Rajput Heavy salaria

Rajput Heavy salaria सनातनी वैदिक धर्म की जय हर हर महादेव

महाभारत के सन्दर्भ में एक जो बहुत बड़ी भ्रान्ति द्रौपदी और दुर्योधन के बारे में है वो ये है कि इंद्रप्रस्थ में द्रौपदी ने...
23/05/2026

महाभारत के सन्दर्भ में एक जो बहुत बड़ी भ्रान्ति द्रौपदी और दुर्योधन के बारे में है वो ये है कि इंद्रप्रस्थ में द्रौपदी ने दुर्योधन का अपमान किया था। लगभग सभी लोगों का ऐसा मानना है कि इंद्रप्रस्थ के मयाभावन में जब दुर्योधन मायानिर्मित सरोवर में गिर पड़ा, तब द्रौपदी ने हँसते हुए उसे "अंधे का पुत्र अँधा" कहकर अपमानित किया। हालाँकि द्रौपदी ने ऐसा परिहास में कहा लेकिन दुर्योधन उस बात को कभी भूला नहीं।

ये घटना लोगों के मन में ऐसी रच बस गयी है कि लोग इसे ही सही मानने लगे हैं। आज कल के टीवी सीरियल तो खैर हमारे धर्म ग्रंथों का बेडा गर्क करने में लगे ही हुए हैं लेकिन दुःख की बात है कि महाभारत पर बने सर्वश्रेष्ठ सीरियल, १९८८ में बी.आर. चोपड़ा की महाभारत में भी ऐसा ही दिखाया गया है। लेकिन ये बात बिल्कुल गलत है। द्रौपदी ने कभी भी दुर्योधन का अपमान नहीं किया था।

द्रौपदी महाभारत काल की सबसे प्रतिष्ठित और सम्मानित महिलाओं में से एक थी। इसके साथ ही वो कुरुकुल की कुलवधू भी थी। ऐसी सम्मानित महिला के मुख से ऐसी गलत बात निकलना संभव ही नहीं है। यदि आप महाभारत पढ़ेंगे तो आपको इस बात का पता चलेगा कि वास्तव में द्रौपदी ने कभी ऐसी बात नहीं की। वो तो उस मयाभावन में उपस्थित भी नहीं थी जब दुर्योधन माया सरोवर में गिरा था।

महाभारत के सभापर्व के अंतर्गत द्युत उप-पर्व के ४७वें अध्याय में हमें इसके बारे में पता चलता है। इसके अनुसार दुर्योधन ने शकुनि के साथ उस पूरी सभा का निरिक्षण किया। उसने वहां वो सारी चीजें देखी जो उसने हस्तिनापुर में कभी नहीं देखी थी। इसके बाद उसे एक जगह जल होने का आभास हुआ तो उसने अपने वस्त्र उठा लिए किन्तु वो जल नहीं बल्कि ठोस भूमि थी।

जब वो आगे गया तो एक जल से भरी हुई बावली को भूमि मानकर वो उसपर उतरा। इससे वो वस्त्र सहित उसी बावली के जल में गिर पड़ा। उसे इस प्रकार जल में गिरा देख कर भीमसेन हंसने लगे। साथ ही भीमसेन के सेवक भी दुर्योधन की वो दशा देख कर हंसने लगे। फिर भीमसेन की आज्ञा से उन्होंने दुर्योधन को नए वस्त्र दिए। दुर्योधन की ऐसी दशा देख कर भीम के साथ साथ अर्जुन, नकुल और सहदेव भी जोर जोर से हंसने लगे।

उनकी हंसी से दुर्योधन बहुत अपमानित हुआ और उनकी ओर ना देख कर वहां से चला गया। आगे जाकर उसे एक खुला दरवाजा दिखा जो वास्तव में बंद था। उससे निकलने के चक्कर में दुर्योधन का सर उस दरवाजे से टकरा गया। आगे चल कर उसे एक बंद दरवाजा दिखा जो वास्तव में खुला था। जब दुर्योधन ने उसे धक्का देना चाहा तो द्वार के उस पर गिर पड़ा। इसके आगे भी उसे एक बड़ा फाटक दिखा लेकिन उसके साथ और कोई दुर्घटना ना हो इसी भय से वो वही से वापस लौट गया। इस प्रकार खिन्न होकर दुर्योधन ने अंततः युधिष्ठिर से आज्ञा ली और फिर अप्रसन्न मन से वापस लौट गया।

