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हरी जी क्रेन की तरफ़ से आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ
16/08/2025

हरी जी क्रेन की तरफ़ से आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ

हरी जी क्रेन की तरफ़ से आप सभी को हार्दिक शुभ कामनाये
15/08/2025

हरी जी क्रेन की तरफ़ से आप सभी को हार्दिक शुभ कामनाये

13/08/2025
* बीवी तो और आ जाएगी पर मां दूसरी नहीं आएगी*आज बेटी घर आई हुई थी। घर में अच्छी खासी चहल पहल थी। बाहर पूरा परिवार एक साथ ...
28/03/2024

* बीवी तो और आ जाएगी पर मां दूसरी नहीं आएगी*

आज बेटी घर आई हुई थी। घर में अच्छी खासी चहल पहल थी। बाहर पूरा परिवार एक साथ बैठकर खिल खिला रहा था। हंसी ठहाकों की गूंज अंदर कमरे तक सुनाई दे रही थी। गगन जी का भी मन कर रहा था कि वो भी अपने परिवार के साथ बैठे, बातें करें। पर वो तो अपने बीमार शरीर और उदास मन को लिए अपने कमरे में पलंग पर लेटे हुए थे।
आजकल शरीर साथ नहीं देता, बूढ़ा और बीमार जो हो चुका है। ज्यादा बोल भी नहीं पाते। पर मन बहुत करता है अपने परिवार के साथ बैठने का, उनसे बातें करने का। पर ये तो उन्हीं के कर्म थे कि आज पत्नी उनके साथ ना बैठती थी और ना ही ज्यादा बातें करती थी। हालांकि ये अलग बात है कि खाना, पीना, दवाईयां सब कुछ सही समय पर वो जरूर दे जाती थी।
जिन लोगों के लिए उस पत्नी को उन्होंने इतना जलील किया आज उन लोगों में से कोई भी उनके साथ नहीं थे। थी तो वही, जो जलालत के बावजूद इस घर में रह गई। उनके जैसे शख्स के साथ निभा गई। पर खामोशी का आवरण ओड़े हमेशा चुपचाप सी ही रहती है। जानते थे कि बाहर बच्चे हंस रहे हैं बोल रहे हैं। और वो?
वो उनको हंसते बोलते देखकर सिर्फ मुस्कुराकर चुपचाप उन लोगों को देख रही होगी।
आज भी याद है उन्हें, जब सुमन उनकी पत्नी बनकर इस घर में आई थी। कितनी खुश मिजाज थी वो। हमेशा हंसती खिल खिलाती रहती थी। उसका यही स्वभाव तो पसंद आया था उन्हें जब उन्होंने अपने एक रिश्तेदार की शादी में उसे देखा था। बस एक नजर में ही उनकी बेबाक हंसी उनके दिल को भा गई थी और इसलिए उन्होंने शादी के लिए हां कर दी।
पर ये नहीं पता था कि इसी हंसी के वो दुश्मन हो जाएंगे। अक्सर अम्मा से डांट भी खा लेती। आखिर बहू का इतना हंसना बोलना उन्हें पसंद नहीं था।
और फिर अपनी अम्मा का मन रखने के लिए गगन जी भी सुमन को ही डांट कर चुप कर देते थे। लेकिन सुमन भी क्या करती? अपने स्वाभाविक स्वभाव को तो छोड़ नहीं सकती थी। और उसका स्वभाव तो वैसे ही हंसमुख था तो फिर कुछ देर बाद वापस वैसे ही हो जाती। गगन जी भी मन ही मन मुस्कुरा कर रह जाते। पर अम्मा के सामने खुलकर जाहिर नहीं करते।
लेकिन उस दिन जो कुछ हुआ उसके बाद सुमन का वो स्वाभाविक स्वभाव कहां गायब हो गया। उसकी कसक आज भी गगन जी के मन में थी। जरा सी हिम्मत नहीं कर पाए अपनी अम्मा के सामने ये जानते हुए कि पत्नी सही है। और पत्नी को ही दबा कर रख दिया।
उस दिन छोटी बहन जानकी की सगाई थी। बड़ी बहन आरती भी घर पर आई हुई थी। और कई खास रिश्तेदार घर पर मौजूद थे। सगाई का प्रोग्राम पूरा हो चुका था। सुमन और आरती ने सारा सामान अम्मा के कमरे में रख दिया था। सुमन के मायके वाले अपने घर रवाना हो चुके थे। बाहर सभी खास रिश्तेदार बैठे बातें कर रहे थे। गगन भी उन्हीं लोगों के साथ था। इधर सुमन रसोई में काम कर ही रही थी कि बाहर से अम्मा जी के जोर जोर से चिल्लाने की आवाज आई,
" हे भगवान! मैं तो लुट गई। बर्बाद हो गई। कौन बैरी दुश्मन पीछे पड़ा है"
अचानक अम्मा की आवाज सुनकर सब लोग अंदर की तरफ भागे। अम्मा अपने कमरे में थे। गगन ने आकर अम्मा से पूछा,
" क्या हुआ अम्मा? इस तरह रो क्यों रही हो? क्या हो गया?"
पर अम्मा तो जोर-जोर से छाती पीट पीट कर दहाड़े मार के रो रही थी। चुप होने का नाम ही नहीं ले रही थी।
"अरे बताओ तो सही हुआ क्या है? रोना बंद करोगी तो हमें पता चलेगा ना "
पीछे से मामा जी ने भी कहा।
मामा जी की बात सुनकर अम्मा रोते हुए बोली,
" अरे जानकी के ससुराल से आए हुए गहने कहां है? मिल नहीं रहे। जरूर चोरी हो गए होंगे। हे भगवान! मैं इसके ससुराल वालों को क्या जवाब दूंगी। मैं तो बर्बाद हो गई"
अम्मा रोती रोती बोली।
अम्मा के बोलते ही अजीब सी खामोशी घर में छा गई।
" अरे ध्यान से देख। इन्हीं सामान में कहीं रखा होगा "
मामा जी दोबारा बोले।
" भैया पूरा सामान ऊपर नीचे करके देख चुकी हूं। पर गहने नहीं है। जरूर चोरी हुए होंगे "
"अरे शुभ शुभ बोल। एक बार हमें देखने दे"
अम्मा को परे हटाकर मामा जी खुद सामान चेक करने लगे, लेकिन उसमें गहने नहीं थे। फिर कुछ सोच कर मामा जी बोले ,
" अरे गहने कोई इन सामानों के साथ यहां रखेगा क्या? अलमारी में रख दिए होंगे तुमने। देख जरा"
" अरे मैंने सामान कहां रखा? सामान तो आरती और सुमन रख रही थी "
" हां तो आरती और सुमन से पूछ ले। जरूर उन्होंने अलमारी में रख दिए होंगे"
मामा जी के समझाने पर अम्मा ने आशा भरी नजरों से आरती की तरफ देखा तो आरती ने कहा,
" अम्मा मुझे क्या देख रही हो। कोई मैंने थोड़ी ना गहने लिए है। अपनी बहू से पूछो। उसी ने कहीं रख दिए होंगे"
