Pandit Rajesh Sharma Astrologer

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04/09/2022
भगवान श्री राम को 14 वर्ष का वनवास हुआ तो उनकी पत्नी माँ सीता ने भी सहर्ष वनवास स्वीकार कर लिया।परन्तु बचपन से ही बड़े भा...
11/08/2022

भगवान श्री राम को 14 वर्ष का वनवास हुआ तो उनकी पत्नी माँ सीता ने भी सहर्ष वनवास स्वीकार कर लिया।
परन्तु बचपन से ही बड़े भाई की सेवा मे रहने वाले लक्ष्मण जी कैसे राम जी से दूर हो जाते! माता सुमित्रा से तो उन्होंने आज्ञा ले ली थी, वन जाने की.. परन्तु जब पत्नी उर्मिला के कक्ष की ओर बढ़ रहे थे तो सोच रहे थे कि माँ ने तो आज्ञा दे दी, परन्तु उर्मिला को कैसे समझाऊंगा!! क्या कहूंगा!! यदि बिना बताए जाऊंगा तो रो रोके जान दे देगी और यदि बताया तो साथ जाने की ज़िद्द करने लगेगी और कहेगी कि यदि सीता जी अपने पति के साथ जा सकती हैं तो मैं क्यों नहीं!!

यहीं सोच विचार करके लक्ष्मण जी जैसे ही अपने कक्ष में पहुंचे तो देखा कि उर्मिला जी आरती का थाल लेके खड़ी थीं और बोलीं- "आप मेरी चिंता छोड़ प्रभु की सेवा में वन को जाओ। मैं आपको नहीं रोकुंगीं। मेरे कारण आपकी सेवा में कोई बाधा न आये, इसलिये साथ जाने की जिद्द भी नहीं करूंगी।"

लक्ष्मण जी को कहने में संकोच हो रहा था। परन्तु उनके कुछ कहने से पहले ही उर्मिला जी ने उन्हें संकोच से बाहर निकाल दिया।

वास्तव में यहीं पत्नी का धर्म है। पति संकोच में पड़े, उससे पहले ही पत्नी उसके मन की बात जानकर उसे संकोच से बाहर कर दे!

पत्नी का इतना त्याग और प्रेम देखकर लक्ष्मण जी भी रो पड़े। उर्मिला जी ने एक दीपक जलाया और विनती की कि मेरी इस आस को कभी बुझने नहीं देना।

लक्ष्मण जी तो चले गये परन्तु 14 वर्ष तक उर्मिला जी ने एक तपस्विनी की भांति कठोर तप किया। वन में भैया-भाभी की सेवा में लक्ष्मण जी कभी सोये नहीं परन्तु उर्मिला ने भी अपने महलों के द्वार कभी बंद नहीं किये और सारी रात जाग जागकर उस दीपक की लौ को बुझने नहीं दिया।

मेघनाथ से युद्ध करते हुए जब लक्ष्मण को शक्ति लग जाती है और हनुमान जी उनके लिये संजीवनी का पहाड़ लेके लौट रहे होते हैं, तो बीच में अयोध्या में भरत जी उन्हें राक्षस समझकर बाण मारते हैं और हनुमान जी गिर जाते हैं। तब हनुमान जी सारा वृत्तांत सुनाते हैं कि सीता जी को रावण ले गया, लक्ष्मण जी मूर्छित हैं।

यह सुनते ही कौशल्या जी कहती हैं कि राम को कहना कि लक्ष्मण के बिना अयोध्या में पैर भी मत रखना। राम वन में ही रहे।

माता सुमित्रा कहती हैं कि राम से कहना कि कोई बात नहीं। अभी शत्रुघ्न है। मैं उसे भेज दूंगी। मेरे दोनों पुत्र राम सेवा के लिये ही तो जन्मे है

समस्त प्रदेश वासियों और श्रद्धालुओं को श्रावण मास की शिवरात्रि की हृदय से बधाई एवं अनंत शुभकामनाएं।भगवान भोलेनाथ की कृपा...
26/07/2022

समस्त प्रदेश वासियों और श्रद्धालुओं को श्रावण मास की शिवरात्रि की हृदय से बधाई एवं अनंत शुभकामनाएं।

