Save Our Heritage Foundation

Save Our Heritage Foundation "Save Our Heritage Foundation: Preserving the Past for the Future."

रक्षाबंधन पर्व रे अवसर ने आप सगळा शुभचिंतकां ने घणा घणा रंग।
28/08/2026

रक्षाबंधन पर्व रे अवसर ने आप सगळा शुभचिंतकां ने घणा घणा रंग।

रक्षाबंधन: प्रेम और विश्वास का पवित्र बंधन©आलेख- दयालसिंह चौहान-सिलारीरक्षाबंधन सनातन धर्म का एक महत्वपूर्ण त्योहार है ज...
28/08/2026

रक्षाबंधन: प्रेम और विश्वास का पवित्र बंधन
©आलेख- दयालसिंह चौहान-सिलारी
रक्षाबंधन सनातन धर्म का एक महत्वपूर्ण त्योहार है जो भाई-बहन के पवित्र रिश्ते का प्रतीक है। यह त्योहार श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस दिन बहनें अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांधती हैं तथा भाई के सुदीर्घ जीवन की मंगल-कामना करती है और भाई अपनी बहन के मान-सम्मान की रक्षा का वचन देते हैं। रक्षा-बंधन का पर्व कुछ स्थानों पर रक्षासूत्र के नाम से भी जाना जाता है। प्राचीन काल से यह पर्व भाई-बहन के निश्चल स्नेह के प्रतीक के रुप में मनाया जाता है। हमारे यहां सभी पर्व किसी न किसी कथा, दंत कथा या किवदन्ती से जुड़े हुए है। रक्षाबंधन का पर्व भी ऐसी ही कुछ कथाओं से संबन्धित है। रक्षाबंधन क्यों मनाया जाता है, हजारों साल पुराना है रक्षाबंधन का इतिहास यह जानने का प्रयास करते है।
रक्षाबंधन मनाने का पौराणिक आधार राजा बलि और माता लक्ष्मी की कथा: पुराणों के अनुसार रक्षा बंधन पर्व लक्ष्मी जी का राजा बली को राखी बांधने से जुड़ा हुआ है। स्कंद पुराण, पद्मपुराण और श्रीमद्भागवत में वामनावतार कथा में रक्षाबंधन का प्रसंग मिलता है। राजा बलि ने विश्वजित्‌ और 100 अश्वमेध यज्ञों का संपादन कर तीनों लोकों पर अधिकार जमा लिया। लोक मान्यता है कि इन 100 यज्ञों में से 5 यज्ञ राजा बलि ने जोधपुर जिले के बिलाड़ा कस्बे के पास स्थित पिचियाक गांव में सम्पन्न किए थे। दानवेंद्र राजा बलि कालांतर में जब अंतिम अश्वमेघ यज्ञ का समापन कर रहे थे, तब बलि का अहंकार चूर करने के लिए भगवान विष्णु ने वामन अवतार लिया और राजा बलि के यहां भिक्षा मांगने पहुंच गये। शुक्राचार्य के सावधान करने पर भी राजा बलि दान से विमुख न हुआ। वामन ने तीन पग भूमि दान में माँगी, बलि अपने वचन पर अडिग रहते हुए तीन पग भूमि दान में दे दी। विशाल रूप धारण कर प्रथम दो पगों में पृथ्वी और आकाश को नाप लिया। अभी तीसरा पैर रखना शेष था, बलि के सामने संकट उत्पन्न हो गया। ऐसे में राजा बलि अपना वचन नहीं निभाते तो अधर्म होगा यह सोचकर आखिरकार उन्होंने अपना सिर भगवान के आगे कर दिया और कहां तीसरा पग आप मेरे सिर पर रख दीजिए। वामन भगवान ने ठीक वैसा ही किया, श्री विष्णु के पैर रखते ही, राजा बलि पाताल लोक में पहुंच गया। राजा बलि के द्वारा वचन का पालन करने पर भगवान विष्णु अत्यन्त प्रसन्न हुए, उन्होंने आग्रह किया कि राजा बलि उनसे कुछ मांग लें। इसके बदले में बलि ने पाताल लोक में रात दिन भगवान को अपने सामने रहने का वचन मांग लिया। विष्णुजी ने वरदान दे दिया और वह उनके साथ रहने लगे। दूसरी ओर, मां लक्ष्मी भगवान विष्णु के वापस लौटने का इंतजार कर रही थी। भगवान को वापस लाने के लिए नारद ने लक्ष्मीजी को एक उपाय बताया। मां लक्ष्मी एक गरीब महिला के रूप में राजा बलि के पास पहुंची और उन्हें राखी बांध दी। राखी के बदले राजा ने कुछ भी मांग लेने को कहा। मां लक्ष्मी तुरंत प्रकट हुई और उन्होंने विष्णु जी को मुक्त करने का वचन लिया। राखी का मान रखते हुए राजा बलि ने भगवान विष्णु को वापस लक्ष्मीजी के साथ भेज दिया। जिस दिन का यह प्रसंग है, उस दिन श्रावण मास की पूर्णिमा थी। उस दिन से ही रक्षा बंधन का पर्व मनाया जाने लगा। सनातन धर्म के सभी धार्मिक अनुष्ठानों में रक्षासूत्र बाँधते समय या रक्षाबंधन में राखी बांधते वक्त या किसी मंगल कार्य में मौली बांधते वक्त यह स्वस्तिवाचन किया (यह श्लोक रक्षाबन्धन का अभीष्ट मन्त्र है) -
येन बद्धो बलि: राजा दानवेन्द्रो महाबल: ।
तेन त्वामभिबध्नामि रक्षे मा चल मा चल ।।
इस श्लोक का हिन्दी भावार्थ है- "जिस रक्षासूत्र से महान शक्तिशाली दानवेन्द्र राजा बलि को बाँधा गया था, उसी सूत्र से मैं तुझे बाँधता हूँ। हे रक्षे (राखी)! तुम अडिग रहना (तू अपने संकल्प से कभी भी विचलित न हो।)"