आरती के जवाब को सुनकर सुमन दंग रह गई क्योंकि गहने की थाली तो आरती ही उठा कर लाई थी। और गहने रखे भी उसी ने ही थे।
"जीजी ऐसा क्यों बोल रही हो। गहने तो आप ही लेकर आई थी ना"
सुमन का ऐसा कहना हुआ और आरती ने रोना-धोना मचा दिया।
"अब मेरे मायके में ही मुझ पर चोरी का इल्जाम लगेगा। यही दिन देखना बाकी रह गया था। आज मेरे बापू जिंदा होते तो मजाल थी कोई मुझे इतना कह कर दिखा देता"
उसे रोता देखकर अम्मा सुमन पर दहाड़ पड़ी,
" खबरदार जो मेरी बच्ची पर चोरी का इल्जाम लगाया तो। तू ने ही गहने लिए होंगे। ये मेरी बेटी है। इसको मैं बचपन से जानती हूं। अरे जन्म दिया है मैंने इसे। इसमें मेरे संस्कार कूट-कूट के भरे हैं। तू बाहर से आई है। जरूर तूने ही गहने लिए होंगे और तेरे मायके वालों को दे दिए होंगे। तभी तेरे मायके वाले इतनी जल्दी चले गए"
"बस अम्मा जी। आप मेरे माता-पिता पर चोरी का इल्जाम कैसे लगा सकती हो। मैंने तो गहनों की शक्ल तक नहीं देखी, चुराना तो दूर की बात है"
सुमन ने पलट कर जवाब दे दिया। बस फिर क्या था? आरती और अम्मा दोनों ही सुमन पर चढ़ पड़ी। लेकिन इस बार सुमन भी बराबर जवाब दे रही थी। आखिर उस पर चोरी का इल्जाम लगा था। कोई छोटी-मोटी बात थोड़ी ना थी। घर में इतना हंगामा होते देखकर मामा जी ने बीच बचाव किया। लेकिन आरती और अम्मा तो चुप होने का नाम ही नहीं ले रही थी।
" सच-सच बता, गहने कहाँ पर है? अगर तू नहीं बोलेगी तो तेरे मां-बाप से जाकर गहने लेंगे हम लोग। और वही सबके सामने उनकी इज्जत की मटिया मेल करेंगे"
" अम्मा जी मेरे मां-बाप इज्जतदार लोग है। कोई चोर उचक्के नहीं जो आपके घर पर बुलावे पर आएंगे और सामान चोरी करके ले जाएंगे"
सुमन ने थोड़ी तेज आवाज में कहा।
" बस सुमन। तुम मेरी अम्मा से किस तरह से बात कर रही हो। याद रखो तुम इस घर की बहू हो। अपनी आवाज को नीचे रख कर बोलो। और अगर गहने लिए भी है तो दे दो। कोई तुमसे कुछ नहीं कहेगा"
अचानक गगन सुमन पर बिगड़ गया।
गगन के इस जवाब से सुमन हक्की-बक्की रह गई। मतलब गगन भी उस पर ही इल्जाम लगा रहा था। एक लड़की जो ससुराल को अपना घर मान लेती है, आज वहां सुमन बिल्कुल अकेली खड़ी थी। पति तक साथ नहीं था। गगन के जवाब के बाद सुमन की नजर आरती से टकराई तो वो मंद मन मुस्कुरा रही थी। इससे बड़ी जीत और क्या हो सकती थी।
लेकिन तब तक आरती का नौ साल का बेटा अपने हाथ में एक कपड़े की छोटी सी पोटली लेकर आया और सबके सामने ही बोला,
" मां ये अपना सामान नहीं है। किसी ने गलती से अपने सामान में रख दिया"
उसे देखते ही आरती के चेहरे पर पसीने की बूंदे चमकने लगी। उसके चेहरे पर डर देखकर मामा जी ने वो पोटली उस बच्चे के हाथों से अपने हाथों में ले ली। और उस पोटली को खोल कर देखा तो सब भौंचक्के रह गए। उसमें जानकी के ससुराल से आए हुए गहने थे।
सबने हैरानी से आरती की तरफ देखा। पर वो तो बेशर्मों की तरह अपने बेटे का हाथ पकड़ कर दूसरे कमरे में चली गई, जैसे कुछ हुआ ही ना हो। रिश्तेदार मुंह पर हाथ रखकर दबी जबान से बातें करने लगे। तभी अम्मा बोली,
" अरे वो भूल गई होगी रखकर। इसमें यूं जबान दबाकर बात करने की क्या जरूरत है"
और फिर सुमन से बोली,
" बेटी है वो मेरी। उसने गहने चुराए नहीं थे बल्कि संभाल कर रखे थे अपने पास। उसकी बराबरी की तो सोचना भी मत। पर तूने यहां जो इस तरह से सबके सामने चिल्ला चिल्ला कर मुझसे बात की है ना। उसकी माफी मांग मुझसे "
अम्मा की बात सुनकर सुमन की आंखों में आंसू आ गए। भला कोई औरत ऐसी निर्दयी कैसे हो सकती है। उसने आशा भरी नजरों से गगन की तरफ देखा। लेकिन गगन तो नज़रें झुकाए चुपचाप खड़ा था।
ये देखकर वो रोती हुई अपने कमरे में चली गई। लेकिन जब इतना हंगामा हो ही गया तो रिश्तेदार भी धीरे-धीरे कर वहां से रवाना हो गए। यहां तक कि आरती ने भी देर नहीं लगाई वहां से रवाना होने में। अब घर में अम्मा, जानकी, गगन, मामा जी, बुआ जी और सुमन ही बचे थे।
लेकिन अम्मा तो अब अनशन पर बैठ गई कि जब तक बहू माफी नहीं मांगेगा तब तक मैं पानी की एक बूंद नहीं पियूंगी। आखिर उसने इतने रिश्तेदारों के सामने मुझसे ऊंची आवाज में बात की तो की कैसे? सबके सामने मेरी बेइज्जती कर दी।
आखिर गगन ने समझाया,
" अम्मा जो बात हो गई अब उसे छोड़ो भी। आप पानी पी लो। आपकी तबीयत बिगड़ जाएगी "
" अरे ऐसे कैसे छोड़ दूं? तेरी पत्नी ने इतने लोगों के सामने मेरी बेइज्जती की है। माफी तो उसे मांगने ही पड़ेगी"
अम्मा अपनी ही ऐंठ में बोली।
" पर अम्मा, आरती जीजी ने भी तो गलती की थी। आखिर सुमन की क्या गलती"
" अरे वाह! आज तो बीवी के लिए तो अपनी बहन को गलत बता रहा है। अरे वो गहने रखकर भूल गई होगी। भला कौन बेटी अपने घर में चोरी करती है। लेकिन बहू? बहु को तो इज्जत को ढक कर रखना चाहिए थी। वो भी सबके सामने बेशर्मों की तरह लड़ पड़ी मुझसे। अब तू उसका साथ दे रहा है। इससे तो मैं मर जाती तो ज्यादा अच्छा था। पर याद रख पत्नी तो फिर भी तुझे दोबारा मिल जाएगी, मां नहीं मिलेगी दोबारा"
अम्मा आंसू बहाते हुए बोली।
आखिर अपनी मां को रोता देखकर गगन वहां से उठा और सीधे सुमन के पास कमरे में पहुंच गया और जाकर बोला,

