19/08/2017
बछबारस (गौवत्स द्वादशी)
जहां तक इस व्रत को मनाने की शुरुआत की बात है, तो यह माता यशोदा और पुत्र कृष्ण के बीच प्रेम के जीवंत उदाहरण का प्रतीक त्योहार है। जैसा कि सभी जानते हैं, श्री कृष्ण माता
यशोदा की आंख के तारे थे। माता यशोदा अपने प्यारे पुत्र को देखे बिना पल भर भी ना रह पाती थीं। पुत्र कृष्ण भी माता पर पूर्णभक्ति रखते थे और खेलने के बीच थोड़ी- थोड़ी देर में
उनके पास एक चक्कर लगाना, उनसे दुलार पाना और प्यार जताना नहीं भूलते थे। ऐसे ही मां- बेटे के दिन प्रेम से कट रहे थे।इस बीच श्री कृष्ण बड़े हो गए और उनके प्यारे मित्र ग्वाले
गाय चराने जंगल में जाने लगे। अपने मित्रों को देख श्री कृष्ण ने भी गाय चराने जाने की हठ पकड़ ली। माता यशोदा इस सत्य से परिचित थीं कि आयु के अनुरूप पुत्र को घर से बाहर
भेजना ही होगा। अपने पुत्र को इतनी देर बाहर भेजने के नाम से भी वे चिंतित थीं। ढेर टालमटोल के बाद आखिरकार भाद्रपद की कृष्ण पक्ष की द्वादशी को श्री कृष्ण का जंगल में गाय
चराने जाना निश्चित किया गया।पुत्र की चिंता में, उसे हर कष्ट से बचाने के लिए माता यशोदा ने लाख जतन किए। उनका लाडला इतनी देर घर से बाहर रहने वाला था इसलिए माता ने
अपने पुत्र के पसंद के सारे व्यंजन बनाए। श्री कृष्ण मात्र माता यशोदा के लाड़ले ही ना थे। सारा गोकुल उन पर जान छिड़कता था। इसीलिए श्री कृष्ण के प्रथम वन गमन पर गोकुल गांव
की प्रत्येक माता ने कृष्ण के प्रति दुलार प्रकट करने के लिए उनके पसंद के व्यंजन बनाए। कृष्ण के साथ वन जाने वाली गायों और बछड़ों के लिए भी मूंग, मोठ और बाजरा अंकुरित किया
गया। सुबह यशोदा ने श्री कृष्ण को हर तरह से सुंदर सजाया और काला टीका लगाया।उनके साथ ही ब्रज की सारी माताओं ने श्री कृष्ण के लिए व्यंजनों का ढेर लगा दिया। गायों और
बछड़ों का भी श्रंगार हुआ और पूजा के बाद उन्हें अंकुरित अनाज खिलाया गया। यशोदा ने बीसियों बार बलराम को समझाया कि कृष्ण को बछड़े चराने दूर मत जाने देना। कृष्ण को
अकेला मत छोड़ना। कृष्ण को धूप में अधिक मत खेलने देना आदि। इस तरह मां की ममता से ओत- प्रोत श्री कृष्ण का पहला गोवत्साचरण संपूर्ण हुआ। श्री कृष्ण के वापस आने तक गांव
की किसी महिला ने उनकी चिंता में भोजन नहीं किया। गायों के लिए अंकुरित किए हुए अन्न पर ही उनका दिन कट गया। इस तरह बछबारस का व्रत अस्तित्व में आ गया।