25/02/2021
राहू कि महादशा में नवग्रहों कि अंतर्दशाओं का फल एवं उपाय
राहु की महादशा में नवग्रहों की अंतर्दशाओं का फल एवं उपाय राहु मूलतः छाया ग्रह है, फिर भी उसे एक पूर्ण ग्रह के समान ही माना जाता है। यह आद्र्रा, स्वाति एवं शतभिषा नक्षत्र का स्वामी है। राहु की दृष्टि कुंडली के पंचम, सप्तम और नवम भाव पर पड़ती है। जिन भावों पर राहु की दृष्टि का प्रभाव पड़ता है, वे राहु की महादशा में अवश्य प्रभावित होते हैं।
राहु की महादशा 18 वर्ष की होती है। राहु में राहु की अंतर्दशा का काल 2 वर्ष 8 माह और 12 दिन का होता है। इस अवधि में राहु की महादशा से प्रभावित जातक को अपमान और बदनामी का सामना करना पड़ सकता है। विष और जल के कारण पीड़ा हो सकती है। विषाक्त भोजन, से स्वास्थ्य प्रभावित हो सकता है।
इसके अतिरिक्त अपच, सर्पदंश, परस्त्री या पर पुरुष गमन की आशंका भी इस अवधि में बनी रहती है। अशुभ राहु की इस अवधि में जातक के किसी प्रिय से वियोग, समाज में अपयश, निंदा आदि की संभावना भी रहती है। किसी दुष्ट व्यक्ति के कारण उस परेशानियों का भी सामना करना पड़ सकता है। उपाय: भगवान शिव के रौद्र अवतार भगवान भैरव के मंदिर में रविवार को शराब चढ़ाएं और तेल का दीपक जलाएं। शराब का सेवन कतई न करें। लावारिस शव के दाह-संस्कार के लिए शमशान में लकड़िया दान करें।
अप्रिय वचनों का प्रयोग न करें। राहु में बृहस्पति: राहु की महादशा में गुरु की अंतर्दशा की यह अवधि दो वर्ष चार माह और 24 दिन की होती है। राक्षस प्रवृत्ति के ग्रह राहु और देवताओं के गुरु बृहस्पति का यह संयोग सुखदायी होता है। जातक के मन में श्रेष्ठ विचारों का संचार होता है और उसका शरीर स्वस्थ रहता है। धार्मिक कार्यों में उसका मन लगता है। यदि कुंडली में गुरु अशुभ प्रभाव में हो, राहु के साथ या उसकी दृष्टि में हो तो उक्त फल का अभाव रहता है। ऐसी स्थिति में निम्नांकित उपाय करने चाहिए। किसी अपंग छात्र की पढ़ाई या इलाज में सहायता करें। शैक्षणिक संस्था के शौचालयों की सफाई की व्यवस्था कराएं।
शिव मंदिर में नित्य झाड़ू लगाएं। पीले रंग के फूलों से शिव पूजन करें। राहु में शनि: राहु में शनि की अंतदर्शा का काल 2 वर्ष 10 माह और 6 दिन का होता है। इस अवधि में परिवार में कलह की स्थिति बनती है। तलाक भाई, बहन और संतान से अनबन, नौकरी में या अधीनस्थ नौकर से संकट की संभावना रहती है। शरीर में अचानक चोट या दुर्घटना के दुर्योग, कुसंगति आदि की संभावना भी रहती है। साथ ही वात और पित्त जनित रोग भी हो सकता है।
दो अशुभ ग्रहों की दशा-अंतर्दशा कष्ट कारक हो सकती है। इससे बचने के लिए निम्न उपाय अवश्य करने चाहिए। भगवान शिव की शमी के पत्रों से पूजा और शिव सहस्रनाम का पाठ करना चाहिए। महामृत्युंजय मंत्र के जप स्वयं, अथवा किसी योग्य विद्वान ब्राह्मण से कराएं। जप के पश्चात् दशांश हवन कराएं जिसमें जायफल की आहुतियां अवश्य दें।
