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One Sim All Recharge अमीर बनने के तरीके जानिये,उनकी तरह सोचना ,उनकी तरह करना और उनकी तरह होना ...

153 . सही या गलत -निर्णय आपका !कुछ लोग टीम बनाने का अर्थ बिज़नेस, स्पोर्ट्स ,राजनीति जैसे फील्ड से ही लेते है जबकि ज़िन्दग...
30/12/2014

153 . सही या गलत -निर्णय आपका !

कुछ लोग टीम बनाने का अर्थ बिज़नेस, स्पोर्ट्स ,राजनीति जैसे फील्ड से ही लेते है जबकि ज़िन्दगी के हर क्षेत्र में टीम मौजूद होती है - चाहे आप इसे नकारे या स्वीकारे . यहाँ तक कि ये तो आपके घर में भी मौजूद होती है , उदाहरण के तौर पर किसी शादी-शुदा घरेलु महिला की टीम में उसका पति , उसके बच्चे , उसके माँ- बाप ,उसके सास-ससुर , उसकी ननद , उसकी बहन यानि कुल मिलाकर उसके सारे रिश्तेदार , उसकी- सखिया-सहेलियां ,काम करनेवाली नौकरानी , धोबी, प्लम्बर, इलेक्ट्रीशियन, सब्जीवाला भइया , उनके बच्चों का टीचर , कबाड़ वाला यानि घर-गृहस्थी चलाने में सहायक जो भी शख्शियत जिनसे एक बार से अधिक बार व्यवहार करना पड़े उसकी टीम का हिस्सा है . दूसरी - तीसरी बार में उसे समझ में आ जाता है कि ये उसकी टीम का परमानेंट मेंबर हो सकता है या नहीं .

मेरे घर पर पेपर लेने वाला करीबन दस साल से एक ही बंदा आता है जिससे किसी भी तरह की किट- किट हमें नहीं करनी पड़ती. महीने के पहले वीक में वो अपने आप आ जाता है और मार्किट में जो भाव चल रहा है उसी हिसाब से वो हमारे घर से पेपर ले जाता है .जबकि मिसेज कपूर हर बार किसी भी कबाड़ी को बुलाती है और उन्हें हर बार उनसे रेट को ,तौल को लेकर बहस करनी पड़ती है !

कृपया टीम बनाने को हलके में न लेवे , एक अच्छी टीम बनाने के लिए पूरी मेहनत करें क्योंकि उसके बाद आपकी ज़िन्दगी सुविधाजनक और आसान होती जाएगी - टीम बनाने के चरणों के बारे में मेरी इससे पूर्व की पोस्ट देखें .
सुबोध
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152 . सही या गलत -निर्णय आपका !टीम बनाने के तीन महत्त्वपूर्ण चरण होते है . पहला चरण है जो आप अपनी टीम से  पाना चाहते है ...
28/12/2014

152 . सही या गलत -निर्णय आपका !

टीम बनाने के तीन महत्त्वपूर्ण चरण होते है . पहला चरण है जो आप अपनी टीम से पाना चाहते है उस बारे में उन्हें सिखाना , दूसरा चरण है उन्हें सीखे हुए को करने के लिए प्रोत्साहित करना और तीसरा एवं आखिरी चरण है अपनी टीम पर भरोसा करना,अगर आप ऐसा नहीं कर पा रहे है तो आपका व्यवसाय ( आप स्वयं ) छोटे स्तर से शुरू होकर छोटे स्तर का ही रहेगा ,उसके विकास की सम्भावनाये नहीं है .
सुबोध

35 . पैसा बोलता है ..." अंकल, मेरे उत्तर पर मुझे जीरो दिया गया है क्या मैं गलत हूँ ?अंकल ,आप सही और ईमानदार जवाब देना " ...
05/12/2014

35 . पैसा बोलता है ...

" अंकल, मेरे उत्तर पर मुझे जीरो दिया गया है क्या मैं गलत हूँ ?अंकल ,आप सही और ईमानदार जवाब देना " मेरे पडोसी कपूर साहेब का पंद्रह साल का लड़का मुझसे पूछ रहा था.

प्रश्न ये था "रावण को किसने मारा ?"

और कपूर साहब के लड़के ने जवाब दिया था "रावण को उसके अहंकार ने मारा ."

उसकी टीचर ने न सिर्फ उसे जीरो दिया था बल्कि पूरी क्लास के सामने उसकी बेइज्जती भी की थी कि "हम पहली और दूसरी क्लास से ही ये सीखा रहे है कि रावण को राम ने मारा और तुम इतने साल में भी ये याद नहीं कर पाये ."

मैंने उसे समझाने की कोशिश की " हमारी शिक्षा व्यवस्था हमें रटना सिखाती है, इस शिक्षा व्यवस्था में सोचने पर पाबंदिया होती है ,क्योंकि रटने पर जवाब सिर्फ एक ही होता है लेकिन सोचने पर जवाब एक से अधिक हो सकते है .और टीचर्स इतने मैच्योर और समझदार नहीं होते है कि एक से अधिक जवाब सुन और समझ सके क्योंकि ऑफ्टरऑल उन्हें भी रटना ही सिखाया गया है ."