यमुना और यमराज: शास्त्रों में रक्षाबंधन के संदर्भ में मृत्यु के देवता भगवान यम और उनकी बहन यमुना का एक प्रसंग मिलता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार यमराज और यमुना जी भगवान सूर्य देव की संतान है। यमुना जी बहन के रूप में अपने भाई यम से स्नेह पाना चाहती थी। कहते है इसीलिए यमुना जी ने एक बार यमराज की कलाई पर धागा बांधा था। भगवान यम, यमुना की इस बात से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने यमुना की रक्षा का वचन देने के साथ ही यमुना को अमरता का वरदान भी दे दिया। यमराज जी ने अपनी बहन यमुना को यह भी वचन दिया कि जो भी बहन सावन की पूर्णिमा के दिन अपने भाई को शुभ मुहूर्त में राखी/रक्षा सूत्र बांधेगी और भाई अपनी बहन की मदद के लिए वचन देगा, उसका कल्याण होगा और वह उसे लंबी आयु का वरदान देंगे, उससे अकाल मृत्यु दूर रहेगी।
एक अन्य पौराणिक कथा पुराणों के अनुसार: पौराणिक कथाओं के अनुसार, देवताओं और असुरों में भीषण युद्ध चल रहा था और राक्षसों से देवताओं की सेना को पराजय का सामना करना पड़ रहा था। यह देख इंद्रदेव की पत्नी शचि(इंद्राणी) को अपने पति और देवताओं की चिंता होने लगी। उन्होंने कठोर जप-तप किया और एक रक्षासूत्र बनाया। धार्मिक मान्यता है कि शचि ने यह रक्षासूत्र अपने पति इंद्र की कलाई पर बांधा, जिसके बाद राक्षसों को पराजित करने की शक्ति प्राप्ति हुई। जिस दिन यह रक्षासूत्र बांधा गया उस दिन श्रावण पूर्णिमा का दिन था। उसी दिन से ही श्रावण पूर्णिमा के दिन रक्षासूत्र बांधने की प्रथा चली आ रही है।
महाभारत में द्रौपदी का श्री कृष्ण को राखी बांधना: राखी का यह पर्व पुराणों से होता हुआ, महाभारत अर्थात द्वापर युग में गया और आज आधुनिक काल में भी इस पर्व का महत्व कम नहीं हुआ है। राखी से जुड़ा हुआ एक प्रसंग महाभारत में भी आता है। शिशुपाल का वध करने के बाद जब श्रीकृष्ण की अंगुली पर सुदर्शन चक्र वापस बैठने के लिए लौटने लगा तो कृष्णजी की तर्जनी अंगुली पर चोट लग गई। ऐसे में द्रौपदी ने तुरंत साड़ी का पल्लू फाड़कर कृष्णजी की अंगुली पर बांध दिया। भगवान कृष्ण इससे बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने द्रौपदी की जीवनभर रक्षा करने का वचन दिया। इसी ऋण को चुकाने के लिये श्री कृष्ण ने चीर हरण के समय द्रौपदी की लाज बचाकर इस ऋण को चुकाया था। यह घटना जिस दिन घटित हुई उस दिन भी श्रावण मास की पूर्णिमा थी।
रक्षा बंधन का सामाजिक आधार: क्षत्रिय (राजपूत) जब लड़ाई पर जाते थे तब महिलाएँ उनको माथे पर कुमकुम तिलक लगाने के साथ साथ हाथ में रेशमी धागा बाँधती थी, इस विश्वास के साथ कि यह धागा उन्हें विजयश्री के साथ सुरक्षित वापस ले आयेगा। राजस्थान में इस दिन रामराखी और चूड़ा राखी बांधने की परम्परा है। राम राखी केवल भगवान, देवपुरुषों और झुंझारो को ही बांधी जाती है व चूड़ा राखी केवल भाभी की चूड़ियों में ही बांधी जाती है। क्षत्रियों के घरों में रेशमी डोरे से बनी यह राखी तलवारों व शस्त्रों को भी बांधी जाती हैं।
रक्षाबंधन पर्व के संबंध में राजस्थान में निम्न पंक्तियां प्रसिद्ध हैं -
करू स्मरण मात भवानी रो, सिंवरु पांचू देव।
हाथ खांडो करे रुखाली, मुलखे बीरो सदैव।।
पेली राखी शमशिर री, रेवे बीरें रे सँग सदैव।
दूजी राखी कुल रा वीर री, हिम्मत थरपे देव।।
तीजी राखी जामण जाया री, निरखे दुनिया सदैव।
चौथी राखी भूमि अर नीर री, ध्यान धरे सदैव।।
रक्षाबंधन का धार्मिक आधार व अन्य रुप : भारत में स्थान बदलने के साथ ही पर्व को मनाने की परम्परा भी बदल जाती है, यही कारण है कि तमिलनाडू, केरल और उडीसा के दक्षिण में इसे अवनि अवितम के रुप में मनाया जाता है, महाराष्ट्र में यह त्योहार नारियल पूर्णिमा के नाम से विख्यात है। इस दिन लोग नदी या समुद्र के तट पर जाकर अपने जनेऊ बदलते हैं और समुद्र की पूजा करते हैं। उत्तरांचल में इसे श्रावणी कहते हैं। इस दिन यजुर्वेदी द्विजों का उपकर्म होता है। उत्सर्जन, स्नान-विधि, ऋषि-तर्पणादि करके नवीन यज्ञोपवीत धारण किया जाता है। रक्षाबंधन से पहले तक ठाकुरजी झुले में दर्शन देते है, परन्तु रक्षा बंधन के दिन से ये दर्शन समाप्त होते है। अमरनाथ की अतिविख्यात धार्मिक यात्रा गुरु पूर्णिमा से प्रारम्भ होकर रक्षाबन्धन के दिन सम्पूर्ण होती है। भाई-बहनों में परस्पर अपार स्नेह और प्रेम की उत्तरोत्तर वृद्धि हो, जीवन में शुभत्व, मंगल एवं आनंद के दीप देदीप्यमान रहें। रक्षाबंधन पर्व की आप सभी को हार्दिक बधाई एवं मंगल शुभकामनाएं।

