Shastra Gyan

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आज हम जानते हैं कि करुणा और क्रोध में क्या अंतर है ! क्यों कभी किसी पर करुणा आती है और क्यों कभी किसी पर क्रोध आता है ? ...
30/08/2024

आज हम जानते हैं कि करुणा और क्रोध में क्या अंतर है ! क्यों कभी किसी पर करुणा आती है और क्यों कभी किसी पर क्रोध आता है ? दोनों के क्या लक्षण हैं ? क्या करेगे तो क्रोध नहीं आएगा | जानते हैं, आज के शास्त्र ज्ञान से, बस थोड़ी ही देर में |

आज हम जानते हैं कि करुणा और क्रोध में क्या अंतर है ! क्यों कभी किसी पर करुणा आती है और क्यों कभी किसी पर क्रोध आता है ? .....

ज्योतिष में आज हम जानेंगे कि वृष राशि के जातक कैसे होते हैं ? उनका स्वभाव कैसा होता है ? यदि आपकी भी राशि वृष है तो आप इ...
30/08/2024

ज्योतिष में आज हम जानेंगे कि वृष राशि के जातक कैसे होते हैं ? उनका स्वभाव कैसा होता है ? यदि आपकी भी राशि वृष है तो आप इस लाइव वीडियो को अवश्य देखें और यदि नहीं है और ज्योतिष सीखना चाहते हैं, तो भी अवश्य देखें ताकि जो वृष राशि का जातक हो, उसके बारे में बता सकें |

आज हम जानेंगे कि वृष राशि के जातक कैसे होते हैं ? क्या स्वभाव होता है ? जो लोग, ज्योतिष सीख रहे हैं, वो वृष राशि के नोट्.....

शिखंडी हिंजड़ा (आधा स्त्री, आधा पुरुष) था, ये बात आपने सुनी है या खुद पढ़ी है ? अहिंसा परमो धर्मः, धर्म हिंसा तथैव च, वाला...
27/06/2024

शिखंडी हिंजड़ा (आधा स्त्री, आधा पुरुष) था, ये बात आपने सुनी है या खुद पढ़ी है ? अहिंसा परमो धर्मः, धर्म हिंसा तथैव च, वाला सूत्र महाभारत में है, ये आपने सुना है, या स्वयं पढ़ा है ? शास्त्रों पर लगी धूल झाड़िये तो, पता चलेगा कि शास्त्रों/ग्रन्थों/धर्म के नाम पर बहुत सी मनगढ़ंत बातें प्रचलित हैं ।
शास्त्रों की सही बातों को जानिए, यदि अभी तक शास्त्रज्ञान का यूट्यूब चैनल लाइक करके सब्सक्राइब नहीं किया है तो आज ही कर लें, ताकि आपको शास्त्रों के बारे में सही और महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त हो सके और एक बार चैनल के विभिन्न विडियो को ब्राउज अवश्य करें, बहुत कुछ नया मिल सकता है । लिंक कमेन्ट में ।

पुत्र (गुस्से में) - पापा, आपके पास पैसे होते हैं, पर आप हम बच्चों पर उन्हें खर्च नहीं करना चाहते | पिता - बेटा, तुम्हें...
21/06/2024

पुत्र (गुस्से में) - पापा, आपके पास पैसे होते हैं, पर आप हम बच्चों पर उन्हें खर्च नहीं करना चाहते |

पिता - बेटा, तुम्हें मेरी उजली कमीज तो दिख रही है, पर मेरी बनियान के छेद नहीं दिख रहे |

नाटक - प्राण जाए, पर वचन न जाई

17/05/2024

अंतर्ध्यान - ज्ञान से अज्ञान को काटना है | पर कैसे ?

बहुत से पंडित, बाबा, महात्मा बताते हैं कि लोभ छोड़ो, माया छोड़ो, स्त्री छोड़ो.... ये छोड़ो, वो छोड़ो.... ज्ञान मिल जायेगा | कैसे मिल जायेगा ? अरे साब, स्त्री के पास रहना पाप होता तो कृष्ण जी के पास तो हजारों पत्नियाँ थी, जिसमें एक दो नहीं ८-८ पटरानियाँ थी | माया छोड़ो !!! अरे, जब भगवान् राम स्वयं माया के वशीभूत हो कर सीता जी को जंगल छुडवा दिए रहे तो हम और आप माया कैसे छोड़ सकते हैं ? सीता जी को तोते से श्राप पड़ा ही क्यों ? अगर वो माया के वशीभूत नहीं थी ? जब वो नहीं छोड़ पाए तो हम कैसे छोड़ेंगे ? वास्तव में कुछ नहीं छोड़ना... !