मैंने उसके चेहरे पर उलझन और न समझ में आने वाले भाव देखकर एक प्रयास और किया " हमारी शिक्षा व्यवस्था औद्योगिक युग की है जहाँ बताये गए काम को ठीक उसी के अनुरूप करना होता था जैसा बताया गया है वहां क्रिएटिविटी के लिए कोई जगह नहीं होती थी और गलतियों के लिए कोई गुंजाइश भी नहीं होती थी लिहाजा एक सवाल का एक ही उत्तर - खांचे में फिट ,न कम न ज्यादा ,न छोटा न बड़ा .और हमारे टीचर्स के लिए भी ये आसान था , उन्होंने एक बार रट लिया और ज़िन्दगी गुजर गई . "

मेरी कोशिश असफल रही उसका विकसित होता दिमाग इस जड़ता को पचा नहीं पा रहा था ,जो जवाब पहली और दूसरी क्लास के लिए सही था वही जवाब दसवीं क्लास में भी ! क्या दिमाग नहीं बढ़ा ? फिर जवाब वही क्यों अटका हुआ है ? "रटने" से आगे हमारे टीचर्स "समझने" की शुरुआत क्यों नहीं करते ?

सालों से हमारे टीचर्स ,हमारे पेरेंट्स हमे कह रहे है "अच्छे से पढाई करो,अच्छे नंबर लाओ ,अच्छी नौकरी ढूंढो और अच्छे से गुजारा करो." इतनी बार दोहराया गया है कि हमे याद हो गया है ,हमने उनके दोहराये वाक्यों को रट लिया है ,लिहाजा हम पढाई या नौकरी से बाहर भी ज़िन्दगी होती है ये समझना ही नहीं चाहते है ,हमे रटाया गया याद है कि राम को रावण ने मारा और हम हमारी क्रिएटिविटी कि रावण को उसके अहंकार ने मारा भूल गए है ,भुला दिए गए है . हम एक चेक से दूसरे चेक का इंतज़ार करते है लेकिन खांचे के बाहर झांकने की हिम्मत और ज़ुर्रत नहीं करते कि टीचर हमे जीरो नहीं दे देवे .हमारी गरीबी की वजह ,पैसे की कमी की वजह रटाये गए जवाब है जिन्होंने हमारी क्रिएटिविटी ख़त्म कर दी है - हमारे दिमाग को सीमित और संकुचित कर दिया है.
सुबोध - नवंबर २७,२०१४
आभार सहित निम्न ब्लॉग से लिया गया है
http://ameerbane.blogspot.in/

151 . सही या गलत -निर्णय आपका !ये प्रश्नचिन्ह उनकी काबिलियत पर नहीं है ,जो मेरे शिक्षक रहे है . उन्होंने मुझे वही सिखाया...
02/12/2014

151 . सही या गलत -निर्णय आपका !
ये प्रश्नचिन्ह उनकी काबिलियत पर नहीं है ,जो मेरे शिक्षक रहे है . उन्होंने मुझे वही सिखाया जो सिखाने को उनसे कहा गया और जिस तथाकथित शिक्षा को देने के लिए उन्हें पेमेंट दिया गया .कुल मिलाकर ये उनको मिलने वाली उनकी मज़दूरी भर थी और मजे की बात ये कि जिस तरह एक मज़दूर को मज़दूरी करने भर से मतलब होता है उससे मिलनेवाले नतीजे से नहीं उसी तरह मेरे शिक्षक भी उन द्वारा की गई मज़दूरी के भविष्य में मिलनेवाले परिणामों से नावाकिफ थे,उन्हें अपनी मज़दूरी की फिक्र भर थी .हकीकत में वे शिक्षक थे ही नहीं शिक्षा के नाम पर वे दिमागी मज़दूर थे या फिर कोचिंग सेंटर चलानेवाले व्यवसायी .

हाँ, मैं खुले दिल से स्वीकार करता हूँ कि कुछ एक मेरे शिक्षक ऐसे भी थे जिन्हे वाकई मेरे अच्छे भविष्य की फ़िक्र थी ,लेकिन अफ़सोस उनकी फिक्र औद्योगिक युग वाली फिक्र थी कि अच्छे से पढाई करो ,अच्छे नंबर लाओ ,कहीं ढंग की जगह नौकरी लग जाओ और एक सुकून की ज़िन्दगी गुजारो. उनकी ये चाहत ,उनका ये आशीर्वाद उपयोगिता खो चूका है उन्हें इसका एहसास ही नहीं था ,वे आनेवाले युग की तेज आंधी से नावाकिफ थे , वे इतने दूरदर्शी नहीं थे कि नयी सदी की तेज चौंधियाती रोशनी का सामना कैसे किया जाये ये मुझे बता सके ,वे मेरे गाँव के सीधे-सादे ,सच्चे लोग थे , वे इतने सीधे थे,इतने सच्चे थे ; उस पुरानी पीढ़ी की तरह जो नई बहु को आज भी आशीर्वाद में सात पूतों की माँ का आशीर्वाद देती है - उस पीढ़ी को पता ही नहीं है कि उनका आशीर्वाद नई पीढ़ी के लिए श्राप जैसा है .

मैं ये क्या लिख रहा हूँ और क्यों लिख रहा हूँ ,अपनी शुरुआती असफलता के लिए अपने शिक्षकों पर या शिक्षा नीति पर उंगली उठा रहा हूँ , क्यों ? आखिर क्यों ?

शिक्षा नीति गलत थी और है ,शिक्षक गलत थे और है लेकिन किसी के गलत होने से, या मेरे द्वारा किसी और को दोषी ठहराने से क्या मैं अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त हो जाता हूँ ? जब बात सच के तलाश की आती है ,तो मैं अर्जुन या एकलव्य के सच को क्यों भूल जाता हूँ? वो भी औरों की तरह साधारण रह सकते थे ,लेकिन उन्होंने खुद पर मेहनत की और वे वो बन गए जिससे उनके शिक्षक का नाम अमर हो गया - गुरु द्रोणाचार्य !