ओझल हो रही स्मृति, सिमट रहा इतिहास।
बॉट निहारे पूर्वज, करके हमसे आस।।
#रक्षाबंधन #राखी

भगवान श्री हयग्रीव जयंती की हार्दिक शुभकामनाएं! ज्ञान, बुद्धि और चेतना के प्रतीक भगवान हयग्रीव (भगवान विष्णु के अश्वग्री...
27/08/2026

भगवान श्री हयग्रीव जयंती की हार्दिक शुभकामनाएं! ज्ञान, बुद्धि और चेतना के प्रतीक भगवान हयग्रीव (भगवान विष्णु के अश्वग्रीव अवतार) सभी के जीवन में अंधकार मिटाकर ज्ञान का प्रकाश फैलाएं।
भगवान हयग्रीव के बारे में मुख्य बातें:
ज्ञान के देवता: इन्हें वेदों का उद्धारक और बुद्धि का अधिष्ठाता माना जाता है।
विष्णु अवतार: जब मधु और कैटभ नामक राक्षसों ने वेदों को चुरा लिया था, तब भगवान विष्णु ने यह अवतार लेकर वेदों की पुनर्स्थापना की थी।
स्वरूप: इनका शरीर मनुष्य का और मुख (गर्दन) घोड़े का है।
प्रतिमा प्राप्ति स्थल ढावा, नागौर।
The God of Knowledge (One of the Vishnu incarnation)🙏

बूंदी में हेरिटेज वॉक — पर्यटन विकास की नई दिशा की ओर एक कदम। आज रविवार को बूंदी शहर में सेव ऑवर हेरिटेज फाउंडेशन, बूंदी...
24/08/2026

बूंदी में हेरिटेज वॉक — पर्यटन विकास की नई दिशा की ओर एक कदम।

आज रविवार को बूंदी शहर में सेव ऑवर हेरिटेज फाउंडेशन, बूंदी टीम द्वारा जिला कलेक्टर श्री हरफूल सिंह, पुलिस अधीक्षक श्री अवनीश कुमार शर्मा एवं रामगढ़ विषधारी टाइगर रिजर्व के वन उप संरक्षक श्री अरुण कुमार के साथ एक विशेष हेरिटेज वॉक का आयोजन किया गया।

हेरिटेज वॉक का उद्देश्य बूंदी शहर में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए संभावित हेरिटेज वॉक रूटों का चयन एवं उनका स्थल निरीक्षण करना था।

हेरिटेज वॉक की शुरुआत अखाड़े वाले बालाजी से हुई। यहां से पहाड़ी मार्ग पर पैदल चलते हुए दल सूरज छतरी पहुंचा। जिला कलेक्टर महोदय ने सूरज छतरी का बारीकी से निरीक्षण किया और इसके ऐतिहासिक एवं स्थापत्य महत्व को समझा।

इसके पश्चात दल टीवी टावर पहुंचा और वहां का निरीक्षण किया। फिर चामुंडा दरवाजे से होते हुए ऐतिहासिक तारागढ़ पहुंचा। तारागढ़ के संचालक श्री जी.पी. शर्मा ने कलेक्टर महोदय को गढ़ के विभिन्न हिस्सों का विस्तृत निरीक्षण करवाया।

तारागढ़ के बाद हेरिटेज वॉक दल गढ़ पैलेस स्थित विश्व प्रसिद्ध चित्रशाला पहुंचा। जिला कलेक्टर ने चित्रशाला में चल रहे जीर्णोद्धार कार्यों का निरीक्षण किया तथा संरक्षण कार्यों की प्रगति की जानकारी ली।