भगवान भोलेनाथ की कृपा चराचर जगत पर बनी रहे, यही प्रार्थना है।

ॐ नमः शिवाय।
🙏 पंडित राजेश शर्मा ज्योतिषी 🙏

समस्त प्रदेश वासियों को पावन गुरु पूर्णिमा की हार्दिक बधाई।सभ्यताओं का उदय, संस्कृतियों का उत्कर्ष व महान विभूतियों का न...
13/07/2022

समस्त प्रदेश वासियों को पावन गुरु पूर्णिमा की हार्दिक बधाई।

सभ्यताओं का उदय, संस्कृतियों का उत्कर्ष व महान विभूतियों का निर्माण पूज्य गुरुजनों के आशीर्वाद व मार्गदर्शन में ही होता है।

अपने तप, त्याग और ज्ञान के आलोक से मानव समाज का उद्धार कर रहे सभी देवतुल्य गुरुजनों को नमन।

जगन्नाथजी के महाप्रसाद की कथाएक दिन नारदमुनि कैलाश पर्वत पर शिवजी के दर्शन करने पहुँचे और उन्होंने श्रीकृष्ण एवं उद्धवजी...
01/07/2022

जगन्नाथजी के महाप्रसाद की कथा

एक दिन नारदमुनि कैलाश पर्वत पर शिवजी के दर्शन करने पहुँचे और उन्होंने श्रीकृष्ण एवं उद्धवजी के बीच की वार्तालाप कर वर्णन उनके समक्ष किया।

इस प्रसंग में उद्धव जी भगवान के महाप्रसाद की महिमा गान करते हुए कहते हैं – 'हे भगवन! आपकी महाप्रसादी माला, सुगन्धित तेल, वस्त्रों और आभूषणों और आपके उच्छिष्ठ भोजन को स्वीकार करने से आपके भक्त आपकी मायाशक्ति पर विजय प्राप्त कर लेते हैं।'

यह सुनकर नारदमुनि कहते हैं – 'हे कैलाशपति यह सुनकर मेरे ह्रदय में भगवान् विष्णु का महाप्रसाद चखने की तीव्र उत्कंठा जागृत हुई है। इस आशा से मैं वैकुण्ठ गया और पूर्ण भक्ति भाव से माता लक्ष्मी की सेवा करने लगा।

बारह वर्षों तक सेवा करने के पश्चात् एक दिन माता लक्ष्मी ने मुझसे पूछा - ‘नारद! मैं तुम्हारी सेवा से अत्यंत प्रसन्न हूँ। तुम मनचाहा वर मांग लो।'

यह सुनकर नादरजी ने विनय भाव से कहा - 'हे माता! अनंतकाल से मेरे हृदय में इस बात को लेकर पीड़ा है कि मैंने आज तक कभी भगवान विष्णु के महाप्रसाद का आस्वादन नहीं किया है। कृपया मेरी यह अभिलाषा पूरी कर दीजिये।'

यह सुनकर माता लक्ष्मी देवी दुविधा में पड़ गईं। कहने लगीं - 'परन्तु नारदजी, मेरे स्वामी ने मुझे कठोर निर्देश दिए हैं कि उनका महाप्रसाद किसी को भी न दिया जाए। मैं उनकी आज्ञा का उल्लंघन कैसे कर सकती हूँ पर तुम्हारे लिए मैं अवश्य कुछ व्यवस्था करूँगी।'

कुछ समय पश्चात् माता लक्ष्मी ने भगवान विष्णु से अपने हृदय की बात कही और बताया कि, किस तरह उन्होंने भूलवश नारदमुनि को भगवान का महाप्रसाद देने का वचन दे दिया है।

यह सुनकर भगवान विष्णु ने कहा - 'हे प्रिये! तुमने बड़ी भारी भूल की है परन्तु अब क्या किया जा सकता है। तुम नारदमुनि को मेरी अनुपस्थिति में मेरा महाप्रसाद दे सकती हो।'

नारदमुनि ने आगे कहा - 'हे महादेव, आप विश्वास नहीं करेंगे, महाप्रसाद के मात्र स्पर्श से मेरा तेज और आध्यात्मिक शक्ति सौ गुना बढ़ गई। मैं दिव्य भाव का अनुभव करने लगा और सुनाने यहाँ आया हूँ।'


यह सुनकर कैलाशपति महादेव कहते हैं - 'हे नारद! निश्चित ही तुम्हारा तेज आलौकिक है परन्तु तुमने ऐसे दुर्लभ महाप्रसाद का एक कण भी मेरे लिए नहीं रखा?'