सवाल सिर्फ ये नहीं है कि शिक्षा नीति गलत है या शिक्षक गलत है ,मुख्य प्रश्न ये भी पैदा होता है कि क्या छात्र सही है ? क्या शिक्षक छात्र को बनाते है ? क्लास के चालीस छात्रों में से टॉपर एक ही क्यों होता है ? क्या उस टॉपर को शिक्षक बनाते है या वो अपने दम पर टॉपर होता है ? द्रोणाचार्य किसी अर्जुन को अर्जुन बनाते है या कोई अर्जुन किसी को द्रोणाचार्य बनाता है या कोई एकलव्य बिना कुछ प्रत्यक्ष सीखे गुरु के नाम पर द्रोणाचार्य को अमर कर जाता है !!

या कहीं हकीकत ये तो नहीं कि मेरी रीढ़ की हड्डी पर पड़ा हुआ भूखे खिसियाए शिक्षक का घूँसा उसकी हद बन गया और मैंने खुद का विस्तार करकर व्यवसायी जगत की शार्कों के बीच तैरना सीख लिया लिहाजा आज मैं किसी गलत को गलत कह सकता हूँ और सही को सही - मेरे शिक्षक प्राइमरी क्लासेज को पढ़ाते-पढ़ाते प्राइमरी क्लासेज की मानसिकता को यथार्थ मान बैठे और वहीँ अटके रह गए - परियों और दैत्यों की कहानियों के बीच..

बिना औपचारिक शिक्षा के कोई बिल गेट्स बन जाता है और कोई धीरूभाई अम्बानी,और मैं हूँ कि सिर्फ दोष ढूंढता रहता हूँ-क्या जिम्मेदार होने की बजाय मैं दोषदर्शी हो गया हूँ ,ओफ़ सुबोध, ये तुम्हे कौनसी बीमारी लग गयी ,इस बीमारी से तो अधिकांश हिंदुस्तानी ग्रस्त है !!!

क्या किसी और को दोष देने से हम अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त हो जाते है ? आपके लिए सवेरा आपके जागने पर होता है या आपके नींद में होने के बावजूद सूर्योदय के साथ ? ये निर्णय आप कर सकते है ,इस सवाल को किसी नेता पर ,किसी समाजसेवी पर,किसी शिक्षक पर,परिवार के मुखिया पर या अपनी जान-पहिचान के किसी समझदार काबिल इंसान के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता . ज़िन्दगी सवाल आपसे कर रही है लिहाजा जवाब भी आपको ही देना है !!
सुबोध
आभार सहित निम्न ब्लॉग से लिया गया -
http://ameerbane.blogspot.in/

आप अगर कॉम्पिटिशन की सोच रहे है तो निश्चित ही अपनी ग्रोथ खत्म कर रहे है ,कॉम्पिटिशन की मत सोचिये  बल्कि अपना  बेस्ट दीजि...
01/12/2014

आप अगर कॉम्पिटिशन की सोच रहे है तो निश्चित ही अपनी ग्रोथ खत्म कर रहे है ,कॉम्पिटिशन की मत सोचिये बल्कि अपना बेस्ट दीजिये . अपने पैरामीटर्स इतने ऊँचे कर दीजिये कि दुसरे के लिए उन तक पहुंचना पहाड़ की चोटी पर बसेरा बनाने जैसा हो .
- सुबोध

34 . पैसा बोलता है ...पैसे के कुछ सिद्धांत होते है .अगर कम पैसे कमाने हो तो ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है ,काम खुद करना पड़ता...
27/11/2014

34 . पैसा बोलता है ...
पैसे के कुछ सिद्धांत होते है .

अगर कम पैसे कमाने हो तो ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है ,काम खुद करना पड़ता है , मेहनत का रूप शारीरिक होता है, एवं जिम्मेदारी कम होती है अगर ज्यादा पैसा कमाना हो तो कम मेहनत करनी पड़ती है, काम दूसरों से करवाना पड़ता है. मेहनत का रूप मानसिक होता है ,जिम्मेदारी ज्यादा होती है.

बहुत से लोग जो ज्यादा पैसा कमाना चाहते है उन्हें ये बात समझ में नहीं आती कि कम मेहनत करकर भी ज्यादा पैसे कमाए जा सकते है क्योंकि उन्होंने आज तक " पैसे कमाने के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ती है " , "हार्ड वर्क इज की ऑफ़ सक्सेस " जैसे वाक्य सुने है,पढ़े है .

मैं बहुत छोटे स्तर पर चीज़ों को लिख रहा हूँ विस्तार और सन्दर्भ स्वयं तलाश लीजियेगा .

कृपया बताये पेमेंट काम करने पर मिलता है या काम के परिणाम पर ?
आप को गौर से देखने पर पता चलेगा कि गरीब मानसिकता वाले लोगों के पास समय होता है लिहाजा वे अपने समय को बेचते है अपने शरीर को बेचते है यानि मज़दूरी करते है . उन्हें मजदूरी करने पर, काम करने पर, मेहनत ज्यादा करने पर पेमेंट मिलता है .