इसको और आसान करके देखते हैं | एक श्लोक देखें -

क्रोधस्तु प्रथमं शत्रुर्निष्फलो देह्नाशनः,
ज्ञानखड्गेन तं छित्वा परमं सुखमाप्नुयात |
तृष्णा बहुविधा माया बन्धनी पापकारिणी,
छित्वेतां ज्ञानखड्गेन सुखं तिष्ठति मानवः ||
--- ब्रह्म पुराण

अर्थ - मनुष्य का पहला शत्रु है क्रोध | उसका फल तो कुछ भी नहीं है, उलटे वह शरीर का नाश करता है, अतः ज्ञान रुपी खड्ग से उसका नाश करके परम आनंद को प्राप्त करे | नाना प्रकार की तृष्णा बंधन में डालने वाली माया है, वह पाप कराती है; अतः ज्ञान रुपी खड्ग से उसका नाश कर देने पर मनुष्य सुख से रहता है |

उपरोक्त श्लोक में अज्ञान एक खराब चीज है, इसे थोड़ी देर के लिए वायरस मान लेते हैं और ज्ञान एक अच्छी चीज है जो अज्ञान का नाश करता है सो इसे थोड़ी देर के लिए एंटीवायरस मान लेते हैं | और ये दोनों कहाँ रहते हैं ? हमारे शरीर में, सो इसे थोड़ी देर के लिए सिस्टम मान लेते हैं | सिस्टम में सारी प्रोग्रामिंग कहाँ होती है ? माइक्रोप्रोसेसर में, सो चित्त हमारा माइक्रोप्रोसेसर है | अब ये वायरस आते कहाँ से हैं ? ये वायरस हमें बचपन से दिए जाते हैं | जैसे ये मेरा है, ये तेरा है; ये अपना है, ये पराया है; ये अच्छा है ये बुरा है; ये पाप है, ये पुण्य है; ये सही है, ये गलत है; ये सुख है और ये दुःख है; ये सब क्या है ? ये सब भेद बुद्धि है; ये सब ही वायरस है जो हमें सिखाये गए हैं, हममें डाले गए हैं | आदमी जो कुछ सोचता है और जो कुछ करता है इन सब चीजो को ध्यान में रख कर ही करता है, यानी हमारी सोच और हमारे कार्य इन सब बातों से प्रभावित होते हैं और यही एक वायरस का काम है | जो भी प्रोसेसिंग हो, उसे एफेक्ट करना | जब कंप्यूटर में वायरस ज्यादा हो जाते हैं तो क्या करते हैं ? कंप्यूटर को फॉर्मेट कर देते हैं | मार दीजिये अपने सिस्टम को फॉर्मेट | कंप्यूटर को फॉर्मेट करते हैं तो क्या होता है ? सब खाली हो जाता है और उसके सारे वायरस भी ख़त्म हो जाते हैं, आपके भी वायरस ख़त्म हो जायेंगे, भेद बुद्धि ख़त्म हो जाएगी क्योंकि आप जिन चित्त के विकारों से भेद कर रहे थे वो सारे प्रोग्राम तो आपने फॉर्मेट कर दिए |

तब क्या होगा ? फॉर्मेट के बाद कंप्यूटर में क्या बचता है ? स्पेस !!! खाली स्पेस आपके सिस्टम में भी एक स्पेस क्रिएट होगा | अब आप उस स्पेस में कुछ भी भर सकते हैं | आप अपनी प्रोग्रामिंग खुद कर सकते हैं | हटा दीजिये सारे भेद जो आप जानते थे | जो प्रोग्राम आपमें डाले गए थे; ये सुन्दर है, ये असुंदर है, ये अच्छा है, ये बुरा है | सब हटा दीजिये | जैसे कंप्यूटर फॉर्मेट होने के बाद क्लीन हो जाता है वैसे ही आपकी बुद्धि भी शुद्ध हो जाएगी | बुद्धि शुद्ध होगी तो क्या होगा ? सारे भेद समाप्त हो जायेंगे |

कीजिये अपनी प्रोग्रामिंग, मिटा दीजिये सारी भेद बुद्धि को | न कुछ अच्छा है, न कुछ बुरा है, न कोई अपना है, न कोई पराया है, न कुछ सही है और न कुछ गलत है, न कुछ पाप है और न कुछ पुण्य है, न कहीं सुख है और न कहीं दुख है | फिर क्या डालना है ? फिर डालना है सही प्रोग्राम, खुद कीजिए अपनी प्रोग्रामिंग | सब मेरे हैं, कोई पराया नहीं है | जब सब मेरे हैं तो मेरा भाई भी मेरा है, मेरा पडोसी भी मेरा भाई है, मेरा सहपाठी भी मेरा भाई है, सारे हमउम्र, सारे छोटे बड़े, सब मेरे भाई हैं, कोई पराया नहीं है क्योंकि अपने परायेपन की प्रोग्रामिंग तो आपने डिलीट कर दी, अब तो सब अपने हैं | ये मेरे पिता जी हैं और पड़ोस के अंकल भी मेरे पिता सामान ही हैं | मेरी बेटी भी मेरी है और मेरे पड़ोस में रहने वाली लड़की भी मेरी बेटी जैसी ही है | कौन पराया है फिर ? नेता लोग, अक्सर अपने स्टेज से कहते हैं - भाइयों और बहनों !!! क्यों ? क्योंकि वो दिखाना चाहते हैं कि वो कोई भेद नहीं करते पर ऐसा है क्या ? क्या कोई अपने भाई के लिए ऐसी पालिसी बनाता है, जिस से खुद के भाई बहनों का नुकसान हो, या कष्ट हो | वो सिर्फ दिखाते हैं, मानते नहीं है | पर जो मानता है कि इस दुनिया में जो भी है, वो अपना है, मेरा है उसके लिए ही कहा गया है - "वसुधैव कुटुम्बकम"

