीलता नहीं रहती। किसी भयंकर बीमारी के कारण उसे पीड़ा भी होती है। उसकी पत्नी तथा पुत्र को कष्ट होता है और उसे विष से पीड़ा और शासक वर्ग से हानि होती है। पीड़ा होती है। राहु की महादशा में मंगल की अंतर्दशा में जातक को शत्रु, शस्त्र, अग्नि तथा चोरों का भय निरंतर बना रहता है।

उसे अन्य अनेक प्रकार के कष्ट भी प्राप्त होते हैं। राहु की महादशा में सूर्य की अंतर्दशा हो तो जातक को रोग, शस्त्र, चोर, अग्नि और राजा से भय और उसके धन का नाश होता है। राहु की महादशा में राहु की अंतर्दशा हो तो जातक के भाई या पिता की मृत्यु, धन का नाश आदि होते है। साथ ही, वह रोगग्रस्त होता है और उसकी प्रतिष्ठा धूमिल होती है। राहु की महादशा में चंद्र की अंतर्दशा हो तो जातक को कलह, धन की हानि, बंधु बांधवों के विरोध तथा अन्य अनेक प्रकार के कष्टों का सामना करना पड़ता है। किंतु इस दशा में उसे स्त्री का सुख प्राप्त होता है। राहु की महादशा में शुक्र की अंतर्दशा हो तो जातक को मित्र के कारण संताप, भाई बंधुओं से कलह एवं कष्ट भोगना पड़ता है।

किंतु इस दशा के दौरान उसे स्त्री सुख तथा धन की प्राप्ति होती है। राहु की महादशा में बुध की अंतर्दशा हो तो जातक का मित्र एवं भ्राताओं के साथ स्नेह बढ़ता है। बुद्धि, धन तथा सुख की वृद्धि होती है, किंतु दुख भी भोगना पड़ता है। राहु की महादशा में बृहस्पति की अंतर्दशा हो तो जातक देवी-देवता की पूजा और ब्राह्मणों की सेवा करने वाला, धनी तथा व्याधियों से मुक्त होता है। राहु की महादशा में केतु की अंतर्दशा हो तो जातक को अग्नि, ज्वर, शस्त्र तथा शत्रुओं से पीड़ा होती है और उसकी मृत्यु की संभावना रहती है। राहु की महादशा में शनि की अंतर्दशा हो तो जातक को रक्त-पित्त की पीड़ा, हाथ, पैर अथवा शरीर के किसी अन्य अंग के टूटने स्वजनों से कलह आदि की संभावना रहती है। केतु का दशाफल: केतु की महादशा में जातक को अनिष्ट फल का सामना करना पड़ता है। स्त्रियों तथा धनिकों, अफसरों या मालिक से उसे कष्ट मिलता है। इस दशा में उससे कोई गंभीर अपराध हो सकता है।

धन के नाश होने के साथ-साथ ऐसी परिस्थिति बन सकती है कि उसे अपना घर और देश तक छोड़ना पड़। उसे कफ जनित रोग अथवा पैर तथा दांत में कष्ट भी हो सकता है। केतु की महादशा में बुध की अंतर्दशा हो तो जातक को भाई-बंधुओं का स्नेह सुख, बुद्धि लाभ, धन लाभ आदि की प्राप्ति होती है। इस दशा में उसे किसी भी प्रकार का कष्ट नहीं उठाना पड़ता। केतु की महादशा में शनि की अंतर्दशा हो तो जातक को स्वजनों से कलह तथा वात-पित्त की पीड़ा का शिकार होना पड़ता है। उसे परदेश गमन भी करना पड़ता है। केतु की महादशा में मंगल की अंतर्दशा हो तो जातक का अपने गांव, या मोहल्ले के लोगों से झगड़ा होता है। उसे चोट तथा देह पीड़ा का सामना भी करना पड़ता है। केतु की महादशा में केतु की अंतर्दशा हो तो जातक को पुत्र-पुत्री की मृत्यु, धन हानि, अग्नि से भय, दुष्ट स्त्रियों से कलह, रोग आदि अनेक प्रकार के संकटों का सामना करना पड़ता है।