जबकि अमीर मानसिकता के लोगों के पास दिमाग होता है लिहाजा वे अपने दिमाग को लगाते है यानि काम करनेवाले मजदूरों को इकट्टा करते है और उनसे काम करवाते है.चूँकि वे परिणाम (RESULT ) को बेचते है तो उन्हें परिणाम देने पर पेमेंट मिलता है .

मज़दूर को मेहनत ज्यादा करनी पड़ती है उसकी मेहनत का स्वरुप शारीरिक होता है लिहाजा वो जितनी ज्यादा मेहनत करेगा उतनी ही ज्यादा बढ़ोतरी पायेगा और उसके लिए" हार्ड वर्क इज की ऑफ़ सक्सेस" एक सही मुहावरा हो जायेगा .जिसमे काम ख़राब होने पर या मुनाफा न होने पर जिम्मेदारी उसकी नहीं होगी बल्कि मालिक या ठेकेदार की होगी . उसे अपने दिए गए समय का निर्धारित मूल्य मिलेगा .

दूसरी तरफ अमीर मानसिकता के लोगों को पता है कि जो वस्तु ज्यादा उपलब्ध होती है उसके रेट कम होते है और जो वस्तु कम उपलब्ध होती है उसके रेट ज्यादा होते है ये मांग और आपूर्ति का मामला है .श्रम की आपूर्ति बहुत ज्यादा है मांग से भी बहुत ज्यादा लेकिन परिणाम की आपूर्ति मांग से बहुत कम है.लिहाजा वे अपनी वित्तीय शिक्षा की बदौलत श्रम न बेचकर परिणाम बेचते है और परिणाम बेचने के लिए मजदूरों को इकट्ठे करकर उनसे रिजल्ट लेना होता है ,वो मज़दूरों से मेहनत करवाने के लिए मैनेजर टाइप का कोई बंदा अपॉइंट करते है और परिणाम प्राप्त करते है . चूँकि वो खुद कुछ नहीं करते उनके सारे काम उनका मैनेजर करता है लिहाजा उनके लिए " हार्डवर्क इज की ऑफ़ सक्सेस " एक गलत मुहावरा हो जायेगा .ऐसे लोगों के लिए सही मुहावरा " स्मार्टवर्क इज की ऑफ़ सक्सेस " होता है क्योंकि ये काम को स्मार्ट तरीके से करते है .इनकी शुरू में नेटवर्क बनाने की मेहनत ही हार्डवर्क होती है , नेटवर्क बनाने के बाद ये अपनी जिम्मेदारियाँ दूसरों पर छोड़ते जाते है और खुद किसी अगले स्मार्टवर्क की तरफ मूव करते है .

अगले किसी प्रोजेक्ट में मजदूरों का नेटवर्क बनाने के लिए इनका मैनेजर इनके पास रहता है और ये एक के बाद एक इस तरह के प्रोजेक्ट करते जाते है . अगर इस कांसेप्ट को आप बराबर समझ जाते है तो ये आपके समझ में आ जायेगा कि अमीर ज्यादा अमीर क्यों बनते जाते है .

वैसे भी कहावत है आपको पहला लाख बनाने में टाइम,मेहनत,दिमाग लगाना पड़ता है फिर अगला लाख बनाने में वक्त नहीं लगता क्योंकि तब आपको लाख बनाने का फार्मूला पता हो जाता है .
सुबोध
आभार सहित निम्न ब्लॉग से लिया गया है
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149 . सही या गलत -निर्णय आपका !पार्टनरशिप से अलग होने के बाद - पार्टनरशिप   चाहे वो बिज़नेस की हो या ज़िन्दगी की .......तु...
25/11/2014

149 . सही या गलत -निर्णय आपका !

पार्टनरशिप से अलग होने के बाद - पार्टनरशिप चाहे वो बिज़नेस की हो या ज़िन्दगी की .......

तुम्हारे फ़्रस्ट्रेशन की वजह मैं नहीं हूँ ,मैं तो सिर्फ तुम्हारे फ्रस्ट्रेशन का शिकार हूँ .जब हम अलग हुए थे -ज़िन्दगी में एक लम्बी दूरी साथ-साथ चलने के बाद , तब तुमने ज़िन्दगी भर की उपलब्धियाँ इकट्ठी करकर दो ढेरियां लगाई थी और कहा था एक तुम चुन लो दूसरी ढेरी मेरी हुई - यानी तुम्हारी निगाहों में दोनों ही ढेरियों का मूल्य एक जैसा था . मैंने वो ढेरी चुनी जिससे मुझे लगता था कि मेरे नेचर के अनुसार ये ढेरी मेरे लिए उपयुक्त है और दूसरी ढेरी तुम्हारी हो गई ,ज़माने में जब ये बात उघड़ी तो जो मेरे वाक़िफ़कार थे उनको मेरा चुनाव बेवकूफी भरा लगा था मैंने उन्हें समझाया कि बँटबारा उन चीज़ों का हुआ है जो हम दोनों ने मिलकर जुटाई है , चीज़ें बनाने के दरमियान काबिलियत भी बनती -बिगड़ती है , और काबिलियत का बंटवारा होना मुमकिन नहीं .

