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Astrology and vastu consulting Astrology and Vastu Consulting ज्योतिष एवं वास्तु परामर्श, रत्न परामर्श

29/03/2024
Happy Birthday Aerish
23/10/2023

Happy Birthday Aerish

26/09/2023

*पंचक विशेष*
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क्यों नहीं किये जाते इसमें शुभ कार्य ?
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ज्योतिषशास्त्र के अनुसार ग्रहों और नक्षत्र के अनुसार ही किसी कार्य को करने या न करने के लिये समय तय किया जाता है जिसे हम शुभ या अशुभ मुहूर्त कहते हैं। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार मान्यता है कि शुभ मुहूर्त में आरंभ होने वाले कार्यों के परिणाम मंगलकारी होते हैं जबकि शुभ मुहूर्त को अनदेखा करने पर कार्य में बाधाएं आ सकती हैं और उसके परिणाम अपेक्षाकृत तो मिलते नहीं बल्कि कई बार बड़ी क्षति होने का खतरा भी रहता है। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार अशुभ और हानिकारक नक्षत्रों के योग को ही पंचक कहा जाता है इसलिये पंचक को ज्योतिष शुभ नक्षत्र नहीं मानता।

कब होता है पंचक
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जब चंद्रमा गोचर में कुंभ और मीन राशि से होकर गुजरता है तो यह समय अशुभ माना जाता है इस दौरान चंद्रमा धनिष्ठा से लेकर शतभिषा, पूर्वा भाद्रपद, उत्तरा भाद्रपद एवं रेवती से होते हुए गुजरता है इसमें नक्षत्रों की संख्या पांच होती है इस कारण इन्हें पंचक कहा जाता है। कुछ कार्य ऐसे हैं जिन्हे विशेष रुप से पंचक के दौरान करने की मनाही होती है।

कितने प्रकार का होता है पंचक
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पंचक प्रमुख रुप से पांच प्रकार का माना जाता है इसमें रोग पंचक, नृप पंचक, चोर पंचक, मृत्यु पंचक और अग्नि पंचक हैं।

रोग पंचक👉 रविवार को शुरू होने वाला पंचक रोग पंचक कहलाता है। इस दौरान पंचक में पांच दिनों के लिये शारीरिक और मानसिक रुप से काफी यातनाएं झेलनी पड़ सकती है इसलिये स्वास्थ्य के प्रति विशेष रुप से सावधान रहने की आवश्यकता होती है। इस दौरान यज्ञोपवीत करना भी वर्जित माना जाता है।

नृप या राज पंचक👉 इस पंचक की शुरुआत सोमवार से मानी जाती है। इस दौरान किसी नई नौकरी को ज्वाइन करना अशुभ माना जाता है, लेकिन नौकरी सरकारी हो तो उसके लिये इसे शुभ माना गया है। सरकारी नौकरी इस पंचक में ज्वाइन करने से लाभ मिलता है।

चोर पंचक👉 इस पंचक की शुरुआत शुक्रवार से होती है। इस पंचक के दौरान यात्रा करने से अपने आपको दूर रखना चाहिये। व्यावसायिक रुप से लेन-देन करना भी इसमें शुभ नहीं माना जाता। अगर ऐसा किया जाता है तो उसमें आर्थिक नुक्सान होने का खतरा बना रहता है।

मृत्य पंचक👉 यह शनिवार को शुरु होता है। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार जोखिम से भरा कोई भी कार्य इस पंचक के दौरान नहीं किया जाना चाहिये। विवाह जैसे शुभ कार्य की भी इस दौरान मनाही होती है। इसमें जान और माल का नुक्सान हो सकता है इसलिये इसे मृत्य पंचक कहा जाता है।

अग्नि पंचक👉 यह मंगलवार को शुरु होता है। घर बनाना हो या फिर एक घर से दूसरे घर में प्रस्थान करना अथवा ग्रह प्रवेश करना अग्नि पंचक के दौरान इन कार्यों को नहीं किया जाता। न्यायालय संबंधी कार्यों को इस पंचक के दौरान किया जा सकता है।

👉 इसके अलावा बुधवार और गुरुवार को शुरू होने वाले पंचक में ऊपर दी गई बातों का पालन करना जरूरी नहीं माना गया है। इन दो दिनों में शुरू होने वाले दिनों में पंचक के पांच कामों के अलावा किसी भी तरह के शुभ काम किए जा सकते हैं।

पंचक का कौनसा नक्षत्र है किसके लिये हानिकारक
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पंचक धनिष्ठा नक्षत्र से शुरु होता है और रेवती नक्षत्र तक रहता है इसमें धनिष्ठा नक्षत्र में अग्नि का भय रहता है इस समय दक्षिण दिशा की यात्रा अथवा छत डलवाने या फिर घास, लकड़ी, ईंधन आदि भी एकत्रित नहीं करना चाहिये। वहीं शतभिषा नक्षत्र में कार्य के दौरान आपसी कलह, वाद-विवाद और झगड़ा होने की संभावनाएं बढ़ जाती इसलिये इस नक्षत्र के दौरान कार्यों को नहीं किया जाता बहुत ही जरुरी हों तो अतिरिक्त सावधानी जरुर रखें। पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र आपकी सेहत के लिये हानिकारक होता है अत: इस दौरान अपनी सेहत का जरुर ध्यान रखना चाहिये। उत्तराभाद्रपद नक्षत्र व्यावसायिक रुप से आपके लिये बहुत हानिकारक होता है इस दौरान अपनी जेब संभालकर रखें अनावश्यक और अतिरिक्त खर्च बढ़ने की संभावना रहती है व्यवासाय में आर्थिक नुक्सान भी उठाना पड़ सकता है। निवेश करने का विचार तो इस नक्षत्र में विशेष रुप से न करें वहीं रेवती नक्षत्र में भी धन की हानि होने की संभावनाएं रहती है।

वहीं पंचक में यदि किसी की मृत्यु हो जाती है तो उसका अंतिम संस्कार विशेष विधि के तहत किया जाना चाहिये अन्यथा पंचक दोष लगने का खतरा रहता है जिस कारण परिवार में पांच लोगों की मृत्यु हो सकती है। इस बारे में गुरुड़ पुराण में विस्तार से जानकारी मिलती है इसमें लिखा है कि अंतिम संस्कार के लिये किसी विद्वान ब्राह्मण की सलाह लेनी चाहिये और अंतिम संस्कार के दौरान शव के साथ आटे या कुश के बनाए हुए पांच पुतले बना कर अर्थी के साथ रखें और शव की तरह ही इन पुतलों का भी अंतिम संस्कार पूरे विधि-विधान से करना चाहिये।

इस दौरान कोई पलंग, चारपाई, बेड आदि नहीं बनवाना चाहिये माना जाता है कि पंचक के दौरान ऐसा करने से बहुत बड़ा संकट आ सकता है।

पंचक शुरु होने से खत्म होने तक किसी यात्रा की योजना न बनाएं मजबूरी वश कहीं जाना भी पड़े तो दक्षिण दिशा में जाने से परहेज करें क्योंकि यह यम की दिशा मानी जाती है। इस दौरान दुर्घटना या अन्य विपदा आने का खतरा आप पर बना रहता है।

पंचक में करने योग्य शुभ कार्य
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पंचक में आने वाले नक्षत्रों में शुभ कार्य हो भी किये जा सकते हैं। पंचक में आने वाला उत्तराभाद्रपद नक्षत्र वार के साथ मिलकर सर्वार्थसिद्धि योग बनाता है, वहीं धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वा भाद्रपद व रेवती नक्षत्र यात्रा, व्यापार, मुंडन आदि शुभ कार्यों में श्रेष्ठ माने गए हैं।