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केतु की महादशा में सूर्य की अंतर्दशा हो तो जातक को शासक वर्ग से पीड़ा, शत्रुओं से विरोध, अग्निदाह, तीव्र ज्वर, विदेश गमन आदि कष्टों का सामना करना पड़ता है। केतु की महादशा में शुक्र की अंतर्दशा हो तो अग्नि दाह, तीव्र ज्वर, स्त्री से कलह, स्त्री वियोग आदि के दुःख भोगने पड़ते हैं और घर में कन्या का जन्म होता है। केतु की महादशा में चंद्र की अंतर्दशा हो तो जातक को धन व स्त्री का लाभ लेकिन यश की हानि होती है। इस प्रकार इस अवधि मंे शुभ एवं अशुभ दोनों प्रकार के फल प्राप्त होते हैं। केतु की महादशा में बृहस्पति की अंतर्दशा हो तो जातक का शासक वर्ग से संपर्क होता है। उसके घर में पुत्र का जन्म तथा भूमि, धन आदि का लाभ भी होता है। केतु की महादशा में राहु की अंतर्दशा हो तो जातक को चोरों का भय, शत्रुओं से विरोध तथा अन्य प्रकार के कष्टों का सामना करना पड़ता है। उसके अंग-भंग होने की आशंका बनी रहती है।

24/02/2021

~ शनि और करियर ~

शनि को ब्रह्माण्ड का बैलेंस व्हील माना जाता है अर्थात् शनि सृष्टि के संतुलन चक्र का नियामक है। क्योंकि बैलेंस शनि का मुख्य गुण है इसलिए यह बैलेंस की कारक राशि तुला में अतिप्रसन्न अर्थात् उच्चराशिस्थ होते हैं तथा व्यावसायिक जीवन में अधिक संतुलन, सुरक्षा व स्थिरता अर्थात् जाॅब सैक्यूरिटी आदि देने में समर्थ होते हैं। इसे न्याय का कारक इसलिए माना जाता है क्योंकि यह मनुष्य को उसकी गलतियों और पाप कर्मों के लिए दण्डित करके मानवता की रक्षा करता है और सृष्टि में संतुलन स्थापित करने की प्रक्रिया को स्थिरता पूर्वक गति देता रहता है। यदि जातक की जन्मकुंडली में करियर के उच्चतम शिखर पर पहंुचने के सभी शुभ योग विद्यमान हों तो यह सही है कि जातक अपने करियर में ऊंचा उठेगा लेकिन उन्नति प्राप्त होने का उसका मार्ग सरल होगा या कठिनाइयों से भरा हुआ होगा इसका सूक्ष्म विष्लेषण करने हेतु कुंडली में शनि की स्थिति का अध्ययन करना होगा। यदि कुंडली में शनि की स्थिति उत्तम हो, यह 3, 6, 10 या 11वें भाव में स्थित हो, नीचराषिस्थ व पीड़ित न हो तो आसानी से सफलता मिलेगी। नीचराषिस्थ होने की स्थिति में पूर्ण नीचभंग हो रहा हो तो भी सफलता मिल सकती है।

परंतु यदि शनि का नीचभंग नहीं हुआ या शनि शत्रुराषिस्थ व पीड़ित होकर अषुभ भाव में स्थित हुआ तो जातक की सफलता पर प्रष्न चिह्न लग जाएगा तथा विषेष योग्यता संपन्न होने के बावजूद भी उसे जीवन में कठिनाइयों व संघर्ष से जूझना पड़ेगा तथा वह साधारण जीवन जीने के लिए मजबूर हो जाएगा। शनि हमें यथार्थवादी बनाकर हमारी वास्तविक शक्तियों व योग्यताओं से अवगत करवाता है तथा हमें एकान्तप्रिय होकर निरंतर अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर करवाता है अर्थात् हमें थ्वबनेमक रखता है। कालपुरुष के अनुसार शनि को व्यवसाय के कारक दशम भाव का स्वामी माना जाता है। हमारे जीवन में स्थिरता व संतुलन का विचार दशम भाव से भी किया जाता है क्योंकि दशम भाव व्यवसाय का घर होता है और जितना हम व्यावसायिक स्तर पर सफल होते हैं उतनी ही श्रेष्ठ सफलता हमें जीवन के दूसरे क्षेत्रों में भी प्राप्त होती है।