तुमने ज़िन्दगी भर चीज़ें बनाई थी और मैंने चीज़ें सम्हाली थी यानि तुम्हारी काबिलियत थी चीज़ें बनाना और मेरी काबिलियत थी चीज़ें सम्हालना.तुम्हारा अहंकार उस झगडे की मुख्य वजह था जिसमे अधिकार ये था कि चूँकि चीज़ें मैंने बनाई है इसलिए ये मेरी मिलकियत है और चूँकि सालो-साल साथ में रहे थे सो नतीजे के तौर पर दोनों में बंटवारा बराबर -बराबर का हुआ , और दो ढेरियों में से एक तुम्हारी हो गई और एक मेरी और बंटवारे को आज पांच साल भी नहीं गुजरे है कि तुम फ्रस्ट्रेड हो गए हो क्योंकि जो भी तुमने बंटवारा करकर हासिल किया था या इस दरमियान जो भी नया बनाया था / है वो सारे का सारा बिखर गया है / बिखर रहा है .

जबकि मैंने, मैं स्वीकार करता हूँ हमारे बनाये सिस्टम में कोई भी मोटा बदलाव नहीं किया, नया मैंने खास कुछ नहीं बनाया लेकिन जो बनाया हुआ था उसे अपनी काबिलियत के मुताबिक सम्हाला और बने-बनाये सिस्टम की गुडविल की वजह से कस्टमर बढ़ते गए / अच्छे लोग मुझसे जुड़ते गए और मेरा शुमार सफल लोगों में होने लगा ,क्या इसमें मेरी गलती थी ? मैंने वो चुना था जिसकी काबिलियत मुझमे थी जो किसी भी बिज़नेस का / ज़िन्दगी का सेकंड पार्ट होता है लेकिन सबसे महत्त्वपूर्ण पार्ट होता है और तुम तो कभी भी अमूनन सेकंड पार्ट को मैनेज करने के लिए बैठे ही नहीं थे.

तुम गहराई में जाकर खुद को क्यों नहीं जांचते कि तुम्हारी हार की वजह तुम खुद हो, तुम्हारा अहंकार है ,जहाँ भाव "अहम ब्रम्हास्मि" वाला है - कि मैं ही निर्माता हूँ मैं ही सब-कुछ हूँ . तुम इस बात को क्यों नहीं समझते कि चीज़ें बनानेवाली काबिलियत से ज्यादा महत्व चीज़ें सही तरीके से सम्हालने का होता है और वो काबिलियत तुम में थी ही नहीं ,तुम्हारी हार की वजह कोई गलत ढेरी का चुनाव नहीं था बल्कि ढेरी को सम्हाल न पाने की नाक़ाबिलियत थी. मैं दावे से कह सकता हूँ कि अगर तुम दूसरी ढेरी का चुनाव भी करते तो भी तुम्हारा हारना निश्चित था क्योंकि तुम में दुसरे भाग वाली काबिलियत ही नहीं थी - जो लम्बी ग्रोथ के लिए पहली आवश्यकता होती है .
सुबोध - नवंबर २५, २०१४

148 . सही या गलत -निर्णय आपका !भविष्य का गरीब जानने का प्रयास करता है ,एक बुक और पढ़ लूँ ,एक वीडियो और देख लूँ,एक मुलाकात...
20/11/2014

148 . सही या गलत -निर्णय आपका !

भविष्य का गरीब जानने का प्रयास करता है ,एक बुक और पढ़ लूँ ,एक वीडियो और देख लूँ,एक मुलाकात और कर लूँ ,इस प्रोजेक्ट में कहीं कोई कमी नहीं रह जाए ,ये भी जान लूँ,वो भी जान लूँ ,और इस जानने के चक्कर में हरी बत्ती लाल हो जाती है और वो जानता ही रहता है ,इसे आप सोच का लकवा भी कह सकते है कि आदमी सिर्फ और सिर्फ जानकारियां इकट्ठी करता रहता है ,ज्ञान बटोरता रहता है लेकिन जाने हुए का उपयोग नहीं करता ,एक डर,एक खौफ ,एक भय काफी कुछ जानने के बाद भी उसमे रहता है कि कहीं कुछ ऐसा तो नहीं है जिसे मैं नहीं जानता क्योंकि उसने यही सुना,समझा और सीखा है कि अज्ञान से बड़ा कोई शत्रु नहीं होता .

भविष्य का अमीर भी जानने का प्रयास करता है लेकिन वो जानता है कि बुक पढ़ने से,वीडियो देखने से या किसी से मुलाकात करने से मैं सब कुछ नहीं जान पाउँगा ,जब तक मैं खुद शुरू नहीं करूँगा कोई भी मेरी मदद नहीं कर पायेगा ,तैरना सीखने के बारे में पचासों बुक पढ़ने से या ढेरों वीडियो देखने से या किसी ओलम्पिक गोल्ड मेडलिस्ट से मुलाकात करने के बाद भी मैं तब तक तैरना नहीं सीख सकता जब तक मैं खुद को स्विमिंग पूल में नहीं उतारता हूँ , और उसे पता होता है कि जब तक दो- चार बार मैं नाक में ,मुहँ में पानी नहीं भर लूंगा तब तक मेरे तैराक बनने की संभावनाएं न के बराबर है .लिहाजा वो जीतनी शीघ्रता से जानकारियां इकट्ठी कर पाता है करता है और अपने प्रोजेक्ट को शुरू कर देता है और जैसे जैसे समस्याएं आती है वैसे-वैसे उनके समाधान निकालता रहता है .वो जानता है महत्त्वपूर्ण जानना नहीं है जाने हुए का इस्तेमाल करना है .