वसुधैव कुटुम्बकम उसी के लिए है जिसकी भेद बुद्धि नष्ट हो चुकी है | जो सेल्फ प्रोग्रामर है, जो खुद पर कण्ट्रोल कर लेता है |

ऐसे ही कुछ भी मेरा नहीं है और कुछ भी पराया नहीं है | अरे ! जब सब अपने ही भाई बंधू हैं तो क्या मेरा और क्या तेरा ? जब तुझे जरूरत पड़ेगी, मेरे से ले और जब मुझे जरूरत पड़ेगी मैं तेरे से ले लूँगा | कहते तो हैं - अयं निजं परोवेती गणना लघुचेतसाम् उदार चरितानान्तु वसुधैव कुटुंबकम |

सब कुछ तो हम जानते हैं | पर मानते नहीं हैं | सो अपनी प्रोग्रामिंग खुद कीजिये | ऐसे ही जितनी भी और भेद बुद्धि है, उस सब को हटा कर केवल एक चीज रखिये | जैसे न कहीं सुख है और न कहीं दुःख है - सब जगह एक ही चीज है, आनंद | सुख में भी आनंद लीजिये और दुःख में भी आनंद लीजिये | कुछ समय बाद आपको लगेगा कि साला, हम कितना फालतू की बातों पर रोता था.... और अपने आप, दुःख और सुख से परे, आनंद की स्टेट में पहुच जायेंगे (विस्तारभय से इसे यहीं छोड़ता हूँ )

अहम् ब्रह्मास्मि ! जो अपनी प्रोग्रामिंग खुद करेगा, जो सबको ब्रह्म का स्वरुप मानेगा, जो स्वयं ब्रह्म की भांति चित्त के विकारों से दूर होगा, वही ब्रह्म है | आप भी ब्रहम हैं और मैं भी ब्रह्म हूँ | हम सब ईश्वर स्वरूप हैं और विकारों से मुक्त होने के लिए ही बने हैं | कीजिये खुद को अपने चित्त के विकारों से दूर..... कीजिये खुद की सेल्फ प्रोग्रामिंग....... काटिए अपने अज्ञान को अपने ज्ञान से ...... स्वयं को जानिये ...... |

ॐ श्री गुरवे नमः |
अभिनंदन शर्मा

*खंडन 15 - कृष्ण और कर्ण के वायरल संवाद का खंडन*आजकल कृष्ण जी और कर्ण के मध्य एक वार्तालाप का मैसेज बहुत वायरल हो रहा है...
15/05/2024

*खंडन 15 - कृष्ण और कर्ण के वायरल संवाद का खंडन*

आजकल कृष्ण जी और कर्ण के मध्य एक वार्तालाप का मैसेज बहुत वायरल हो रहा है | ये पोस्ट, खंडन के लिए मेरे समक्ष आया है | अतः आज हम इसकी चर्चा करेंगे | ऐसे बहुत से मेसेज, कथा, कहानियाँ सोशल मिडिया पर वायरल की जाती हैं, जिनका शास्त्रों से दूर दूर तक का कोई लेना देना नहीं होता है | जो पूर्णतया काल्पनिक, गलत और अशस्त्रोक्त होता है किन्तु कोई बाबा, कोई कथावाचक, किसी प्रेरणा को देने के लिए, इस प्रकार के झूठे कथानक बनाते हैं | इसका नुक्सान ये होता है कि जिसने शास्त्रों को कभी पढ़ा ही नहीं, वो उन्हें सच मानने लगता है और एक गलत कथानक, उस शास्त्र अथवा ग्रन्थ के नाम पर, उसके दिमाग में बैठ जाता है और असली ग्रन्थ, जो कभी छुआ भी नहीं, उसको वो देखता तक नहीं | खैर, पुनः वापिस आते हैं, इस मनगढ़ंत कहानी पर (फेक कहानी का लिंक पोस्ट के कमेन्ट में है) |

पढने वाले जान लें, कि इस प्रकार का कोई संवाद, महाभारत में नहीं है | इस संवाद में शब्द भी गलत चुने गए हैं | पहले कर्ण अपनी परेशानी बताते हैं, पहले कर्ण कहता है कि मैं कुंती की अवैध संतान था तो इसमें मेरी क्या गलती है ? - यहाँ समझने वाली बात ये है कि कर्ण कुंती की अवैध संतान नहीं थे | कर्ण मन्त्र द्वारा, सूर्य के बंधने पर, सूर्य भगवन से प्रदत्त थे | ये अवैध कहाँ से हो गयी ? ये लोकमर्यादा के विरुद्ध था कि एक बच्चा, शादी से पहले हो गया | अवैध होने में (किसी पर पुरुष से सम्बन्ध बना कर, बच्चे को त्यागने में) और लोकमर्यादा के विरुद्ध होने में अंतर है | पर जाहिर सी बात है, माता के फैसले में, बच्चे का कोई दोष नहीं होता है |