मेरे अनुसार, पंचक को भले ही अशुभ माना जाता है, लेकिन इस दौरान सगाई, विवाह आदि शुभ कार्य भी किए जाते हैं।

पंचक में आने वाले तीन नक्षत्र पूर्वा भाद्रपद, उत्तरा भाद्रपद व रेवती रविवार को होने से आनंद आदि 28 योगों में से 3 शुभ योग बनाते हैं, ये शुभ योग इस प्रकार हैं- चर, स्थिर व प्रवर्ध। इन शुभ योगों से सफलता व धन लाभ का विचार किया जाता है।

मुहूर्त चिंतामणि ग्रंथ के अनुसार पंचक के नक्षत्रों का शुभ फल
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👉 घनिष्ठा और शतभिषा नक्षत्र चल संज्ञक माने जाते हैं। इनमें चलित काम करना शुभ माना गया है जैसे- यात्रा करना, वाहन खरीदना, मशीनरी संबंधित काम शुरू करना शुभ माना गया है।

👉 उत्तराभाद्रपद नक्षत्र स्थिर संज्ञक नक्षत्र माना गया है। इसमें स्थिरता वाले काम करने चाहिए जैसे- बीज बोना, गृह प्रवेश, शांति पूजन और जमीन से जुड़े स्थिर कार्य करने में सफलता मिलती है।

👉 रेवती नक्षत्र मैत्री संज्ञक होने से इस नक्षत्र में कपड़े, व्यापार से संबंधित सौदे करना, किसी विवाद का निपटारा करना, गहने खरीदना आदि काम शुभ माने गए हैं।

29/04/2023

*🌇ब्राह्मणों की वंशावली🌇*
भविष्य पुराण के अनुसार ब्राह्मणों का इतिहास है की प्राचीन काल में महर्षि कश्यप के पुत्र कण्वय की आर्यावनी नाम की देव कन्या पत्नी हुई। ब्रम्हा की आज्ञा से
दोनों कुरुक्षेत्र वासनी
सरस्वती नदी के तट
पर गये और कण् व चतुर्वेदमय
सूक्तों में सरस्वती देवी की स्तुति करने लगे
एक वर्ष बीत जाने पर वह देवी प्रसन्न हो वहां आयीं और ब्राम्हणो की समृद्धि के लिये उन्हें
वरदान दिया ।
वर के प्रभाव कण्वय के आर्य बुद्धिवाले दस पुत्र हुए जिनका
क्रमानुसार नाम था -
उपाध्याय,
दीक्षित,
पाठक,
शुक्ला,
मिश्रा,
अग्निहोत्री,
दुबे,
तिवारी,
पाण्डेय,
और
चतुर्वेदी ।
इन लोगो का जैसा नाम था वैसा ही गुण। इन लोगो ने नत मस्तक हो सरस्वती देवी को प्रसन्न किया। बारह वर्ष की अवस्था वाले उन लोगो को भक्तवत्सला सरस्वती ने
अपनी कन्याए प्रदान की।
वे क्रमशः
उपाध्यायी,
दीक्षिता,
पाठकी,
शुक्लिका,
मिश्राणी,
अग्निहोत्रिधी,
द्विवेदिनी,
तिवेदिनी
पाण्ड्यायनी,
और
चतुर्वेदिनी कहलायीं।
फिर उन कन्याआं के भी अपने-अपने पति से सोलह-सोलह पुत्र हुए हैं
वे सब गोत्रकार हुए जिनका नाम -
कष्यप,
भरद्वाज,
विश्वामित्र,
गौतम,
जमदग्रि,
वसिष्ठ,
वत्स,
गौतम,
पराशर,
गर्ग,
अत्रि,
भृगडत्र,
अंगिरा,
श्रंगी,
कात्याय,
और
याज्ञवल्क्य।
इन नामो से सोलह-सोलह पुत्र जाने जाते हैं।
मुख्य 10 प्रकार ब्राम्हणों ये हैं-
(1) तैलंगा,
(2) महार्राष्ट्रा,
(3) गुर्जर,
(4) द्रविड,
(5) कर्णटिका,
यह पांच "द्रविण" कहे जाते हैं, ये विन्ध्यांचल के दक्षिण में पाये जाते हैं|
तथा
विंध्यांचल के उत्तर में पाये जाने वाले या वास करने वाले ब्राम्हण
(1) सारस्वत,
(2) कान्यकुब्ज,
(3) गौड़,
(4) मैथिल,
(5) उत्कलये,
उत्तर के पंच गौड़ कहे जाते हैं।
वैसे ब्राम्हण अनेक हैं जिनका वर्णन आगे लिखा है।
ऐसी संख्या मुख्य 115 की है।
शाखा भेद अनेक हैं । इनके अलावा संकर जाति ब्राम्हण अनेक है ।
यहां मिली जुली उत्तर व दक्षिण के ब्राम्हणों की नामावली 115 की दे रहा हूं।
जो एक से दो और 2 से 5 और 5 से 10 और 10 से 84 भेद हुए हैं,
फिर उत्तर व दक्षिण के ब्राम्हण की संख्या शाखा भेद से 230 के
लगभग है |
तथा और भी शाखा भेद हुए हैं, जो लगभग 300 के करीब ब्राम्हण भेदों की संख्या का लेखा पाया गया है।
उत्तर व दक्षिणी ब्राम्हणां के भेद इस प्रकार है
81 ब्राम्हाणां की 31 शाखा कुल 115 ब्राम्हण संख्या, मुख्य है -
(1) गौड़ ब्राम्हण,
(2)गुजरगौड़ ब्राम्हण (मारवाड,मालवा)
(3) श्री गौड़ ब्राम्हण,
(4) गंगापुत्र गौडत्र ब्राम्हण,
(5) हरियाणा गौड़ ब्राम्हण,
(6) वशिष्ठ गौड़ ब्राम्हण,
(7) शोरथ गौड ब्राम्हण,
(8) दालभ्य गौड़ ब्राम्हण,
(9) सुखसेन गौड़ ब्राम्हण,
(10) भटनागर गौड़ ब्राम्हण,
(11) सूरजध्वज गौड ब्राम्हण(षोभर),
(12) मथुरा के चौबे ब्राम्हण,
(13) वाल्मीकि ब्राम्हण,
(14) रायकवाल ब्राम्हण,
(15) गोमित्र ब्राम्हण,
(16) दायमा ब्राम्हण,
(17) सारस्वत ब्राम्हण,
(18) मैथिल ब्राम्हण,
(19) कान्यकुब्ज ब्राम्हण,
(20) उत्कल ब्राम्हण,
(21) सरयुपारी ब्राम्हण,
(22) पराशर ब्राम्हण,
(23) सनोडिया या सनाड्य,
(24)मित्र गौड़ ब्राम्हण,
(25) कपिल ब्राम्हण,
(26) तलाजिये ब्राम्हण,
(27) खेटुवे ब्राम्हण,
(28) नारदी ब्राम्हण,
(29) चन्द्रसर ब्राम्हण,
(30)वलादरे ब्राम्हण,
(31) गयावाल ब्राम्हण,
(32) ओडये ब्राम्हण,
(33) आभीर ब्राम्हण,
(34) पल्लीवास ब्राम्हण,
(35) लेटवास ब्राम्हण,
(36) सोमपुरा ब्राम्हण,
(37) काबोद सिद्धि ब्राम्हण,
(38) नदोर्या ब्राम्हण,
(39) भारती ब्राम्हण,
(40) पुश्करर्णी ब्राम्हण,
(41) गरुड़ गलिया ब्राम्हण,
(42) भार्गव ब्राम्हण,
(43) नार्मदीय ब्राम्हण,
(44) नन्दवाण ब्राम्हण,
(45) मैत्रयणी ब्राम्हण,
(46) अभिल्ल ब्राम्हण,
(47) मध्यान्दिनीय ब्राम्हण,
(48) टोलक ब्राम्हण,
(49) श्रीमाली ब्राम्हण,
(50) पोरवाल बनिये ब्राम्हण,
(51) श्रीमाली वैष्य ब्राम्हण
(52) तांगड़ ब्राम्हण,
(53) सिंध ब्राम्हण,
(54) त्रिवेदी म्होड ब्राम्हण,
(55) इग्यर्शण ब्राम्हण,
(56) धनोजा म्होड ब्राम्हण,
(57) गौभुज ब्राम्हण,
(58) अट्टालजर ब्राम्हण,
(59) मधुकर ब्राम्हण,
(60) मंडलपुरवासी ब्राम्हण,
(61) खड़ायते ब्राम्हण,
(62) बाजरखेड़ा वाल ब्राम्हण,
(63) भीतरखेड़ा वाल ब्राम्हण,
(64) लाढवनिये ब्राम्हण,
(65) झारोला ब्राम्हण,
(66) अंतरदेवी ब्राम्हण,
(67) गालव ब्राम्हण,
(68) गिरनारे ब्राम्हण
सभी ब्राह्मण बंधुओ को मेरा नमस्कार बहुत दुर्लभ जानकारी है जरूर पढ़े। और समाज में शेयर करे हम क्या है
इस तरह ब्राह्मणों की उत्पत्ति और इतिहास के साथ इनका विस्तार अलग अलग राज्यो में हुआ और ये उस राज्य के ब्राह्मण कहलाये।
ब्राह्मण बिना धरती की कल्पना ही नहीं की जा सकती इसलिए ब्राह्मण होने पर गर्व करो और अपने कर्म और धर्म का पालन कर सनातन संस्कृति की रक्षा करें।

