06/10/2021
बचपन में आड़ी तिरछी रेखाओं को जोड़ कर तारा बनाना सीखा था,
साथ में उन रेखाओं को घुमा कर चांद भी बना लेते थे ।
अब न जाने क्यों रेखाएं जुड़ नहीं रही हैं, अब नहीं बनते चांद, सितारे, सूरज, नदी, पहाड़, एक पेड़, एक झोंपड़ी, कुछ पक्षी ।
अब न वो आसमान बनता है न ही वो छवि ।
अब बनते हैं कुछ लोग भयानक से,
कुछ हिंसक जानवर, कुछ लाशें और ख़ून,
सूखा हुआ ख़ून, इंसानों के हाथों पर, मुंह पर ।
कुछ आकृतियों के नीचे दबी आरबों आकृतियां ।
- नरेश प्रजापत "नाश"