निष्कर्षतः हम कह सकते हैं संतुलन अर्थात् बैलेंस के कारक शनि की राशि का व्यवसाय के भाव में होना उचित ही है। ग्रहों में शनि को सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। यदि यह ग्रह बलवान होकर शुभ भाव में स्थित हो तो सफलता जातक के कदम चूमती है। शनि की विशेष उत्तम स्थिति से जातक को बहुत से नौकर-चाकर, उच्च पद्वी, सŸाा व धन सम्पदा आदि सभी कुछ प्राप्त हो जाता है। शनि को सŸाा का कारक इसलिए माना जाता है क्योंकि राजनीति, कूटनीति, मंत्रीपद सभी इसी के इर्द-गिर्द घूमते हैं। यदि कुंडली में शनि लग्न में बैठा हो तो यह कालपुरुष की दशम राशि मकर को दशम दृष्टि से देखकर न केवल व्यावसायिक जीवन में सफलता की गारंटी देता है अपितु अपनी लग्नस्थ स्थिति के कारण जातक को कुशल विचारक व योजनाबद्ध तरीके से कार्य करने की योग्यता भी देता है।

बड़े-बड़े राजनीतिज्ञों, व्यापारियों, वैज्ञानिकों, तांत्रिकों व ज्योतिषियों की कुंडली में शनि की इस प्रकार की स्थिति देखी जा सकती है। यदि लग्नस्थ शनि नीच का भी हो तो भी व्यावसायिक जीवन में स्थिरता व अधिकार प्राप्ति का कारक बनता है क्योंकि वह दशम दृष्टि से अपनी राशि को देखता है और कालपुरुष के अनुसार भी दशम भाव में इसकी मकर राशि ही होती है जिसे व्यवसाय की कारक राशि माना जाता है। लग्नस्थ शनि सभी लग्नों के लिए श्रेष्ठ है यद्यपि चर लग्न के लिए शनि की लग्नस्थ स्थिति अधिक उŸाम मानी जाएगी क्योंकि चर लग्नों के जातकों में शीघ्र निर्णय लेने की क्षमता होती है जबकि शनि का गुण धैर्य व स्थिरितापूर्वक एकाग्रचित्त होकर कार्य सम्पादन करना है। इसलिए इन दोनों गुणों का सम्मिश्रण जातक को श्रेष्ठस्तरीय सफलता का सूत्र व मार्ग स्पष्ट कर देता है। यदि कर्क लग्न के शनि का विचार करें तो यह सामान्य रूप से प्रबल अकारक होता है लेकिन शुभ भाव लग्न में बैठकर यह न केवल अष्टमेश का शुभ फल देकर दीर्घायु बनाता है अपितु जातक को रिसर्च ओरिएंटड, गुप्त व कूटनीतिक योग्यताओं से सम्पन्न भी कर देता है। कर्क लग्न की अपनी यह विशेषता होती है कि इससे प्रभावित जातकों का शरीर, मन और आत्मा एकात्म समन्वित होते हैं।