और जहाँ तक अमीर की बात है उसके पास पहले से ही सम्बंधित विषय पर पूरी जानकारी वाली टीम मौजूद होती है क्योंकि वो दूसरे व्यक्ति का समय खरीदते है और दूसरे व्यक्ति का पैसा इस्तेमाल करते है जो अमीरी की राह की सबसे बड़ी जरूरत होती है ( इस बारे में पोस्ट 75 पढ़ें )
सुबोध
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147 . सही या गलत -निर्णय आपका !आनेवाले आर्थिक परिवर्तन,नए-नए आविष्कार ,टेक्नोलॉजी के चमत्कार जहाँ कुछ ठहरे हुए लोगों को ...
19/11/2014

147 . सही या गलत -निर्णय आपका !
आनेवाले आर्थिक परिवर्तन,नए-नए आविष्कार ,टेक्नोलॉजी के चमत्कार जहाँ कुछ ठहरे हुए लोगों को भयभीत करते है वही कुछ लोगों के लिए नए अवसर ,चमकदार रोशनी, खूबसूरत सुबह की शुरुआत करते है .

जिनका दिमाग खुला है ,जिनमे लचीलापन है ,जो नया जानने,समझने और करने को तैयार है वही इस युग में पैसा बना पाएंगे अन्यथा तो सिर्फ रोटी ही कमा पाएंगे और वो भी शायद .

जितने ज्यादा बदलाव और शीघ्रता से उन बदलावों का फैलाव इस युग में हो रहा है उतना पहले कभी भी नहीं हुआ इसकी बड़ी वजह सूचना क्रांति युग है .

औद्योगिक युग के ढांचे की, तब की कुछ आवश्यकताएं आज विलासिता बन गयी है और कुछ नासमझ आज भी उन्हें ढ़ो रहे है .ये वही लोग है जो विकास के तेज परिवर्तन की आँधी को स्वीकार नहीं कर पा रहे है . कुछ इस लिए कि उन्हें अपने कम्फर्ट जोन को तोडना पड़ेगा और कुछ इस लिए कि पुराने ढांचे से जो उन्होंने पैसे के रिसाव का श्रोत बनाया था वो सूख जायेगा .वे अपने छोटे फायदे के लिए बड़े नुकसान को " हाँ " कर रहे है .

परिवर्तन जब भी होते है , अपने साथ पूँजी की, सत्ता की , सुविधाओं की बहुत बड़ी अदला-बदली भी लेकर आते है ,अगर आपने खुद को आने वाले परिवर्तन के लिए तैयार कर लिया है तो आने वाला समय आपका है ,जहाज जो बंदरगाह छोड़ चूका उसका अफ़सोस मत कीजिये ,आनेवाले समय में एक नया शिकार नजर आयेगा आप निशाना तैयार रखे . खुद को शिक्षित करें - खास तौर पर वित्तीय शिक्षा प्राप्त करें, अमीर वही बन पाएंगे जो वित्तीय तौर पर शिक्षित होंगे क्योंकि इस युग में पैसे आने के जितने रास्ते है उससे ज्यादा रास्ते पैसे के जाने के है .
- सुबोध
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अमीर यु हीं अमीर नहीं होता (४)ख्वाइश इतनी सीकि हालात बेहतर हो जाएमेरा आरामदेह क्षेत्र (comfort  zone  ) रहे सुरक्षितइस स...
16/11/2014

अमीर यु हीं अमीर नहीं होता (४)

ख्वाइश इतनी सी
कि हालात बेहतर हो जाए
मेरा आरामदेह क्षेत्र (comfort zone ) रहे सुरक्षित
इस सोच की वजह से
कोशिशें होती है आधी-अधूरी.
शुभचिंतकों की
असफलता की फिक्र
फुला देती है हाथ-पाँव .
काम की शुरुआत
अकेले से होती है
ख़त्म २-४ पर होती है.
इस्तेमाल किये जाते है
औद्यौगिक युग के औज़ार,
पेड़ काटने के लिए कुल्हाड़ी .
हर काम /उपाय/कोशिश होते है छोटे
ज़ाहिर है सफल होने पर
सफलता भी
प्रयासों के अनुरूप ही परिणाम देगी
लिहाज़ा छोटे क़दमों की सफलता
किसी कोने में दुबकी रह जाती है
क्योंकि जो छोटा सोचते है
वो गरीब होते है .....
-
उन्हें झोंकना पड़ता है
अपना सब कुछ ,
सब कुछ माने सब कुछ -
समय,
ऊर्जा,
मेहनत,
पूँजी,
हार न मानने का ज़ज़्बा ,
काबिलियत.
नकारना होता है
समाज/दोस्तों का खौफ,
मज़ा आरामदेह क्षेत्र का.
शुरुआत होती है अकेले से
लेकिन जोड़ लेते है
पूरी टीम ,पूरा नेटवर्क.
इस्तेमाल किये जाते है
आधुनिक युग के औज़ार,
पेड़ काटने के लिए इलेक्ट्रिक आरी .
हार उनके दिमाग में
मौत की तरह होती है
लिहाज़ा तैयार होते है कई
वैकल्पिक रास्ते.
हारेंगे तो
शुरुआत करेंगे नए सिरे से.
जीतेंगे तो जश्न मनाएंगे....
और वो मानते है जश्न
क्योंकि जो बड़ा सोचते है
वो अमीर होते है .

सुबोध- ३० मई, २०१४
आभार सहित निम्न ब्लॉग से लिया गया है-
http://subodhchamkeelepal.blogspot.in/

145 . सही या गलत -निर्णय आपका !अगर आप गलती करते हो और अपनी गलती को समझ नहीं पाते हो तो उसे बर्बादी की शुरुवात समझो और अग...
12/11/2014

145 . सही या गलत -निर्णय आपका !