हेरिटेज वॉक का अंतिम पड़ाव लक्ष्मी नारायण मंदिर रहा। मंदिर संचालन समिति के पदाधिकारियों ने मंदिर से संबंधित आवश्यक जीर्णोद्धार एवं संरक्षण कार्यों के लिए जिला कलेक्टर महोदय के समक्ष निवेदन प्रस्तुत किया।

इस अवसर पर अरिहंत सिंह चरड़ास ने बताया कि बूंदी की ऐतिहासिक धरोहरों को पैदल भ्रमण मार्गों से जोड़कर व्यवस्थित हेरिटेज वॉक रूट विकसित किए जा सकते हैं, जिससे पर्यटकों को बूंदी के इतिहास, स्थापत्य और सांस्कृतिक विरासत को करीब से जानने का अवसर मिलेगा तथा शहर में पर्यटन गतिविधियों को भी नई गति मिलेगी।

इस‌ अवसर पर एडवोकेट अजय नुवाल, मनीष सिसोदिया, शैलेन्द्र भाकल, नवीका भाकल, हिमांशु सिंह, अमर सिंह, विष्णु पोसवाल, राजेन्द्र सिंह मीणा, प्रसुन्न बाहेती, अभिषेक यादव उपस्थित रहें।

जय मां भारती,

अरिहंत सिंह चरड़ास,
सेव ऑवर हेरिटेज फाउंडेशन।

श्री कमलेश्वर महादेव मन्दिर, बून्दीपवित्र सावन मास के चतुर्थ सोमवार की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं।ॐ तत्पुरुषाय विद्महे...
24/08/2026

श्री कमलेश्वर महादेव मन्दिर, बून्दी

पवित्र सावन मास के चतुर्थ सोमवार की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं।
ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्॥

राजस्थान के बूंदी जिले में मिनी खजुराहो के नाम से प्रसिद्ध श्री कमलेश्वर महादेव मंदिर, हाड़ौती अंचल में धार्मिक आस्था का केंद्र है। इस मंदिर का निर्माण 7वी सदी का माना जाता है लेकिन मन्दिर में स्थित रणथंभौर के शासक राणा हम्मीरदेव चौहान (हठी हम्मीर) के शिलालेख के अनुसार उनके पिता जेत्रसिंह ने वि.सं. 1345 में चाखन नदी के तट पर इस स्थान पर ऊंचे शिखर वाले इस मंदिर का निर्माण व जीर्णोद्धार कार्य करवाये थे। इस शिलालेख में जैत्रसिंह की मालवा विजय का भी उल्लेख मिलता है। हम्मीरदेव चौहान ने भी मन्दिर में निर्माण कार्य करवाए थे। यह मंदिर चाकन नदी के पास प्रकृति के मनोरम वातावरण में स्थित है। इस स्थान के आसपास घना जंगल मौजूद है। यह बिजासन माता मंदिर और इंद्रगढ़ किले के करीब स्थित है। यह क्षेत्र पूर्व में चक्रवर्ती चाहमान राजवंश के रणथंभौर राज्य में सम्मिलित था। बून्दी नरेश राव सुरजन हाड़ा का रणथम्भौर पर अधिकार होने पर यह क्षेत्र बून्दी के चौहान राज्य में सम्मिलित हुआ। कमलेश्वर महादेव मंदिर में तीन कुंड बने हुए हैं। इनमे से दो कुंड में नहाने के लिए सीढ़ियां बनी हुई तथा एक अन्य कुंड चाकन नदी के रास्ते में बना है। लोगों की मान्यता है कि इन तीनों कुंडों में स्नान करने से लोगों के चर्म रोग ठीक हो जाते हैं।

दंतकथा : दंतकथा के अनुसार परम शिवभक्त रावण ने मृत्यु से बचने के लिए भगवान शिव की ओर से लंका में आत्मलिंग की स्थापना करने का प्रयास किया था। चिंतित होकर, भगवान विष्णु ने एक बूढ़े व्यक्ति का वेश धारण करके हस्तक्षेप किया। उन्होंने रावण को सुला दिया तथा उसके हाथों से शिवलिंग छीन लिया और उसे ज़मीन पर रख दिया। जब रावण जागा, तो उसने पाया कि वह लिंगम को धरती पर छूने के बाद उसे उठा नहीं पा रहा था, जिससे उसकी योजना विफल हो गई। कहा जाता है कि वह लिंगम आज भी वहीं स्थापित है। लोकाख्यान में कहा जाता है कि हम्मीरदेव चौहान ने स्वप्न में अपने इष्टदेव भगवान शिव के दर्शन प्राप्त करने के बाद इस मंदिर का निर्माण कराया था।

