Pandit Mahendra Vyas

Pandit Mahendra Vyas ज्योतिष, मुहूर्त एवं वास्तु विशेषज्ञ? किसी भी तरह की ज्योतिषिय सलाह के लिए हमारी वेब साइट www.vedangchakshu.com पर रजिस्टर करें।

06/10/2020

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ज्योतिष, मुहूर्त एवं वास्तु विशेषज्ञ?

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06/10/2020

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मनीषियों द्वारा रचित चार वेद है एवं छ: वेदांग है उनमे से छठा वेदांग ज्योतिष है इसकी व्याख्या कुछ इस प्रकार से की गई .....

Visit us for astrological and vastu consultation at www.vedangchakshu.com and drop your details.
06/10/2020

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श्राद्ध पर्व चल रहे है विशेष जिज्ञासा रहती है कि क्यों श्राद्ध पक्ष आता है और इस पक्ष में क्या किया जाना चाहिए जानने के ...
05/09/2020

श्राद्ध पर्व चल रहे है विशेष जिज्ञासा रहती है कि क्यों श्राद्ध पक्ष आता है और इस पक्ष में क्या किया जाना चाहिए जानने के लिए हमारी वेबसाइट पर आएं निम्न लिंक पर क्लिक करें।

Mahendra Vyas2 घंटे पहले8 मिनटश्राद्ध कर्म पर विशेषआलेख थोड़ा विस्तृत हो गया है फिर भी निवेदन है कि समय निकाल कर अवश्य पढ़ें। .....

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10/06/2020

ज्योतिष शास्त्रानुसार शोध कार्य हेतु कुछ विशेष कुंडलियों का चयन किया जा रहा है यदि आप चाहते हैं कि आपकी कुंडली भी सम्मिलित की जाए तो निम्न फार्म भरें। यदि आपकी कुंडली सम्मिलित की जाती है तो आपको उस पर किए गए शोध कार्य से अवगत भी कराया जाएगा।
पं. महेंद्र व्यास

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हमारे द्वारा बोले गए शब्दों में असीम शक्ति होती है जो हमारे जीवन को अदभुत रूप से प्रभावित करती है जानने के लिए हमारी वेब...
07/07/2019

हमारे द्वारा बोले गए शब्दों में असीम शक्ति होती है जो हमारे जीवन को अदभुत रूप से प्रभावित करती है जानने के लिए हमारी वेबसाइट के निम्न लिंक पर क्लिक करें।

Mahendra Vyas ३ घंटे पहले 2 min read बोले गए शब्दों की शक्ति मनुष्य को ईश्वर द्वारा प्रदत्त शक्तियों में से एक है “वाक शक्ति” अर्थ...

25/05/2019

ग्रीष्म ऋतू में सर्वाधिक ताप वाले दिन " नौतपा " जानें नौतपा के बारें में www.vedangchakshu.com/blog

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22/05/2019

ज्योतिष, मुहूर्त एवं वास्तु के पूर्णतः वैदिक विज्ञान पर आधारित परामर्श हेतू हमारी वेबसाइट (वेदांग चक्षु) www.vedangchakshu.com पर रजिस्टर करें।
पं. महेन्द्र व्यास

मनीषियों द्वारा रचित चार वेद है एवं छ: वेदांग है उनमे से छठा वेदांग ज्योतिष है इसकी व्याख्या कुछ इस प्रकार से की गई .....

20/12/2017
27/09/2017
बछबारस (गौवत्स द्वादशी)जहां तक इस व्रत को मनाने की शुरुआत की बात है, तो यह माता यशोदा और पुत्र कृष्ण के बीच प्रेम के जीव...
19/08/2017

बछबारस (गौवत्स द्वादशी)

जहां तक इस व्रत को मनाने की शुरुआत की बात है, तो यह माता यशोदा और पुत्र कृष्ण के बीच प्रेम के जीवंत उदाहरण का प्रतीक त्योहार है। जैसा कि सभी जानते हैं, श्री कृष्ण माता
यशोदा की आंख के तारे थे। माता यशोदा अपने प्यारे पुत्र को देखे बिना पल भर भी ना रह पाती थीं। पुत्र कृष्ण भी माता पर पूर्णभक्ति रखते थे और खेलने के बीच थोड़ी- थोड़ी देर में
उनके पास एक चक्कर लगाना, उनसे दुलार पाना और प्यार जताना नहीं भूलते थे। ऐसे ही मां- बेटे के दिन प्रेम से कट रहे थे।इस बीच श्री कृष्ण बड़े हो गए और उनके प्यारे मित्र ग्वाले
गाय चराने जंगल में जाने लगे। अपने मित्रों को देख श्री कृष्ण ने भी गाय चराने जाने की हठ पकड़ ली। माता यशोदा इस सत्य से परिचित थीं कि आयु के अनुरूप पुत्र को घर से बाहर
भेजना ही होगा। अपने पुत्र को इतनी देर बाहर भेजने के नाम से भी वे चिंतित थीं। ढेर टालमटोल के बाद आखिरकार भाद्रपद की कृष्ण पक्ष की द्वादशी को श्री कृष्ण का जंगल में गाय
चराने जाना निश्चित किया गया।पुत्र की चिंता में, उसे हर कष्ट से बचाने के लिए माता यशोदा ने लाख जतन किए। उनका लाडला इतनी देर घर से बाहर रहने वाला था इसलिए माता ने
अपने पुत्र के पसंद के सारे व्यंजन बनाए। श्री कृष्ण मात्र माता यशोदा के लाड़ले ही ना थे। सारा गोकुल उन पर जान छिड़कता था। इसीलिए श्री कृष्ण के प्रथम वन गमन पर गोकुल गांव
की प्रत्येक माता ने कृष्ण के प्रति दुलार प्रकट करने के लिए उनके पसंद के व्यंजन बनाए। कृष्ण के साथ वन जाने वाली गायों और बछड़ों के लिए भी मूंग, मोठ और बाजरा अंकुरित किया
गया। सुबह यशोदा ने श्री कृष्ण को हर तरह से सुंदर सजाया और काला टीका लगाया।उनके साथ ही ब्रज की सारी माताओं ने श्री कृष्ण के लिए व्यंजनों का ढेर लगा दिया। गायों और
बछड़ों का भी श्रंगार हुआ और पूजा के बाद उन्हें अंकुरित अनाज खिलाया गया। यशोदा ने बीसियों बार बलराम को समझाया कि कृष्ण को बछड़े चराने दूर मत जाने देना। कृष्ण को
अकेला मत छोड़ना। कृष्ण को धूप में अधिक मत खेलने देना आदि। इस तरह मां की ममता से ओत- प्रोत श्री कृष्ण का पहला गोवत्साचरण संपूर्ण हुआ। श्री कृष्ण के वापस आने तक गांव
की किसी महिला ने उनकी चिंता में भोजन नहीं किया। गायों के लिए अंकुरित किए हुए अन्न पर ही उनका दिन कट गया। इस तरह बछबारस का व्रत अस्तित्व में आ गया।

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