लग्न से शरीर व आत्मा का विचार तो होता ही है साथ ही मन की राशि कर्क के लग्न में आ जाने से चंद्रमा का प्रभाव भी लग्न मंे आ जाएगा क्योंकि यह लग्नेश होगा इसलिए ऐसी कंुडली में लग्नस्थ शनि शरीर, मन व आत्मा तीनों को प्रभावित करेगा अर्थात् मानव को सर्वाधिक प्रभावित करने वाले ग्रह शनि का प्रभाव आपके जीवन के हर पक्ष पर सीधे रूप से पड़ेगा और फलस्वरूप आप सर्वाधिक सफलता प्राप्त करने में सक्षम होंगे तथा राजनीति के गलियारों में आपकी कुशलता का विशेष डंका बजेगा। तुला लग्न की पत्री में लग्नस्थ शनि उच्चराशिस्थ होकर चतुर्थेश व पंचमेश होकर आपको शश योग से समन्वित करके परम भाग्यशाली बना देगा तथा जीवन के हर क्षेत्र में आप सफल होंगे। ऐसा भी संभव है कि आप योग, अध्यात्म, वैराग्य, दर्शन, त्याग आदि की कठिनतम रहस्यमयी आध्यात्मिक दुनिया में प्रवेश करके संसार को चमत्कृत कर दें अथवा कोई बड़े वैज्ञानिक बनें। मकर राशि की कुंडली में लग्नेश शनि अपार धन सम्पदा से सम्पन्न बड़ा व्यापारी तो बना ही देगा साथ ही आपकी एकाग्रचित्त होकर निरंतर अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने की प्रवृŸिा को भी सुदृढ़ करेगा।

अधिकतर ऐसा देखा गया है कि दशम भावस्थ शनि चाहे किसी भी राशि का हो, जातक के जीवन में व्यावसायिक स्थिरता बनी रहती है। यदि ऐसा शनि नीच का हो तो भी जातक का कार्य चलता रहता है। नीच राशि का शनि अक्सर ज्योतिष कार्यों से या अन्य परामर्श संबंधी कार्यों से लाभान्वित कराता है। शनि का दशम भाव से संबंध होने से लोहे का व्यापार तथा तिल, तेल, खनिज पदार्थ, पेट्रोल, शराब आदि के क्रय-विक्रय से, ठेकेदारी से, दण्डाधिकारी, सरपंच अथवा मंत्री पद आदि से लाभान्वित करवा सकता है। जब शनि गोचर में उच्चराशिस्थ होता है तो समाज, देश व संसार में जगह-जगह पर न्याय व्यवस्था के समुचित रूप से स्थापित किए जाने की आवाजें उठने लगती हैं।

ऐसा 30 वर्ष में एक बार होता है और ऐसे में शनि समाज में फैली अव्यवस्थाओं और अन्याय को नियंत्रित करता ही है। मानव के स्वभाव, भाग्य व जीवन चक्र का नियमन चंद्र की गति, नक्षत्र व चंद्र पर अन्य ग्रहों के प्रभाव द्वारा होता है इसलिए जातक की मानसिकता, मनः स्थिति, ग्रह दशा के क्रम व गोचर का विचार भी चंद्रमा को केंद्र में रखकर ही किया जाता है। कुंडली में सŸाा की प्राप्ति के प्रबल कारक शनि का गोचर में चंद्रमा के निकट आना जीवन में जिम्मेदारियों के बढ़ने तथा सŸाा प्राप्ति का सबब बनते देखा गया है।

इसे साढ़ेसाती भी कहते हैं। कुंडली में शनि की खराब स्थिति तथा साढ़ेसाती में अशुभ भाव व राशि में वक्री या अस्त होकर गोचर करना करियर में जबर्दस्त नुकसान देता है, नौकरी छूट जाती है, राजनीति में हार तथा व्यापार में हानि उठानी पड़ती है। वहीं कुंडली में शनि की शुभ स्थिति हो तथा अच्छे राजयोग बन रहे हों तो ऐसे में साढ़ेसाती के समय शनि का शुभ भाव व राशि में गोचर करियर में श्रेष्ठतम सफलता प्रदान करता है। जितनी श्रेष्ठ कुंडली होगी उतनी ही ऊंची सफलता सुनिश्चित हो जाएगी। श्रेष्ठतम कुंडली में शुभ साढ़ेसाती सŸाा का सुख देती है। चाहे ग्रह योग व साढ़ेसाती का सूक्ष्म निरीक्षण कितना ही शुभ फलदायी प्रतीत होता हो परंतु जातक को साढ़ेसाती के समय व्यापार में जोखिम नहीं उठाना चाहिए। शनि की साढ़ेसाती आपको अपने व्यवसाय के बारे में सूक्ष्म रूप से यथार्थवादी दृष्टिकोण अपनाने के लिए प्रेरित करती है साथ ही आपको जोखिम उठाने के लिए मना करती है।