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*नोट:आप सभी बंधुओं से अनुरोध है कि सभी ब्राह्मणों को भेजें और यथासम्भव अपनी वंशावली का प्रसार करने में सहयोग करें।*
🙏

20/10/2022

कुशोत्पाटिनी अमावश्या
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-जादू टोने व बुरी नजऱ से बचाएगा आज घर लाया कुश
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आज यानी 07 सितम्बर को कुशोत्पाटिनी या कुशाग्रहणी अमावस्या है। भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अमावस्या को शास्त्रों में कुशाग्रहणी या कुशोत्पाटिनी अमावस्या कहा जाता है। आज घर लाया कुश जादू-टोने व बुरी नजऱ से बचाता है। जादू-टोने का कोई भी असर घर परिवार पर नहीं पड़ता है।

ऐसे दें कुश को निमंत्रण
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कुश के पास जाएं और श्रद्धापूर्वक उससे प्रार्थना करें, कि हे कुश कल मैं किसी कारण से आपको आमंत्रित नहीं कर पाया था जिसकी मैं क्षमा चाहता हूं। लेकिन आज आप मेरे निमंत्रण को स्वीकार करें और मेरे साथ मेरे घर चलें। फिर आपको ऊं ह्रूं फट् स्वाहा इस मंत्र का जाप करते हुए कुश को उखाडऩा है उसे अपने साथ घर लाना है और एक साल तक घर पर रखने से आपको शुभ फल प्राप्त होंगे।
पूजाकाले सर्वदैव कुशहस्तो भवेच्छुचि।
कुशेन रहिता पूजा विफला कथिता मया।।
अत: प्रत्येक गृहस्थ को इस दिन कुश का संचय करना चाहिए।

दस प्रकार के होते हैं कुश
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शास्त्रों में दस प्रकार के कुशों का वर्णन मिलता है-
कुशा, काशा यवा दूर्वा उशीराच्छ सकुन्दका।
गोधूमा ब्राह्मयो मौन्जा दश दर्भा, सबल्वजा।।
यानि कुश, काश , दूर्वा, उशीर, ब्राह्मी, मूंज इत्यादि कोई भी कुश आज उखाड़ी जा सकती है और उसका घर में संचय किया जा सकता है। लेकिन इस बात का ध्यान रखना बेहद जरूरी है कि हरी पत्तेदार कुश जो कहीं से भी कटी हुई ना हो उस कुश को ही शुक्रवार के दिन उखाडऩा चाहिए। एक विशेष बात और जान लीजिए कुश का स्वामी केतु है लिहाज़ा कुश को अगर आप अपने घर में रखेंगे तो केतु के बुरे फलों से बच सकते हैं।
ज्योतिष शास्त्र के नज़रिए से कुश को विशेष वनस्पति का दर्जा दिया गया है। इसका इस्तेमाल ग्रहण के दौरान खाने-पीने की चीज़ों में रखने के लिए होता है, कुश की पवित्री उंगली में पहनते हैं तो वहीं कुश के आसन भी बनाए जाते हैं।

कौन सा कुश उखाड़ेंं-
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कुश उखाडऩे से पूर्व यह ध्यान रखें कि जो कुश आप उखाड़ रहे हैं वह उपयोग करने योग्य हो। ऐसा कुश ना उखाड़ें जो गन्दे स्थान पर हो, जो जला हुआ हो, जो मार्ग में हो या जिसका अग्रभाग कटा हो, इस प्रकार का कुश ग्रहण करने योग्य नहीं होता है।

संयम, साधना और तप के लिए आज का दिन श्रेष्ठ
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कुशाग्रहणी अमावस्या के दिन तीर्थ, स्नान, जप, तप और व्रत के पुण्य से ऋण और पापों से छुटकारा मिलता है. इसलिए यह संयम, साधना और तप के लिए श्रेष्ठ दिन माना जाता है. पुराणों में अमावस्या को कुछ विशेष व्रतों के विधान है। भगवान विष्णु की आराधना की जाती है यह व्रत एक वर्ष तक किया जाता है. जिससे तन, मन और धन के कष्टों से मुक्ति मिलती है।

कुशाग्रहणी अमावस्या का विधि-विधान
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कुशोत्पाटिनी अमावस्या के दिन साल भर के धार्मिक कृत्यों के लिये कुश एकत्र लेते हैं. प्रत्येक धार्मिक कार्यो के लिए कुशा का इस्तेमाल किया जाता है. शास्त्रों में भी दस तरह की कुशा का वर्णन प्राप्त होता है. जिस कुशा का मूल सुतीक्ष्ण हो, इसमें सात पत्ती हो, कोई भाग कटा न हो, पूर्ण हरा हो, तो वह कुशा देवताओं तथा पितृ दोनों कृत्यों के लिए उचित मानी जाती है. कुशा तोड़ते समय'हूं फट मंत्र का उच्चारण करना चाहिए।
अघोर चतुर्दशी के दिन तर्पण कार्य भी किए जाते हैं मान्यता है कि इस दिन शिव के गणों भूत-प्रेत आदि सभी को स्वतंत्रता प्राप्त होती है. सोलन, सिरमौर और शिमला जिलों के ग्रामीण क्षेत्रों में परिजनों को बुरी आत्माओं के प्रभाव से बचाने के लिए लोग घरों के दरवाजे व खिड़कियों पर कांटेदार झाडिय़ों को लगाते हैं यह परंपरा सदियों से चली आ रही है। कुश अमावस्या के दिन किसी पात्र में जल भर कर कुशा के पास दक्षिण दिशाकी ओर अपना मुख करके बैठ जाएं तथा अपने सभी पितरों को जल दें, अपने घर परिवार, स्वास्थ आदि की शुभता की प्रार्थना करनी चाहिए।