" सुमन क्या ऐंठ में बैठी हुई हो तुम? जाकर अम्मा से माफी मांग लो ना।‌देखा उन्होंने पानी की बूंद तक नहीं पी है। कहीं उनकी तबीयत खराब ना हो जाए"
" तो इसकी जिम्मेदारी मेरी है क्या। मैं क्यों माफी मांगू। चोरी तुम्हारी बहन ने की थी, मैंने थोड़ी ना की थी। मेरे मां-बाप को ताने भी वो लोग मार रहे थे, इल्जाम भी मुझ पर वो लोग लगा रहे थे, और माफी मैं ही मांगू? तुम्हारी अम्मा पानी नहीं पी रही है तो उसमें मैं कुछ नहीं कर सकती। आखिर उनके गलत के लिए मैं क्यो माफी मांगू?"
" सुमन समझो तो। देखो पत्नी तो मुझे और मिल जाएगी, लेकिन मां तो एक ही है मेरे पास। वो दोबारा नहीं मिलेगी। तुम्हारी एक माफी से उन्हें खुशी मिलती है तो माफी मांग लो ना"
गगन ने अपनी आवाज ऊंची करते हुए कहा। उसके इस जवाब से सुमन के अंदर कुछ दरक सा गया। पत्नी और मिल जाएगी पर मां दूसरी नहीं मिलेगी। तो पत्नी फिर हाथ थाम कर इस घर में लाई क्यों गई। इस घर में मेरी जगह कहां है? सोच सोच कर सुमन का रोना छूट गया।
पर माता-पिता को दुख ना हो। उन तक यह बात ना पहुंचे इसलिए आंसुओं का घूट पीकर मामा जी और बुआ जी के सामने उसने अम्मा से आखिर पैर छूकर माफी मांग ली। जिससे अम्मा के झूठे स्वाभिमान को बहुत तसल्ली मिली। लेकिन सुमन के स्वाभिमान के टुकड़े-टुकड़े हो गए।
लेकिन वो आखरी दिन था जब सुमन को इतना बोलते हुए देखा था। उसके बाद तो वो बिल्कुल खामोश हो गई। अब ना वो ज्यादा किसी से बोलती थी और ना ही खिल खिलाती थी। 'हां' और 'हूं' में जवाब देकर अपने काम से काम रखती थी। ना किसी से लेना, ना किसी को देना। जिसने जो काम कह दिया चुपचाप कर लेना और फिर एक तरफ चुपचाप बैठ जाना। सोचते-सोचते गगन जी की आंखों में आंसू आ गए।