आपके लिए ऐसी कठिनाइयां भी उत्पन्न करती है जिससे आप अपनी गलतियों से सीखें। यह तकलीफें देकर आपको न केवल एक अच्छा इंसान बना देती है अपितु करियर को भी समुचित दिशा प्रदान करती है। जब कुंडली में शनि की स्थिति श्रेष्ठ हो, धन व लाभ भाव के स्वामी विशेष बली हों तथा गुरु व बुध भी उŸाम स्थिति में हों और गोचरस्थ शनि चंद्रमा से तृतीय, षष्ठ व एकादश भावों में शुभ राशि व शुभ ग्रहों के ऊपर से गोचर कर रहा हो तो वह समय व्यापारिक क्षेत्र में उन्नति के लिए विशेष श्रेष्ठ होता है। इस समय यदि शुभ भावों में स्थित ग्रह की दशा भी चल रही हो तो जोखिम भी उठाए जा सकते हैं क्योंकि सफलता तय है।

जिस समय दशम भाव, दशमेश व दशम के कारक पर शनि व गुरु दोनों का गोचरीय प्रभाव आ रहा हो और यह गोचर चंद्रमा से शुभ हो व शुभ राशि में भी हो तो करियर में उन्नति निश्चित रूप से होती है। यदि शनि मेष या वृश्चिक राशि में हो या मंगल से दृष्ट हो तो जातक मशीनरी, फैक्ट्री, धातु, इंजीनियरिंग, इंटीरियर या बिजली संबंधी कार्यों, केंद्रीय सरकार, कृषि विभाग, खान, खनिज या वास्तुकला विभाग में कार्य करता है। यदि इस ग्रह योग पर गुरु व शुक्र का भी प्रभाव हो तो ऐसा जातक न केवल धन लाभ अर्जित करता है अपितु उसे भूमि व संपŸिा का लाभ भी प्राप्त होता है। यदि शनि वृष या तुला राशि में हो अथवा इस पर शुक्र की दृष्टि हो तो कला, प्रबंधन, कम्प्यूटर के व्यवसाय से लाभ उठाता है।

यदि गुरु व बुध का शुभ प्रभाव भी इस ग्रह योग पर पड़ता हो तो कानूनविद्, वकील, न्यायाधीश आदि के लिए विशेष श्रेष्ठ होता है। शनि और शुक्र मित्र हैं इसलिए शनि पर शुक्र का यह प्रभाव सौभाग्यवर्धक माना जाता है। शनि से गुरु, शुक्र व बुध की शुभ स्थिति के फलस्वरूप जीवन में आय लाभ नियमित रूप से होता रहता है। ऐसे जातक अपने व्यवसाय में विशेष सुखी होते हैं। उनके पास धन, वाहन और भवन सभी मौजूद रहते हैं। शनि मिथुन या कन्या में हो अथवा बुध से दृष्ट हो तो ऐसे जातक एकाउंटिंग, काॅस्टिंग, अभिनय, बुद्धिजीवी वाले कार्यों, व्यापार, विŸाीय सौदों, विज्ञान व वाकपटुता आदि के अतिरिक्त लेखन कला व कानून संबंधी कार्यों से धन लाभ प्राप्त करते हैं।