नवचंडी का पूर्ण अनुष्ठान करते हुए पाठ एवं हवन कराएं। काले तिल से शिव का पूजन करें। राहु में बुध: राहु की महादशा में बुध की अंतर्दशा की अवधि 2 वर्ष 3 माह और 6 दिन की होती है। इस समय धन और पुत्र की प्राप्ति के योग बनते हैं। राहु और बुध की मित्रता के कारण मित्रों का सहयोग प्राप्त होता है। साथ ही कार्य कौशल और चतुराई में वृद्धि होती है। व्यापार का विस्तार होता है और मान, सम्मान यश और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। उपाय: भगवान गणेश को शतनाम सहित दूर्वाकुंर चढ़ाते रहें। हाथी को हरे पत्ते, नारियल गोले या गुड़ खिलाएं। कोढ़ी, रोगी और अपंग को खाना खिलाएं। पक्षी को हरी मूंग खिलाएं।
राहु में केतु: राहु की महादशा में केतु की यह अवधि शुभ फल नहीं देती है। एक वर्ष और 18 दिन की इस अवधि के दौरान जातक को सिर में रोग, ज्वर, शत्रुओं से परेशानी, शस्त्रों से घात, अग्नि से हानि, शारीरिक पीड़ा आदि का सामना करना पड़ता है। रिश्तेदारों और मित्रों से परेशानियां व परिवार में क्लेश भी हो सकता है। उपाय: भैरवजी के मंदिर में ध्वजा चढ़ाएं। कुत्तों को रोटी, ब्रेड या बिस्कुट खिलाएं। कौओं को खीर-पूरी खिलाएं। घर या मंदिर में गुग्गुल का धूप करें। राहु में शुक्र: राहु की महादशा में शुक्र की प्रत्यंतर दशा पूरे तीन वर्ष चलती है। इस अवधि में शुभ स्थिति में दाम्पत्य जीवन में सुख मिलता है।
वाहन और भूमि की प्राप्ति तथा भोग-विलास के योग बनते हैं। यदि शुक्र और राहु शुभ नहीं हों तो शीत संबंधित रोग, बदनामी और विरोध का सामना करना पड़ सकता है। इस अवधि में अनुकूलता और शुभत्व की प्राप्ति के लिए निम्न उपाय करें- सांड को गुड़ या घास खिलाएं। शिव मंदिर में स्थित नंदी की पूजा करें और वस्त्र आदि दें।
एकाक्षी श्रीफल की स्थापना कर पूजा करें। स्फटिक की माला धारण करें। राहु में सूर्य: राहु की महादशा में सूर्य की अंतर्दशा की अवधि 10 माह और 24 दिन की होती है, जो अन्य ग्रहों की तुलना में सर्वाधिक कम है। इस अवधि में शत्रुओं से संकट, शस्त्र से घात, अग्नि और विष से हानि, आंखों में रोग, राज्य या शासन से भय, परिवार में कलह आदि हो सकते हैं। सामान्यतः यह समय अशुभ प्रभाव देने वाला ही होता है। उपाय: इस अवधि में सूर्य को अघ्र्य दें।
उनका पूजन एवं उनके मंत्र का नित्य जप करें। हरिवंश पुराण का पाठ या श्रवण करते रहें। चाक्षुषोपनिषद् का पाठ करें। सूअर को मसूर की दाल खिलाएं। राहु में चंद्र: एक वर्ष 6 माह की इस अवधि में जातक को असीम मानसिक कष्ट होता है। इस अवधि में जीवन साथी से अनबन, तलाक या मृत्यु भी हो सकती है। लोगों से मतांतर, आकस्मिक संकट एवं जल जनित पीड़ा की संभावना भी रहती है। इसके अतिरिक्त पशु या कृषि की हानि, धन का नाश, संतान को कष्ट और मृत्युतुल्य पीड़ा भी हो सकती है। उपाय: राहु और चंद्र की दशा में उत्पन्न होने वाली विषम परिस्थितियों से बचने के लिए माता की सेवा करें।
माता की उम्र वाली महिलाओं का सम्मान और सेवा करें। प्रत्येक सोमवार को भगवान शिव का शुद्ध दूध से अभिषेक करें। चांदी की प्रतिमा या कोई अन्य वस्तु मौसी, बुआ या बड़ी बहन को भेंट करें। राहु में मंगल: राहु की महादशा में मंगल की अंतर्दशा का यह समय एक वर्ष 18 दिन का होता है। इस काल में शासन व अग्नि से भय, चोरी, अस्त्र शस्त्र से चोट, शारीरिक पीड़ा, गंभीर रोग, नेत्रों को पीड़ा आदि हो सकते हंै। इस अवधि में पद एवं स्थान परिवर्तन तथा भाई को या भाई से पीड़ा की संभावना भी रहती है।
