Bharatiya Vedantric Kendra

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अपनी कुंडली देखना सीखें यह एक ऑनलाइन लाइव ट्रेनिंग कार्यक्रम है जिसके माध्यम से आप घर पर बैठ कर एस्ट्रोलॉजी सीख सकते हैं...
15/03/2020

अपनी कुंडली देखना सीखें

यह एक ऑनलाइन लाइव ट्रेनिंग कार्यक्रम है जिसके माध्यम से आप घर पर बैठ कर एस्ट्रोलॉजी सीख सकते हैं

कार्यक्रम की अवधि: 3 माह (सप्ताह में 3 ऑनलाइन सैशन)
कार्यक्रम का शुल्क: रु. 3,000/-

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अधिक जानकारी के लिये Whatsapp # 9816091160 पर सम्पर्क करें

यह ट्रेनिंग आशीष भगोरिया द्वारा दी जाएगी | आशीष भगोरिया एक मैनेजमेंट और टेक्नोलॉजी कंसलटेंट हैं | आशीष भगोरिया ने ज्योतिष का अध्ययन भारत के विशिष्ट गुरुजनों के सानिध्य में किया है | इस कार्यक्रम में आपको फलित ज्योतिष का अध्ययन करवाया जायेगा |

About Ashish Bhagoria, a Learner of Astrology

Ashish Bhagoria is a Management and Technology Consultant. He started learning Astrology in 2007 from Dr Madan Mohan Pathak, presently posted as HoD - Astrology, Rashtriya Sanskrit Sansthan, Lucknow Campus. Ashish took Mantra Diksha from Jyotishacharya Prabhunath Mishra in 2009 and continued learning Astrology under his guidance. Dr P.V.B. Subrahmanyam, presently posted as HoD - Astrology, Rashtriya Sanskrit Sansthan, Vedavyas Campus gave many opportunities to Ashish to apply astrological concepts practically and to take part in various research workshops where Ashish submitted his research papers on Astrology.

Ashish finds himself fortunate to have such great Astrologers as his Gurus in his life who are always there to guide him and strengthen his knowledge.

Ashish applies Nakshatra System and Narayan Dasha System while analyzing horoscopes. His focus is on Relationship, Marriage, Career, Finance and Corporate Astrology. Ashish also conducts short-term courses on Astrology where students learn concepts of Phalit Jyotish from him.

In this Program, Ashish Bhagoria will share his knowledge and experience on Phalit Jyotish (Predictive Astrology) with you. You will learn Horoscope Analysis in this training. This training will be an online training for 3 Months. There will be 3 live one-to-one Sessions every week.

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Do you need Astrology Solution and Remedy related to Business and Profession? You can speak to our Expert Astrologer: As...
04/02/2020

Do you need Astrology Solution and Remedy related to Business and Profession? You can speak to our Expert Astrologer: Ashish Bhagoria and get a 30 minutes telephonic-consultation to discuss your problems in detail.

Consultation Charges: Rs 999

Please confirm your Name, Date of Birth, Time of Birth, Place of Birth, Your Problem and Phone Number through Whatsapp or SMS at 9816091160 after making the payment on this link https://imjo.in/gvPZdk

10/06/2017

WHAT IS VEDIC ASTROLOGY?

is an ancient Indian science which explains planetary motions and positions with respect to time and their effect on humans and other entities on earth. Vedic astrology can be traced thousands of years back. Early Vedic astrology was only based on the movement of planets with respect to stars, but later on it started including zodiac signs as well. According to Vedic astrology there are 27 constellations made up of 12 zodiac signs, 9 planets and 12 houses with each house and planet representing some aspect of human life. Depending on when a person is born, the 12 signs are distributed among the 12 houses and 9 planets are placed in various houses. This visual representation of the snapshot of the signs and planets is called a horoscope chart. Vedic astrology is study of interpreting the meaning of these arrangements as it applies to humans and other entities.

25/01/2017

ज्योतिष विभाग, वेदव्यास परिसर, राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान, बलाहर, हिमाचल प्रदेश द्वारा आयोजित साप्ताहिक राष्ट्रिय ज्योतिष कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य विज्ञान व ज्योतिष के विषय पर विचारविमर्श व् परिचर्चा है | इस सन्दर्भ में शोधपत्रों का वाचन भी एक उद्देश्य है। प्रतिदिन कम से कम तीन शोधपत्र प्रस्तुत किये जायेंगे | ज्योतिष विषय में रुचि रखने वाले व्यक्ति, शोधकर्ता व अध्यापक इस कार्यशाला में निशुल्क भाग ले सकते हैं और शोध पत्र भी प्रस्तुत कर सकते हैं | कार्यक्रम अवधि 17 मार्च से 24 मार्च, 2017 अधिक जानकारी के लिए सम्पर्क करें : 9805034336
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Registration Form: https://goo.gl/forms/n9LI4tMrFUxgEa8X2

We welcome Pandit Prabhunath Mishra as Chairman of Bharatiya Vedantric Kendra
02/01/2017

We welcome Pandit Prabhunath Mishra as Chairman of Bharatiya Vedantric Kendra

यदि आप अपने प्रेम, विवाह या जीवन साथी के साथ सम्बन्धों जैसी समस्याओं का समाधान चाहते हैं तो आप हमारी कुंडली विश्लेषण सेव...
30/12/2016

यदि आप अपने प्रेम, विवाह या जीवन साथी के साथ सम्बन्धों जैसी समस्याओं का समाधान चाहते हैं तो आप हमारी कुंडली विश्लेषण सेवा का लाभ ले सकते हैं | आपको हमें मैसेज द्वारा अपनी जन्म तिथि, समय व् स्थान बताना होगा | हमारे विशेषज्ञ से आपकी फ़ोन पर बात करवाई जाएगी |

*आपकी पहचान व् अन्य जानकारी गोपनीय रखी जाएगी |

आप हमारे ऑनलाइन लिंक से पेमेंट कर सकते हैं |

26/11/2016

जुड़वा बच्चों का भविष्य एक समान क्यों नहीं होता? यह प्रश्न अक्सर चर्चा का विषय रहा है कि यदि दो बच्चों का जन्म एक ही स्थान, एक ही दिन और एक ही समय में हुआ है तो उनका जीवन भी एक जैसा क्यों नही होता। यूनिसेफ संस्था की गणना के अनुसार पूरे विश्व में प्रतिदिन औसतन तीन लाख त्रेपन हज़ार बच्चों का जन्म होता है। जिस के अनुसार दो सौ पचपन बच्चे प्रति मिनट या चार से पांच बच्चे प्रति सेकंड पैदा हो रहे हैं। फिर भी सभी का भविष्य एक दूसरे से अलग क्यों होता है | ज्योतिष गणना के लिए जन्म स्थान, जन्म तिथि व् जन्म समय की आवश्यकता होती है। यदि इन आंकड़ो में यह भी मान लिया जाय कि इन बच्चों का जन्म स्थान अलग - अलग रहा होगा तब भी जुड़वाँ बच्चों का जन्म स्थान तो एक ही रहता है और एक ही गर्भ से पैदा होते हैं फिर दो जुड़वाँ बच्चों का भविष्य एक समान होना चाहिए लेकिन ऐसा नहीं होता और कई बार तो एक बच्चे की जन्म के समय ही मृत्यु हो जाती है और दूसरा बच्चा स्वस्थ और दीर्घ आयु ले कर खुशहाल जीवन व्यतीत करता है |