इतिहास : श्री कमलेश्वर महादेव का मंदिर प्राचीन इतिहास का गवाह रहा है। यह मंदिर मध्यकालीन युग का तीर्थ स्थल है। यहां अभी दो मंदिर शेष है, जिसमें एक तो पूरी तरह खंडहर में तब्दील हो गया है, जिसे खंडदेवरा के नाम से जाना जाता है। दूसरा मुख्य शिवमंदिर देखने योग्य है। मंदिर के आसपास प्राचीन बस्तियों के अवशेष मौजूद हैं। हम्मीरदेव चौहान के काल के सिक्के भी यहाँ मिले हैं। प्राचीनकाल के मिट्टी के बर्तन और पत्थर के औजार भी यहाँ मिले हैं। पुरा महत्व के अवशेष यहां आदि मानव की तात्कालीन मौजूदगी को भी प्रमाणित करते हैं। सघन वन और चाकन नदी की निकटता इस बात को भी प्रमाणित करती है। मंदिर के दाहिनी ओर पहाड़ी पर एक पत्थर की कार्यशाला है। यहाँ अधूरी मूर्तियाँ और बड़े-बड़े शिलाखंडों पर नक्काशी के पूरे चिह्न हैं। इस क्षेत्र में लौह अयस्क की मौजूदगी के प्रमाण भी बताते हैं कि इसका इस्तेमाल पत्थरों को तराशने में किया जाता होगा।

वास्तुकला : मंदिर की वास्तुकला उस अवधि के दौरान प्रचलित विशिष्ट हिंदू मंदिर वास्तुकला शैली को दर्शाती है। यहां पर पत्थरों को तराश कर विभिन्न मुद्राओं में योग, आसन एवं संगीत कला को विभिन्न मूर्तियों के रुप में दिखाया गया है। मंदिर में विभिन्न देवी-देवताओं की कलात्मक मूर्तियां विराजमान है, जो स्थापत्य कला प्रमुख रूप से आकर्षण का केंद्र बिंदु है तथा उत्कीर्ण मूर्तियां उत्तम स्थापत्य कला की अनुपम उदाहरण है। इन पर जीवन दर्शन को दर्शाती कला को बड़ी बारीकी से पत्थरों पर उकेरा गया है, जिसकी विशेषता नक्काशीदार पत्थर की दीवारें, स्तंभ और पौराणिक रूपांकनों को दर्शाती मूर्तियाँ हैं। मंदिर परिसर में गर्भगृह में भगवान शिव का लिंगम (लिंग प्रतीक) है, जो एक स्तंभित हॉल (मंडप) और एक खुले आंगन से घिरा है। मंदिर की बाहरी दीवारों पर विभिन्न देवताओं को दर्शाती नक्काशी है।

त्यौहार और समारोह : मंदिर पूरे साल धार्मिक उत्सवों और सांस्कृतिक समारोहों का केंद्र है। मंदिर में मनाया जाने वाला सबसे महत्वपूर्ण त्यौहार महाशिवरात्रि है, जिसे भक्त बड़े उत्साह और भक्ति के साथ मनाते हैं, प्रार्थना करते हैं, अनुष्ठान करते हैं और धार्मिक जुलूसों में भाग लेते हैं। महाशिवरात्रि के अलावा, श्रावण मास और अमावस्या से पहले प्रदोष जैसे अन्य त्यौहार भी उत्साह के साथ मनाए जाते हैं, जो भगवान शिव का आशीर्वाद लेने के लिए दूर-दूर से भक्तों को आकर्षित करते हैं।

संरक्षण की आवश्यकता : श्री कमलेश्वर महादेव मंदिर क्षेत्र धार्मिक और पुरा महत्व के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण है। इससे अलग हुई कलात्मक प्रतिमाएं इस क्षेत्र में इधर-उधर बिखरी पड़ी हैं। मंदिर और उसके आस-पास की विरासत संरचनाओं को संरक्षित करने के प्रयास होने चाहिए। 13वीं सदी के इस पौराणिक मंदिर में स्थापत्य कला को देखते हुए पुरातत्व विभाग को इस क्षेत्र और मंदिर को संरक्षित करना चाहिए। अब भी इन्हें संरक्षित नहीं किया गया तो इस कलात्मक धरोहर के नष्ट होने की आशंका है। इसके लिए यहां साइट म्यूजियम बनाया जाना चाहिए, जिससे इधर-उधर बिखरी पड़ी कलात्मक प्रतिमाओं को एक सुरक्षित मुकाम मिल सकेगा। कमलेश्वर महादेव मंदिर परिक्षेत्र रणथंभौर टाइगर रिजर्व एरिया के करीब होने से यहां पर्यटन की अपार संभावनाएं है। इसके पास ही रणथंभौर बाघ परियोजना के पर्यटन क्षेत्र के जोन 9 का प्रवेश द्वार है। इस क्षेत्र में अक्सर टाइगर की मूवमेंट होती रहती है। यहां पर्यटन को विकसित करने के लिए योजनाबद्ध तरीके से काम करने के साथ मूलभूत सुविधाओं के विस्तार की भी ज़रूरत है। इससे यहां पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा औैर पर्यटक इस स्थान की प्राचीन कला से भी रूबरू हो सकेंगे।

ओझल हो रही स्मृति, सिमट रहा इतिहास।
बॉट निहारे पूर्वज, करके हमसे आस।।
©आलेख- दयालसिंह चौहान-सिलारी