तभी सुमन अंदर कमरे में आई। हाथ में पानी का गिलास था। वहीं पास वाली ड्राअर में से दवाइयां निकाली और गगन जी को देते हुए हाथ आगे बढ़ा दिए।
लेकिन गगन जी ने हाथ में दवाई लेने की जगह अपने दोनों हाथ जोड़ दिए और अपनी कंपकंपाती आवाज में कहा,
" सुमन अब तो माफ कर दो मुझको"
उनकी आवाज सुनकर सुमन ने एक नजर उनकी तरफ देखा और फिर दवाई हाथ में देते हुए बोली,
" आपकी दवाई का समय हो गया है"
" सुमन माफ कर दे मुझे। तेरे इतने सालों के खामोशी नासूर बन चुकी है मेरे लिए। अब बर्दाश्त नहीं होता"
" कोई बात नहीं है जी। माफी क्यों मांगते हो? इस घर में गलतियों के लिए कोई माफी नहीं मांगता। बल्कि बिना गलती के माफी मंगवाई जाती है"
" सुमन पति हूं मैं तेरा। तेरी माफी का हकदार हूं। मुझे माफ कर दे"
गगन जी ने जोर देते हुए कहा।
" हम्म! पत्नी..... पत्नी का क्या है? वो तो और मिल जाती है। फिर मुझसे माफी मांग कर क्यों अपना मुंह खराब कर रहे हो"
कहकर सुमन कमरे के बाहर निकल गई। लेकिन गगन जी के पास से सिवाय पछतावे के और कुछ नहीं था अब।