जीवविज्ञान के अनुसार एक ही गर्भावस्था में पैदा होने वाली दो संतानों को जुड़वाँ (ट्विन) कहा जाता है | जुड़वाँ संतानों के मुख्यतः दो प्रकार होते हैं; द्वियुग्मनज (डाईज़ाईगोटिक या फ्रैटर्नल ट्विन) तथा एकयुग्मनज (मोनोज़ाईगोटिक या आइडेंटिकल ट्विन(| फ्रैटर्नल ट्विन दो अलग – अलग अन्डो में दो अलग शुक्राणुओ द्वारा बने दो भ्रूणों से बनते हैं जबकि आइडेंटिकल ट्विन एक ही जाइगोट (युग्मनज) के विभाजित होने से बने दो भ्रूणों द्वारा उत्पन्न होते होते है अर्थात् एक ही अंडे में शुक्राणु के विभाजन से | फ्रैटर्नल ट्विन या द्वियुग्मनज जुड़वाँ अक्सर अलग लिंग के होते हैं और इनका ब्लड ग्रुप भी अलग होता है जबकि आइडेंटिकल ट्विन या एकयुग्मनज जुड़वाँ एक ही लिंग के होते हैं और इनका ब्लड ग्रुप भी समान होता है |

फ्रैटर्नल ट्विन या द्वियुग्मनज जुड़वाँ में तो जीव का अंश - शुक्राणु भी दो अलग होते हैं जिस के कारण एक सन्तान दूसरी सन्तान से भिन्न होती है और स्वाभाविक है कि उनका जीवन भी भिन्न होगा | लेकिन आइडेंटिकल ट्विन या एकयुग्मनज संताने तो एक ही जीव के अंश यानि एक ही शुक्राणु से उत्पन होती हैं जिनका लिंग, ब्लड ग्रुप व् चेहरे की संरचना भी समान होती है तो उनके जीवन में पायी जाने वाली भिन्नताओं का क्या कारण रहता है | यहाँ पर इस बात पर ध्यान देना भी आवश्यक है कि किसी भी जीव के विकास में उसकी परिस्थिति व् वातावरण का महत्वपूर्ण प्रभाव रहता है | बच्चे के जन्म के पश्चात् तो आइडेंटिकल ट्विन या एकयुग्मनज जुड़वाँ भी अलग – अलग वातावरण एवं परिस्थितियों में विक्सित होते हैं लेकिन गर्भ के भीतर भी इनके विकास में स्थिति स्थिर नही रहती जो कि बच्चे के हिलने जुलने जैसी क्रियाओं से बदलती रहती है | यही कारण भी है कि इस संसार में उत्पन किसी भी प्राणी के फिंगर प्रिंट (उन्गलिओं के निशान) किसी दुसरे प्राणी से नही मिलते फिर चाहे वो आइडेंटिकल ट्विन या एकयुग्मनज जुड़वाँ ही क्यों न हो | हस्तरेखा से भविष्य जानने के रहस्य को भी इसी लिए खोजा गया था | प्राकृतिक रूप से उत्पन्न कोई भी एक वस्तु हमेशा दूसरी से भिन्न होगी यह प्रकृति का नियम है | एक ही बीज और जड़ से उत्पन्न पौधे की भी सभी टहनियां और पत्ते कभी एक समान नही होते | केवल कृत्रिम रूप में नियन्त्रित परिस्थिति व् वातावरण में मशीनों द्वारा एक समान वस्तुएं तैयार की जा सकती हैं | सौर मंडल में उपस्थित पिण्ड व् ग्रह एक ही सूर्य से उत्पन्न होने पर भी अलग हैं और अलग प्रभाव देते हैं |

आध्यात्मिक दृष्टिकोण से कर्म सिद्धांत व् जन्म, पूर्व जन्म एवं पुनर्जन्म भी एक कारण है जिस से प्रत्येक व्यक्ति अपने किये कर्मों के अनुसार जीवन में परिणाम भोगता है और हर एक जीव आत्मा दूसरी जीव आत्मा से भिन्न होती है |
यदि हम ज्योतिष विद्या के अध्ययन द्वारा भविष्य ज्ञात करने का प्रयास करें तो यह अनिवार्य है कि हम सही जन्म समय के आधार पर गणना करें | ज्योतिष विषय काल गणना का विषय है जिस में समय सबसे अधिक महत्वपूर्ण बिंदु है | समय की सूक्षम गणना के आधार पर ही ग्रहों की सटीक स्थिति का पता लगता है और जन्म कुण्डलीं बनाई जाती है | आधुनिक समय में जन्म समय मिनट या अधिक से अधिक सेकंड तक ही परिकलित किया जाता है | जबकि ज्योतिष में ग्रह, तारों या अन्य खगोलीय पिण्डों की चाल, गति, दूरी व् स्थिति निर्धारित करने के लिए सिडीरियल टाइम या नक्षत्र समय का प्रयोग किया जाता है जिसका वर्णन वेदों व् सूर्य सिद्धान्त में दिया गया है | इस पद्वति द्वारा समय को सूक्ष्म रूप में वर्गीकृत किया है जिस से पृथ्वी से तारों की गणना वैज्ञानिक मापदंड पर भी सही हो सके | इस पद्वति के अनुसार समय को मूहर्त, घटी, पल, विपल, प्राण, लीक्षक, लव, रेणु व् त्रुटी जैसी सूक्ष्म इकाईयों तक विभाजित किया है | समय की सबसे सूक्ष्म इकाई त्रुटी एक सेकंड के बत्तीस लाख चालीस हजारवें हिस्से के बराबर होती है | यदि जुड़वाँ बच्चों के जन्म समय को सेकंड अथवा मिली सेकंड तक भी जान लिया जाय तब भी यह तय कर पाना की काल कौन सी त्रुटी में था, यह असम्भव ही है क्योंकि एक सेकंड में बत्तीस लाख चालीस हज़ार त्रुटी होगी |