तो यहाँ हम देख सकते हैं कि इस पूरे प्रसंग में द्रौपदी का कहीं वर्णन भी नहीं है। तो अब प्रश्न आता है कि ये "अंधे का पुत्र अँधा" वाली बात कहाँ से आ गयी? तो इसका बेडा गर्क भी श्री शिवजी सावंत ने अपने भ्रामक ग्रन्थ मृत्युंजय में किया है। मृत्युंजय में ही उन्होंने ऐसा लिख दिया है कि जब दुर्योधन उस सरोवर में गिरा तो द्रौपदी ने हँसते हुए उसे "अंधे का पुत्र अँधा" कहकर अपमानित किया।

वास्तव में आज महाभारत, विशेषकर कर्ण के विषय में जितनी भी गलत जानकारियां समाज में फैली हैं वो श्री शिवजी सावंत और मृत्युंजय उपन्यास के कारण ही फैली है। इस ग्रन्थ से उन्होंने महाभारत के विषय में गलत जानकारियों का एक ऐसा पिटारा खोल दिया जो पूरे समाज को भ्रमित कर रहा है।

राधे राधे

मार्गदर्शक - श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज
प्रेरणास्त्रोत - श्री श्री १०८ श्री स्वामी हरिहरानंद जी महाराज , होलीपुरा

"विष पीकर शिव नील भये, जग को दियो दान।"इस पंक्ति का अर्थ है कि जब समुद्र मंथन के समय भयंकर 'हलाहल' विष निकला, जो समस्त स...
11/05/2026

"विष पीकर शिव नील भये, जग को दियो दान।"
इस पंक्ति का अर्थ है कि जब समुद्र मंथन के समय भयंकर 'हलाहल' विष निकला, जो समस्त सृष्टि का विनाश कर सकता था, तब भगवान शिव ने निस्वार्थ भाव से उसे स्वयं पी लिया। विष के प्रभाव से उनका कंठ नीला पड़ गया, जिससे वे 'नीलकंठ' कहलाए। इस प्रकार उन्होंने स्वयं कष्ट सहकर संपूर्ण जगत को जीवन का दान दिया।

"करुणा के सागर प्रभु, राखो सबका मान।।"
यहाँ शिव जी को दया और करुणा का अथाह सागर बताया गया है। भक्त प्रार्थना कर रहा है कि हे प्रभु, आप इतने कृपालु हैं कि आपने संसार की रक्षा के लिए विष पान कर लिया, अब आप अपनी उसी करुणा से हम सभी का मान-सम्मान बनाए रखें और सबका कल्याण करें।

मुख्य भाव:
यह दोहा भगवान शिव के त्याग, परोपकार और असीम धैर्य को दर्शाता है। यह हमें सिखाता है कि महान वही है जो दूसरों के कल्याण के लिए विष (कष्ट) को पी जाए और समाज को अमृत (सुख) प्रदान करे।

राधे राधे

मार्गदर्शक - श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज
प्रेरणास्त्रोत - श्री श्री १०८ श्री स्वामी हरिहरानंद जी महाराज , होलीपुरा

शिवलिंग की शक्ति — वह आकार जो आकार नहीं हैशिवलिंग को लोग पत्थर समझते हैं। पुजारी जल चढ़ाता है, भक्त परिक्रमा करता है। पर...
10/05/2026

शिवलिंग की शक्ति — वह आकार जो आकार नहीं है

शिवलिंग को लोग पत्थर समझते हैं। पुजारी जल चढ़ाता है, भक्त परिक्रमा करता है। पर शिवलिंग मूर्ति नहीं है, वह यंत्र है — ऊर्जा का। सनातन में इसे 'शक्ति का स्तंभ' कहा है।

इसे समझो तो पूजा बदल जाएगी।

1. शिवलिंग क्या है — लिंग का अर्थ

संस्कृत में 'लिंग' का अर्थ चिन्ह, प्रतीक। 'शिव लिंग' मतलब — वह चिन्ह जिससे शिव को पहचाना जाए। शिव का कोई रूप नहीं, इसलिए रूप की जगह चिन्ह रखा।

लिंग तीन भागों में बँटा है —

नीचे चौकोर भाग — ब्रह्मपीठ : ब्रह्मा, सृष्टि। धरती में धँसा रहता है।
बीच अष्टकोण — विष्णुपीठ : विष्णु, पालन। जलधारी।
ऊपर गोल — रुद्रपीठ : शिव, लय। वही पूजते हैं।

यह त्रिदेव नहीं, त्रिगुण है — सृजन, स्थिति, संहार। एक ही पत्थर में।

2. आकार की विज्ञान

शिवलिंग अंडाकार है। ब्रह्मांड भी अंडाकार — 'ब्रह्मांड' शब्द ही अंडा है। आधुनिक विज्ञान कहता है बिग बैंग एक बिंदु से फैला। शिवलिंग वही बिंदु है।