दूसरी बात कर्ण कहता है कि उसे द्रोणाचार्य से शिक्षा नहीं मिली | जिन्होंने टीवी वाली महाभारत देखी है, उनको ये सत्य भी लगता होगा पर ऐसा है नहीं | महाभारत में 'आदि पर्व के संभव पर्व के अध्याय 131' में स्पष्ट लिखा है कि कर्ण ने भी द्रोणाचार्य से ही शिक्षा ली थी और वो अर्जुन से बैर रखता था | महाभारत में कर्ण और दुर्योधन पहले से एक दुसरे को जानते थे और मित्र थे, न कि जैसा टीवी में दिखाया कि केवल रंगभूमि में वो पहली बार मिले | कर्ण की शिक्षा द्रोणाचार्य के आश्रम में ही हुई थी और पूर्ण शिक्षा लेने के बाद कर्ण, ब्रह्मास्त्र सीखना चाहता था, कारण पूछने पर, अर्जुन से द्वेष बताया था तो द्रोणाचार्य ने कर्ण को मना कर दिया और उन्होंने ही स्वयं कर्ण को परशुराम को प्रसन्न करने को कहा था कि यदि वो प्रसन्न हो गए तो ब्रह्मास्त्र दे सकते हैं | (द्रोणाचार्य, बच्चों को सिखाने में, उनके कुल आदि का ध्यान रखते थे और भेदभाव भी करते थे | उन्होंने स्वयं भी अर्जुन के रसोइये से कहा था कि अर्जुन को दिन ढलने के बाद भोजन भूलकर भी न दे, इस प्रकार का भेदभाव वो करते थे | अर्जुन के शब्दभेदी बाण सीखने का सम्बन्ध, इसी भोजन से है)

तीसरी बात, कर्ण कहता है परशुराम को पता चलने पर कि मैं कुंती का पुत्र हूँ, उन्होंने मुझे श्राप दिया | ऐसा नहीं था, अव्वल तो उस समय तक कर्ण को स्वयं नहीं पता था कि वो कुंती पुत्र है अतः इस बात पर श्राप का तो प्रश्न ही नहीं उठता | श्राप मिला इसलिए क्योंकि कर्ण ने झूठ बोलकर विद्या ग्रहण की थी | गुरु से झूठ की बड़ी निंदा है | अतः यहाँ भी तथ्यों को मरोड़ दिया गया है | संभव है कि द्रोणाचार्य द्वारा आश्रम से निकालने पर, उनसे बेहतर विद्या प्राप्त करने के लिए, कर्ण परशुराम जी के पास गया हो और क्योंकि वो क्षत्रियों को नहीं सिखाते थे, अतः झूठ बोलकर ब्राह्मण होने का स्वांग रचा हो, जिसका दंड उसे अंत में मिला | गलत बात का नतीजा गलत ही होता है |

आगे कर्ण कहता है कि मेरे बाण से एक गाय मारी गयी और बिना मेरी गलती के ब्राहमण ने मुझे श्राप दे दिया | गाय का मारा जाना, सबसे जघन्य अपराधों में से एक गिना जाता था, उस समय (इस समय नहीं गिना जाता किन्तु, उस समय गाय को मारना जघन्य पाप था) | यदि बाण से गाय मारी गयी, तो ये नहीं कहा जा सकता कि कोई गलती नहीं थी | जिसके पास शक्ति होती है, उसके पास शक्ति का सही समय और सही तरह से उपयोग करने की जिम्मेदारी भी होती है | भीम चाहता तो वस्त्रहरण के समय ही, दुर्योधन को मार डालता लेकिन उस समय वो दुर्योधन का नौकर था और ये सेवकधर्म के विरुद्ध था अतः शक्ति के साथ जिम्मेदारी भी आती है | आप ये नहीं कह सकते कि मैंने तो ये कर दिया, पर इसमें मेरी कोई गलती नहीं थी |

आगे कर्ण कहते हैं कि द्रौपदी स्वयंवर में, उनका अपमान हुआ | किन्तु द्रौपदी स्वयम्वर में कर्ण का अपमान कैसे हुआ ? क्षत्राणियों का विवाह, क्षत्रिय और ब्राह्मण में ही मान्य है (अपने वर्ण से ऊपर) वैश्य अथवा शूद्र से नहीं और उस समय तक कर्ण सूतपुत्र के नाम से ही विख्यात थे | ये बात सर्वविदित थी,फिर भी कर्ण, दुर्योधन के बहकावे में आकर, उस स्वयम्वर में गया, जिसमें उसे नहीं जाना चाहिए था | ये तो उसे भी पता था कि उसका विवाह द्रौपदी से नही हो सकता है | संभवतः जब दुर्योधन उस प्रतियोगिता को नहीं जीत पाया तो उसके अपमान को पूरा करने के लिए, कर्ण ने उस प्रयास को किया हो किन्तु उसको रोकने में कुछ भी गलत नहीं था | उस समय क्षत्राणियों का विवाह, शूद्र अथवा वैश्य से नहीं होता था |