यदि दो जुड़वां बच्चों का जन्म समय एक ही मान लिया जाये तो क्या एक ही कुण्डली को दो बार देखने से अलग – अलग विश्लेषण या परिणाम प्राप्त होगा | यह धारणा बिलकुल गलत है की जुड़वाँ बच्चों का जन्म समय समान होता है | गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड के अनुसार विश्व में जुड़वाँ बच्चों के जन्म समय की अवधि में सबसे कम समय का अंतर एक मिनट का दर्ज हुआ है जो कि केसेंड्रा फ्लोरेस नामक अमरीकी महिला ने सेंट जोसफ हॉस्पिटल केलिफोर्निया में 9 जुलाई 2013 को 13:39 व् 13:40 बजे जुड़वाँ बच्चों को जन्म देने पर हुआ है | इसी प्रकार एक पंद्रह वर्ष तक की गयी एक जर्मन शोध के अनुसार जुड़वाँ बच्चों के जन्म समय में औसत अवधि का अंतर 13.5 मिनट का पाया गया है जिस से साबित होता है कि ज्योतिष दृष्टिकोण से भी जुड़वाँ बच्चों का भविष्य व् जीवन एक समान नही हो सकता क्योंकि उनका जन्म समय जो ज्योतिष का आधार है, कभी एक समान नही होता |

इन सभी कारणों से चाहे वह जीवविज्ञान से सम्बन्धित हों, प्रकृति की रचना, कर्म सिद्धांत, पूर्व जन्म का परिणाम, भाग्य, हस्तरेखा या ज्योतिष विषय हो, यह निश्चित होता है कि प्रत्येक व्यक्ति का जीवन और भविष्य कभी दूसरे व्यक्ति के समान नही हो सकता चाहे वह जुड़वाँ ही क्यों न हों |
- आशीष भगोरिया

13/09/2016

9 सितम्बर से लेकर 7 अक्टूबर तक गुरु ग्रह अस्त रहेगा
18 सितम्बर तक शुक्र नीच रहेगा
30 अगस्त से लेकर 22 सितम्बर तक बुध भी वक्री रहेगा
16 सितम्बर तक सूर्य और राहु का ग्रहण दोष रहेगा
18 सितम्बर तक मंगल और शनि का अंगारक दोष रहेगा

21/06/2016
06/03/2016

?सभी मन्त्रों के रचयता केवल शिव हैं। तंत्र की रचना भी स्वयं शिव ने की। यंत्र भी शिव की ही रचना है। ध्यान, योग, तप, सिद्धि और समाधी, ये सब क्रियाएँ और अवस्थाएं शिव की ही हैं। संगीत और नृत्य भी शिव से ही उत्पन्न हुए हैं। तो क्या शिव आराधना के पश्चात किसी भी प्रकार के जप, पूजा, कर्मकांड, यज्ञ, भजन और कीर्तन की आवश्यकता रह जाती है?

अब थोड़ा और करीब से समझिये। प्रथम पूजनीय गणपति के पिता शिव हैं। नव दुर्गा और दस महाविद्याएं शिव की ही शक्तियां हैं। सबसे पवित्र गंगा शिव के शीश से ही उत्पन्न होती है। चन्द्र जो धरती की परिक्रमा करते हैं, भी शिव के मस्तक पर विराजमान हैं। धरती में विराजमान सब पशु, नाग, गण आदि शिव के अधीन हैं। पंच तत्व जल, अग्नि, वायु, पृथ्वी और आकाश कैलाश पति शिव के पंचाक्षर मन्त्र के अंश हैं। सभी नवग्रह शिव की आराधना करते हैं। शिव भैरव हैं शिव हनुमान हैं शिव ही वेद हैं । महाकाल भी शिव हैं अर्थात काल या समय शिव के अनुसार हे चलता है। प्रकृति, जिसके बिना जीवन की कल्पना भी संभव नहीं है, शिव की अर्धांगिनी हैं। देवता भी शिव की उपासना करते हैं और दैत्य भी । तो अब यह भी समझना और अनिवार्य है कि यदि शिव की आराधना की जाए तो क्या किसी और की आराधना की आवश्यकता शेष रहती है

26/01/2016

॥ चमत्कारचिन्तामणिः भत्तनारायणकृतः ॥

ओंसर्वविघ्नहर्त्रे श्रीगनेशायनमः ।
श्रीसूर्यादिनवग्रहेभ्योनमः ।
अथ मालवियदय्वज्ञधर्मेश्वरकृत अन्वयार्थप्रबोधप्रदीपटीकासहित
श्रीनारायणभत्त-कृत चमत्कार-चिन्तामणिः
श्रीदुर्गाशरणाख्या मणिप्रभाटीका-टिप्पणी सम्पादकीया
अथ ग्रन्थकर्तुः भत्तनारायणस्य मङ्गलाचरणम् -
लसत् पीतपट्टाम्बरं कृष्णचन्द्रं मुदाराधयाऽलिङ्गतं विद्युतेव ।
धनं सम्प्रणभ्यात्र नारायणाख्यः चमत्कारचिन्तामणिं सम्प्रवक्ष्ये ॥ १॥

क्वणत् किङ्किण्णीजाल कोलाहलाढ्यं लसत् पीतवासोवसानं चलन्तम् ।
यशोदाङ्गणे योगिनामप्यगम्यं भजेऽहं मुकुन्दं धनश्यामवर्णम् ॥ २॥

चतुर्लक्षज्योतिर्महाम्बोधिमुच्चैः प्रमध्यैव विद्वद्जनानन्दहेतोः ।
परं युक्तिरम्यं सुसंक्षिप्तशब्दं भुजङ्गप्रयातैः प्रबन्धं करोमि ॥ ३॥

न चेत् खेचराः स्थापिताः किं भचक्रे न चेत् स्पष्टगाः स्थापिताः किं ग्रहेन्द्रैः ।
अभावोदिता स्पष्टाकोऽत्रहेतुः फलैरेवपूर्वं ब्रुवे तानि तस्मात् ॥ ४॥

अथ सूर्यफलम् -
तनुस्थो रविः तुङ्गयष्टिं विधत्ते मनः सन्तपेत् दारदायादवर्गात् ।
वपुः पीड्यते वातपित्तेन नित्यंस वै प्रयटन् ह्रासवृद्धिं प्रयाति ॥ १॥

धनभाव -
धने यस्य भानुः स भाग्याधिकः स्यात् चतुष्पात् सुखं सद्व्यये स्वं च याति ।
कुटुम्बे कलिः जायया जायतेऽपि क्रिया निष्फला याति लाभस्य हेतोः ॥ २॥

तृतीय भाव फल -
तृतीये यदोऽहर्मणिर्जन्मकाले प्रतापाधिकं विक्रमं चाऽ।तनोति ।
तदा सोदरैस्तप्यते तीर्थचारी सदोऽरिक्षयः सङ्गरे शं नरेशात् ॥ ३॥