गोल सिरे से ऊर्जा चारों ओर समान फैलती है। मंदिर के गर्भगृह को गुंबद इसलिए बनाते हैं — ध्वनि और ऊर्जा लौट कर लिंग पर गिरे। जब तुम 'ॐ नमः शिवाय' बोलते हो, ध्वनि 7.83 हर्ट्ज़ (पृथ्वी की शुमान रेज़ोनेंस) से मिलती है। लिंग उसे एम्प्लिफाई करता है।

जलधारा — लगातार पानी गिरना — लिंग को ठंडा रखता है। पत्थर घर्षण से गर्म होता है, पानी आयन बनाता है। नकारात्मक आयन मन शांत करते हैं। इसीलिए शिवलिंग के पास बैठते ही नींद-सी आती है।

3. शक्ति के पाँच स्रोत

क. पृथ्वी तत्व — लिंग अक्सर नर्मदा के काले पत्थर, स्फटिक या पारद से बनता है। नर्मदेश्वर में प्राकृतिक चुंबकत्व है। स्फटिक प्रकाश को तोड़ता है, सात रंग बनाता है — सात चक्र।

ख. जल तत्व — अभिषेक। दूध, दही, शहद, घी, जल — पंचामृत। हर द्रव्य का pH अलग। जब वे मिलते हैं, लिंग पर सूक्ष्म विद्युत बनती है। भक्त का हाथ लगता है, सर्किट पूरा होता है।

ग. अग्नि तत्व — दीपक। लिंग के ठीक सामने घी का दीया जलता है। लौ की गर्मी ऊपर उठती है, ठंडा जल नीचे गिरता है — संवहन चक्र। यही कुंडलिनी का ऊपर-नीचे।

घ. वायु तत्व — बेलपत्र। तीन पत्तियाँ — इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना। उल्टा चढ़ाते हैं, चिकनी सतह नीचे। इससे वाष्पीकरण धीमा, ऊर्जा देर तक टिकती है।

ङ. आकाश तत्व — शून्य। लिंग के बीच खाली जगह नहीं, पर ध्यान में वह शून्य बन जाता है। वहाँ विचार रुकते हैं।

4. शिवलिंग और शरीर

तुम्हारा शरीर भी शिवलिंग है।

रीढ़ — ब्रह्मपीठ से रुद्रपीठ तक का स्तंभ।
सिर — गोल भाग, सहस्रार।
जलधारी — योनि पीठ, जहाँ ऊर्जा बाहर निकलती है।

जब तुम ध्यान में बैठते हो, तुम्हारी रीढ़ शिवलिंग बनती है। कुंडलिनी जलधारा है। इसीलिए शिव को 'स्थाणु' कहते हैं — स्थिर स्तंभ।

5. 12 ज्योतिर्लिंग — पृथ्वी की बैटरी

भारत में 12 ज्योतिर्लिंग एक खास अक्षांश पर हैं। सोमनाथ से लेकर रामेश्वरम तक — यह एक ऊर्जा ग्रिड है। प्राचीन ऋषियों ने इन्हें वहाँ रखा जहाँ भू-चुंबकीय रेखाएँ मिलती हैं।

केदारनाथ — हिमालय की ठंड, ध्यान।
उज्जैन महाकाल — कर्क रेखा पर, समय का केंद्र।
चिदंबरम (आकाश लिंग) — वहाँ लिंग नहीं, खाली जगह है। शक्ति अदृश्य।

हर ज्योतिर्लिंग एक चक्र से जुड़ा है। यात्रा करने से शरीर के चक्र अपने आप संतुलित होते हैं।

6. घर में शिवलिंग — नियम क्यों

शास्त्र कहते हैं, घर में अंगूठे से बड़ा शिवलिंग मत रखो। क्यों? क्योंकि बड़ा लिंग ज्यादा ऊर्जा खींचता है। घर में वह संभाल नहीं पाते। मंदिर में गर्भगृह छोटा, दीवारें मोटी — ऊर्जा बंद रहती है।

पारद शिवलिंग सबसे तेज। पारा तरल धातु, आयन बनाता है। पर उसे रोज जल चाहिए, नहीं तो गर्म हो कर नकारात्मक खींचता है।

7. शक्ति कैसे मिले — विधि नहीं, भाव

लोग पूछते हैं, "कितना जल चढ़ाऊँ?" शक्ति मात्रा में नहीं, निरंतरता में है।

सरल प्रयोग — 5 मिनट
शिवलिंग के सामने बैठो, या मन में कल्पना करो।
एक लोटा जल धीरे-धीरे धार से छोड़ो। देखते रहो।
साथ में मन में 'नमः शिवाय' — साँस लेते 'नमः', छोड़ते 'शिवाय'।
जल गिरते समय आँख बंद मत करो। धार पर ध्यान टिकाओ।