#शिव #श्रावण #महादेव #चौहान #हम्मीर #कमलेश्वर #बंूंदी

847 वर्ष प्राचीन शिलालेखस्थान: मेड़ता, नागौर तिथि: संवत् 1236 आश्विन बुदि १ सोमवार= 1179 ई. लिपि: नागरी भाषा: देशज प्रेष...
23/08/2026

847 वर्ष प्राचीन शिलालेख

स्थान: मेड़ता, नागौर
तिथि: संवत् 1236 आश्विन बुदि १ सोमवार= 1179 ई.
लिपि: नागरी
भाषा: देशज
प्रेषक: श्री नरेंद्र जी जसनगर
पठन: मनोज मीना, टोंक एवं श्री दयाल सिंह जी चौहान सिलारी
दिनांक: 8/7/2026

मूलपाठ
संवत् १२३६ आसोज वदि १
सोमिवारे गोवीद पवमां
धांधी लोगतरे गता: ।।
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#शोधसंकलनएवंप्रकाशनपटल





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वरिष्ठ कवि एवं गीतकार श्री दुर्गादान सिंह गौड़ जी के निधन का समाचार अत्यंत दुखद है। साहित्य के क्षेत्र में उनका योगदान अ...
18/08/2026

वरिष्ठ कवि एवं गीतकार श्री दुर्गादान सिंह गौड़ जी के निधन का समाचार अत्यंत दुखद है। साहित्य के क्षेत्र में उनका योगदान अविस्मरणीय रहेगा। राजस्थानी एवं हाड़ौती भाषा-साहित्य को अपनी रचनाओं के माध्यम से उन्होंने समृद्ध किया और इन लोकभाषाओं की सांस्कृतिक विरासत को नई पहचान देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

उनका निधन हाड़ौती क्षेत्र के साथ साहित्य जगत के लिए अपूरणीय क्षति है। ईश्वर दिवंगत आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दें तथा शोकाकुल परिजनों एवं साहित्य प्रेमियों को यह दुःख सहन करने की शक्ति प्रदान करें।

सेव ऑवर हेरिटेज फाउंडेशन।

महानालेश्वर शिव मंदिर एवं मठ - मेनाल एवं चाहमान शासक पृथ्वीराज द्वितीयपवित्र श्रावण मास के तृतीय सोमवार की सभी को शुभकाम...
17/08/2026