चतुर्थभावफल -
तुरीये दिनेशेऽतिशोभाधिकारी जनः संल्लभेत् विग्रहे बन्धुतोऽपि ।
प्रवासी विपक्षाहवे मानभङ्गं कदाचिन्न शान्तं भवेत् तस्य चेतः ॥ ४॥

पञ्चमभाव -
सुतस्थानगे पूर्वजन्मापत्यतापी कुशाग्रामतिः भास्करे मन्त्रविद्या ।
रतिः वञ्चने सञ्चकोऽपि प्रमादी मृतः क्रोडरोगादिजा भावनीया ॥ ५॥

षष्ट्ःअभाव -
रिपुध्वंसकृद्भास्करो यस्य षष्ठे तनोति व्ययं राजतो मित्रतोऽपि ।
कुले मातुरापद् चतुष्पादतोवा प्रयाणे निषादैः विषादं करोति ॥ ६॥

सप्तमभाव -
द्युनाथो यदा द्युनजातो नरस्य प्रियातापनं पिडपीडा च चिन्ता ।
भवेत् तुच्छलब्धिः क्रयेविक्रयेऽपि प्रतिस्पर्धया नैति निद्राङ्कदाचित् ॥ ७॥

अष्टमभाव -
क्रिया लम्पटं त्वष्टमे कष्टभाजं विदेशीयदारान् भजेद् वाप्यवस्तु ।
वसुक्षीणता दस्यु तो वा विलम्वाद् विपद् गुह्यतां भानुरुग्रां विधत्ते ॥ ८॥

नवमभाव -
दिवानायके दुष्टा कोणयाते न चाप्नोति चिन्ता विरामोऽस्य् चेतः ।
तपश्चर्ययाऽनिच्छयाऽपि प्रयाति क्रियातुङ्गतां तप्यते सोदरेण ॥ ९॥

दशमभाव -
प्रयार्तोऽशुभान् यस्य मेषूरणेऽस्य श्रमः सिधिदो राजतुल्यो नरस्य ।
जन्न्यास्तथा यातनामातनोतिक्लमः सङ्क्रमेत् बल्लभैः विप्रयोगः ॥ १०॥

एकादशभाव -
रवौ संल्लभेत् स्वं च लाभोपयाते नृपद्वारतो राजमुद्राधिकारात् ।
प्रतापानले शत्रवः सम्पतन्ति श्रियोऽनेकधा दुःखमङ्गोद्भवानाम् ॥ ११॥

द्वादशभाव -
रविर्द्वादशे नेत्रदोषं करोति विपक्षाहवे जायतेऽसौ जयश्रीः ।
स्थितिर्लब्धया लीयते देहदुःखं पितृव्यापदो हानिरध्वप्रदेशे ॥ १२॥

अथ चन्द्रफल
प्रथमस्थान का चन्द्र
विधुर्गोकुलीराजगः सन् वपुस्थो धनाध्यक्षलावण्यमानन्दपूर्णम् ।
विधते धनं क्षीणदेहं दरिद्रं जडं श्रोत्रहीनं शेषलग्ने ॥ १॥

द्वितीयभाव का चन्द्र -
हिमांशौ वसुस्थानगे धान्यलाभः शरीरेऽतिसौख्यं विलासोऽगनानाम् ।
कुटुम्बे रतिः जायते तस्य तुच्छं वशं दर्शने याति देवाङ्गनाऽपि ॥ २॥

तृतीयभाव का चन्द्र -
विधौ विक्रमे विक्रमेर्णैति वित्तं तपस्वी भवेद्भामिनी रञ्जितोऽपि ।
कियच् चिन्तयेत् साहजं तस्यशर्म प्रतापोज्ज्वलो धर्मिणो वैजयन्त्या ॥ ३॥

अथ चतुर्थ चन्द्र फल -
यदा बन्धुग वान्धवैरत्रिजन्मा नृपद्वारि सर्वाधिकारी सदैव ।
वयस्यादिमे तादृशं नैव सौख्यं सुतस्त्रीगणात् तोप मायाति सम्यक् ॥ ४॥

अथ पञ्चम चन्द्र फल -
यदा पञ्चमे यस्य नक्षत्रनाथो ददातीह सन्तानसन्तोषमेव ।
मतिनिर्मलां रत्नलाभं च भूमिं कुसीदेन नानाप्तयो व्यावसायात् ॥ ५॥

अथ छठे भाव में चन्द्र का फल -
रिपौ राजते विग्रहेणाऽपि राजा जितास्तेऽपि भूयो विधौ सम्भवन्ति ।
तदग्रेऽरयोनिष्प्रभा भूयसोऽपि प्रतापोज्वलो मातृशीलोनतद्वत् ॥ ६॥

अथ सप्तम चन्द्र फल -
ददेद् दारशं सप्तमे शीतरश्मिः धनित्वं भवेद्ध्ववाणिज्यतोऽपि ।
रतिं स्त्रीजने मिष्टभुक् लुब्धचेताः कृशः कृष्णपक्षे विपक्षाभिभूतः ॥ ७॥

अष्टमभावस्थित चन्द्र का भावफल -
सभा विद्यते भैषजी तस्यगेहे पचेत् कर्हिचित् क्वाथमुद्गोदकानि ।
महाव्याधयो भीतयो वारिभूताः शशीक्लेशकृत् सङ्कटान्यष्टमस्थः ॥ ८॥

नवमभावस्थित चन्द्र का फलः -
तपोभावगस्तारकेशो जनस्य प्रजाश्च द्विजाः वेदिनः तं स्तुवन्ति ।
भवत्येव भाग्याधिको यौवनादेः शरीरे सुखं चन्द्रवत् साहसं च ॥ ९॥

दशमभावस्थित चन्द्रफल -
सुखं वान्धवेभ्यः खगे धर्मकर्मा समुद्राङ्गजेशं नरेशादितोऽपि ।
नवीनाङ्गना वैभवे सुप्रियत्वं पुरा जातके सौख्यमल्पं करोति ॥ १०॥

एकादशभावस्थित चन्द्रफल -
लभद् भूमिपादिदुना लभगेन प्रतिष्ठाधिकाराम्बराणि क्रमेण ।
श्रियोऽथस्त्रियोऽन्तःपुरे विश्रमन्ति क्रिया वैकृती कन्यका वस्तुलाभः ॥ ११॥

द्वादशभावस्थित चन्द्रफल -
शशी द्वादशे शत्रुनेत्रादिचिन्ता विचिन्त्या सदा सद्व्ययो मङ्गलेन ।
पितृव्यादि मात्रादितोऽन्तविषादो न चाप्नोति कामं प्रियाल्पप्रियत्वम् ॥ १२॥