यदि गुरु व शुक्र का भी प्रभाव रहे तो धन कमाना सरल होने लगता है। ऐसे जातक को मित्रों से भी सहयोग मिलता है। शनि कर्क राशि में हो या चंद्रमा से दृष्ट हो तो ऐसा व्यक्ति कला, ज्योतिष, राजनीति, धर्म, यात्रा, पेय पदार्थ, साहित्य, जल, मदिरा आदि के कार्यों से लाभ उठाते हैं। ऐसे लेगों के करियर में बार-बार परिवर्तन होते हैं। करियर में यात्राएं भी खूब होती हैं लेकिन यह आवश्यक नहीं कि ऐसे लोग कठिन परिश्रम वाले कार्यों में संलग्न होना चाहें। ऐसे लोग अधिकतर शांत व नरम स्वभाव के होते हैं। शनि सिंह राशि में हो अथवा सूर्य से दृष्ट हो तो ऐसे जातक को सरकारी नौकरी या सŸााधारी लेागों से लाभ मिलता है।

इसका यह भी संकेत निकाल सकते हैं कि पिता पुत्र का व्यापार या साझेदारी आदि में संबंध है। इसके कारण सरकारी नौकरी व राजनीति से लाभ मिलता है। शनि सूर्य की शत्रुता के चलते कुछ संघर्ष के पश्चात् सफलता मिलती है। इसलिए यदि गुरु, शुक्र व बुध आदि ग्रहों का शनि पर प्रभाव न हो तो व्यावसायिक जीवन में संघर्ष का सामना करना पड़ता है। लेकिन यदि गुरु, शुक्र, बुध व बलवान चंद्रमा का प्रभाव आ जाए तो जातक को विशेष प्रसिद्धि की प्राप्ति होती है। यदि शनि धनु या मीन राशि म हो या गुरु से दृष्ट हो तो जातक को कानून, वन विभाग, लकड़ी या धार्मिक संस्थाओं आदि में विशेष सफलता मिलती है।

यह ग्रह योग जातक को मनोविज्ञान, गुप्त ज्ञान (पराविद्या), प्रशासनिक कार्य, प्रबंधन कार्य, शिक्षक, अन्वेषक, वैज्ञानिक, ज्योतिषी, मार्गदर्शक, वकील, इतिहासकार, चिकित्सक, धर्मोपदेशक आदि के रूप में प्रतिष्ठित कराता है। ऐसे जातक में वाद-विवाद करने का विशेष चातुर्य होता है व व्यक्तित्व विशेष आकर्षक होता है। इनके बहुत से मित्र होते हैं तथा व्यावसायिक जीवन में निश्चित रूप से प्रतिष्ठा की प्राप्ति होती है। ऐसा ग्रह योग स्वतंत्र व्यवसाय या रोजगार की प्राप्ति करवाता है। शनि मकर या कुंभ राशि में हो तो जातक को सेवा, यात्रा, जन आंदोलन, विक्रय कार्य अथवा लायजनिंग संबंधी कार्यों से लाभ होता है।

शनि विदेशी भाषा का कारक है इसलिए विद्या व भाषा पर अधिकार देने वाले ग्रहों जैसे शुक्र, गुरु, बुध व केतु से इसका शुभ संबंध और स्थिति जातक को अंग्रेजी या अन्य विदेशी भाषाओं का विद्वान बनाती है। शनि के ऊपर, गुरु, बुध, केतु इन सभी का प्रभाव पड़े तो मशहूर वकील बने। शनि पर केवल राहु का प्रभाव हो तो जातक छोटी नौकरी से गुजर बसर करता है परंतु यदि राहु के साथ-साथ गुरु, शुक्र का भी प्रभाव हो तो प्रारंभ में नौकरी करने के पश्चात् जातक धीरे-धीरे अपने आप को स्वतंत्र व्यवसाय में भी स्थापित कर लेता है।


जय श्री शनि देव
Astro Shastri....