7 दिन में — मन की चंचलता घटेगी, नींद गहरी, निर्णय साफ। क्योंकि तुमने अपने भीतर के लिंग को ठंडा किया।

8. गलतफहमियाँ

शिवलिंग योनि-लिंग का मिलन नहीं, वह सृष्टि का प्रतीक है। योनि पीठ आधार है, लिंग स्तंभ। दोनों मिल कर 'अर्धनारीश्वर' — शक्ति बिना शिव शव।
शिवलिंग पर हल्दी नहीं चढ़ाते — हल्दी गर्म, शिव को ठंडक चाहिए। बेलपत्र, भांग, धतूरा — ये न्यूरो-कूलेंट, मन को शांत करते हैं।
रात को शिवलिंग पर जल चढ़ाना श्रेष्ठ — चंद्र नाड़ी चलती है, ऊर्जा भीतर जाती है।

सार

शिवलिंग पत्थर नहीं, पावर हाउस है। वह तुम्हें कुछ देता नहीं, तुम्हें तुमसे जोड़ता है।

सनातन ने भगवान को आसमान में नहीं, जमीन पर रखा — ताकि तुम छू सको। छूते ही सर्किट पूरा होता है। तुम्हारी ऊर्जा उसकी ऊर्जा से मिलती है।

इसीलिए शिवलिंग पर चढ़ा जल प्रसाद नहीं पीते, सिर पर लगाते हैं — क्योंकि वह तुम्हारी ही शुद्ध हुई ऊर्जा है।

जब अगली बार जल चढ़ाओ, माँगो मत। बस देखो — धार कैसे गोल पत्थर पर फैलती है, फिर नीचे बह जाती है। वही तुम्हारा मन है। शिवलिंग सिखाता है — स्थिर रहो, पर बहने दो।

यही शक्ति है।

जब प्रभु श्री राम ने चलाये हनुमानजी पर बाण १. एक चक्रवर्ती राजा से अनजाने में हुई भूलएक बार एक चक्रवर्ती राजा से अनजाने ...
07/05/2026

जब प्रभु श्री राम ने चलाये हनुमानजी पर बाण

१. एक चक्रवर्ती राजा से अनजाने में हुई भूल
एक बार एक चक्रवर्ती राजा से अनजाने में ऋषि विश्वामित्र का अपमान हो गया। विश्वामित्र अत्यंत क्रोधित हो गए और उन्होंने अपनी मर्यादा की रक्षा के लिए भगवान श्रीराम के पास जाकर राजा को मृत्युदंड देने की मांग की।

२. श्रीराम की प्रतिज्ञा
अपने गुरु की आज्ञा का पालन करना श्रीराम का धर्म था। उन्होंने प्रतिज्ञा की कि वे सूर्यास्त से पहले उस चक्रवर्ती राजा का वध कर देंगे। जब राजा को यह पता चला, तो वे भयभीत होकर अपनी रक्षा के लिए इधर-उधर भटकने लगे।

३. हनुमान जी की शरण में राजा
नारद मुनी की सलाह पर राजा माता अंजनी की शरण में गए। माता अंजनी ने राजा को शरण देने का वचन दे दिया और हनुमान जी को उनकी रक्षा का आदेश दिया। हनुमान जी संकट में थे—एक तरफ उनके आराध्य प्रभु श्रीराम थे और दूसरी तरफ माता की आज्ञा। अंततः उन्होंने शरणागत की रक्षा को अपना धर्म चुना।

युद्ध और परिणाम
राम और हनुमान का सामना: हनुमान जी ने राजा को अपने पीछे छिपा लिया और राम नाम का जाप करने लगे। जब श्रीराम युद्ध क्षेत्र में आए, तो उन्होंने हनुमान जी पर बाण चलाए, लेकिन राम नाम के प्रभाव से वे बाण हनुमान जी का कुछ नहीं बिगाड़ सके।

अस्त्रों की विफलता: श्रीराम ने अंत में 'ब्रह्मास्त्र' का संधान किया। जब हनुमान जी निरंतर राम नाम जप रहे थे, तो ब्रह्मास्त्र भी उनके पास आकर शांत हो गया। यह देखकर स्वयं ब्रह्मा जी और समस्त देवता प्रकट हुए।

समाधान: विश्वामित्र ने हनुमान जी की भक्ति और समर्पण देखकर अपना क्रोध त्याग दिया और श्रीराम को अपनी प्रतिज्ञा से मुक्त कर दिया। राजा को क्षमा दान मिला।