अंत में, कर्ण कहता है कि मेरे साथ इतना गलत हुआ लेकिन दुर्योधन ने मेरा साथ दिया तो अब मैं अगर दुर्योधन का साथ देता हूँ तो मैं गलत कैसे हूँ ? यहाँ ये भी जानना जरूरी है कि जैसे बहुत से लोगों को लगता है कि कर्ण ने दुर्योधन का साथ दिया, इसलिए गलत था | ऐसा नहीं है, लोग बिना महाभारत पढ़े ही, महाभारत के बारे में, ऐसे मनगढ़ंत आख्यानो से एक सोच बना लेते हैं | महाभारत में सभी पात्रों ने, स्वधर्म की रक्षा की थी | कर्ण ने भी ! उसका धर्म था कि मित्र के किये परोपकार के लिए कृतज्ञ रहे, कृतघ्नता न करे और वही उसने किया | इसमें कर्ण का कोई दोष नहीं था | ये करना ही उसका धर्म था | यदि वो ऐसा नहीं करता तो वो कृतघ्नता करता और अधर्म का अनुसरण करता | लेकिन लोग, जानबूझकर कर्ण को दोषी बताते हैं और फिर उसे जस्टिफाई करने के लिए, इस प्रकार के मनगढ़ंत कथानक गढ़ते हैं |

अब इसके बाद कृष्ण जी बताते हैं कि उनके साथ कितना कितना गलत हुआ पर उन्होंने तो कभी उफ़ तक नहीं की | परिस्तिथियों में सामजस्य होना चाहिए आदि इत्यादि | यहाँ भी एक छोटी सी गडबड है कि कृष्ण जी, ऐसी बात करें, ये संभव ही नहीं है | स्वप्रशंसा अथवा मेरे साथ तो इतना बुरा बुरा हुआ आदि कोई अन्य तो कह सकता है किन्तु भगवान् श्रीकृष्ण, जिनकी उस समय तक ये स्थापना हो चुकी थी (जब असल में कृष्ण और कर्ण संवाद हुआ, तब तक शान्तिदूत बनकर कृष्ण जा चुके थे) कि कृष्ण जी भगवान् हैं | उनको साधारण मनुष्य नहीं समझा जाता था हालांकि कुछ दुष्टबुद्धि जैसे शिशुपाल, शकुनी आदि ऐसा नहीं मानते थे | अतः भगवान् यदि इस प्रकार की बातें करे कि मेरे साथ ऐसा गलत हुआ, वैसा गलत हुआ और मैंने फिर भी देखो कितने संयम से काम लिया तो बात जमती नहीं है | स्वप्रशंसा की शास्त्रों में निंदा की गयी है और कृष्ण जी के जीवन में जो भी हुआ, वो कृष्ण जी की लीला ही थी | इसमें भाग्य का कोई रोल नहीं था | अतः जिसने भगवद्गीता जैसा गूढ़ रहस्य अर्जुन को बताया वो ऐसे साधारण वाक्यों और दृष्टान्तो से, किसी की शंका निवारण करे, ऐसा सही तो नहीं लगता |

पर मनगढ़ंत तो कुछ भी बनाया जा सकता है | अपनी बात जो कहनी है, अंत में सीख जो देनी है सो कथामास्टर ने, अंत में सीख दे दी | अब कुछ लोग कह सकते हैं कि भैया, चलो मनगढ़ंत है पर सीख तो अच्छी दी है, अगर किसी मनगढ़ंत बात से भी अच्छी सीख दी जा सकती है तो आपको क्या आपत्ति है ? तो मेरा कहना है कि मनगढ़ंत कहानी बनानी है, जिसमें सीख भी दी जा सके तो बनाइये पंचतंत्र जैसी | दुनिया आपकी विद्वत्ता का लोहा मानेगी लेकिन हमारे कृष्ण जी को लेकर, ऐसी मनगढ़ंत बातें न बनाएं, जो कहीं ग्रन्थों में है ही नहीं | आप असली में से ही कथा सुना दीजिये, महाभारत में ऐसी हजारों कहानियाँ हैं, जिनमें एक से बढ़कर एक सीख है, लेकिन क्योंकि वो आपने खुद नहीं पढ़ी है सो कृष्ण जी का नाम लेकर, मनगढ़ंत कहानियों का प्रचार कर रहे हैं और लोग उन्हें शास्त्रों से उद्धृत समझ कर, वाह वाह करते हैं | हम जैसे लोग, अपना सिर फोड़ते हैं कि लो, आ गयी एक और फर्जी कहानी, सोशल मिडिया पर | अरे, कहानी मनगढ़ंत है तो ठीक पर पात्र क्यों शास्त्रों में से ले रहे हैं, वो भी मनगढ़ंत ले लीजिये.. सीख देना उद्देश्य है न ? या केवल शास्त्रों और ग्रंथो पर कुठाराघात किये बिना, आप अपनी बात कह ही नहीं सकते हैं ! ऐसी कहानी, जिसमें कर्ण को द्रोणाचार्य ने नहीं पढ़ाया था, जिसमें कर्ण को परशुराम से श्राप, कुंती का पुत्र होने की वजह से मिला, जिसमें कर्ण का स्वयंवर में अपमान हो गया ... मतलब सब कुछ फर्जी |