अथ भौमस्य लग्नादि द्वादशभाव फलम्
विलग्ने कुजे दण्डलोहाग्निभीतिस्तपेन् मानसं केसरी किं द्वितीयः ।
कलत्रादिघतः शिरोनेत्रपीडा विपाकेफलानां सदैवोपसर्गः ॥ १॥

भवेत्तस्य किं विद्यमाने कुतुम्बे धनेऽङ्गारके यस्य लब्धे धने किम् ।
यथा त्रायते मर्कटः कण्ठहारं पुनः सम्भुखं को भवेद् वादभग्नः ॥ २॥

कुतो बाहुवीर्यं कुतो बाहुलक्ष्मीस्तृतीयो न चेन् मङ्गलो मानवानाम् ।
सहोत्थव्यथा भण्यते केन नेषां तपश्चर्ययाआ चोपहास्यः कथं स्यात् ॥ ३॥

यदा भूसुतः सम्भवेत्तुर्यभावे तदा किं ग्रहाः सानुकूला जनानाम् ।
सुहृद्वर्गसौख्यंनकिञ्चित् विचिन्त्यं कृपावस्त्रभूमीः लभेद्भूमिपालात् ॥ ४॥

कुजे पञ्चम जाठराग्निर्वलीयान् न जातं न जान्त निहन्त्येक एव ।
तदानीमनल्पा मतिः किल्विषेऽपि स्ययं दुग्धवत् तप्यतेऽन्तः सदैव ॥ ५॥

न तिष्ठन्ति षष्ठेऽरयोऽङ्गारके वै तदङ्गैरिताः सङ्गरे शक्तिमन्तः ।
मनीषी सुखी मातुलेयो न तद्वन् विलीयेत वित्तं लभेत्तापि भूरि ॥ ६॥

अनुद्धारभूतेन पाणिग्रहेण प्रयाणेन वाणिज्य तो नो निवृत्तिः ।
मुहुर्भगदः स्पर्धिनां मेदिनीजः प्रहारार्दनैः सप्तमे दम्पतिघ्नः ॥ ७॥

शुभास्तस्य किं खेचराः कुर्युरन्ये विधानेऽपिचेदष्टमे भूमिसूनुः ।
सखा किं न शत्रुयते सत्कृतोऽपि प्रयत्नेकृते भूयते चोपसर्गेः ॥ ८॥

महोग्रा मतिर्भग्यवित्तं महोग्रं तपोभाग्यगो मङ्गलस्तत् करोति ।
भवेन्नादियः श्यालकः सोदरो वा कुतो विक्रमस्तुच्छलाभे विपाके ॥ ९॥

कुले तस्य किं मङ्गलं मङ्गलोनो जनैर्भूयते मध्यभावे यदि स्यात् ।
स्वतः सिद्ध एवावतंसीयतेऽसौ वराकोऽपि कण्ठीरवः किं द्वितीयः ॥ १०॥

कुजः पीडयेल्लाभगोऽपत्यशत्रुन् भवेत् संमुखो दुर्मुखोऽपिप्रतापात् ।
धनं वर्धते गोधनैः वाहनैर्वा सकृच्छून्यतार्थे च पैशुन्यभावात् ॥ ११॥

शताक्षोऽपि तत् सक्षतो लोहघानैः कुजो द्वादशोऽर्थस्य नाशं करोति ।
मृपा किंवदन्ती भयं दस्युतो वा कलिः पारधी हेतु दुःखं विचिन्त्यम् ॥ १२॥

अथ बुधस्य लग्नादि द्वादशभावफलम् -
बुधो मूर्तिगो मार्जयेदन्यरिष्टंवरिष्टाधिया वैखरी वृत्तिभाजः ।
जना दिव्यचामीकरीभूतदेहाश्चिकित्साविदो दुश्चिकित्स्या भवन्ति ॥ १॥

धने बुद्धिमान् बोधने बाहुतेजाः सभासङ्गतो भासते व्यास एव ।
पृथूदारता कल्पवृक्षस्य तद्वद् बुधैर्भण्यते भोगतः षट्पदोऽयम् ॥ २॥

तृतीय भाव -
वणिङ्मित्रता पण्यकृद्वृत्तिशीलो वशित्वं धियो दुर्वशानामुपैति ।
विनीतोऽतिभोगं भजेत् संन्यसेद्धा तृतीयेऽनुजैराश्रितो ज्ञे लताबान् ॥ ३॥

चतुर्थभाव
चतुर्थे चरेत् चन्द्रजश्चारु मित्रो विशेषाधिकृद् भूमिनाथो गणस्य ।
भवेल् लेखको लिख्यते वा तदुक्तं तदाशापरः पैतृकं नो धनं च ॥ ४॥

पञ्चमभाव
वयस्यादिमे पुत्रगर्भो न तिष्ठेत् भवेत् तस्य मेधाऽर्थसंवादयित्री ।
बुधैर्भण्यते पञ्चमे रोहिणेये कियद् विद्यते कैतवस्याभिचारम् ॥ ५॥

षष्ट्ःअभाव -
विरोधो जनानां निरोधो रिपुणां प्रबोधो यतीनां च रोधोऽनिलानां ।
बुधे सद्व्यये व्यावहारो निधीनां बलादर्थकृत् सम्भवेच्छत्रुभावे ॥ ६॥

सप्तमभाव -
सुतः शीतगोः सप्तमे शं युवत्या विधत्ते तथा तुच्छ वीर्यं च भोगे ।
जतस्तं गतो हेमवद् देहशोभां न शक्रोति सत्सम्पदो वानुकर्तुम् ॥ ७॥

अष्टमभाव -
शतञ्जीविनो रन्ध्रगे राजपुत्रे भवन्तीह देशान्तरे विश्रुतस्ते ।
निधानं नृपद् विक्रयाद् वा लभन्ते युवत्युद्भवं क्रीडनं प्रीतिमन्तः ॥ ८॥

नवमभाव -
बुधे धर्मगे धर्मशीलोऽतिधीमान् भवेद् दीक्षितः स्वर्धुनीस्नातकोवा ।
कुलोद्योतकृद्भानुवद भूमिपालात् प्रतापाधिको वाधको दुर्मुखानाम् ॥ ९॥

दशमभाव -
मितं संवदेन्नो मितं मंलभेत् प्रमादादिवैकारि सौराजवृत्तिः ।
बुधे कर्मगे पूजनोयो विशेपात् पितुः सम्पदो नीतिदण्डाधिकारात् ॥ १०॥

एकादशभाव -
विना लाभभावस्थितं भेशजातं न लाभो न लावण्यमानृण्यमस्ति ।
कुतः कन्यकोद्वाहदानं च देयं कथं भूसुरास्त्यक्ततृष्णा भवन्ति ॥ ११॥