किसी भी जातक को राहु अथवा केतु की दशा-अंतर्दशा का फल कुंडली में उसकी स्थितियों, भावों एवं अन्य ग्रहों के संबंधों पर निर्भर करता है। राहु जब शुभ प्रभाव में हो तो अपनी दशा में जातक की भलाई, धन एवं यश की वृद्धि करता है जबकि शुभ प्रभावों में होने पर विभिन्न रोग, संकट एवं शत्रुता देता है। राहु उच्च राशि का हो तो जातक को उच्च पद की प्राप्ति होती है। वह अत्यंत साहसी होता है और उसे मित्रों का सहयोग, स्त्री, पुत्र तथा भाइयों से सुख और यात्रा के अवसर आदि प्राप्त होते हैं। किंतु साथ ही वह बवासीर और सिर दर्द से ग्रस्त तथा अधर्म के प्रति प्रवृत्त होता है। जब राहु नीच राशि का होता है तो जातक को छाती में पीड़ा, शत्रु, अग्नि तथा, शस्त्र का भय और चोटों से हानि होती है।
उसके मित्रों तथा बांधवों का पतन होता है और वह स्वयं शासक वर्ग के कोप का शिकार होता है। इसके अतिरिक्त उसके माता-पिता, स्त्री, संतान, दादा-दादी, नाना-नानी का स्वास्थ्य खराब रहता है और उनकी मृत्यु की संभावना भी रहती है। राहु से युक्त ग्रह बलवान भी हांे तो उसकी दशा में अरिष्ट होता है और दशा के अंत में दुःख, हानि तथा परदेश गमन होता है।
केतु के शुभ प्रभाव में जातक को सर्वत्र विजय मिलती है। क्रूर कार्य करने से या म्लेच्छ राजा से धन की प्राप्ति होती है और शत्रु का नाश होता है। इसके विपरीत यदि केतु पाप प्रभाव में हो तो अत्यधिक कष्ट मिलता है। उसे कार्यों में असफलता शूलरोग, हड्डियों में ज्वर आदि से ग्रस्त होता है। वह ब्राह्मणों से द्वेष रखता है तथा उसका व्यवहार मूर्खतापूर्ण होता है। केतु उच्च का हो तो जातक अत्यधिक साहसी होता है। उसे कार्यों में सफलता तथा उच्च पद की प्राप्ति होती है। उसकी धर्म के प्रति निष्ठा होती है और वह यदा-कदा तीर्थ यात्रा करता है। उसे महात्माओं के दर्शन होते हंै। यदि केतु अच्छे स्थान में स्थित हो तो मनुष्य को मोक्ष भी देता है। यदि केतु नीच का हो तो स्वजन, भाई, चोर, वनपशु, मित्रों तथा बंधु बांधवों के कारण हानि होती है।
इसके अतिरिक्त जातक संग्रहणी, फोड़ा-फंुसी आदि से पीड़ित होता है और उसे कारावास का दंड भी भोगना पड़ता है। महादशा एवं अंतर्दशाओं का फलादेश: राहु का दशाफल: राहु की महादशा में जातक दुःस्वभावी हो जाता है। उसमें सुशीलता नहीं रहती। किसी भयंकर बीमारी के कारण उसे पीड़ा भी होती है। उसकी पत्नी तथा पुत्र को कष्ट होता है और उसे विष से पीड़ा और शासक वर्ग से हानि होती है। पीड़ा होती है। राहु की महादशा में मंगल की अंतर्दशा में जातक को शत्रु, शस्त्र, अग्नि तथा चोरों का भय निरंतर बना रहता है।
उसे अन्य अनेक प्रकार के कष्ट भी प्राप्त होते हैं। राहु की महादशा में सूर्य की अंतर्दशा हो तो जातक को रोग, शस्त्र, चोर, अग्नि और राजा से भय और उसके धन का नाश होता है। राहु की महादशा में राहु की अंतर्दशा हो तो जातक के भाई या पिता की मृत्यु, धन का नाश आदि होते है। साथ ही, वह रोगग्रस्त होता है और उसकी प्रतिष्ठा धूमिल होती है। राहु की महादशा में चंद्र की अंतर्दशा हो तो जातक को कलह, धन की हानि, बंधु बांधवों के विरोध तथा अन्य अनेक प्रकार के कष्टों का सामना करना पड़ता है। किंतु इस दशा में उसे स्त्री का सुख प्राप्त होता है। राहु की महादशा में शुक्र की अंतर्दशा हो तो जातक को मित्र के कारण संताप, भाई बंधुओं से कलह एवं कष्ट भोगना पड़ता है।