कुशाग्रहणी अमावस्या का पौराणिक महत्व
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शास्त्रों में में अमावस्या तिथि का स्वामी पितृदेव को माना जाता है. इसलिए इस दिन पितरों की तृप्ति के लिए तर्पण, दान-पुण्य का महत्व है। शास्त्रोक्त विधि के अनुसार आश्विन कृष्ण पक्ष में चलने वाला पन्द्रह दिनों के पितृ पक्ष का शुभारम्भ भादों मास की अमावस्या से ही हो जाती है।

Astro PALMIST priti chaubey Praygraj
ज्योतिषी और हस्तरेखाविद
मो. 8707683089
नोट- अगर आप अपना भविष्य जानना चाहते हैं तो ऊपर दिए गए मोबाइल नंबर पर कॉल करके या व्हाट्स एप पर मैसेज भेजकर पहले शर्तें जान लेवें, इसी के बाद अपनी बर्थ डिटेल और हैंडप्रिंट्स भेजें।

14/08/2022

लोगों के दृष्टिकोण को लेकर*
*ज्यादा मत सोचिए,*
*क्योंकि सबसे ज्यादा वो लोग ही*
*हमारा मूल्यांकन करते हैं,*
*जिनका खुद कोई मूल्य नही होता..!*

07/03/2022

#सभी_सनातनधर्मावलम्बी ध्यान दें -

#शाकाहार_और_मांसाहार. :

#दोनों_के_भ्रम_से_बचें ।

#यज्ञशिष्टाहार_का_प्रसार_करें -----------

सनातन धर्म में नास्तिकता को प्रश्रय नहीं मिलना चाहिये । मांसाहार और शाकाहार का भेद पशुओं को लेकर होता है, मानवों में यह भेद पाश्चात्य विचारधारा की लीला है । भारतीय सनातन संस्कृति दार्शनिक , वैज्ञानिक एवं व्यावहारिक धरातल पर पूर्णतः सत्य है , इसीलिये स्वेदज , अण्डज और जरायुज की ही भांति उद्भिज (धरती से उगने वाले ) को भी प्राणी ही समझती है ।

उद्भिज्जाः स्थावराः सर्वे बीजकाण्डप्ररोहिणः ।
ओषध्यः फलपाकान्ता बहुपुष्पफलोपगाः ।।
(श्रीमनुस्मृतिः १।४६)

अर्थात् बीज और शाखा से उत्पन्न होने वाले (सर्वे स्थावराः) सब स्थावर (एक स्थान पर टिके रहने वाले) जीव वृक्ष आदि (उद्भिज्जाः) ‘उद्भिज’ – भूमि को फाड़कर उगने वाले कहलाते हैं । इनमें (फल – पाकान्ता) फल आने पर पककर सूख जाने वाले और (बहुपुष्पफलोपगाः) जिन पर बहुत फूल – फल लगते हैं , वे ‘ओषधि’ कहलाते हैं ।

मा हिंस्यात् सर्वभूतानि - ये वैदिक सिद्धान्त है , इस स्थिति में अचेतन , अर्धचेतन , पूर्णचेतन सभी प्रकार के स्थावर जङ्गम प्राणी अवध्य हैं । तत्र प्राणवियोगप्रयोजनव्यापारो हिंसा - प्राण का शरीर से वियोग आपके द्वारा यदि हुआ तो हिंसा हुई । प्राण का सम्बन्ध शरीर के सभी अंगों से रहता है, ऐसी स्थिति में एक अंग का भी भंग हिंसा की ही कोटि में आता है, क्योंकि उस अंग से आपने अंगी के प्राण का वियोग किया है , अतः केवल पत्ते तोड़कर खाने की बात करने वाले वाले तथाकथित शाकाहारी भी सावधान हो जायें !

यही कारण है कि मानव को अभ्युदय एवं निःश्रेयस् की प्राप्ति कराने की भावना से ही जगत् का परिपालन करने वाले जगत्कारण जगदीश्वर भगवान् नारायण ने , यज्ञवेत्ता पुरुष मेरे ही यज्ञात्मक स्वरूप के बल से पापनिवृत्त हो सकता है - इस सत्य को ध्यान में रखकर , भोजन को लेकर अशिष्टाहार और यज्ञशिष्टाहार - ये दो प्रकार का भेद स्वयं उपदेश किया है , यही वैदिकी विचारधारा है । श्री मनुमहाराज के सर्वधर्ममय वाक्य धर्म अधर्म के बोध में सर्वोच्च स्मृतिप्रमाण हैं ।

यह लोक में प्रत्यक्ष देखने में आता है कि जैविक जगत् में मनुष्य सर्वाहारी प्राणी है तथा यह भी प्रत्यक्ष ही देखा जाता है कि शाकाहारी और मांसाहारी - लोक में दोनों ही प्राणियों की पृथकता गोचर रहती है । यह भी प्रत्यक्ष देखने में आता है कि मनुष्य बुद्धिपूर्वक धर्माधर्म विचार करने की क्षमता रखने वाला प्राणी है , ऐसी स्थिति में मनुष्य के आहार पर शास्त्रीय हस्तक्षेप स्वतः सिद्ध हो जाता है ।

शास्त्र में जहॉ-जहॉ भी मांस का खण्डन है , वह अशिष्टाहार को लेकर है , तथा जहॉ जहॉ भी मांस का मण्डन है,वह यज्ञशिष्टाहार को लेकर है । महाभारतादि में जहॉ यज्ञविधि की ही आलोचना है , वहॉ वेद के विध्यंश की आलोचना में तात्पर्य न होकर सार्वभौममहाव्रताख्य अहिंसा धर्म में प्रेरणा मात्र प्रयोजन है , अन्यथा तो वेद का ही खण्डन करने से स्वयं महाभारत ही वेदबाह्यस्मृति के रूप में अप्रमाण कोटि में चला जायेगा ।

बुद्धिशील होने के उपरान्त भी बहिर्मुखी इन्द्रियों वाला होने के कारण मानव में पञ्चनखेतर प्राणियों में भी रागतः प्रवृत्ति की निवृत्ति की भावना को लेकर , अप्रवृत्तांश में प्रवृत्त कराने हेतु परिसंख्यामुख से शास्त्र भक्ष्य मांस का मण्डन करते हैं किन्तु सर्वत्र परिसंख्याविधि ही है , ऐसा कहना हास्यास्पद है ।

वेदादि शास्त्रों का अनुशीलन करने पर अपूर्वविधि के भी पर्याप्त दर्शन यथास्थान होते हैं ।

यज्ञशिष्टान्न अमृत है -------

श्री आद्य शङ्कराचार्य कहते हैं कि यथोक्तान् यज्ञान् कृत्वा तच्छिष्टेन कालेन यथाविधिचोदितम् अन्नम् अमृताख्यं भुञ्जते इति यज्ञशिष्टामृतभुजः ।