द्वादशभाव -
न चेद् द्वादशे यस्य शीतांशुजातः कथं तद्गृहं भूमिदेवा भजन्ति ।
रणे वैरिणो भीतिभायान्ति कस्माद् हिरण्यादिकोशं शठः कोऽनुभूयात् ॥ १२॥

अथ गुरोः लग्नादि द्वादशभावफलम् -
गुरुत्वं गुणैर्लग्नगे देवपूज्ये सुवेशी शुखी दिव्यदेहोऽल्पवीर्यः ।
गतिर्भाविनी पारलोकी विचिन्त्या वसूनि व्ययं सम्बलेन ब्रजन्ति ॥ १॥

द्वितीयभावस्थ गुरुफलम्
कवित्वेमतिः दण्डनेतृत्वशक्तिः मुखे दोषधृक् शीघ्रभोगार्त एव ।
कुतुम्बे गुरौ कष्टतो द्रव्यलब्धिः सदा नो धनं विश्रमेद् यत्नतोऽपि ॥ २॥

तृतीयभावस्थ गुरुफल -
भवेद् यस्य दुश्चिक्यगो देवमन्त्री लघूनां लघीयान् सुखं सोदरा नाम् ।
कृतघ्नो भवेत् मित्र सार्थे न मैत्रि ललाटोदयेऽप्यर्थलाभो न तद्वत् ॥ ३॥

चतुर्थभावस्थ गुरुर्फल -
गृहद्वारतः श्रियते वाजिह्वेषा द्विजोच्चारितो वेदघोषोऽपि तद्वत् ।
प्रातिस्पर्द्धिनः कुर्वते पारिचार्य्यं चतुर्थे गुरौ सप्तमन्तर्गतञ्च ॥ ४॥

पञ्चमभावगत गुरु का फल -
विलासे मतिः बुद्धिगेदेवपूज्ये भवेज्जल्पकः कल्पको लेखको वा ।
निदाने सुते विद्यमानेऽति भूतिः फलोपद्रवः पक्वकाले फलस्य ॥ ५॥

षष्ठमस्थ गुरुफलम् -
रुजार्तो जनन्या रुजः सम्भवेयू रिपौ वाक्पतौ शत्रुहन्तृत्वमेति ।
वलादुद्धतः को रणे तस्य जेता महिष्यादिशर्मा न तन् मातुलानाम् ॥ ६॥

सप्तमभावस्थ गुरुफलम् -
मतिः तस्यबह्नी विभूतिश्चवह्नी रतिर्वैभवेद्भामिनीमवह्नीः ।
गुरुर्वर्गकृद् यस्य जामित्रभावे सम्पिडाधिकोऽखण्ड कन्दर्प एव ॥ ७॥

अष्टमभावस्थ गुरुर्फलम् -
चिरं नो वसेत् पैतृके चैवगेहे चिरस्थायिनो तद्गृहं तस्य देहम् ।
चिरं नो भवेत् तस्य नीरोगभङ्गं गुरुर्मृत्यगो तस्य वैकुण्ठगता ॥ ८॥

नवमभावस्थितगुरुफलम् -
चतुर्भूमिकं तद्गृहं तस्य भूमिपतेर्वल्लभोवल्लभा भूमिदेवाः ।
गुरौ धर्मगे बान्धवाः स्युर्विनीताः सदालस्यतोधर्मवैगुण्यकारी ॥ ९॥

दशमस्थगुरुफलम् -
ध्वजामण्डपे मन्दिरे चित्रशाला पितुः पूर्वजेभ्योऽपि तेजोऽधिकत्वम् ।
न तुष्टोभवेच्छमणा पुत्रकाणो पचेत् प्रत्यहं प्रस्थसामुद्रमन्नम् ॥ १०॥

एकादशभावस्थगुरुफलम् -
अकुप्यं च लाभे गुरौ किं न लभ्यं वदन्त्यष्टधीमन्त मन्ये मुनीन्द्राः ।
पितुः भारभृतः स्वाङ्गजास्तस्य पञ्च परार्थस्तदर्थो न चेद् वैभवाय ॥ ११॥

द्वादशस्थगुरुर्फलम् -
यशः कीदृशं सद्व्यये साभिमाने मतिः कीदृशी वञ्चनाचेत् परेषाम् ।
विधिः किदशोऽर्थस्त्य नाशो हि यने त्रयस्ते भवेयुः व्यये यस्य जीवः ॥ १२॥

प्रथमभावस्थ शुक्रफल -
समीचीनमङ्गं समीचीनमङ्गः ममीचीनवह्वङ्गना भोग युक्तः ।
समीचीनकर्मा समीचीनशर्मा समीचीन शुक्रो यदालग्नवर्ती ॥ १॥

द्वितीयभावगत शुक्रफल -
मुखं चारुभापं मनीषापि चार्विं मुखं चारु चारूणि वासांसि तस्य ।
कुटुम्बे स्थितः पूर्वदेवस्य पूज्यः कुटुम्बेन चारु चार्वगिकामः ॥ २॥

तृतीयभाव गतशुक्र का फल -
रतिः स्त्रीजने तस्य नो बन्धुनाशो गुरुर्यस्य दुशिक्यगो दानवानाम् ।
न पूर्णो भवेत् पुत्रसौख्येऽपि सेनापतिः कातरो दानसङ्ग्रामकाले ॥ ३॥

चतुर्थभाव का शुक्रफलः -
महित्वेऽधिको यस्य तुर्येऽऽसुरेज्यो जनैः किं जनैश्चापरैरुष्ट तुष्टैः ।
कियत् पोषयेत् जन्मतः सञ्जनन्या अधीनापि तोपायनैरेव पूर्णः ॥ ४॥

पञ्चमभाव का शुक्रफल -
सपुत्रेऽपि किं यस्य शुक्रो न पुत्रे प्रयासेन किं यत्नसम्पादितोऽर्थ ।
व्युदर्कं विना मन्त्रमिष्टाशनाभ्यामधीतेन किं चेत् कवित्वेन शक्तिः ॥ ५॥

षष्ठभावगत शुक्र का फल -
सदा दानवेज्ये सुधासिक्त शत्रुः व्ययः शत्रुगे चौत्तमौ तौ भवेताम् ।
विपद्येत सम्पादितं चापिकृत्यं तपेत् मन्त्रतः पूज्यसौख्यं न धत्ते ॥ ६॥

सप्तमभावगत शुक्र का फल -
कलत्रे कलत्रात् सुखं नोकलत्रात् कलत्रं तु शुक्रे भवेत् रत्नगर्भम् ।
विलासाधिको गण्यते च प्रवासी प्रयासात्पकः के न मुह्यति तस्मात् ॥ ७॥