महानालेश्वर शिव मंदिर एवं मठ - मेनाल एवं चाहमान शासक पृथ्वीराज द्वितीय

पवित्र श्रावण मास के तृतीय सोमवार की सभी को शुभकामनाऍं..!! आईये आज के इस शुभ पावन पुण्य दिन पर हम सभी श्री महानालेश्वर शिव मंदिर एवं मठ - मेनाल के इतिहास बारे में जानते है। 🔱
ऊँ त्रयम्बकं यजामहे, सुगन्धिं पुष्टिवर्धनं उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मोक्षिय मामृतात्।।
राजस्थान के भीलवाड़ा से 70 किलोमीटर दूर मांडलगढ़ के निकट ऊपर माल पठार के पश्चिमी छोर पर स्थित मेनाल इतिहास, पुरातत्व, पर्यटन, प्रकृति और धार्मिक आस्थाओं का मिलन स्थल है। प्रकृति की खूबसूरत जल तरंगों का अनुपम सौंदर्य, शैव साधना का प्राचीन स्थल और अनसुने इतिहास की गाथाओं का त्रिवेणी संगम है मेनाल के प्राचीन देवालय और मठ। यहां एक बड़ा नाला बहता है जिस कारण यहां बने शिव मंदिर को महानालेश्वर शिव मंदिर कहते हैं। घने वनों में कल कल करती झरनों से गुंजायमान मेनाल एक मुख्य ऐतिहासिक स्थल है। चक्रवर्ती चाहमानो के काल की स्थापत्य और मूर्ति शिल्प से शोभित मेनाल शैव साधना के रहस्यों को छिपाएं हुए हैं। मेनाल शैव धर्म का केंद्र रहा है क्योंकि चौहानों के इष्टदेव भगवान शिव ही है। मेनाल को चाहमानो के बिजोलिया अभिलेखों में महानाल कहा गया है। महानाल का अधिपति यह शिवालय महानालेश्वर के नाम से विख्यात हुआ। महानाल से अपभ्रंश होकर मेनाल पड़ा और यही नाम जग प्रसिद्ध हुआ। मेनाल का मुख्य महानालेश्वर देवालय झरने के एक तरफ मजबूत किले बंदी के अंदर निर्मित है। मुख्य द्वार दो मंजिला ऊंचा है और छतरियों गुम्बद से अलंकृत है। परिसर के अंदर कई खंडित मंदिर है।
भगवान शिव को समर्पित मुख्य महानालेश्वर शिव मंदिर भूमिज शैली में निर्मित है, महानाल शिव मंदिर का निर्माण अजयमेरू के चौहान शासक महाराजा पृथ्वीराज द्वितीय (1167- 1169ई.) द्वारा करवाया गया था, जो जगदेव के पुत्र थे। जगदेव के बाद उनके भाई सम्राट विग्रहराज चतुर्थ और फिर विग्रहराज के पुत्र अपरगांगेय ने शासन किया। धोद में रूठी रानी मंदिर में मिले एक शिलालेख के अनुसार, पृथ्वीराज ने शाकंभरी के राजा को हराया था। इससे संकेत मिलता है कि पृथ्वीराज ने अपरगांगेय को गद्दी से उतार दिया और अजयमेरू के शासक बन गए। बिजौलिया शिलालेख में मेनाल का उल्लेख एक तीर्थ स्थल के रूप में मिलता है। यह विशाल मंदिर पश्चिमाभिमुख् है। मंदिर गर्भगृह, अंतराल और मंडप में विभक्त है। गर्भगृह में शिवलिंग प्रतिष्ठापित है। समय की मार से मंडप की छत क्षतिग्रस्त हैं इसलिए इसे लोहे की खम्बो का सहारा दिया गया है। मंदिर का शिखर उरु श्रृंगो से शोभित कलश आमलक युक्त है। शुकनास पर गज शार्दुल की भव्य प्रतिमा स्थापित है। मंदिर का मंडप समवर्णा शिखर से अलंकृत है। सामने पुन गज शार्दुल की प्रतिमा स्थापित है। मंदिर की दीवार पर गरुड़ पर सवार चतुर्भुज विष्णु की मूर्ति लगी है। मंदिर के एक गर्भगृह, एक अंतराल, समवर्ण छत वाला एक रंगमंडप तथा सामने की ओर नंदी-मंडप स्थित है। मंदिर के सम्मुख मंडप में नंदी की भव्य कलात्मक प्रतिमा स्थापित है। मंदिर की रथिकाओ पर विभिन्न देवी देवताओं, अप्सराये, सामाजिक जीवन, पौराणिक आख्यानों को प्रदर्शित करते शिल्प सुशोभित है। मंदिर के पास ही शैव आचार्यों के निवास हेतू दो मंजिला मठ बना हुआ है। नंदी की पीठ पर एक पंक्ति का लेख लिखा है।
मुख्य मंदिर की उत्तर-पश्चिम दिशा में 2 अन्य लघु मंदिर बने है, जिनका निर्माण लगभग 8वी सदी में हुआ था ये क्रमशः भगवान श्रीगणेश और मातागौरी को समर्पित हैं। यहां की मूर्तियों और अभिलेखों में मेनाल के इतिहास की कई घटनाएं दर्ज है जिसका अपना विशेष महत्व है। चाहमान शासक महाराजाधिराज अर्णोराज का भी 1137 ईस्वी का अभिलेख मेनाल से मिला है। एक अन्य अभिलेख से विदित होता है कि मेनाल के मठ का निर्माण चाहमान शासक पृथ्वीराज द्वितीय के शासनकाल में उनकी रानी सुहिया देवी के निर्देश पर गुरू संत भावब्रह्मा द्वारा 1169 ई. में बनवाया था। मेनाल में शिवालय बना, जिसके लिए महारानी सुहवदेवी के शासनान्तर्गत कायस्थ विल्हेम और उसके भाई धरेश्वर ने पारौली ग्राम की आय में से 20 अजयप्रिय द्रम्मों को प्रतिवर्ष देने की आज्ञा प्रसारित की थी। यह मन्दिर बाद में सुहवेश्वर के नाम ही जाना गया। सुहियादेवी ने धौड़ ग्राम के शिवालय के लिए 1168 ई. में दान का प्रबन्धकर पूजन कार्य को निरन्तरता प्रदान की जिसका उल्लेख इस काल के रूठीरानी के शिवालय के स्तम्भ लेख में है।

महाराजा पृथ्वीराज चौहान द्वितीय (पृथ्वीभट्ट) : इनका जन्म सन 1149 में हुआ था उनका राज्याभिषेक सन 1165 ई में हुआ और वह 1169 ई तक अजयमेरू के शासक रहे। महाराजा पृथ्वीराज चौहान द्वितीय का इतिहास उनके उत्तराधिकारी और प्रसिद्ध शासक पृथ्वीराज तृतीय (रॉय पिथौरा) की तुलना में छोटा रहा है, लेकिन अपने संक्षिप्त शासनकाल में उन्होंने साम्राज्य की रक्षा और विस्तार के लिए महत्वपूर्ण सैन्य कदम उठाए थे।
शिलालेखों और ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार, उनके द्वारा लड़े गए प्रमुख युद्धों और सैन्य अभियानों का विवरण इस प्रकार है:
1. शाकंभरी के राजा (अपरगांगेय) पर विजय: पृथ्वीराज द्वितीय, चाहमान राजा जगदेव के पुत्र थे। राजस्थान के धोद (रुठी रानी मंदिर) से प्राप्त एक शिलालेख के अनुसार, उन्होंने शाकंभरी के तत्कालीन राजा को युद्ध में पराजित किया था। इतिहासकारों का मानना है कि उन्होंने अपने चचेरे भाई 'अपरगांगेय' को सिंहासन से हटाकर चाहमान राजवंश की सत्ता अपने हाथों में ली थी।
2. पश्चिमी मुस्लिम आक्रमणों (गजनवी राजवंश) का प्रतिरोध: पृथ्वीराज द्वितीय के शासनकाल के दौरान भारतवर्ष की पश्चिम सीमा से मुस्लिम आक्रमणों का खतरा लगातार बना हुआ था। तुर्कों के आक्रमण से अपने साम्राज्य की रक्षा करने के लिये उन्होंने हांसी के दुर्ग पर अपना अधिकार सुदृढ कर लिया। सन 1167 ई के हांसी (हरियाणा) के शिलालेख के अनुसार, उन्होंने अपने मामा किलहाना को आशिका किले (आधुनिक हांसी) का प्रभारी नियुक्त किया, ताकि वे उत्तर-पश्चिमी सीमा की मजबूती से रक्षा कर सकें और मुस्लिम आक्रमणकारियों को आगे बढ़ने से रोक सकें। वे 'हम्मीर' (उस समय लाहौर के गजनवी शासक खुसरो मलिक) के आक्रमणों को लेकर बेहद सतर्क थे। पृथ्वीराज द्वितीय ने लाहौर के तुर्क शासक खुसरू मलिक को पराजित किया था।