अर्थात् यज्ञों का सम्पादन करके यज्ञों के शेष का नाम यज्ञशिष्ट है, वही अमृत है , उसको जो भोगते हैं, वे यज्ञशिष्ट अमृतभोजी हैं।

यह यज्ञशिष्टाख्य अमृत यदि मुमुक्षु द्वारा पाया जाये तो कालातिक्रम की अपेक्षा से अर्थात् मरने के बाद कितने ही कालतक ब्रह्मलोक में रहकर फिर प्रलय के समय ब्रह्म को प्राप्त करा देने की सामर्थ्य रखता है और यदि तदन्य सकामभाव से ही भी पाया जाये तो भी तदनुरूप अभ्युदय अथवा उत्तम लोक की प्राप्ति कराता ही है ।

अतः सभी सनातन हिन्दू धर्मावलम्बियों का यह पुनीत कर्त्तव्य है कि स्वयं को और समाज को नास्तिकता की गर्त में धकेलने से बचें , एवं सद्विवेक को धारण करते हुए निर्भीकतापूर्वक धर्म का प्रचार प्रसार करें ।

।। जय श्री राम ।।
#श्री_आद्य_शंकराचार्य_संदेश

*प्रकृति के तीन कड़वे नियम, जो सत्य है !!!**1. प्रकृति का पहला नियम :* यदि खेत में बीज न डालें जाएं, तो कुदरत  उसे *घास-फ...
07/09/2021

*प्रकृति के तीन कड़वे नियम, जो सत्य है !!!*

*1. प्रकृति का पहला नियम :* यदि खेत में बीज न डालें जाएं, तो कुदरत उसे *घास-फूस* से भर देती है !! ठीक उसी तरह से दिमाग में अगर *सकारात्मक* विचार न भरे जाएँ, तो *नकारात्मक* विचार अपनी जगह बना ही लेते हैं !!

*2. प्रकृति का दूसरा नियम :* जिसके पास जो होता है, *वह वही बांटता है !!*• सुखी *सुख* बांटता है !!• दुःखी *दुःख* बांटता है !!• ज्ञानी *ज्ञान* बांटता है !!• भ्रमित *भ्रम* बांटता है !!• भयभीत *भय* बांटता हैं !!

*3. प्रकृति का तीसरा नियम :* आपको जीवन में जो भी मिले, उसे *पचाना* सीखो क्योंकि -• *भोजन* न पचने पर, रोग बढ़ते हैं• *पैसा* न पचने पर, दिखावा बढ़ता है• *बात* न पचने पर, चुगली बढ़ती है• *प्रशंसा* न पचने पर, अंहकार बढ़ता है • *निंदा* न पचने पर, दुश्मनी बढ़ती है• *राज़* न पचने पर, खतरा बढ़ता है• *दुःख* न पचने पर, निराशा बढ़ती है• *सुख* न पचने पर, पाप बढ़ता हैं। *यही जीवन के सत्य हैं*

27/06/2021

*अखण्ड सनातन समिति🚩🇮🇳*
*क्रमांक=०७*

*𝕚𝕚🚩ॐ 🚩𝕚𝕚*

*स्विट्जरलैंड स्थित विश्व की सबसे बड़ी भौतिकी विज्ञान प्रयोगशाला (CERN) के बाहर यह नटराज प्रतिमा क्‍यों लगी है ??*

सनातन धर्म के सबसे शक्‍तिशाली देवता हैं भगवान शिव। शिव की अभिव्‍यक्‍ति ‘नटराज’ के रूप में भी हुई है। नटराज जिसे ‘प्राण शक्‍ति’ का प्रतीक भी माना जाता है।इन्‍हीं नटराज की विशाल प्रतिमा को स्‍विट्जरलैंड के जेनेवा स्‍थित दुनिया के सबसे बड़े भौतिकी प्रयोगशाला CERN के बाहर लगाया गया है।

European Organization For Nuclear Research (CERN) वही प्रयोगशाला है, जहां कुछ साल पहले ‘गॉड पार्टिकल’ जिसे हिग्‍स~बोसोन का नाम दिया गया है, का अनुसंधान हुआ।यहां अनुसंधान हुए हिग्‍स~बोसोन को ‘ब्रह्मकण’ के नाम से भी जाना जाता है।

CERN के बाहर स्‍थापित नटराज प्रतिमा के ठीक बगल में लगी पट्टिका पर महान भौतिक वैज्ञानिक फ्रित्‍जोफ कैपरा ने उद्धरण के साथ यहां लिखा है....,

”हजारों वर्ष पूर्व भारतीय कलाकारों ने तांबे की श्रृंखला से भगवान शिव के नृत्‍य में लीन स्‍वरूप को बनाया। आज हमारे समय में तमाम भौतिक वैज्ञानिक फिर से उन्‍नत तकनीकों को इस्‍तेमाल करते हुए ‘कॉस्‍मिक डांस’ का प्रारूप तैयार कर रहे हैं।

वर्तमान में वैज्ञानिकों की ‘कॉस्‍मिक डांस’ की थ्‍योरी, दरअसल प्राचीन मिथकों, धर्म, कला और भौतिकी की बुनियाद पर ही खड़ी है आनंद तांडव करते शिव प्रतीक हैं सभी व्‍यक्‍त~अव्‍यक्‍त के आधार का।

आधुनिक भौतिक विज्ञान हमें बताता है कि निर्माण और प्रलय की प्रक्रिया सिर्फ ब्रह्मांड में जीवन के आरंभ और अंत से ही नहीं जुड़ी हुई है, बल्‍कि ये पूरी सृष्‍टि के कण~कण से जुड़ी हुई है।”

कैपरा लिखते हैं, ”Quantum field theory के अनुसार ‘ Dance of creation & destruction’ ही सभी तत्‍वों के होने का आधार है।

आधुनिक भौतिकशास्‍त्र हमें बताता है कि हर उप~परमाणविक कण ना केवल एक ‘ऊर्जा~नृत्य’ करता है, बल्‍कि यह खुद भी एक ‘ऊर्जा~नृत्य’ ही है। सृजन और विनाश की एक सतत प्रक्रिया।”

वैज्ञानिक फ्रित्‍जोफ कैपरा लिखते हैं...., ”खुद हम भौतिकी के वैज्ञानिकों के लिए शिव का ‘आनंद~तांडव’, उप~परमाणविक कणों का ‘ऊर्जा~नृत्‍य’ ही है, जो आधार है हर अस्‍तित्‍व और सभी प्राकृतिक घटनाओं का।”

नटराज प्रतिमा के बारे में पट्टिका पर सर्न के शोधार्थी एडन रैन्डल कोंड लिखते हैं......, ”दिन की रोशनी में जब सर्न हलचलों से भरा होता है, शिव तब भी नृत्‍य मुद्रा में ही होते हैं। जो हमें ये याद दिलाता है कि ब्रह्मांड लगातार गतिमान है, खुद को परिवर्तित कर रहा है और स्‍थिर तो ये कभी नहीं रहा।”

रैन्‍डल कोंड लिखते हैं, ‘शिव, अपनी इस मुद्रा से हमें हर पल याद दिलाते हैं कि हमें अभी भी इस ब्रह्मांड का सबसे बड़ा रहस्‍य नहीं पता है।”