अष्टमभावगत् शुक्र का फल -
जनः क्षुद्रवादी चिरञ्चारु जीवेत् चतुष्पात् सुखं दैत्यपूज्यो ददाति ।
जनुष्यष्टमे कष्टसाध्योजयार्थः पुनः वर्धते दीयमानं धनर्णम् ॥ ८॥

नवमभावस्थित शुक्र का फल -
भृगौत्रिकोणे पुरे के न पौराः कुमिदेन ये वृद्धिमस्मै ददीरन् ।
गृहज्ञाय्ते तस्यधर्मध्वजादेः सहोत्थादि सौख्यं शरीरे सुखं च ॥ ९॥

दशमभावगत शुक्र का फल -
भृगुः कर्मगोगोत्रवीर्यं । गोत्रबीजं । रूणद्धि क्षयार्थोभ्रमः किन्न आत्मीय एव ।
तुलामानतो हाटकं विप्रवृत्या जनाडम्बरैः प्रत्यहं वा विवादात् ॥ १०॥

एकादशभावस्थित शुक्र के फल -
भृगुः लाभगो यस्य लग्नात् सुरूपं महीपं च कुर्य्यच्च सम्यक् ।
लसत् कीर्ति सत्यानुरागं गुणाढ्यं महाभोगमैश्वर्ययुक्तम् सुशीलम् ॥ ११॥

व्ययस्थानगत शुक्र के फल -
कदाप्येति वित्तं विलीयेत् पित्तं सितो द्वादशे केलिसत्कर्म शर्मा ।
गुणानां च कीर्तेः क्षयं मित्रवैरं जनानां विरोधं सदोऽसौ करोति ॥ १२॥

शनेः लग्नादिद्वादशभावफलम्
शनि के प्रथमस्थान के फल -
धनेनातिपूर्णोऽतितृष्णो विवादी तनुस्थेऽर्कजे स्थूलदृष्टिर्नरः स्यात् ।
विपं दृष्टिजं स्वाधिकृत्व्याधिवाधाः स्वयं पीडितो मत्सरावेश एव ॥ १॥

धनभावस्थ शनि के फल -
सुखापेक्षया वर्जितोऽसौ कुटुम्बात् कुटुम्बे शनौ वस्तु कि किन भुक्ते ।
समं वक्ति मित्रेण तिक्तं वचोऽपि प्रसक्ति विना लोहकं को लभेत् ॥ २॥

तृतीयभावस्थ शनि के फल -
तृतीये शनौ शीतलं नैव चित्ताञ्जना दुद्यभाज्जायते युक्तमापी ।
अविघ्नं भवेत् कर्विचिन्नैवभाग्यं दृढाशः सुखी दुर्मुखः सत्कृतोऽपि ॥ ३॥

चतुर्थभावस्थ शनि के फल -
चतुर्थे शनौ पैकृतं याति दूरं धनं मन्दिरं बन्धुवर्गापवादः ।
पितुश्चापि मातुश्च सन्तापकारी गृहे वाहने हानयो वातरोगी
पऽम्च भावस्थ शनि के फल -
शनौ पञ्चमे च प्रजा हेतु दुःखी विभूतिचला तस्यबुद्धिर्न शुद्धा ।
रति दैवते शब्दशास्त्रे न तद्वत् कलिर्मित्रतो मन्त्रतः क्रोडपीडा ॥ ५॥

षष्ठथान के शनि के फल -
अरेर्भूपतेश्चौरतो भीतयः कि यदिनस्य पुत्रो भवेद् यस्य शत्रौ ।
न युद्धे भवेत्संमुखे तस्य योद्धा महिष्यादिकं मातुलानां विनाशः ॥ ६॥

सप्तमस्थान मे शनि के फल -
सुदारा न मित्रं चिरं चारु वित्तं शनौ द्युनगे दम्पती रोगयुक्तौ ।
अनुत्साहसन्तप्तकृद् हीनचेताः कुतोवीर्यवान् विह्वलो लोलुपः स्यात् ॥ ७॥

अष्टमस्थान मे शनि के फल -
वियोगो जनानां त्वनौपाधिकानां विनाशो धनानां स को यस्य न स्यान् ।
शनौ रन्ध्रगे व्याधितः क्षुद्रदर्शी तदग्रे जनः कैतवं कि करोतु ॥ ८॥

नवमस्थान में शनि के फल -
मतिस्तस्यत्तिक्ता न तिक्तं सुशीलं रतिर्योगशास्त्रे गुनोराजसः स्यात् ।
सुहृद्वर्गतो दुःखितो दीनबुद्ध्या शनिः धर्मगः कर्मकृत् संन्यसेद्धा ॥ ९॥

दशमस्थान मे शनि के फल -
अजातम्य मातापिता बाहुरेव वृथा मर्वतो दुष्ट कर्माधिपत्यात् ।
शनैरेहने कर्मगः शर्म मन्दो जये विग्रहे जीविकानां तु यस्य ॥ १०॥

लाभभावगत शनि के फल -
स्थिरं वित्तमायुः स्थिरं मानमं च स्थिरा नैव रोगादयो न स्थिराणि ।
अपत्यानि शूरः शतादेक एव प्रपञ्चाधिको लाभगे भानुपुत्रे ॥ ११॥

व्ययस्थान मे शनि के फल -
व्ययस्थे यदा सूर्यसूनौ नरः स्यादशूरोऽथवा निस्त्रयो मन्दनेत्रः ।
प्रसन्नो वहिः नोगृहे लग्नपश्चेद् व्ययस्थोरिपुध्वंसकृद् यग़्यभोक्ता ॥ १२॥

राहु के द्वादशभाव् फल -
स्ववाक्ये समर्थः परेषां प्रतापात् प्रभावात् समाच्छादयेत् स्वान् परार्थान् ।
तमोयस्य लग्ने स भग्नारिवीर्यः कलत्रेऽधृति भूरिदारोऽपि यायात् ॥ १॥

धनभावगत राहु के फल -
कुटुम्बे तमो नष्टभूतं कुटुम्बं मृषाभाषिता निर्भयो वित्तपालः ।
स्ववर्गप्रणाशो भयंशस्त्रतः चेदवश्यं खलेभ्यो लभेत् पारवश्यम् ॥ २॥

तृतीय भावस्थ राहु के फल -
न नागोऽथ सिंहो भुजाविक्रमेण प्रयाती ह सिंही सुते तत्समत्वम् ।
तृतीये जगत्सोदरत्वं समेति प्रयातोऽपि भाग्यं कुतो यत्न हेतुः ॥ ३॥