किंतु इस दशा के दौरान उसे स्त्री सुख तथा धन की प्राप्ति होती है। राहु की महादशा में बुध की अंतर्दशा हो तो जातक का मित्र एवं भ्राताओं के साथ स्नेह बढ़ता है। बुद्धि, धन तथा सुख की वृद्धि होती है, किंतु दुख भी भोगना पड़ता है। राहु की महादशा में बृहस्पति की अंतर्दशा हो तो जातक देवी-देवता की पूजा और ब्राह्मणों की सेवा करने वाला, धनी तथा व्याधियों से मुक्त होता है। राहु की महादशा में केतु की अंतर्दशा हो तो जातक को अग्नि, ज्वर, शस्त्र तथा शत्रुओं से पीड़ा होती है और उसकी मृत्यु की संभावना रहती है। राहु की महादशा में शनि की अंतर्दशा हो तो जातक को रक्त-पित्त की पीड़ा, हाथ, पैर अथवा शरीर के किसी अन्य अंग के टूटने स्वजनों से कलह आदि की संभावना रहती है। केतु का दशाफल: केतु की महादशा में जातक को अनिष्ट फल का सामना करना पड़ता है। स्त्रियों तथा धनिकों, अफसरों या मालिक से उसे कष्ट मिलता है। इस दशा में उससे कोई गंभीर अपराध हो सकता है।
धन के नाश होने के साथ-साथ ऐसी परिस्थिति बन सकती है कि उसे अपना घर और देश तक छोड़ना पड़। उसे कफ जनित रोग अथवा पैर तथा दांत में कष्ट भी हो सकता है। केतु की महादशा में बुध की अंतर्दशा हो तो जातक को भाई-बंधुओं का स्नेह सुख, बुद्धि लाभ, धन लाभ आदि की प्राप्ति होती है। इस दशा में उसे किसी भी प्रकार का कष्ट नहीं उठाना पड़ता। केतु की महादशा में शनि की अंतर्दशा हो तो जातक को स्वजनों से कलह तथा वात-पित्त की पीड़ा का शिकार होना पड़ता है। उसे परदेश गमन भी करना पड़ता है। केतु की महादशा में मंगल की अंतर्दशा हो तो जातक का अपने गांव, या मोहल्ले के लोगों से झगड़ा होता है। उसे चोट तथा देह पीड़ा का सामना भी करना पड़ता है। केतु की महादशा में केतु की अंतर्दशा हो तो जातक को पुत्र-पुत्री की मृत्यु, धन हानि, अग्नि से भय, दुष्ट स्त्रियों से कलह, रोग आदि अनेक प्रकार के संकटों का सामना करना पड़ता है।
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केतु की महादशा में सूर्य की अंतर्दशा हो तो जातक को शासक वर्ग से पीड़ा, शत्रुओं से विरोध, अग्निदाह, तीव्र ज्वर, विदेश गमन आदि कष्टों का सामना करना पड़ता है। केतु की महादशा में शुक्र की अंतर्दशा हो तो अग्नि दाह, तीव्र ज्वर, स्त्री से कलह, स्त्री वियोग आदि के दुःख भोगने पड़ते हैं और घर में कन्या का जन्म होता है। केतु की महादशा में चंद्र की अंतर्दशा हो तो जातक को धन व स्त्री का लाभ लेकिन यश की हानि होती है। इस प्रकार इस अवधि मंे शुभ एवं अशुभ दोनों प्रकार के फल प्राप्त होते हैं। केतु की महादशा में बृहस्पति की अंतर्दशा हो तो जातक का शासक वर्ग से संपर्क होता है। उसके घर में पुत्र का जन्म तथा भूमि, धन आदि का लाभ भी होता है। केतु की महादशा में राहु की अंतर्दशा हो तो जातक को चोरों का भय, शत्रुओं से विरोध तथा अन्य प्रकार के कष्टों का सामना करना पड़ता है। उसके अंग-भंग होने की आशंका बनी रहती है।