मशहूर भौतिक वैज्ञानिक कार्ल सेगन के अनुसार, ”सनातन धर्म विश्‍व के उन महान धर्मों में से एक है जिसके अनुसार इस ब्रह्माण्‍ड की उत्‍तपत्‍ति और विध्‍वंस की प्रक्रिया निरंतर जारी है।यह धर्म अकेला ऐसा धर्म है जो हमें यह बताता है कि हमारे दिन और रात की तरह ही स्‍वयं ब्रह्मा के भी दिन और रात होते हैं।

हमारे 24 घंटे के दिन और रात की जगह ब्रह्मा के दिन और रात की अवधि तकरीबन 8.64 बिलियन वर्ष की होती है। सनातन धर्म एक अनवरत प्रक्रिया की बात करता है।”

जून-2014 में जब शिव की नटराज प्रतिमा यहां लगाई गई तो वैज्ञानिकों को आलोचनाओं का सामना भी करना पड़ा।

शिव के नृत्‍य स्‍वरूप को लेकर रूढ़िवादी ईसाई तबतक आपत्‍तियां उठाते रहे, जबतक वैज्ञानिकों ने हिग्‍स~बोसोन पार्टिकल की खोज नहीं कर ली। इसके बाद वैज्ञानिकों ने आलोचकों को स्‍पष्‍ट किया कि आखिर क्‍यों सृष्‍टि के ‘संहारक’ की प्रतिमा यहां लगाई गई है।

अमूमन हम भारतीय भी नटराज की प्रतिमा के रहस्‍य नहीं जानते हैं। दरअसल, नटराज प्रतीक है शिव के तांडव स्‍वरूप का। हम में से ज्‍यादातर लोग तांडव नृत्‍य को शिव के उग्र रूप से जोड़कर देखते हैं, जबकि ऐसा नहीं है।

शिव तांडव के भी दो प्रकार हैं। पहला है ‘तांडव’, शिव का ये रूप ‘रुद्र’ कहलाता है। जबकि दूसरा है ‘आनंद-तांडव’, शिव का ये रूप ‘नटराज’ कहलाता है। रुद्र रूप में शिव समूचे ब्रह्माण्‍ड के संहारक बन जाते हैं वहीं सर्न के बाहर लगी नटराज प्रतिमा ‘सृष्‍टि निर्माण’ का प्रतीक है।

*आनंद तांडव के भी पांच रूप हैं:-*

1. सृष्‍टि : निर्माण, रचना creation, evolution
2. स्‍थिति : संरक्षण, समर्थन preservation, support
3. संहार : विनाश Destruction
4. तिरोभाव : मोह-माया Illusion
5. अनुग्रह : मुक्‍ति release, grace

नटराज, दो शब्‍दों ‘नट’ यानी कला और राज से मिलकर बना है। इस स्‍वरूप में शिव कलाओं के आधार हैं।

नटराज शिव की प्रसिद्ध प्राचीन मूर्ति की चार भुजाएं हैं। उनके चारो ओर अग्‍नि का घेरा है। अपने एक पांव से शिव ने एक बौने को दबा रखा है। दूसरा पांव नृत्‍य मुद्रा में ऊपर की ओर उठा हुआ है। शिव अपने दाहिने हाथ में डमरू पकड़े हुए हैं। डमरू की ध्‍वनि यहां सृजन का प्रतीक है। ऊपर की ओर उठे उनके दूसरे हाथ में अग्‍नि है। यहां अग्‍नि विनाश का प्रतीक है। इसका अर्थ यह है कि शिव ही एक हाथ से सृजन और दूसरे से विनाश करते हैं।

शिव का तीसरा दाहिना हाथ अभय मुद्रा में उठा हुआ है। उनका चौथा बांया हाथ उनके उठे हुए पांव की ओर इशारा करता है, इसका अर्थ यह भी है कि शिव के चरणों में ही मोक्ष है। शिव के पैरे के नीचे दबा बौना दानव अज्ञान का प्रतीक है, जो कि शिव द्वारा नष्‍ट किया जाता है। चारो ओर उठ रही लपटें इस ब्रह्माण्‍ड का प्रतीक है। शिव की संपूर्ण आकृति ओंकार स्‍वरूप दिखाई पड़ती है। विद्वानों के अनुसार यह इस बात की ओर इशारा करती है कि ‘ॐ’ दरअसल शिव में ही निहित है।

सनातन धर्म की जय हो...अधर्म का नाश हो,
प्राणियों में सद्भावना हो...विश्व का कल्याण हो 🙏

𝕚𝕚 🚩शिवाय नम:🚩𝕚𝕚
🕉🐚⚔🚩🌞🇮🇳⚔🌷🙏🏻

25/05/2021

विश्व का सबसे बड़ा और वैज्ञानिक समय गणना तन्त्र।

■ काष्ठा = सैकन्ड का 34000 वाँ भाग
■ 1 त्रुटि = सैकन्ड का 300 वाँ भाग
■ 2 त्रुटि = 1 लव ,
■ 1 लव = 1 क्षण
■ 30 क्षण = 1 विपल ,
■ 60 विपल = 1 पल
■ 60 पल = 1 घड़ी (24 मिनट ) ,
■ 2.5 घड़ी = 1 होरा (घन्टा )
■ 24 होरा = 1 दिवस (दिन या वार) ,
■ 7 दिवस = 1 सप्ताह
■ 4 सप्ताह = 1 माह ,
■ 2 माह = 1 ऋतू
■ 6 ऋतू = 1 वर्ष ,
■ 100 वर्ष = 1 शताब्दी
■ 10 शताब्दी = 1 सहस्राब्दी ,
■ 432 सहस्राब्दी = 1 युग
■ 2 युग = 1 द्वापर युग ,
■ 3 युग = 1 त्रैता युग ,
■ 4 युग = सतयुग
■ सतयुग + त्रेतायुग + द्वापरयुग + कलियुग = 1 महायुग
■ 72 महायुग = मनवन्तर ,
■ 1000 महायुग = 1 कल्प
■ 1 नित्य प्रलय = 1 महायुग (धरती पर जीवन अन्त और फिर आरम्भ )
■ 1 नैमितिका प्रलय = 1 कल्प ।(देवों का अन्त और जन्म )
■ महालय = 730 कल्प ।(ब्राह्मा का अन्त और जन्म )

सम्पूर्ण विश्व का सबसे बड़ा और वैज्ञानिक समय गणना तन्त्र यही है। जो हमारे देश भारत में बना। ये हमारा भारत जिस पर हमको गर्व है l
दो लिंग : नर और नारी ।
दो पक्ष : शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष।
दो पूजा : वैदिकी और तांत्रिकी (पुराणोक्त)।
दो अयन : उत्तरायन और दक्षिणायन।

तीन देव : ब्रह्मा, विष्णु, शंकर।
तीन देवियाँ : महा सरस्वती, महा लक्ष्मी, महा गौरी।
तीन लोक : पृथ्वी, आकाश, पाताल।
तीन गुण : सत्वगुण, रजोगुण, तमोगुण।
तीन स्थिति : ठोस, द्रव, वायु।
तीन स्तर : प्रारंभ, मध्य, अंत।
तीन पड़ाव : बचपन, जवानी, बुढ़ापा।
तीन रचनाएँ : देव, दानव, मानव।
तीन अवस्था : जागृत, मृत, बेहोशी।
तीन काल : भूत, भविष्य, वर्तमान।
तीन नाड़ी : इडा, पिंगला, सुषुम्ना।
तीन संध्या : प्रात:, मध्याह्न, सायं।
तीन शक्ति : इच्छाशक्ति, ज्ञानशक्ति, क्रियाशक्ति।