इस कथा की सीख
यह कथा बताती है कि "राम से बड़ा राम का नाम" है। हनुमान जी ने सिद्ध कर दिया कि यदि मन में सच्ची भक्ति और राम नाम का सहारा हो, तो स्वयं भगवान भी अपने भक्त को पराजित नहीं कर सकते।

राधे राधे

मार्गदर्शक - श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज
प्रेरणास्त्रोत - श्री श्री १०८ श्री स्वामी हरिहरानंद जी महाराज , होलीपुरा

नरकासुर का उत्थान: पृथ्वी-पुत्र की कथाबहुत समय पहले, धरती की देवी भू-देवी ने एक पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम नरकासुर (य...
07/05/2026

नरकासुर का उत्थान: पृथ्वी-पुत्र की कथा
बहुत समय पहले, धरती की देवी भू-देवी ने एक पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम नरकासुर (या भौम) था। एक दिव्य माता की संतान होने के बावजूद, उसका पालन-पोषण असुर बाणासुर के प्रभाव में हुआ, जिससे वह सत्ता, अहंकार और लोभ के मद में चूर हो गया।

जैसे-जैसे उसकी शक्ति बढ़ी, नरकासुर ने लोकों में आतंक मचाना शुरू कर दिया। उसने राजाओं और देवताओं को पराजित किया, पवित्र यज्ञों को अपवित्र किया और कई राज्यों को जीतकर हजारों राजकुमारियों को बंदी बना लिया।

उसका दुस्साहस इतना बढ़ गया कि उसने देवताओं की माता अदिति के दिव्य कुंडल चुरा लिए और इंद्र के ऐरावत हाथी का भी अपहरण कर लिया। अपमानित और असहाय होकर देवता अपने शाश्वत रक्षक भगवान श्री कृष्ण की शरण में गए।

सत्यभामा का संकल्प और दिव्य प्रस्थान
देवताओं की पुकार सुनकर भगवान कृष्ण ने नरकासुर को दंड देने की तैयारी की। जब कृष्ण की रानी सत्यभामा ने सुना कि कैसे नरकासुर ने महिलाओं और देवियों का अपमान किया है, तो वे क्रोधित हो उठीं।

भगवान कृष्ण ने मुस्कुराते हुए कहा:

"तो फिर हमें साथ चलना चाहिए। तुम स्वयं अधर्म पर धर्म की विजय की साक्षी बनोगी।"

दिव्य पक्षी गरुड़ पर सवार होकर, कृष्ण और सत्यभामा नरकासुर के दुर्ग प्राग्ज्योतिषपुर की ओर उड़े। वह किला मायावी भ्रमों, अग्नि की दीवारों और काले जादू के घेरों से सुरक्षित था। कृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्र और बाणों से हर बाधा को नष्ट कर दिया, जबकि सत्यभामा ने धर्म के तेज के साथ उनके साथ वीरतापूर्वक युद्ध किया।

नरकासुर का अंत
जब नरकासुर का सामना कृष्ण से हुआ, तो उसने अपने दिव्य रथ से अस्त्रों की वर्षा कर दी। लेकिन कृष्ण ने सहजता से हर वार को विफल कर दिया और सिंह की भांति गर्जना करते हुए सुदर्शन चक्र का आह्वान किया।

युद्ध में परास्त होकर नरकासुर भूमि पर गिर पड़ा। कृष्ण की दृष्टि मात्र से उसका अहंकार भस्म हो गया। अपने अंतिम क्षणों में, उसने कृष्ण के वास्तविक स्वरूप को पहचाना और अपना हृदय उन्हें समर्पित कर दिया। भगवान ने उसे मोक्ष प्रदान किया।

राजकुमारियों की मुक्ति
असुर के वध के बाद, कृष्ण और सत्यभामा ने महल में प्रवेश किया। वहां कालकोठरी में उन्होंने 16,100 राजकुमारियों को पाया, जिन्हें भारतवर्ष के विभिन्न राजघरानों से अपहरण कर बंदी बनाया गया था।

भगवान को अपने सामने देख, राजकुमारियां भावुक होकर उनके चरणों में गिर पड़ीं और रोते हुए कहा:

"हमारा अब कोई परिवार नहीं, कोई सम्मान नहीं और कोई रक्षक नहीं है। यह संसार हमें तिरस्कृत करेगा। हे प्रभु! अब केवल आप ही हमें आश्रय दे सकते हैं।"

उनकी निश्छल पुकार सुनकर कृष्ण द्रवित हो गए और उन्होंने वचन दिया:

"तुम्हारा अपमान नहीं होगा। मैं तुम सभी से विवाह कर तुम्हारा सम्मान पुनः स्थापित करूँगा।"