अतः सभी से अनुरोध है कि कृपया अपने मूलग्रंथो को स्वयं पढ़ें, ऐसे कथावाचकों से बचे, जो आपको आपके ही धर्मग्रंथों से दूर कर दें और फर्जी कथानकों से, आपके मन में एक नयी प्रकार की सोच ही बना दें | यदि आप असली ग्रन्थ पढेंगे तो आपको ऐसी हजारों प्रेरणास्पद कहानियाँ मिलेंगी | आनंद आएगा, पढ़ कर तो देखिये | लेकिन शास्त्रों और धर्म को, व्हात्साप्प और फेसबुक पर पढने से बचिए क्योंकि 95% तक का मेटेरियल फर्जी और गलत ही होता है | अतः कसम खाइए कि अब से स्वयं अध्ययन प्रारम्भ करेंगे और फर्जी कहानियों से धर्म को सीखने का प्रयास नहीं करेंगे | इस पोस्ट को शेयर कीजिये ताकि जितनी दूर तक वो फर्जी कहानी गयी है, उससे आधी दूर तक कम से कम ये खंडन भी पहुचे | इसे व्हात्सप्प और फेसबुक दोनों पर शेयर करें |

पं अशोकशर्मात्मज अभिनन्दन शर्मा

खंडन 12 : श्रीराम द्वारा शम्बूकवध नामक वायरल पोस्ट का खंडनरघुकुल में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्र जी पर ही, शम्बूकवध...
02/04/2023

खंडन 12 : श्रीराम द्वारा शम्बूकवध नामक वायरल पोस्ट का खंडन

रघुकुल में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्र जी पर ही, शम्बूकवध के नाम से घूम रही, वायरल पोस्ट द्वारा मर्यादाभ्रष्ट होने का मिथ्या आरोप लगाया गया है | शम्बूक वध के लिए, विभिन्न वीडियो/फेक पोस्ट नेट पर उपलब्ध हैं, जिसमें श्रीराम जी, एक ब्राहमण पुत्र के मर जाने का कारण, किसी शूद्र द्वारा तपस्या में रत होने को कारण जानकार, पुष्पक विमान से उसको ढूँढने जाते हैं और उसका वध कर देते हैं, जबकि ये पूर्णतः काल्पनिक, निराधार और असत्य है, इसमें कोई संशय नहीं है | इसको न मानने के बहुत से कारण उपलब्ध हैं |

जिसमें सबसे प्रमुख कारण तो यही है कि इस फेक पोस्ट के अनुसार, श्रीराम चन्द्र जी, पुष्पक विमान से, उड़कर उस तपस्वी को ढूँढने जाते हैं | जबकि वाल्मिक रामायण (यही अंतिम प्रमाण है) के ही युद्धकाण्ड में, 130 वें सर्ग के, 59-60वें श्लोक में स्पष्ट लिखा है कि भगवान् श्री राम ने, पुष्पक विमान कुबेर को वापिस लौटा दिया था (अयोध्या में उतरने के बाद उन्होंने पुष्पक विमान कुबेर के पास भेज दिया क्योंकि वो उसी का था, जिसे रावण ने, कुबेर से छीन लिया था)

अवतीर्य विमानाग्रादवतस्थे महीतले, अब्रवीच्च तदा रामस्तद्विमानमनुत्तमम् |
वह वैश्रवणं देवमनुजानामि गम्यताम्, ततो रामाभ्यनुज्ञातं तद्विमानमनुत्तमम् |
उत्तरां दिशमुद्दिश्य जगाम धनदालयम् |

श्रीरामचन्द्र तथा अन्य समस्त लोग, विमान से भूमि पर उतर पड़े | तदनंतर श्रीराम ने, उस श्रेष्ठ पुष्पकविमान के अधिष्ठाता को संबोधन करके कहा, मैं आज्ञा देता हूँ कि तुम कुबेर के पास चले जाओ और उन्ही की सवारी में रहो | जब श्रीराम ने इस प्रकार आज्ञा दी, तब वह श्रेष्ठ विमान उत्तर दिशा की ओर कुबेर की राजधानी को चला गया |

अब आप सोचिये कि जब, पुष्पक विमान श्रीराम चन्द्र जी के पास था ही नहीं, तो वो शम्बूक का वध करने, पुष्पक विमान से कैसे पहुंचे ? ये २ श्लोक ही अपने आप में पर्याप्त प्रमाण हैं कि ये पोस्ट झूठी है | जो भगवान् रामचंद्र जी, युद्ध में, अपने परम शत्रु, रावण के, शस्त्रविहीन होने पर, निहत्थे होने पर, आघात नहीं किये | उसे युद्ध से सकुशल वापिस जाने को कह दिया और अगले दिन, पुनः सशस्त्र आकर युद्ध करने को कहते हो, वो एक निहत्थे, तपस्या में रत व्यक्ति पर तलवार से वार कर देंगे, ये वही व्यक्ति लिख सकता है, जिसने रामायण को पढ़ा ही न हो |

