11/07/2026
मैंने सत्य को खोजा
तो वह किसी ग्रन्थ में नहीं मिला।
वह एक बूढ़े मज़दूर की हथेली पर था,
जहाँ रेखाएँ कम
और दरारें अधिक थीं।
मैंने ईश्वर को पुकारा
तो आकाश मौन रहा।
फिर एक भूखी चिड़िया
मेरी खिड़की पर आ बैठी,
और मुझे अपने हिस्से की रोटी
छोटी करनी पड़ी।
तभी समझा,
प्रार्थना शब्दों से नहीं बनती,
किसी दूसरे के लिए
अपने सुख में थोड़ी जगह खाली करने से बनती है।
मैंने समय से पूछा,
“तू सब कुछ छीन क्यों लेता है?”
समय ने उत्तर नहीं दिया।
बस मेरे पिता के बालों में
थोड़ी और सफेदी रख दी
और मेरी माँ की आँखों में
इन्तज़ार थोड़ा गहरा कर दिया।
तभी समझा,
समय घड़ी में नहीं चलता,
वह उन चेहरों पर चलता है
जिन्हें हम यह सोचकर टाल देते हैं
कि अभी बहुत जीवन शेष है।
मैंने मृत्यु से कहा,
“तू जीवन की शत्रु है।”
मृत्यु ने मेरी ओर देखा
जैसे कोई गुरु
अधीर शिष्य को देखता है।
उसने कहा,
“मैं न होती
तो तुम किसी आलिंगन को अन्तिम समझकर
इतनी सच्चाई से गले न लगाते।
मैं ही तो प्रत्येक क्षण को
उसका मूल्य देती हूँ।”
मैंने प्रेम को पकड़ना चाहा,
वह मुट्ठी से रेत की तरह फिसल गया।
मैंने उसे मुक्त छोड़ दिया,
वह लौटकर
मेरे भीतर घर बना गया।
तभी समझा,
जिसे बाँधना पड़े
वह प्रेम नहीं, भय है।
और जो चला जाए
फिर भी भीतर करुणा छोड़ जाए,
वही प्रेम का सबसे शुद्ध रूप है।
मैंने अपने अहंकार से पूछा,
“तू इतना ऊँचा क्यों बोलता है?”
उसने धीरे से कहा,
“क्योंकि भीतर एक बच्चा है
जिसे आज तक किसी ने यह नहीं बताया
कि वह बिना जीते भी मूल्यवान है।”
उस दिन मैंने
अपने शत्रुओं को क्षमा नहीं किया,
पहले स्वयं को किया।
क्योंकि बहुत बार
हम दूसरों से नहीं,
अपने ही अधूरे रूप से लड़ रहे होते हैं।
मैंने संसार बदलने की ठानी,
पर संसार बहुत विशाल था।
मैंने अपना घर बदलना चाहा,
पर घर में सब अपने सत्य लिए बैठे थे।
अन्ततः मैंने
अपनी दृष्टि का एक छोटा-सा कोण बदला,
और आश्चर्य,
उसी क्षण संसार कुछ कम कठोर हो गया।
अब मैं विजय नहीं माँगता।
विजय के पीछे
किसी पराजित का मौन पड़ा रहता है।
मैं इतनी बुद्धि माँगता हूँ
कि सही होने से पहले
मनुष्य रह सकूँ,
इतना साहस
कि भीड़ के बीच अकेला सत्य कह सकूँ,
और इतनी विनम्रता
कि अपने सत्य को
अन्तिम सत्य न मानूँ।
जीवन शायद कोई प्रश्न नहीं
जिसका उत्तर हमें मरने से पहले देना है।
जीवन एक दीपक है
जिसे हवा के बीच लेकर चलना है,
इस सावधानी के साथ
कि अपनी लौ बचाते हुए
किसी और का अँधेरा न बढ़ा दें।
अन्त में
हमारे नाम पत्थरों से मिट जाएँगे,
हमारी उपलब्धियाँ
धूल की भाषा सीख लेंगी,
हमारे विचार भी
किसी नए विचार के लिए जगह छोड़ देंगे।
पर सम्भव है,
किसी अनजान मनुष्य के भीतर
हमारी कही हुई एक करुण बात
बहुत देर तक जीवित रहे।
और शायद
अमरता का अर्थ यही है,
संसार में सदा बने रहना नहीं,
अपने जाने के बाद भी
किसी अनजान मनुष्य के भीतर
एक क्षण की करुणा बनकर जीवित रहना।
जब तुम्हारा नाम मिट चुका हो,
तुम्हारी देह मिट्टी हो चुकी हो,
फिर भी तुम्हारे कारण
कोई मनुष्य क्रूर होने से पहले रुक जाए,
किसी गिरे हुए को उठा ले,
किसी रोते हुए के पास बैठ जाए,
तभी समझना,
तुम मरे नहीं।
तुम मृत्यु से आगे निकल गए।
-डॉ दिनेश कुमार जांगड़ा