चार धाम : बद्रीनाथ, जगन्नाथ पुरी, रामेश्वरम्, द्वारका।
चार मुनि : सनत, सनातन, सनंद, सनत कुमार।
चार वर्ण : ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र।
चार निति : साम, दाम, दंड, भेद।
चार वेद : सामवेद, ॠग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद।
चार स्त्री : माता, पत्नी, बहन, पुत्री।
चार युग : सतयुग, त्रेतायुग, द्वापर युग, कलयुग।
चार समय : सुबह, शाम, दिन, रात।
चार अप्सरा : उर्वशी, रंभा, मेनका, तिलोत्तमा।
चार गुरु : माता, पिता, शिक्षक, आध्यात्मिक गुरु।
चार प्राणी : जलचर, थलचर, नभचर, उभयचर।
चार जीव : अण्डज, पिंडज, स्वेदज, उद्भिज।
चार वाणी : ओम्कार्, अकार्, उकार, मकार्।
चार आश्रम : ब्रह्मचर्य, ग्राहस्थ, वानप्रस्थ, सन्यास।
चार भोज्य : खाद्य, पेय, लेह्य, चोष्य।
चार पुरुषार्थ : धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष।
चार वाद्य : तत्, सुषिर, अवनद्व, घन।

पाँच तत्व : पृथ्वी, आकाश, अग्नि, जल, वायु।
पाँच देवता : गणेश, दुर्गा, विष्णु, शंकर, सुर्य।
पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ : आँख, नाक, कान, जीभ, त्वचा।
पाँच कर्म : रस, रुप, गंध, स्पर्श, ध्वनि।
पाँच उंगलियां : अँगूठा, तर्जनी, मध्यमा, अनामिका, कनिष्ठा।
पाँच पूजा उपचार : गंध, पुष्प, धुप, दीप, नैवेद्य।
पाँच अमृत : दूध, दही, घी, शहद, शक्कर।
पाँच प्रेत : भूत, पिशाच, वैताल, कुष्मांड, ब्रह्मराक्षस।
पाँच स्वाद : मीठा, चर्खा, खट्टा, खारा, कड़वा।
पाँच वायु : प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान।
पाँच इन्द्रियाँ : आँख, नाक, कान, जीभ, त्वचा, मन।
पाँच वटवृक्ष : सिद्धवट (उज्जैन), अक्षयवट (Prayagraj), बोधिवट (बोधगया), वंशीवट (वृंदावन), साक्षीवट (गया)।
पाँच पत्ते : आम, पीपल, बरगद, गुलर, अशोक।
पाँच कन्या : अहिल्या, तारा, मंदोदरी, कुंती, द्रौपदी।

छ: ॠतु : शीत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, बसंत, शिशिर।
छ: ज्ञान के अंग : शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष।
छ: कर्म : देवपूजा, गुरु उपासना, स्वाध्याय, संयम, तप, दान।
छ: दोष : काम, क्रोध, मद (घमंड), लोभ (लालच), मोह, आलस्य।

सात छंद : गायत्री, उष्णिक, अनुष्टुप, वृहती, पंक्ति, त्रिष्टुप, जगती।
सात स्वर : सा, रे, ग, म, प, ध, नि।
सात सुर : षडज्, ॠषभ्, गांधार, मध्यम, पंचम, धैवत, निषाद।
सात चक्र : सहस्त्रार, आज्ञा, विशुद्ध, अनाहत, मणिपुर, स्वाधिष्ठान, मुलाधार।
सात वार : रवि, सोम, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि।
सात मिट्टी : गौशाला, घुड़साल, हाथीसाल, राजद्वार, बाम्बी की मिट्टी, नदी संगम, तालाब।
सात महाद्वीप : जम्बुद्वीप (एशिया), प्लक्षद्वीप, शाल्मलीद्वीप, कुशद्वीप, क्रौंचद्वीप, शाकद्वीप, पुष्करद्वीप।
सात ॠषि : वशिष्ठ, विश्वामित्र, कण्व, भारद्वाज, अत्रि, वामदेव, शौनक।
सात ॠषि : वशिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र, भारद्वाज।
सात धातु (शारीरिक) : रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, वीर्य।
सात रंग : बैंगनी, जामुनी, नीला, हरा, पीला, नारंगी, लाल।
सात पाताल : अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल, पाताल।
सात पुरी : मथुरा, हरिद्वार, काशी, अयोध्या, उज्जैन, द्वारका, काञ्ची।
सात धान्य : उड़द, गेहूँ, चना, चांवल, जौ, मूँग, बाजरा।

आठ मातृका : ब्राह्मी, वैष्णवी, माहेश्वरी, कौमारी, ऐन्द्री, वाराही, नारसिंही, चामुंडा।
आठ लक्ष्मी : आदिलक्ष्मी, धनलक्ष्मी, धान्यलक्ष्मी, गजलक्ष्मी, संतानलक्ष्मी, वीरलक्ष्मी, विजयलक्ष्मी, विद्यालक्ष्मी।
आठ वसु : अप (अह:/अयज), ध्रुव, सोम, धर, अनिल, अनल, प्रत्युष, प्रभास।
आठ सिद्धि : अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व।
आठ धातु : सोना, चांदी, ताम्बा, सीसा जस्ता, टिन, लोहा, पारा।

नवदुर्गा : शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघंटा, कुष्मांडा, स्कन्दमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्री।
नवग्रह : सुर्य, चन्द्रमा, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु, केतु।
नवरत्न : हीरा, पन्ना, मोती, माणिक, मूंगा, पुखराज, नीलम, गोमेद, लहसुनिया।
नवनिधि : पद्मनिधि, महापद्मनिधि, नीलनिधि, मुकुंदनिधि, नंदनिधि, मकरनिधि, कच्छपनिधि, शंखनिधि, खर्व/मिश्र निधि।

दस महाविद्या : काली, तारा, षोडशी, भुवनेश्वरी, भैरवी, छिन्नमस्तिका, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी, कमला।
दस दिशाएँ : पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, आग्नेय, नैॠत्य, वायव्य, ईशान, ऊपर, नीचे।
दस दिक्पाल : इन्द्र, अग्नि, यमराज, नैॠिति, वरुण, वायुदेव, कुबेर, ईशान, ब्रह्मा, अनंत।
दस अवतार (विष्णुजी) : मत्स्य, कच्छप, वाराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध, कल्कि।
दस सति : सावित्री, अनुसुइया, मंदोदरी, तुलसी, द्रौपदी, गांधारी, सीता, दमयन्ती, सुलक्षणा, अरुंधती।

*उक्त जानकारी शास्त्रोक्त 📚 आधार पर... हैं ।*
*यह आपको पसंद आया हो तो अपने बन्धुओं को भी शेयर जरूर कर अनुग्रहित अवश्य करें यह संस्कार का कुछ हिस्सा हैं 🌷*
⛈️⛈️ *इन्द्र* ⛈️⛈️

22/01/2021

14 प्रकार की तुल्य मृत्यु

राम और रावण का युद्ध चल रहा था । तब अंगद रावण को बोला, तू तो मरा हुआ है । तुझे मारने से क्या फायदा ?

रावण बोला– मैं जीवित हूँ, मरा हुआ कैसे ?