आज फिर बेटा बिना कुछ खाए घर से जा रहा था, तो मां ने बेटे से कहा – बेटा थोड़ा खाना खाकर जा। दो दिन से तूने कुछ नहीं खाया ...
18/03/2024

आज फिर बेटा बिना कुछ खाए घर से जा रहा था, तो मां ने बेटे से कहा – बेटा थोड़ा खाना खाकर जा। दो दिन से तूने कुछ नहीं खाया – तो बेटे ने कहा देखो मम्मी मैंने मेरी 12वीं बोर्ड की परीक्षा के बाद सेकंड हैंड बाइक मांगी थी और पापा ने प्रॉमिस किया था कि जरूर लेकर देंगे। आज मेरा आखिरी पेपर है दीदी को कह देना कि जैसे ही मैं परीक्षा देकर बाहर आऊंगा। तब वह पैसे लेकर बाहर खड़ी रहे। मेरे दोस्त की पुरानी बाइक मुझे आज ही लेनी है और हां यदि दीदी वहां पैसे लेकर नहीं आई तो मैं घर वापस नहीं आऊंगा।

एक गरीब घर में बेटे मोहन की जिद और माता की लाचारी आमने-सामने टकरा रही थी। मां ने कहा बेटा तेरे पापा तुझे बाइक लेकर देने ही वाले थे। लेकिन पिछले महीने एक्सीडेंट, इससे पहले के मां अपनी बात पूरी कर पाती उससे पहले मोहन बोला मैं कुछ नहीं जानता मुझे तो बाइक चाहिए ही चाहिए। ऐसा बोलकर मोहन अपनी मम्मी को गरीबी और लाचारी की मझदार में छोड़कर घर से बाहर निकल गया।
12वीं बोर्ड की परीक्षा के बाद भागवत सर एक अनोखी परीक्षा का आयोजन करते थे। हालांकि भागवत सर का विषय गणित था। किंतु विद्यार्थियों को जीवन का गणित भी समझाते थे। उनके सभी विद्यार्थी यह परीक्षा जरूर देने आते थे। इस साल परीक्षा का विषय था – मेरी पारिवारिक भूमिका। मोहन परीक्षा कक्षा में आकर बैठ गया। उसने मन में गांठ बांध ली थी कि यदि मुझे बाइक नहीं लेकर देंगे तो मैं घर नहीं जाऊंगा। भागवत सर ने क्लास में सभी को पेपर बांट दिए। पेपर में कुल 10 प्रश्न थे। उत्तर देने के लिए 1 घंटे का समय दिया गया था।

मोहन ने पहले प्रश्न पढ़ा – आपके घर में आपके पिताजी, माताजी, बहन, भाई और आप कितने घंटे काम करते हो ? बिस्तार में बताइए? मोहन ने तुरंत जवाब लिखना शुरू कर दिया पापा सुबह 6:00 बजे टिफिन के साथ अपनी ऑटो रिक्शा लेकर निकल जाते हैं और रात को 9:00 बजे वापस आते हैं। ऐसे में वह लगभग 15 घंटे काम करते हैं। मम्मी सुबह 4:00 बजे उठकर पापा का टिफिन तैयार करती है। बाद में घर का सारा काम करती है। दोपहर को सिलाई का काम करती है और सभी लोगों के सो जाने के बाद वह सोती है। लगभग रोज 16 घंटे काम करती है।

