26/11/2016
जुड़वा बच्चों का भविष्य एक समान क्यों नहीं होता? यह प्रश्न अक्सर चर्चा का विषय रहा है कि यदि दो बच्चों का जन्म एक ही स्थान, एक ही दिन और एक ही समय में हुआ है तो उनका जीवन भी एक जैसा क्यों नही होता। यूनिसेफ संस्था की गणना के अनुसार पूरे विश्व में प्रतिदिन औसतन तीन लाख त्रेपन हज़ार बच्चों का जन्म होता है। जिस के अनुसार दो सौ पचपन बच्चे प्रति मिनट या चार से पांच बच्चे प्रति सेकंड पैदा हो रहे हैं। फिर भी सभी का भविष्य एक दूसरे से अलग क्यों होता है | ज्योतिष गणना के लिए जन्म स्थान, जन्म तिथि व् जन्म समय की आवश्यकता होती है। यदि इन आंकड़ो में यह भी मान लिया जाय कि इन बच्चों का जन्म स्थान अलग - अलग रहा होगा तब भी जुड़वाँ बच्चों का जन्म स्थान तो एक ही रहता है और एक ही गर्भ से पैदा होते हैं फिर दो जुड़वाँ बच्चों का भविष्य एक समान होना चाहिए लेकिन ऐसा नहीं होता और कई बार तो एक बच्चे की जन्म के समय ही मृत्यु हो जाती है और दूसरा बच्चा स्वस्थ और दीर्घ आयु ले कर खुशहाल जीवन व्यतीत करता है |
जीवविज्ञान के अनुसार एक ही गर्भावस्था में पैदा होने वाली दो संतानों को जुड़वाँ (ट्विन) कहा जाता है | जुड़वाँ संतानों के मुख्यतः दो प्रकार होते हैं; द्वियुग्मनज (डाईज़ाईगोटिक या फ्रैटर्नल ट्विन) तथा एकयुग्मनज (मोनोज़ाईगोटिक या आइडेंटिकल ट्विन(| फ्रैटर्नल ट्विन दो अलग – अलग अन्डो में दो अलग शुक्राणुओ द्वारा बने दो भ्रूणों से बनते हैं जबकि आइडेंटिकल ट्विन एक ही जाइगोट (युग्मनज) के विभाजित होने से बने दो भ्रूणों द्वारा उत्पन्न होते होते है अर्थात् एक ही अंडे में शुक्राणु के विभाजन से | फ्रैटर्नल ट्विन या द्वियुग्मनज जुड़वाँ अक्सर अलग लिंग के होते हैं और इनका ब्लड ग्रुप भी अलग होता है जबकि आइडेंटिकल ट्विन या एकयुग्मनज जुड़वाँ एक ही लिंग के होते हैं और इनका ब्लड ग्रुप भी समान होता है |
फ्रैटर्नल ट्विन या द्वियुग्मनज जुड़वाँ में तो जीव का अंश - शुक्राणु भी दो अलग होते हैं जिस के कारण एक सन्तान दूसरी सन्तान से भिन्न होती है और स्वाभाविक है कि उनका जीवन भी भिन्न होगा | लेकिन आइडेंटिकल ट्विन या एकयुग्मनज संताने तो एक ही जीव के अंश यानि एक ही शुक्राणु से उत्पन होती हैं जिनका लिंग, ब्लड ग्रुप व् चेहरे की संरचना भी समान होती है तो उनके जीवन में पायी जाने वाली भिन्नताओं का क्या कारण रहता है | यहाँ पर इस बात पर ध्यान देना भी आवश्यक है कि किसी भी जीव के विकास में उसकी परिस्थिति व् वातावरण का महत्वपूर्ण प्रभाव रहता है | बच्चे के जन्म के पश्चात् तो आइडेंटिकल ट्विन या एकयुग्मनज जुड़वाँ भी अलग – अलग वातावरण एवं परिस्थितियों में विक्सित होते हैं लेकिन गर्भ के भीतर भी इनके विकास में स्थिति स्थिर नही रहती जो कि बच्चे के हिलने जुलने जैसी क्रियाओं से बदलती रहती है | यही कारण भी है कि इस संसार में उत्पन किसी भी प्राणी के फिंगर प्रिंट (उन्गलिओं के निशान) किसी दुसरे प्राणी से नही मिलते फिर चाहे वो आइडेंटिकल ट्विन या एकयुग्मनज जुड़वाँ ही क्यों न हो | हस्तरेखा से भविष्य जानने के रहस्य को भी इसी लिए खोजा गया था | प्राकृतिक रूप से उत्पन्न कोई भी एक वस्तु हमेशा दूसरी से भिन्न होगी यह प्रकृति का नियम है | एक ही बीज और जड़ से उत्पन्न पौधे की भी सभी टहनियां और पत्ते कभी एक समान नही होते | केवल कृत्रिम रूप में नियन्त्रित परिस्थिति व् वातावरण में मशीनों द्वारा एक समान वस्तुएं तैयार की जा सकती हैं | सौर मंडल में उपस्थित पिण्ड व् ग्रह एक ही सूर्य से उत्पन्न होने पर भी अलग हैं और अलग प्रभाव देते हैं |