अगर आप गलती करते हो और अपनी गलती को समझ नहीं पाते हो तो उसे बर्बादी की शुरुवात समझो और अगर अपनी गलती को समझ लेते हो ,स्वीकार कर लेते हो तो उसे फला हुआ आशीर्वाद मानो क्योंकि आपके दिल ने , आपके दिमाग ने आपको इतनी शक्ति दी है कि आप अपनी गलती स्वीकार कर पा रहे हो .ध्यान रहे सुधार हमेशा स्वीकार के बाद होता है ,अब आपके अच्छे दिन शुरू हो गए है कि आप गलतियों को स्वीकारने लगे है ,जिम्मेदारी लेने लगे है .

अगर आप कोई उपलब्धि हासिल कर लेते हो तो आप नई ऊंचाइयां पाने जा रहे हो क्योंकि उस फार्मूले को समझना जिससे उपलब्धियां हासिल होती है बहुत बड़ी उपलब्धि है ,उसे बार -बार दोहराया जा सकता है बिलकुल वैसे ही जैसे कि पहला लाख बनाने का फार्मूला समझने के बाद अमीर बनना उतना मुश्किल नहीं रह जाता जितना पहला लाख बनाना था.

आप हारे या जीते ,एक बार की हार या जीत से बहुत ज्यादा फर्क नहीं पड़ता ,फर्क इस बात से पड़ता है कि आपने अपनी हार से या जीत से सीखा क्या है और फर्क इससे पड़ता है कि आपने अपनी हार को जीत में बदलना सीखा है या नहीं और फर्क इससे पड़ता कि आपने अपनी जीत का फार्मूला बराबर याद करकर उसे बार-बार दोहराया है या नहीं !!!

क्योंकि हार कर जीतना और उस जीत को बार-बार दोहराना ही आपको आपकी सपनो की दुनिया की सैर करवाएगा - सतरंगी सपनो की दुनिया की सैर !!!

आइये शुरू करें क्योंकि डरकर ठहरने से ज्यादा या सोच के लकवे से ग्रस्त होकर जीने से ज्यादा महत्त्वपूर्ण शुरुआत करना है, शुरू करे उस एक अंजानी दुनिया को खंगालना जो अनछुए-अनचीन्हे उपलब्धियों भरे संसार तक ले जाती है और वहां पूरी तरह सही होने का प्रेशर अपने ऊपर नहीं रखे , अगर गलती होती है तो उसे स्वीकार करे ,सुधार करे, हार को जीत में बदले और जीत को दुबारा जीत में और फिर एक और जीत में .....

लम्बी से लम्बी दूरी तय करना मुश्किल नहीं होता, मुश्किल पहला कदम उठाना होता है !!!!
-सुबोध
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33 . पैसा बोलता है ...अगर अमीरी आपके लिए महत्त्वपूर्ण  है तो क्या ये आपके डेली के कामों में प्रायोरिटी रखती है ?क्या आप ...
11/11/2014

33 . पैसा बोलता है ...
अगर अमीरी आपके लिए महत्त्वपूर्ण है तो क्या ये आपके डेली के कामों में प्रायोरिटी रखती है ?

क्या आप हर रोज़ ऐसा कुछ अलग कर रहे है जिससे आप अमीरी तक पहुँच सके ?

अमीरी या गरीबी मेरी निगाहों में भाग्य की बात नहीं है ये आपके सतत प्रयासों का नतीजा होती है, आपके कर्म से निर्धारित होती है .गरीबी और अमीरी दोनों ही आपके कामों का परिणाम है -कुछ ऐसे काम जिन्हे अमुक तरीके से करना चाहिए और कुछ ऐसे काम जो नहीं करने चाहिए ये सही- सही जानना ही आपकी अमीरी और ये नहीं जानना ही आपकी गरीबी की बुनियाद है .

महत्त्वपूर्ण ये है कि आप ये कैसे जानेंगे कि कौनसा काम करना चाहिए और कौन सा नहीं करना चाहिए ?

इसके लिए आपको खुद को लगातार शिक्षित करना पड़ेगा. ये जानना पड़ेगा कि अमीरों की सोच,उनकी भावनाएं ,उनकी कार्यपद्धति क्या है और वो जैसी भी है वैसी क्यों है , उनकी सोच एक निर्धारित पैटर्न पर ही क्यों है ,वो ऐसी किन चीज़ों पर जोर देते है जिन्हे नेग्लेक्ट करना भारी पड़ सकता है !

आपको पढ़ कर शायद आश्चर्य हो कि अमीरों की सोच गरीबों की सोच से सिर्फ हलकी सी अलग नहीं होती है बल्कि तकरीबन विपरीत होती है .

गरीबों के लिए जो शब्द महत्व पूर्ण होते है उनका अमीरों के लिए कोई महत्व ही नहीं होता बल्कि कई मामलों में तो गरीबों के लिए जो दर्दभरा अनुभव होता है अमीरों के लिए वो अपनी संपत्ति बढ़ाने का अवसर होता है ,जैसे खरीदने के समय महँगाई . या जैसे बेचने के टाइम मंदी . दोनों ही स्थिति में गरीब कुछ खोता है और अमीर पैसा बनाता है .