द्वारका लौटकर, भगवान ने स्वयं को 16,100 स्वरूपों में विस्तारित किया और प्रत्येक राजकुमारी के साथ पूरे विधि-विधान से विवाह किया। हर रानी को एक महल, सेवक और भगवान का सान्निध्य प्राप्त हुआ।

अदिति के कुंडल और ऐरावत की वापसी
कृष्ण ने अदिति के चोरी हुए कुंडल और ऐरावत हाथी इंद्र को लौटा दिए, जिससे देवताओं का मान पुनः स्थापित हुआ। शची देवी के अनुरोध पर वे स्वर्ग के उद्यानों में गए, जहाँ देवताओं ने गीतों और पुष्पमालाओं से उनका पूजन किया।

राधे राधे

मार्गदर्शक - श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज
प्रेरणास्त्रोत - श्री श्री १०८ श्री स्वामी हरिहरानंद जी महाराज , होलीपुरा

प्रथम पूज्य गणनायक ही, सकल विघ्न हर लेत: इस पंक्ति का अर्थ है कि भगवान श्री गणेश समस्त देवों में 'प्रथम पूज्य' हैं, यानी...
06/05/2026

प्रथम पूज्य गणनायक ही, सकल विघ्न हर लेत: इस पंक्ति का अर्थ है कि भगवान श्री गणेश समस्त देवों में 'प्रथम पूज्य' हैं, यानी किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत में सबसे पहले उनकी ही पूजा की जाती है। वे 'गणनायक' (गणों के स्वामी) हैं जो अपने भक्तों के मार्ग में आने वाली सभी बाधाओं और दुखों (सकल विघ्न) को दूर कर देते हैं।

रिद्धि-सिद्धि के स्वामी प्रभु, सदा सद्बुद्धि देत: भगवान गणेश 'रिद्धि' (समृद्धि और वैभव) और 'सिद्धि' (सफलता और आध्यात्मिक शक्ति) के स्वामी हैं। वे न केवल भौतिक सुख प्रदान करते हैं, बल्कि अपने भक्तों को सदैव 'सद्बुद्धि' (अच्छी और नेक बुद्धि) का वरदान भी देते हैं, जिससे व्यक्ति सही मार्ग पर चल सके।

निष्कर्ष:
यह दोहा श्री गणेश जी की महिमा का गुणगान करता है कि वे विघ्नहर्ता और बुद्धि के दाता हैं, जिनकी कृपा से जीवन के सभी कार्य निर्विघ्न संपन्न होते हैं।

राधे राधे

मार्गदर्शक - श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज
प्रेरणास्त्रोत - श्री श्री १०८ श्री स्वामी हरिहरानंद जी महाराज , होलीपुरा

भर्तृहरि का वैराग्य और अहंकारएक बार भगवती पार्वती के साथ भगवान शिव पृथ्वी पर भ्रमण कर रहे थे| भ्रमण करते हुए वे एक वन-क्...
04/05/2026