अंगद बोले सिर्फ साँस लेने वालों को जीवित नहीं कहते - साँस तो लुहार का भाता भी लेता है ।
तब अंगद ने 14 प्रकार की मृत्यु बतलाई l

अंगद द्वारा रावण को बतलाई गई, ये बातें आज के दौर में भी लागू होती हैं ।

यदि किसी व्यक्ति में इन 14 दुर्गुणों में से एक दुर्गुण भी आ जाता है तो वह मृतक समान हो जाता है ।

विचार करें कहीं यह दुर्गुण हमारे पास तो नहीं हैं....कि हमें मृतक समान माना जाय ।

1.कामवश- जो व्यक्ति अत्यंत भोगी हो, कामवासना में लिप्त रहता हो, जो संसार के भोगों में उलझा हुआ हो, वह मृत समान है । जिसके मन की इच्छाएं कभी खत्म नहीं होती और जो प्राणी सिर्फ अपनी इच्छाओं के अधीन होकर ही जीता है, वह मृत समान है । वह अध्यात्म का सेवन नही करता है । सदैव वासना में लीन रहता है ।

2.वाम मार्गी- जो व्यक्ति पूरी दुनिया से उल्टा चले । जो संसार की हर बात के पीछे नकारात्मकता खोजता हो । नियमों, परंपराओं और लोक व्यवहार के खिलाफ चलता हो, वह वाम मार्गी कहलाता है । ऐसे काम करने वाले लोग मृत समान माने गए हैं ।

3.कंजूस- अति कंजूस व्यक्ति भी मरा हुआ होता है । जो व्यक्ति धर्म के कार्य करने में, आर्थिक रूप से किसी कल्याण कार्य में हिस्सा लेने में हिचकता हो । दान करने से बचता हो । ऐसा आदमी भी मृत समान ही है ।

4.अति दरिद्र- गरीबी सबसे बड़ा श्राप है । जो व्यक्ति धन, आत्म-विश्वास, सम्मान और साहस से हीन हो, वो भी मृत ही है । अत्यन्त दरिद्र भी मरा हुआ है । दरिद्र व्यक्ति को दुत्कारना नहीं चाहिए, क्योंकि वह पहले ही मरा हुआ होता है । गरीब लोगों की मदद करनी चाहिए ।

5.विमूढ़- अत्यन्त मूढ़ यानी मूर्ख व्यक्ति भी मरा हुआ होता है । जिसके पास विवेक, बुद्धि नहीं हो । जो खुद निर्णय ना ले सके यानि हर काम को समझने या निर्णय को लेने में किसी अन्य पर आश्रित हो, ऐसा व्यक्ति भी जीवित होते हुए मृत के समान ही है । मूढ़ अध्यात्म को समझता नहीं है ।

6.अजसि- जिस व्यक्ति को संसार में बदनामी मिली हुई है, वह भी मरा हुआ है । जो घर, परिवार, कुटुंब, समाज, नगर या राष्ट्र, किसी भी ईकाई में सम्मान नहीं पाता है, वह व्यक्ति मृत समान ही होता है ।

7.सदा रोगवश- जो व्यक्ति निरंतर रोगी रहता है, वह भी मरा हुआ है । स्वस्थ शरीर के अभाव में मन विचलित रहता है । नकारात्मकता हावी हो जाती है । व्यक्ति मृत्यु की कामना में लग जाता है । जीवित होते हुए भी रोगी व्यक्ति जीवन के आनंद से वंचित रह जाता है ।

8.अति बूढ़ा- अत्यन्त वृद्ध व्यक्ति भी मृत समान होता है, क्योंकि वह अन्य लोगों पर आश्रित हो जाता है । शरीर और बुद्धि, दोनों असक्षम हो जाते हैं । ऐसे में कई बार स्वयं वह और उसके परिजन ही उसकी मृत्यु की कामना करने लगते हैं, ताकि उसे इन कष्टों से मुक्ति मिल सके ।

9.सतत क्रोधी- 24 घंटे क्रोध में रहने वाला व्यक्ति भी मृत समान ही है । हर छोटी-बड़ी बात पर क्रोध करना, ऐसे लोगों का काम होता है । क्रोध के कारण मन और बुद्धि, दोनों ही उसके नियंत्रण से बाहर होते हैं । जिस व्यक्ति का अपने मन और बुद्धि पर नियंत्रण न हो, वह जीवित होकर भी जीवित नहीं माना जाता है । पूर्व जन्म के संस्कार लेकर यह जीव क्रोधी होता है । क्रोधी अनेक जीवों का घात करता है और नरक गामी होता है ।

10.अघ खानी- जो व्यक्ति पाप कर्मों से अर्जित धन से अपना और परिवार का पालन-पोषण करता है, वह व्यक्ति भी मृत समान ही है । उसके साथ रहने वाले लोग भी उसी के समान हो जाते हैं । हमेशा मेहनत और ईमानदारी से कमाई करके ही धन प्राप्त करना चाहिए । पाप की कमाई पाप में ही जाती है । और पाप की कमाई से नीच गोत्र, निगोद की प्राप्ति होती है ।

11.तनु पोषक- ऐसा व्यक्ति जो पूरी तरह से आत्म संतुष्टि और खुद के स्वार्थों के लिए ही जीता है, संसार के किसी अन्य प्राणी के लिए उसके मन में कोई संवेदना ना हो, तो ऐसा व्यक्ति भी मृतक समान ही है । जो लोग खाने-पीने में, वाहनों में स्थान के लिए, हर बात में सिर्फ यही सोचते हैं कि सारी चीजें पहले हमें ही मिल जाएं, बाकि किसी अन्य को मिले ना मिले, वे मृत समान होते हैं । ऐसे लोग समाज और राष्ट्र के लिए अनुपयोगी होते हैं । शरीर को अपना मानकर उसमें रत रहना मूर्खता है । क्योंकि यह शरीर विनाशी है । नष्ट होने वाला है ।

12.निंदक- अकारण निंदा करने वाला व्यक्ति भी मरा हुआ होता है । जिसे दूसरों में सिर्फ कमियाँ ही नज़र आती हैं । जो व्यक्ति किसी के अच्छे काम की भी आलोचना करने से नहीं चूकता है । ऐसा व्यक्ति जो किसी के पास भी बैठे, तो सिर्फ किसी ना किसी की बुराई ही करे, वह इंसान मृत समान होता है ।
परनिंदा करने से नीच गोत्र का बन्ध होता है ।

13.परमात्म विमुख- जो व्यक्ति परमात्मा का विरोधी है, वह भी मृत समान है । जो व्यक्ति ये सोच लेता है कि कोई परमतत्व है ही नहीं । हम जो करते हैं, वही होता है । संसार हम ही चला रहे हैं । जो परमशक्ति में आस्था नहीं रखता है, ऐसा व्यक्ति भी मृत माना जाता है ।

14. श्रुति , संत विरोधी- जो संत, ग्रंथ, पुराण का विरोधी है, वह भी मृत समान होता है । श्रुत और सन्त ब्रेक का काम करते हैं । अगर गाड़ी में ब्रेक ना हो तो वह कहीं भी गिरकर एक्सीडेंट हो सकता है । वैसे ही समाज को सन्त के जैसे ब्रेक की जरूरत है । नहीं तो समाज में अनाचार फैलेगा ।

लंका काण्ड
कौल कामबस कृपिन विमूढ़ा ।
अतिदरिद्र अजसि अतिबूढ़ा ।।
सदारोगबस संतत क्रोधी।
विष्णु विमूख श्रुति संत विरोधी।।
तनुपोषक निंदक अघखानी।
जिवत सव सम चौदह प्रानी।।

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