दीदी सुबह कॉलेज जाती है और शाम को 4:00 से 8:00 बजे तक पार्ट टाइम जॉब करती है और रात को मम्मी के काम में मदद करती है। लगभग 12 से 13 घंटे काम करती है। मैं सुबह 6:00 बजे उठता हूं और दोपहर को स्कूल से आकर खाना खाकर सो जाता हूं। शाम को अपने दोस्तों के साथ टहलता हूं। रात को 11:00 तक पढ़ता हूं तो लगभग 10 घंटे तक में व्यस्त रहता हूं।

पहले सवाल के जवाब के बाद मोहन ने दूसरा प्रश्न पढ़ा – आपके घर की मासिक कुल आमदनी कितनी है? तो मोहन ने जवाब लिखना शुरू किया मेरे पापा की आमदनी लगभग ₹10000 है। मम्मी और दीदी मिलकर 5000 कुल जोड़ लेते हैं। कुल आमदनी 15000 रुपए है।
प्रश्न नंबर तीन था – मोबाइल रिचार्ज प्लान, आपकी मनपसंद टीवी पर आ रही तीन सीरियल के नाम, शहर के एक सिनेमा हॉल का पता और अभी वहां चल रही मूवी का नाम बताइए? सभी प्रश्नों के जवाब आसान होने के कारण मोहन ने फटाफट 2 मिनट में लिख दिए।

अब बारी थी प्रश्न नंबर चार की और चार नंबर प्रश्न था 1 किलो आलू और भिंडी की कीमत क्या है? 1 किलो गेहूं चावल और तेल की कीमत बताइए और जहां पर घर का गेहूं पिसाने जाते हो उस आटा चक्की का पता भी बताइए ? मोहन को इस सवाल का जवाब नहीं आया उसे समझ में आया कि हमारे दैनिक आवश्यक जरूरत की चीजों के बारे में तो उसे थोड़ा भी पता नहीं है। मम्मी जब भी कोई काम बताती थी तो मना कर देता था। आज उसे समझ में आया कि बेकार की चीज मोबाइल रिचार्ज, मूवी का ज्ञान ही जरूरी नहीं है। अपने घर के कामों की समझ होना भी बहुत जरूरी है।

प्रश्न नंबर पांच था – आप अपने घर में भोजन को लेकर कभी तकरार या गुस्सा करते हैं? तो मोहन ने सोच कर जवाब लिखा – हां मुझे आलू के सिवा कोई भी सब्जी पसंद नहीं है। यदि मम्मी और कोई सब्जी बनाएं तो मेरे घर में झगड़ा होता है। कई बार मैं बिना खाना खा उठ खड़ा हो जाता हूं। इतना लिखते ही मोहन को याद आया की आलू की सब्जी से मूमय को गैस की तकलीफ होती है। पेट मे दर्द होता है। ममी अपनी सब्जी मे एक बड़ी चमच्च अजवाइन डालकर खाती है।

एक दिन मैंने गलती से मम्मी की सब्जी खा ली थी और फिर मैं थूक दिया था और फिर पूछा था कि मम्मी तुम इतनी कड़वी सब्जी क्यों खाती हो? तब दीदी ने बताया था कि हमारे घर की स्थिति अच्छी नहीं है, कि हम दो सब्जी बनाकर खाएं। तुम्हारी जिद के कारण मम्मी बेचारी क्या करें?

मोहन ने अपनी यादों से बाहर आकर अगले प्रश्न को पढ़ा – अगला प्रश्न नंबर छः था – आपने अपने घर में की हुई आखिरी जिद के बारे में लिखिए? मोहन ने जवाब लिखना शुरू किया मेरी बोर्ड की परीक्षा पूर्ण होने के बाद दूसरे ही दिन बाइक के लिए जिद की थी। पापा ने कोई जवाब नहीं दिया था और मम्मी ने समझाया था कि घर में पैसे नहीं है। लेकिन मैं नहीं माना मैंने दो दिन से घर में खाना खाना भी छोड़ दिया है। जब तक बाइक नहीं लेकर देंगे मैं खाना नहीं खाऊंगा और आज तो मैं वापस घर ही नहीं जाऊंगा। यह कहकर निकला हूं।