गरीब जिस चीज़ की सबसे ज्यादा परवाह करता है वो है नौकरी की सुरक्षा .जबकि नौकरी करने का एक सीधा से मतलब है आप अपने श्रम से किसी दूसरे को अमीर बना रहे हो और अमीर और गरीब में सबसे बड़ा फर्क ये नज़र आता है कि अमीरों को नौकरी करना ही समझ में नहीं आता . लिहाजा वे एम्प्लोयी न बनकर एम्प्लायर बनते है. नौकरी करते नहीं है बल्कि करवाते है .

कुछ लोग इस बात को समझ जाते है कि ज़िन्दगी में लम्बी ग्रोथ के लिए आपको अपना खुद का व्यवसाय करना पड़ेगा ,अगर अमीर बनना है तो एम्प्लायर बनना पड़ेगा , खुद का बिज़नेस करना पड़ेगा और वो ऐसा ही करते है .

वो कोई बिज़नेस शुरू करते है और असफल हो जाते है , क्यों ?

ऐसा क्यों होता है कि कोई किसी लाइन में जाकर भयंकर पैसा पैदा करता है और कोई लगाई हुई पूँजी भी गवां बैठता है ?

जिस तरह गरीब आदमी पैसे के सिद्धांतों को नहीं समझ पाता उसी तरह ये असफल बिजनेसमैन बिज़नेस के सिद्धांतों को नहीं समझ पाते .मैं उन असफल बिजनेसमैन को गरीब और सफल बिजनेसमैन को अमीर कहूँगा .

गरीब प्रोडक्ट बेहतर करने का प्रयास करता है कि मेरा प्रोडक्ट ,मेरी क्वालिटी अच्छी हो ,वो अपनी पूरी एनर्जी,पूरी ताकत प्रोडक्ट बेहतर बनाने में लगा देता है जबकि अमीर प्रोडक्ट पर नहीं टीम बनाने पर काम करता है वो एक प्रॉपर सिस्टम बनाने पर काम करता है ,टीम को शिक्षित करने ,क्लाइंट को संतुष्ट करने , मार्केटिंग करने पर मेहनत करता है वो जानता है कि प्रोडक्ट महत्वपूर्ण है लेकिन वो ये भी जानता है कि प्रोडक्ट से ज्यादा महत्व प्रेजेंटेशन का है ,मार्केटिंग का है,कस्टमर केयर सपोर्ट सिस्टम का है .

गरीब का विज़न बड़ा नहीं होता वो एक स्टोर जिस पर उसने खुद बैठना है वही तक सोच रखता है लिहाजा वो एक पूरा सिस्टम बनाने की सोच नहीं रखता है और इसी की वजह से वो मार खाता है वो हर चीज़ की जिम्मेदारी खुद उठाना चाहता है और इसी वजह से अपने नीचे एक जवाबदेह समूह तैयार नहीं कर पाता. हकीकत में उसके अंदर अभी भी एक नौकर छुपा हुआ है ,वो बिज़नेस के नाम पर नौकरी करता है . जबकि अमीर सबसे पहले,हाँ प्रोडक्ट से भी पहले एक जवाबदेह समूह तैयार करता है .

गरीब सबसे पहले खुद को पेमेंट देना चाहता है , वो व्यवसाय के मूल सिद्धांत को भूल गया है या हो सकता कि उसे पता ही नहीं हो कि बिजनेसमैन को बिज़नेस के शुरू में नहीं सबसे आखिर में और सबसे ज्यादा भुगतान मिलता है .

गरीब को जानना चाहिए कि बिज़नेस में सबसे पहले इंफ्रास्ट्रक्चर पर होने वाले खर्चे निकाले जाते है. फिर एम्प्लोयी को , फिर उन प्रोफेशनल सेवाएं देने वालों को जिनकी बदौलत कंपनी ग्रो कर रही है, फिर उन निवेशकों को जिन्होंने उस पर, उसके कॉन्सेप्ट पर भरोसा करकर उसकी कंपनी में पैसा लगाया है ,पेमेंट दिया जाता है और तब जो बचता है वो उसको मिलता है और वही उसे लेना चाहिए - अमीर बिजनेसमैन यही करते है !

जबकि होता ये है कि गरीब सबसे पहले खुद को पेमेंट करता है फिर अपने शौक को,अपनी इच्छाओं को पूरा करता है - वो प्रॉफिट के साथ-साथ प्रिंसिपल अमाउंट का भी कुछ हिस्सा खर्च कर देता है ( कई मर्तवा तो वो निवेशकों तक के पैसे का भी इस्तेमाल कर लेता है ) और तब नंबर उन लोगों का आता है जिनके पेमेंट का उस पर सबसे ज्यादा प्रेशर होता है ,लिहाजा कंपनी की पेमेंट को लेकर साख बिगड़ती जाती है , सप्लायर उनको माल देने में हिला-हवाली करते है या लेट देते है या मना कर देते है ,एम्प्लोयी उन्हें छोड़ कर चले जाते है और अंततः जो होना चाहिए था वो होता है ,वह असफल होकर या तो नए बिज़नेस की तलाश शुरू कर देता है या अपने सुरक्षित खोल में लौट जाता है उसी पुरानी या उससे मिलती-जुलती नौकरी में.

और भी बहुत सी वजहें है जो किसी गरीब मानसिकता के व्यक्ति को गरीबी के दलदल से निकलने नहीं देती - उन के बारे में किसी अगली पोस्ट में ....
-सुबोध
आभार सहित निम्न ब्लॉग से लिया गया है
http://ameerbane.blogspot.in/

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