10/02/2021

Surya Rashi Parivartan 2020: सूर्य 12 फरवरी को कुंभ राशि में करेंगे गोचर, जानें राशि परिवर्तन का कुंभ राशि वालों पर क्या पड़ेगा असर

सूर्य 12 फरवरी, 2021 को मकर से कुंभ राशि में गोचर करेंगे। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, सूर्य को हमेशा सीधी चाल चलने वाला ग्रह माना जाता है। सूर्य, सिंह राशि के स्वामी होते हैं। यही कारण है कि सूर्य को ऊर्जा का कारक माना जाता है। सूर्य किसी भी राशि में गोचर करने के बाद लगभग एक माह तक उसी राशि में रहते हैं।
ज्योतिष शास्त्र में सूर्य को एक प्रभावशाली ग्रह माना जाता है। जो भी ग्रह सूर्य के करीब आते हैं, उन्हें अस्त माना जाता है। यानी उनका अपना कोई प्रभाव नहीं रह जाता है। बुध के करीब आने पर बुधादित्य योग बनता है, जिसे बेहद शुभ माना जाता है। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, सूर्य की गिनती पाप ग्रहों में की जाती है, लेकिन क्रूर ग्रहों की दृष्टि पड़ने या उनके पास आने पर सूर्य नेगेटिव प्रभाव छोड़ते हैं। अन्यथा सूर्य जातक के जीवन पर शुभ प्रभाव डालते हैं।

सूर्य गोचर 2021: कुंभ राशि वालों पर क्या पड़ेगा प्रभाव-
सूर्य 12 फरवरी को कुंभ राशि में प्रवेश करेंगे। सूर्य के इस राशि परिवर्तन का असर कुंभ राशि वालों पर ज्यादा पड़ेगा। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, इस गोचर काल के दौरान इस राशि के जातक क्रोधी हो सकते हैं। आप पैसे बचाएंगे और कभी-कभी आवश्यक चीजों पर भी खर्च नहीं कर पाएंगे। इस दौरान आप बहुत भावुक होंगे और हमेशा दूसरों की भलाई के बारे में सोचेंगे जिसकी वजह से लोग आपको पसंद करेंगे। कार्यक्षेत्र में आप एक टीम के अच्छे खिलाड़ी की तरह काम करेंगे, यदि आप आधिकारिक स्थिति में काम करते हैं, तो आप सफल होंगे।

कभी-कभी आप खुद को अकेला महसूस कर सकते हैं और दुनिया से खुद को अलग कर सकते हैं, हालांकि ऐसा करना आपके लिए ठीक नहीं है इससे आपको ज्याादा नुकसान हो सकता है। आप संचार और नेटवर्किंग में तरक्की करेंगे और आपका मान-सम्मान होगा। इस गोचर काल के दौरान स्वाभिमान के कारण आप कई बार जिद्दी हो सकते हैं। आप स्वतंत्रता पर विश्वास करेंगे और इस दौरान कोई भी आपसे आपकी स्वतंत्रता छीन नहीं पाएगा । मेष, मिथुन और कन्या राशियों के लिए यह गोचर अच्छा रहेगा।

उपाय: बाहर जाने से पहले पिता और परिवार के बड़ों का आशीर्वाद लें।

10/02/2021

Vitiligo or white spot gives weak Mercury Said

Astrologer: ज्योतिष शास्त्र में प्रत्येक ग्रह से जुड़े रोग और पीड़ाओं का विस्तार से वर्णन मिलता है। अनियमित खानपान, स्मोकिंग व ड्रिंक की आदत और बिगड़ती लाइफस्टाइल के कारण कम उम्र में त्वचा पर बुढ़ापे जैसे लक्षण नजर आने लगे हैं। आजकल लोगों में त्वचा खराब होने जैसे अनेक मामले देखे जा रहे हैं। अनेक त्वचारोग विशेषज्ञों से इलाज करवाने के बाद भी समस्या से छुटकारा नहीं मिल पा रहा है। वैदिक ज्योतिष की दृष्टि से देखें तो त्वचा का कारक ग्रह मुख्य रूप से बुध होता है। यह संपूर्ण शरीर की बाहरी त्वचा को नियंत्रित करता है। लेकिन इसके अलावा सूर्य, मंगल और शुक्र भी त्वचा को अच्छी या बुरी बनाने में भूमिका निभाते हैं। त्वचा से संबंधित अनेक रोग होते हैं जिनमें ल्यूकोडर्मा या सफेद दाग होना एक ऐसा रोग है जो व्यक्ति में हीन भावना पैदा करता है। वह दूसरों के सामने खुद को जाने से बचता है। दूसरे लोग भी इसे हेय दृष्टि से देखते हैं।दरअसल, ल्यूकोडर्मा या सफेद दाग एक सामान्य त्वचा रोग है, जिसमें त्वचा के भीतर मेलानिन बनना बंद हो जाता है जो त्वचा के रंग को नियंत्रित करता है। इसके फलस्वरूप त्वचा पर सफेद दाग होने लगते हैं। यह बढ़ते-बढ़ते पूरे शरीर पर फैल जाते हैं। लोगों में इसे लेकर भ्रम है कियह कोढ़ की बीमारी है लेकिन ऐसा नहीं है। कोढ़ और यह बिलकुल अलग है।