चतुर्थभावगत राहु के फल -
चतुर्थे तथं मातृनैरुर्ज्यदेहो हृदिज्वाल्या शीतलं किं वहिः स्यात् ।
स चेज्ञथा मेषगः कर्कगो वा बुधर्क्षेऽसुरो भूपतेर्वन्धुरेव ॥ ४॥

पञ्चभावगत्राहु के फल -
सुते तत्सुतोत्त्पति कृत् सिंहिकायाः सुतोभामिनिचिन्तया चित्ततापः ।
सति क्रोडरोगे किमाहारहेतुः प्रपञ्चन किं प्रापकन्दृष्टवर्ज्यम् ॥ ५॥

षष्ठभावगत राहु के फल -
वलं बुधिवीर्यं धनं तद्वशेन स्थितो वैरिभावेऽयेषां जनानाम् ।
रिपूणामरण्यं दहेदेव राहुः स्थिरं मानसं तत्तुला नो पृथिव्याम् ॥ ६॥

सप्तमभावगत राहु के फल -
विनाशंलभेयुः द्युने तद्युवत्यो रुजा धातुपाकादिना चन्द्रमर्दी ।
कटाहे यथा लोडयेत् जातवेदा वियोगापवादाः शर्मं न प्रयान्ति ॥ ७॥

अष्टम्भावगत राहु के फल -
नृपैः पण्डितैः वन्दितोनिन्दितः सकृद्भाग्यलाभोऽसकृद् भ्रंश एव ।
धनं जातकं तं जनाश्च त्यजन्ति श्रमग्रन्थि कृद्रन्ध्रगो व्रघ्नशत्रुः ॥ ८॥

नवमभावगत राहु के फल -
मनीषी कृतं न त्यजेत् बन्धुवर्गं सदा पालयेत् पूजितः याद्गुणैः स्वैः ।
सभाद्योतको यस्य चेत् त्रित्रिकोणे तमः कौतुकी देवतीर्थे दयालुः ॥ ९॥

दशमभावगत राहु के फल
सदाम्लेच्छसंसगेतोऽतीवगर्वं लभेत् मानिनी कामिनी भोगमुच्चैः ।
जनैर्व्याकुलोऽसौ सुखं नाधिशेते मदार्थव्ययी क्रूरकर्मा खगेऽगौ ॥ १०॥

एकादशथानगत राहु के फल -
सदा म्लेच्छतोऽर्थ लभेत् साभिमानः चरेत् किङ्करेण व्रजेत् किं विदेशम ।
परार्थाननर्थी हरेद् धूर्तबन्धुः सुतोत्पत्तिसौख्यं तमो लाभगश्चेत् ॥ ११॥

द्वादशभावगत राहु के फल -
तमो द्वादशे दीनताम्पार्श्वशूलं प्रयत्ने कृतेऽनर्थतमातनोति ।
खलैः मित्रतां साधुलोके रिपुत्वं विरामे मनोवाञ्छितार्थस्य सिद्धिम् ॥ १२॥

केतु के द्वादशभावफल -
प्रथम स्थानस्थ केतु फल -
तनुस्थः शिखी बान्धवक्लेशकर्ता तथा दुर्जनेभ्यो भयं व्याकुलत्वम् ।
कलत्रादिचिन्ता सदोद्वेगता च शरीरे व्यथा नैकधा मारुती स्यात् ॥ १॥

द्वितीय भावस्थित केतु फल -
धने केतुरव्यग्रता किं नरेशात् धनेधान्यनाशो मुखेरोगकृच्च ।
कुटुम्वाद् विरोधो वचाह् सत्कृतं वा भवेत् स्वेगृहे सौम्यगेहेऽतिसौख्यम् ॥ २॥

तृतीयस्थकेतु के फल -
शिखी विक्रमे शत्रुनाशं विवादं धनं भोगमैश्वर्यतेजोऽधिकं च ।
सुहृद्वर्गनाशं सदा बाहुपीडां भयोद्वेगचिन्ताऽकुलत्वं विधत्ते ॥ ३॥

चतुर्थस्थानगत केतु के फल -
चतुर्थे च मातुः सुखेनो कदाचित् सुहृद्वर्गतः पैतृकं नाशयेति ।
शस्त्री बन्धुवर्गात् सुखं स्वोच्चगेहे चिरं नो वसेत् स्वेगृहे व्यग्रताचेत् ॥ ४॥

पञ्चमस्थान के केतु का फल -
यदा पञ्चमे राहपुच्छं प्रयाति तदा सोदरे घातवातादिकष्टम् ।
स्वबुद्धिव्यथा सन्ततं स्वल्पपुत्रः स दासो भवेद् वीर्ययुक्तो नरोऽपि ॥ ५॥

षष्ठभावगत केतु के फल -
तमः षष्ठभागेगते षष्ठभावे भवेत् मातुलान् मनभङ्गो रिपूणाम् ।
विनाशश्चतुष्पात् सुखं तुच्छवित्तं शरीरं सदानामयं व्याधिनाशः ॥ ६॥

सप्तमस्थानगत केतु का फल -
शिखी सप्तमे भूयसी मार्गचिन्ता निवृत्तः स्वनाशोऽथवा वारिभीतिः ।
भवेत् कीटगः सर्वदालाभकारी कलत्रादिपीडा व्ययोव्यग्रता चेत् ॥ ७॥

अष्टमभावगत केतु के फल -
गुदा पीड्यतेऽर्शारोगैरवश्यं भयं वाहनादेः स्वद्रव्यस्यरोधः ।
भवेदष्टमे राहुच्छेऽर्थलाभः सदा कीटकन्याऽजगो युग्मगे तु ॥ ८॥

नवमभावगत केतु के फल -
शिखी धर्मभावे यदाक्लेशनाशः सुतार्थी भवेत् म्लेच्छतोभाग्यवृद्धिः ।
सहोत्थव्यथां बहुरोगं विधत्ते तपोदानतो हास्यवृद्धिं तदानीम् ॥ ९॥

दशमभावगत केतु के फल -
पितुर्नो सुखी कर्मगः यस्य केतुः दुर्भगं कष्टभाजे करोति ।
तदा वाहने पीडितं जातु जन्म वृषाजालिकन्यासु चेत् शत्रुनाशम् ॥ १०॥

लाभ भावगत केतु के फल -
सुभाग्यः सुविद्याधिको दर्शनीयः सुगात्रः सुवस्त्रः सुतेजोऽपितस्य ।
दरे पीड्यते सन्ततिः दुर्भगा च शिखी लाभगः सर्वलाभे करोति ॥ ११॥

व्ययस्थानगत केतु के फल -
शिखीरिःफगो वस्तिगुह्यान्ध्रिनेत्रे रुजापीडानं मातुलान्नैव शर्म ।
सदा राजतुल्यं सद्व्ययं तद् रिपूणां विनाशं रणेऽसौ करोति ॥ १२॥

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