अब बारी थी प्रश्न नंबर 7 की और प्रश्न था – आपको अपने घर में मिल रही पॉकेट मनी का आप क्या करते हैं? आपके भाई बहन अपनी पॉकेट मनी कैसे खर्च करते हैं। तो मोहन में जवाब लिखना शुरू किया हर महीने पापा मुझे ₹100 देते हैं उसमें से मैं मनपसंद परफ्यूम और चश्मा लेता हूं या अपने दोस्तों के साथ छोटी-मोटी पार्टियों में खर्च करता हूं। मेरी दीदी को भी पापा ₹100 देते हैं। वह खुद भी कमाती है और पगार के पैसे से मम्मी को आर्थिक मदद भी करती हैं। हां उसको दिए गए पॉकेट मनी को वह गुल्लक में डालकर बचत करती हैं। उसके किसी प्रकार के कोई शौक नहीं है क्योंकि वह कंजूस भी है।
इसके बाद प्रश्न था आठ – आप अपनी खुद की पारिवारिक जिम्मेदारी को समझते हैं ? यह प्रश्न अटपटा और मुश्किल होने के बाद भी मोहन ने जवाब लिखना शुरू किया। परिवार के साथ जुड़े रहना चाहिए। एक दूसरे के प्रति समझदारी से व्यवहार करना चाहिए। एक दूसरे की मदद करनी चाहिए और ऐसे अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए। यह लिखते लिखते ही अंतरात्मा से आवाज ए आर मोहन तुम खुद अपनी पारिवारिक जिम्मेदारी को योग्य रूप से निभा रहे हो क्या और अंतरात्मा से ही जवाब आया नहीं बिल्कुल नहीं।

प्रश्न नंबर 9 – आपके परिणाम सेआपके माता-पिता खुश हैं? क्या वह अच्छे परिणाम के लिए आपसे जिद करते हैं ?आपको डांटते रहते हैं? इस प्रश्न का जवाब लिखने से पहले मोहन की आंखें भर आई। अब वह परिवार के प्रति अपनी भूमिका बराबर समझ चुका था। उसने लिखने की शुरुआत की वैसे तो मैं कभी भी मेरे माता-पिता को आज तक संतोषजनक परिणाम नहीं दे पाया हूं। लेकिन इसके लिए उन्होंने कभी भी जिद नहीं कि। मैं बहुत बार अच्छे रिजल्ट के प्रॉमिस तोड़े हैं। फिर भी हल्की सी डाँट के बाद वहीं प्रेम बना रहता है।

इसके बाद आखरी प्रश्न था प्रश्न नंबर 10 – पारिवारिक जीवन में असर कारक भूमिका निभाने के लिए इन छुट्टियों में आप कैसे अपने परिवार की मदद करेंगे? जवाब में मोहन की कलम चले इससे पहले उसकी आंखों से आंसू बहने लगे। जवाब लिखने से पहले ही कलम रुक गई। बेंच के नीचे मुंह रखकर रोने लगा फिर से कलम उठाई तब भी वह कुछ ना लिख पाया।

दसवें प्रश्न का जवाब दिए बगैर उसने पेपर सबमिट कर दिया और बाहर आ गया। स्कूल के दरवाजे पर दीदी को देखकर मोहन उसकी ओर दौड़ पड़ा। जैसे ही दीदी के पास पहुंचा दीदी ने कहा – भाई यह ले ₹8000 मम्मी ने कहा है की बाइक लेकर ही आना। दीदी ने मोहन को पैसे पकड़ा दिए। मोहन ने पूछा – कहां से लाई हो पैसे ? तब दीदी ने बताया मैंने मेरे ऑफिस से एक महीने की सैलरी एडवांस मांग ली। मम्मी भी जहां काम करती है वहीं से उधार ले लिया और मेरी पॉकेट मनी की बचत से निकाल लिए। ऐसा करके तुम्हारी बाइक के पैसे की व्यवस्था हो गई है। मोहन की दृष्टि पैसों पर स्थिर हो गई थी।

दीदी फिर बोली – भाई मम्मी को बोलकर निकले थे कि पैसे नहीं दोगे तो मैं घर पर नहीं आऊंगा। अब तुम्हें समझना चाहिए की तुम्हारी भी घर के प्रति जिम्मेदारी है। मुझे भी बहुत शौक है। लेकिन मै अपने शौक की बजाय अपने परिवार को ज्यादा महत्व देती हूँ। तुम हमारे घर के सबसे लाडले हो इसलिए पापा के के पैर मे फ्रैक्चर होने के बावजूद भी रोज ऑटो चलाते है ताकि तुझे बाइक दिलाने का प्रामिस पूरा कर सके। बाकी तुमने तो अनेकों बार अपने प्रामिस तोड़े ही है न?