भर्तृहरि का वैराग्य और अहंकार

एक बार भगवती पार्वती के साथ भगवान शिव पृथ्वी पर भ्रमण कर रहे थे| भ्रमण करते हुए वे एक वन-क्षेत्र से गुजरे| विस्तृत वन-क्षेत्र में वृक्षों की सघन माला के मध्य उन्हें एक ज्योतिर्मय मानवाकृति दिखाई दी| रुक्ष केशराशि ने निरावरण बाहुओं को अच्छादित कर रखा था| अस्पष्ट आलोक में भी तपस्वी की उज्वल छवि दर्शनीय थी| जगत जननी पार्वती ने मुग्ध भाव से कहा – “इतने विस्तृत साम्राज्य का अधिपति, इतने विशाल वैभव और ऐश्वर्य का स्वामी तथा त्याग की ऐसी अपूर्व नि:स्पृह भावना! धन्य हैं भर्तृहरि|”
भगवान शिव ने आश्चर्य भंगिमा से पार्वती को निहारा – “क्या देखकर इतना मुग्ध हो उठी हैं देवी?”
पार्वती बोलीं – “तपस्वी का त्याग भाव| और क्या?”
शिव बोले – “अच्छा! लेकिन मैंने तो कुछ और ही देखा देवी! तपस्वी का त्याग तो उसका अतीत था| अतीत के प्रति प्रतिक्रियाभिव्यक्ति से क्या लाभ? देखना ही था तो इसका वर्तमान देखतीं|”
पार्वती ने ध्यानपूर्वक देखा| तपस्वी के निकट तीन वस्तुएं रखी थीं – तीन भौतिक वस्तुएं| संग्रह का मोह दर्शाती वस्तुएं – एक पंखा, एक जलपात्र और एक शीश आलंबक (तकिया)| वस्तुओं को देखकर पार्वती ने खेद भरे स्वर में कहा – “प्रभो! निश्चय ही मैंने प्रतिक्रियाभिव्यक्ति में शीघ्रता कर दी|”
यह सुनकर शिव मुस्करा उठे| फिर, दोनों आगे बढ़ गए| समय बीता| साधना गहन हुई| बोध भाव निखरा| वैराग्य घनीभूत हुआ तो भर्तृहरि को आभास हुआ – “अरे! मेरे समीप ये अनावश्यक वस्तुएं क्यों रखी हैं? प्रकृति प्रदत्त समीर जब स्वयं ही इस देह को उपकृत कर देता है तो इस पंखे का क्या प्रयोजन? जल अंजलि में भरकर भी पिया जा सकता है और इस शीश को आलंबन देने हेतु क्या बाहुओं का उपयोग नहीं किया जा सकता?”
तपस्वी ने तत्काल तीनों वस्तुएं दूर हटा दीं| पुन: साधना में लीन हो गए| कुछ समय बाद शिव और पार्वती पुन: भ्रमण करते हुए वहां पहुंचे| देवी पार्वती ने तपस्वी को देखा| भौतिक साधनों को अनुपस्थिति पाकर वे प्रसन्न हो उठीं| उत्साहित होकर उन्होंने शिव को देखा, लेकिन उनके मुख पर वैसी ही पूर्ववत तटस्थता छाई थी| उन्होंने दृष्टि संकेत दिया| पार्वती की दृष्टि तपस्वी की ओर मुड़ गई| उन्होंने देखा| भर्तृहरि उठे| अपना भिक्षापात्र लेकर अति शीघ्रता से ग्राम्य-सीमा में प्रवेश कर गए| शिव ने पार्वती से कहा – “देवी! साधक के हाथ में भिक्षापात्र, क्षुधापूर्ति हेतु ग्राम्य जीवन के निकट निवास और एकांत से भय! यह वैराग्य की परिपक्वता दर्शाता है| इसे परिपक्व होने में समय लगेगा| हमें अभी प्रस्थान करना चाहिए|”
समय व्यतीत हुआ| बोध भावना दी साधना कुछ अधिक प्रखर हुई तो भर्तृहरि ने विचार किया – ‘संन्यासी होकर भिक्षाटन में बहुमूल्य समय का दुरूपयोग करना और ग्राम्य-कोलाहल के निकट निवास करना सर्वथा अनुचित है|’
भर्तृहरि ने निर्जन श्मशान को अपना आवास बना लिया| भिक्षार्थ भ्रमण बंद कर दिया और जनकल्याणार्थ ‘वैराग्यशतक’ की रचना में लीन हो गए| उनकी तल्लीनता दैहिक आवश्यकताओं से ऊपर उठने लगी| रात्रि से दिवस, दिवस से रात्रि वे निरंतर साहित्य-सृजन ले लीन रहने लगे| कोई स्वयं आकर कुछ दे जाता तो ठीक, अन्यथा निराहार ही सृजन में लगे रहते|
एक बार निराहार रहते हुए कई दिन बीत गए| अन्नाभाव से शरीर-बल क्षीण होने लगा| दुर्बलता असहनीय होने लगी| फिर भी वे आत्मिक जिजीविषा के बल पर निरंतर रचना कार्य करते रहे| लेकिन जब क्षीणता में मृत्युबोध होने लगा तो उन्हें भोजनार्थ उद्यम उचित लगा| ‘वैराग्य शतक’ के जनहिताय सृजन कर्म को वे अपूर्ण नहीं रहने देना चाहते थे| अत: वे किसी तरह आगे बढ़े, पास ही कई चिताएं ‘धू-धू’ करती हुई आकाश को छू रही थीं| उन्होंने देखा कि चिताओं के निकट पिंडदान के रूप में आटे की दो लोइयां रखी हैं तथा एक भग्नपात्र में जल भी है| भर्तृहरि आटे की लोइयां जलनी चिता पर सेंकने लगे|
यह देख भगवती पार्वती विह्वल हो उठीं और बोलीं – “देखिए तो ऐश्वर्यशाली नृप को, जिसके राज्य की श्री-समृद्धि में काग भी स्वर्ण चुग सकते थे, वे किस नि:स्पृहता के साथ सत्कार्य समर्पित इस जीवन की रक्षा हेतु पिंडदान की लोइयां सेंक रहा है? आह! मर्मभेदी है यह क्षण| कहिए महेश्वर, क्या अब भी आप तटस्थ रहेंगे?”
शिव हंसकर बोले – “देवी! प्रश्न मेरी प्रसन्नता या तटस्थता का नही है| प्रश्न तो साधना की सत्यता का है| यदि साधक पवित्र है, तो भला साधक को शिव क्यों न मिलेगा?”
पार्वती उसी व्यथित स्वर में बोलीं – “इस दृश्य से सत्य और सुंदर कुछ और हो सकता है क्या? आश्चर्य है! सहज ही मुग्ध हो उठने वाला आपका भोला हृदय इस बार यूं निर्विकार क्यों बना हुआ है?”
“देवी! व्यथित न हों| आप स्वयं चलकर साधक की साधना का मूल्यांकन करें और तब निर्णय लें तो अधिक श्रेयस्कर होगा|”
भगवान शिव और भगवती पार्वती ने कृशकाय और दीन ब्राह्मण युगल का वेष धारण कर लिया और भर्तृहरि के सम्मुख पहुंचे| भर्तृहरि आहार ग्रहण करने को उद्यत हुए ही थे कि अतिथि युगल को सम्मुख पाकर रुक गए| उन्होंने क्षीण वाणी में कहा – “अतिथि युगल! कृपया आहार ग्रहण कर मुझे उपकृत करें|”
शिव बोले – “साधक! आहार देखकर, वुभुक्षा तो जाग्रत हुई थी| लेकिन हम कोई और मार्ग खोज लेंगे|”
“क्यों विप्रवर! कोई और मार्ग क्यों?”
“क्योंकि इस आहार की आवश्यकता हमसे अधिक आपको है|”
“हां तपस्वी! इस आहार से आप अपनी क्षुधा को तृप्त करें, हमारी तृप्ति स्वयमेव ही हो जाएगी|” पार्वती बोलीं|
“नहीं माते! मेरे समक्ष आकर भी आप अतृप्त रह जाएं, ऐसा मुझे स्वीकार नहीं|” दोनों रोटियां ब्राह्मण युगल की ओर बढ़ाते हुए भर्तृहरि के मुख पर दान का दर्प मुखर हो उठा – “माते! आप मेरी दृढ़ता से परिचित नहीं हैं| अपनी दृढ़ता के समक्ष जब मैंने अपने विशाल और ऐश्वर्य संपन्न राज्य तथा अथाह और अपरिमित श्री-संपत्ति को त्यागने में एक क्षण का विलंब न किया तो क्या आज इन पिंडदान की लोइयों का मोह करूंगा?”
अनायास ही पार्वती हंस पड़ीं| किंतु उस हंसी में प्रशस्ति को खनक न होकर किंचित उपहास की ध्वनि थी| उन्होंने कहा – “तपस्वी! आश्चर्य है कि तुमने अपना राज्य कैसे छोड़ दिया? साधुवेष धारण करके तुम्हारी बुद्धि अभी तक वणिक वृत्ति से भौतिक वस्तुओं की माप-तौल पर टिकी हुई है| तुम मोह से निवृत्ति का दंभ करते हो| लेकिन इतना अच्छा होता कि तुमने राज्य त्यागने के स्थान पर अपनी तथाकथित निर्मोहिता के अहंकार से मुक्ति पा ली होती|”
यह सुनकर भर्तृहरि ठगे से देखते रह गए| ब्राह्मण दंपति के रूप में आए परम शिव और शक्ति शून्य में लोप हो चुके थे| दिशाओं में केवल हंसी की गूंज थी और हाथों में वही दो रोटियां|