और शूद्र तपस्या नहीं कर सकता, ऐसा कौन से शास्त्र में लिखा है ? ऋग्वेद,मंडल १० ,सूक्त ३०-३४ का द्रष्टा है >कवष ऐलूष । यह शूद्र था।जुआरी भी था । इसने अक्षसूक्त भी लिखा था ,जिसमें इसने अपने से ही कहा है कि >मत खेल जुआ। इसका एक सूक्त विश्वेदेवा को समर्पित है।एक अपां- नपात को। सरस्वतीनदी के तट पर जब सोमयाग हुआ, तब ब्राह्मणों ने इसे दास्या:पुत्र: कह कर बाहर कर दिया। यह कुछ दूरी पर जाकर बैठ गया। अपां- नपात की स्तुति की। संयोग से सरस्वती का प्रवाह इसके चारों ओर आ गया । वह स्थल परिसारक- तीर्थ माना गया।

इसने ब्राह्मणों को बताया कि जाति नहीं कर्म आगे बढाता है।इसके बेटे तुरकावषेय की गणना बडे विद्वानों में हुई तो फिर कौन इस बात को मानेगा कि शूद्र के तपस्या करने से, कोई भारी मर्यादा टूट जाती है | ऊपर से, जिस राम ने, शबरी के झूठे बेर खाए, निषादराज को अपना परममित्र माना, वो मात्र शूद्र के तपस्या करने भर से, उसे तलवार से मार देंगे | ये कोई अनपढ़ ही मान सकता है, शास्त्रों का अध्ययन करने वाले तो नहीं मान सकते |

इन्टरनेट पर कुछ जगह, इस शम्बूक वध के लिए, वाल्मिक रामायण के ही उत्तरकाण्ड से कुछ श्लोक दिए गए हैं, कि उस श्लोक के अनुसार, श्रीराम जी ने, शम्बूक का वध किया था, जबकि मजेदार बात ये है कि वाल्मिक रामायण में उत्तरकाण्ड ही नहीं है !!! वाल्मिक रामायण तो युद्धकाण्ड पर आकर समाप्त हो जाती है | उसके आगे वाल्मिक रामायण में कोई काण्ड नहीं है | फिर ये बाद वाला काण्ड कहाँ से आया ? जिसे लोग उत्तर काण्ड के नाम से कह रहे हैं, ये वैसे ही आया, जैसे किसी ने अफवाह उड़ा दी कि कोरोना स्तोत्र, शिव पुराण से है | ऐसे ही, किसी की रचना को जबरन वाल्मिक रामायण से जोड़कर, उसे वाल्मिक रामायण का बताया जाने लगा, जबकि मूल वाल्मिक रामायण में ऐसा कुछ नहीं है |

फिर ये सारा शम्बूक वध का प्रकरण आया कहाँ से ? ये इतना प्रचलित कैसे हुआ ? अब आते हैं, इस फेक पोस्ट के मूल पर | एक बहुत ही प्रसिद्ध उपन्यासकार हुए हैं, नरेंद्र कोहली जी | इन्होने १९७५ में एक नाटक लिखा था - शम्बूक वध | जाहिर है, नाटक था तो मंचन भी हुआ, और खूब हुआ और ये प्रकरण, आम जनमानस तक पहुँच गया, जहाँ तक फेक उत्तरकांड नहीं पहुँच पाया था | ऐसा नहीं है कि उपन्यासकार पढ़ते नहीं है, बहुत पढ़ते हैं, बहुत अध्ययन करते हैं लेकिन वो किसी भी चीज को आध्यात्म के अनुसार नहीं पढ़ते अपितु उसमें छिद्र ढूंढकर, उस पर एक नयी रचना बनाने के उद्देश्य से पढ़ते हैं | इन्होने भी देखा कि अरे, एक अनपढ़ा सा करैक्टर मिला, शम्बूक, इसी पर आगे एक नाटक बनाया जा सकता है और एक फेक करैक्टर, एक फेक कथा को एक बेस मिल गया, आम जनमानस में | जब-जब आप धर्म को, शास्त्रों को, मूलग्रंथों की बजाय, उपन्यासकारों की नज़रों से पढ़ते हैं, तब तब आप एक नए भ्रम के शिकार होते हैं क्योंकि उस उपन्यास में कुछ भी शास्त्रोक्त नहीं होता, सब कुछ या कुछ भी मनगढ़ंत हो सकता है और आपको पता भी नहीं चलता, क्योंकि आपने तो मूलग्रन्थ तिनके तक से नहीं छुए हैं | चाहे वो नरेंद्र कोहली जी का नाटक - शम्बूकवध हो या अमीश त्रिपाठी की शिव ट्रायोलोजी |

अब से कसम खाइए कि शास्त्रों के बारे में अपनी राय, किसी सोशल मिडिया पोस्ट से नहीं, किसी नाटक, उपन्यास से नहीं बनायेंगे अपितु शास्त्रों का स्वअध्ययन करके ही बनायेंगे और इस प्रकार की किसी भी सोशल मिडिया पोस्ट को १% सत्य नहीं मानेंगे |