आध्यात्मिक दृष्टिकोण से कर्म सिद्धांत व् जन्म, पूर्व जन्म एवं पुनर्जन्म भी एक कारण है जिस से प्रत्येक व्यक्ति अपने किये कर्मों के अनुसार जीवन में परिणाम भोगता है और हर एक जीव आत्मा दूसरी जीव आत्मा से भिन्न होती है |
यदि हम ज्योतिष विद्या के अध्ययन द्वारा भविष्य ज्ञात करने का प्रयास करें तो यह अनिवार्य है कि हम सही जन्म समय के आधार पर गणना करें | ज्योतिष विषय काल गणना का विषय है जिस में समय सबसे अधिक महत्वपूर्ण बिंदु है | समय की सूक्षम गणना के आधार पर ही ग्रहों की सटीक स्थिति का पता लगता है और जन्म कुण्डलीं बनाई जाती है | आधुनिक समय में जन्म समय मिनट या अधिक से अधिक सेकंड तक ही परिकलित किया जाता है | जबकि ज्योतिष में ग्रह, तारों या अन्य खगोलीय पिण्डों की चाल, गति, दूरी व् स्थिति निर्धारित करने के लिए सिडीरियल टाइम या नक्षत्र समय का प्रयोग किया जाता है जिसका वर्णन वेदों व् सूर्य सिद्धान्त में दिया गया है | इस पद्वति द्वारा समय को सूक्ष्म रूप में वर्गीकृत किया है जिस से पृथ्वी से तारों की गणना वैज्ञानिक मापदंड पर भी सही हो सके | इस पद्वति के अनुसार समय को मूहर्त, घटी, पल, विपल, प्राण, लीक्षक, लव, रेणु व् त्रुटी जैसी सूक्ष्म इकाईयों तक विभाजित किया है | समय की सबसे सूक्ष्म इकाई त्रुटी एक सेकंड के बत्तीस लाख चालीस हजारवें हिस्से के बराबर होती है | यदि जुड़वाँ बच्चों के जन्म समय को सेकंड अथवा मिली सेकंड तक भी जान लिया जाय तब भी यह तय कर पाना की काल कौन सी त्रुटी में था, यह असम्भव ही है क्योंकि एक सेकंड में बत्तीस लाख चालीस हज़ार त्रुटी होगी |
यदि दो जुड़वां बच्चों का जन्म समय एक ही मान लिया जाये तो क्या एक ही कुण्डली को दो बार देखने से अलग – अलग विश्लेषण या परिणाम प्राप्त होगा | यह धारणा बिलकुल गलत है की जुड़वाँ बच्चों का जन्म समय समान होता है | गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड के अनुसार विश्व में जुड़वाँ बच्चों के जन्म समय की अवधि में सबसे कम समय का अंतर एक मिनट का दर्ज हुआ है जो कि केसेंड्रा फ्लोरेस नामक अमरीकी महिला ने सेंट जोसफ हॉस्पिटल केलिफोर्निया में 9 जुलाई 2013 को 13:39 व् 13:40 बजे जुड़वाँ बच्चों को जन्म देने पर हुआ है | इसी प्रकार एक पंद्रह वर्ष तक की गयी एक जर्मन शोध के अनुसार जुड़वाँ बच्चों के जन्म समय में औसत अवधि का अंतर 13.5 मिनट का पाया गया है जिस से साबित होता है कि ज्योतिष दृष्टिकोण से भी जुड़वाँ बच्चों का भविष्य व् जीवन एक समान नही हो सकता क्योंकि उनका जन्म समय जो ज्योतिष का आधार है, कभी एक समान नही होता |
इन सभी कारणों से चाहे वह जीवविज्ञान से सम्बन्धित हों, प्रकृति की रचना, कर्म सिद्धांत, पूर्व जन्म का परिणाम, भाग्य, हस्तरेखा या ज्योतिष विषय हो, यह निश्चित होता है कि प्रत्येक व्यक्ति का जीवन और भविष्य कभी दूसरे व्यक्ति के समान नही हो सकता चाहे वह जुड़वाँ ही क्यों न हों |
- आशीष भगोरिया