01/05/2026
22/04/2026

पहलगाम की पीड़ा हर भारतीय के हृदय में अंकित एक अविस्मरणीय आघात है। उस भीषण आतंकी हमले में काल-कवलित हुए निर्दोष नागरिकों को विनम्र श्रद्धांजलि!

उन पुण्यात्माओं की स्मृति आज भी हमें झकझोरती है, उनका बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा।

आतंकवाद मानवता का सबसे बड़ा शत्रु है। 'नया भारत' पूर्ण एकजुटता और जीरो टॉलरेंस के संकल्प के साथ आतंक के हर रूप के निर्मूलन हेतु प्रतिबद्ध है।

जय हिंद!

मिली थी जिन्दगी  किसी के 'काम' आने के लिए..    पर वक्त बीत रहा है      कागज के टुकड़े कमाने के लिए..    क्या करोगे इतना ...
22/04/2026

मिली थी जिन्दगी
किसी के 'काम' आने के लिए..
पर वक्त बीत रहा है
कागज के टुकड़े कमाने के लिए..
क्या करोगे इतना पैसा कमा कर..?
ना कफन मे 'जेब' है ना कब्र मे 'अलमारी..'
और ये मौत के फ़रिश्ते तो
'रिश्वत' भी नही लेते... everyone
🌹

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