पं अशोकशर्मात्मज अभिनन्दन शर्मा

आज किन्हीं मित्र के सानिध्य से कुमार विश्वास की अपने अपने राम का विडियो सुनने को मिला । दो अंक सुने । क्षोभ हुआ सुन कर ।...
01/03/2023

आज किन्हीं मित्र के सानिध्य से कुमार विश्वास की अपने अपने राम का विडियो सुनने को मिला । दो अंक सुने । क्षोभ हुआ सुन कर । पहले मैं समझता था कि आजकल शास्त्रों का कथाकारों ने ही नाश किया हुआ है, कोई अच्छा ब्राह्मण यदि कथाकारी करे तो अच्छे से कर सकेगा लेकिन मेरा या भ्रम भी टूट गया। कुमार विश्वास को मैं सभी प्रकार से योग्य मानता हूं, पढ़े लिखे हैं, प्रोफेसर हैं, भाषा कुशलता है, मंच से घंटो बोल सकते हैं, काव्य, साहित्य और राजनीति का अच्छा ज्ञान है लेकिन साहित्य और शास्त्रों के ज्ञान होने में को अंतर होता है, वो आज सुना ।

हम भी जब कोई यूट्यूब लाइव करते हैं तो बहुत पढ़कर और अध्ययन करके करते हैं, कि तथ्यों में कोई गलती न रह जाए जबकि हमारा तो ऑडियंस बेस ही बहुत छोटा है, जबकि कुमार विश्वास तो हजारों लोगों के सामने एक विशाल मंच से बोल रहे थे, कम से कम शास्त्रीय तथ्यों को जांच तो लेना चाहिए था । उनके कहे को लाखों लोग सच ही मान रहे होंगे ।

एक जगह कहते हैं, जामवंत ब्रह्मा जी के पोते थे ?? क्या सच में ! जामवंत जी, स्वयं ब्रह्मपुत्र थे, पोते नहीं थे । दूसरी जगह कहते हैं, पुलस्त्य ऋषि के मित्र थे ?? सच में ?? अरे ऋषि पुलस्त्य भी ब्रह्मा जी के ही पुत्र थे, अतः जामवंत रावण के नाना के समकक्ष ही हुए। वो पुलस्त्य ऋषि के मित्र नहीं, अपितु भाई थे ।

ऐसे एक नहीं अनेकों ऊट पटांग तथ्य उन्होंने अपनी कथा में कहे !! सूपर्णखा विश्व सुंदरी थी, उनके हिसाब से और उसकी नाक, गलती से कट गई थी ??? अरे भाई, स्त्री को मृत्युदंड नहीं दिया जाता अतः उसके नाक और कान दोनों काट लिए गए थे और ये गलती से नहीं हुआ था ।

फिर बताते हैं कि भरत और शत्रुघ्न अयोध्या पहुंचे तो पहले एक मंदिर में पहुंचे, जहां पूर्वजों की मूर्तियां थीं और वहां दशरथ की मूर्ति देखकर उन्होंने पुजारी से पूछा तो उसने बताया, महाराज स्वर्ग सिधार गए !!! मतलब राजा दशरथ मरे और तुरंत उनकी मूर्ति 1 से 2 दिन के अंदर बनवा कर, मंदिर में रखवा दी गई ?? वो भी उनके दाहसंस्कार से पहले ?? जबकि भरत को पिताजी के देहावसान की सूचना कैकई ने दी थी, न कि किसी पुजारी ने ।

ऐसे ही एक जगह कहा कि रामचंद्र जी जब वनवास को जा रहे थे, तो संकल्प हुआ और जंबू द्वीपे भारत खंडे सुनकर रामचंद्र जी भूमि पर गिर पड़े, क्योंकि उन्हें भरत का ध्यान हो आया, इतना प्रेम वो भरत से करते थे । मतलब कुछ भी !!! भारत देश तब था भी ?? भारत देश का नाम, दुष्यंत और शंकुतला पुत्र, भरत के नाम से पड़ा था, न कि रामचंद्र के भाई, भरत जी की वजह से क्योंकि तब कोई भारत था ही नहीं, तब केवल आर्यवर्त था, जंबू द्वीपे, आर्यवर्ते, न कि भरत खंडे । ये तो बाद में जोड़ा गया, स्थान की और अधिक स्पष्ट बनाने के लिए ।

ऐसी अनेकों बातें उन्होंने कहीं, जिस पर कथा लाइव सुनने वाले, सभी लोग तालियां बजा रहे थे और मैं सिर धुन रहा था । पूरी जगह रामकथा को, कहानी कहा गया ?? क्या कथा और कहानी, एक ही बात होती है ?? ये बात कुमार विश्वास से अपेक्षित नहीं थी। ऋषि भारद्वाज जी को, केवल भरद्वाज कहकर संबोधित करना, क्या उचित है ??

मुझे अफसोस हुआ कि मेरा भ्रम, कि कोई पढ़ा लिखा ब्राह्मण यदि रामकथा या शास्त्रों की कथा मंच से कहे तो अच्छे से कहेगा, टूट गया ।

हे राम !!!

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