मोहन के हाथ मे पैसे देकर दीदी घर चली गई। उसी समय मोहन का दोस्त वहाँ अपनी बाइक लेकर आ गया। उसने अच्छे से बाइक को चमका दिया था।
दोस्त ने कहा – ले मोहन आज से यह बाइक तुम्हारी। सब 12000 रुपए में मांग रहे थे मगर यह तुम्हारे लिए ₹8000 में। मोहन बाइक की ओर एक टक देख रहा था और थोड़ी देर बाद बोला – दोस्त तुम अपनी बाइक उसे 12000 वाले को ही दे देना। मेरे पास पैसे की व्यवस्था नहीं हो पाई है और होने की संभावना भी नहीं है। यह कहकर मोहन सीधा भागवत सर की केबिन में जा पहुंचा। भागवत सर ने मोहन की ओर देखा और पूछा – अरे मोहन कैसा लिखा है पेपर में?

तब मोहन बोला सर यह कोई पेपर नहीं था यह तो मेरे जीवन के लिए दिशा निर्देश था। मैंने एक प्रश्न का जवाब छोड़ दिया है किंतु वह जवाब लिखकर नहीं अपने जीवन की जवाबदेही निभा कर दूंगा और इतना कहकर भागवत सर के चरण स्पर्श किए और अपने घर की ओर निकल पड़ा।

घर पहुंचते ही मोहन ने देखा की मम्मी पापा दीदी सब उसकी राह देख रहे थे। मोहन को देखते ही मम्मी ने पूछा बेटा बाइक कहां है? मोहन ने दीदी के हाथों में पैसे थमा दिए और कहा सॉरी मुझे बाइक नहीं चाहिए और पापा मुझे ऑटो की चाभी दो। आज से मैं पूरी छुट्टियां ऑटो चलाऊंगा और आप थोड़े दिन आराम करेंगे और मम्मी आज मेरी पहली कमाई शुरू होगी। इसलिए तुम अपनी पसंद की सब्जी ले आन। रात को हम सब साथ मिलकर खाना खाएंगे।

मोहन के स्वभाव में आए परिवर्तन को देखकर मम्मी ने उसको गले लगा लिया और कहा बेटा सुबह जो कहकर तुम गए थे। वह बात मैंने तुम्हारे पापा को बताई थी और इसलिए तुम्हारे पापा दुखी हो गए। काम छोड़कर घर वापस आ गए। भले ही मुझे पेट में दर्द होता हो लेकिन आज तो मैं तेरी पसंद की ही सब्जी बनाऊंगी।

तब मोहन ने कहा – नहीं मम्मी अब मैं समझ गया हूं कि मेरे घर परिवार में मेरी भूमिका क्या है? मैं रात को आपकी पसंद की सब्जी ही खाऊंगा। परीक्षा में मैं आखरी जवाब नहीं लिखा वह प्रेक्टिकल करके दिखाना है। और हां मम्मी हम गेहूं को पीसने कहां जाते हैं उस आटा चक्की का नाम और पता भी मुझे दे दो। इसी समय भागवत सर ने घर में प्रवेश किया और बोले वाह मोहन वाह जो जवाब तुमने लिखकर नहीं दिया वह प्रैक्टिकल जीवन में करके दोगे।

मोहन भागवत सर को देखकर आश्चर्य चकित हो गया और बोला – सर आप और यहां ? तब भागवत सर बोले मुझे मिलकर तुम चले गए उसके बाद मैं तुम्हारा पेपर पढ़ा। इसलिए तुम्हारे घर की ओर निकल पड़ा। मैं बहुत देर से तुम्हारे अंदर आए परिवर्तन को सुना। मेरी अनोखी परीक्षा सफल रही और उस परीक्षा में तुमने पहले नंबर पाया है। ऐसा बोलकर भागवत सर ने मोहन के सर पर हाथ रख दिया और उसे आशीर्वाद दिया। मोहन ने तुरंत ही भागवत सर के पैर छुए और ऑटो रिक्शा चलाने के लिए निकल पड़ा।😊Aditya Yadav

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08/02/2024

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