यह सुनकर नारदमुनि लज्जित हो जाते हैं परन्तु तभी उन्हें स्मरण हुआ कि उनके पास अभी भी थोड़ा महाप्रसाद बचा हुआ है। उन्होंने तुरन्त उसे महादेव को दिया जिसे उन्होंने अत्यन्त सम्मानपूर्वक स्वीकार कर लिया।

उसे ग्रहण करते ही श्रीकृष्ण प्रेम में मस्त होकर भगवान शिव नृत्य करने लगे। उनके नृत्य की थिरकन से धरा हिलने लगी और भूकम्प सा अनुभव होने लगा।

भयभीत होकर माता पृथ्वी ने माता पार्वती से महादेव को शांत करने का निवेदन किया।

बहुत कठिनाई से माता पार्वती ने शिवजी को शांत किया और फिर उनसे इस उन्मत नृत्य करने का कारण पूछा तो शिवजी ने इसका कारण बताया।

यह सुनकर माता पर्वती रुष्ठ होकर बोलीं - 'स्वामी! आपको महाप्रसाद मुझे भी देना चाहिए था क्या आप नहीं जानते मेरा नाम वैष्णवी है। आज मैं प्रतिज्ञा लेती हूँ कि यदि भगवान श्रीहरि मुझ पर अपनी करुणा दिखाएंगे तो मैं प्रयास करुँगी की उनका महाप्रसाद ब्रह्मांड के प्रत्येक व्यक्ति, देवता और यहाँ तक की सभी प्राणियों को भी प्राप्त होगा।

तभी आश्चर्यजनक रूप से उसी क्षण भगवान विष्णु माता पर्वती के वचन की रक्षा हेतु वहाँ प्रकट हुए और बोले - 'हे देवी पार्वती! मैं आपको वचन देता हूँ कि मैं स्वयं तुम्हारी प्रतिज्ञा को पूर्ण करूँगा और पुरुषोत्तम क्षेत्र जगन्नाथ पुरी में प्रकट होऊँगा और ब्रह्माण्ड में प्रत्येक जीव को अपना महाप्रसाद प्रदान करूँगा।

इसीलिए आज भी जगन्नाथ मन्दिर में भगवान जगन्नाथ को भोग लगाने के पश्चात सर्वप्रथम प्रसाद विमलादेवी (माता पार्वती) के मन्दिर में अर्पित किया जाता है और यही कारण है कि कोई भी भक्त प्रसाद कभी भी अर्चा विग्रह के सामने बैठकर ग्रहण नहीं करता है।

"जय श्री जगन्नाथजी"

काॅपी पेस्ट

महा प्रसाद, महाप्रभु श्री जगन्नाथ पुरी 🚩 आचार्य राजेश पंडित ज्योतिषी 🚩

महाप्रभु श्री जगन्नाथ जी की पावन रथ यात्रा के शुभारंभ की सभी प्रदेश वासियों व श्रद्धालुओं को हार्दिक बधाई।भगवान जगन्नाथ ...
01/07/2022

महाप्रभु श्री जगन्नाथ जी की पावन रथ यात्रा के शुभारंभ की सभी प्रदेश वासियों व श्रद्धालुओं को हार्दिक बधाई।

भगवान जगन्नाथ जी की कृपा सम्पूर्ण सृष्टि पर बनी रहे। सभी का जीवन शांति, समृद्धि व आरोग्यता से परिपूर्ण हो।

प्रभु की यह रथ यात्रा चराचर जगत के लिए मंगलकारी हो।

जय जगन्नाथ!
🚩 आचार्य राजेश पंडित ज्योतिषी 🚩

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