कौन ग्रह क्या करता है

बुध : यह बाहरी त्वचा का कारक होता है। त्वचा का कोई भी रोग उभरता है तो इसी त्वचा पर दिखाई देता है। बुध पीड़ित होने पर बाहरी त्वचा खराब होने लगती है।

सूर्य : सूर्य को आरोग्य का कारक ग्रह है। सूर्य से शरीर का तेज और चमक बरकरार रहती है। सूर्य पाप ग्रह है यदि इस पर अन्य पाप ग्रहों की दृष्टि हो तो यह शरीर को कुम्हला देता है। खराब सूर्य वाले जातक की त्वचा में चमक नहीं होती।

मंगल : मंगल रक्त और शरीर में ऊतकों के निर्माण में सहायक होता है। मंगल खराब होने पर रक्त विकार पैदा होते हैं, जिससे त्वचा पर दाने उभरना, कील-मुहांसे की समस्या होती है। खुजली, रेशेज की समस्या भी मंगल के कारण होती है।

शुक्र : शुक्र का संबंध सौंदर्य से है। जिस जातक का शुक्र मजबूत होता है वह आकर्षक, खूबसूरत होता है। उसकी त्वचा निखरी रहती है और चमकदार होती है। शुक्र खराब हो तो त्वचा की चमक खो जाती है।
ये हैं सफेद दाग के कारण
लग्न में पीड़ित बुध, शुक्र या सूर्य होने पर सफेद दाग की समस्या होती है।
छठा भाव रोग का भाग है। लग्न, छठा और आठवां भाव में पाप ग्रह ज्यादा हों तो सफेद दाग होता है।
लग्नेश का दोष युक्त होना सफेद दाग का कारण बनता है।
मंगल यदि छठे भाव का स्वामी होकर लग्न में बैठा हो तो सफेद दाग होने की संभावना रहती है।

कुंडली में शुक्र अस्त हो अर्थात् सूर्य के साथ शुक्र हो और पाप ग्रहों की दृष्टि हो तो सफेद दाग होते हैं।
चंद्र और बुध की युति पर राहु-केतु की दृष्टि होने पर भी सफेद दाग होते हैं।

बुध के साथ केतु यदि शनि की राशि मकर-कुंभ में हो और बुध की राशि मिथुन या कन्या में शनि हो तो सफेद दाग की समस्या होती है।
रोग भाव छष्ठम में मंगल और बुध पीड़ित हो तो त्वचा रोग होते हैं।
यह उपाय करें

नवग्रह का पेंडेंट पहनें। नवग्रह स्तोत्र का नियमित पाठ करें।
बथुआ की सब्जी खाना और पानी में बथुआ उबालकर उसके पानी से 6 माह तक रोज नहाने से सफेद दाग दूर हो जाते हैं।
अखरोट खाने से सफेद दाग दूर होते हैं।
बुध की शांति के निमित्त हरे मूंग का दान करना लाभदायक होता है।

हरे मूंगे की माला या फिरोजे की माला से बुध के मंत्रों का जाप नियमित रूप से करें।
मोती शंख में जल भरकर 24 घंटे रखें और उसे प्रभावित त्वचा पर लगाने से सफेद दाग दूर होते हैं।



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