3. पंचपुर के शासक पर विजय: हांसी के शिलालेख से ही यह भी पता चलता है कि पृथ्वीराज द्वितीय के निर्देश पर उनके सेनापति/मामा किल्हण ने 'पंचपुर' (जिसकी पहचान आधुनिक पिंजौर से की जाती है) नामक शहर पर हमला कर उसे जला दिया था। पंचपुर का राजा इस सैन्य कार्रवाई से भयभीत हो गया और उसने आत्मसमर्पण करते हुए पृथ्वीराज द्वितीय की अधीनता स्वीकार कर ली। उपहार स्वरूप उसने राजा को एक अत्यंत मूल्यवान मोतियों का हार भी भेंट किया था।
4. राजा वसंतपाल पर विजय: बिजोलिया के शिलालेख के अनुसार, पृथ्वीराज द्वितीय ने 'वसंतपाल' नाम के एक शासक को युद्ध या कूटनीति के माध्यम से अपने वश में किया था। इस विजय के प्रतीक स्वरूप उन्होंने वसंतपाल से 'मनःसिद्धिकारी' नाम का एक प्रसिद्ध हाथी प्राप्त किया था। डॉ दशरथ शर्मा इस वसंतपाल की पहचान ललित-विग्रहराज नाटक में वर्णित एक राजा से करते हैं। इस नाटक के अनुसार, वसंतपाल विग्रहराज की प्रेमिका देसलदेवी के पिता थे। शर्मा का मानना है कि अपरगांगेय देसलदेवी के पुत्र थे। इस प्रकार, वसंतपाल संभवतः पृथ्वीराज का शत्रु था और उनके अधीन था।

वंशज: पृथ्वीराज द्वितीय का कोई पुत्र (उत्तराधिकारी) नहीं था, जिसके कारण उनकी मृत्यु के बाद उनके चाचा सोमेश्वर (जो कि प्रसिद्ध सम्राट पृथ्वीराज चौहान तृतीय के पिता थे) अजमेर के सिंहासन पर बैठे। महाराजा पृथ्वीराज द्वितीय का शासनकाल मुख्य रूप से आंतरिक विद्रोहों को शांत करने और पंजाब की तरफ से आ रहे गजनवी शासकों से अपने राज्य की सीमाओं को सुरक्षित रखने में बीता था। उनका शासन काल 1165 से 1169 ई तक रहा है। पृथ्वीराज द्वितीय की मृत्यु संभवतः उत्तराधिकारहीन हुई, जिसके कारण उनके चाचा सोमेश्वर चौहान ने उनका उत्तराधिकार ग्रहण किया, जो भारतेश्वर सम्राट पृथ्वीराज चौहान तृतीय के पिता थे।

ओझल हो रही स्मृति, सिमट रहा इतिहास।
बॉट निहारे पूर्वज, करके हमसे आस।।
© आलेख- दयालसिंह चौहान-सिलारी

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🙏 जय श्री चारभुजा की🙏           " मूल  पाठ "[श्रीरामजी]१•सबत१७८१ मीती त्र्प्रसोज २•सुदी५ क दीन राजश्री नरसी-३•घदासजी काम...
16/08/2026

🙏 जय श्री चारभुजा की🙏
" मूल पाठ "[श्रीरामजी]
१•सबत१७८१ मीती त्र्प्रसोज
२•सुदी५ क दीन राजश्री नरसी-
३•घदासजी कामी त्र्प्रया जाती जग-
४•मालोत:सबत १७८६ क मीती चत
५•सुदी३ क दीन दवली चौडी राजश्री
६•रामचदजा चौडी नरसघ दासजी
७• जजर
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" अनुवाद "[श्री रामजी]
१•सम्वत १७८१ मिती आसोज
२•सुदी ५ के दिन राजश्री नरसिंग
३•दासजी काम आया,जाति[नख]
४•जगमालोत मेड़तिया,सम्वत १७८६
५•का मिती चैत्र सुदी३ के दिन
६•राजश्री रामचन्द्र जी,ने नरसिंगदासजी
७• झुंझार की देवळी चढ़ाई
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टिप्पणी@-राव वीरमदेव मेड़ता के पुत्र जगमाल की सन्तति जगमालोत मेड़तिया कहलाए। जगमालोत मेड़तियों का पाटवी ठिकाना मसूदा रहा।ढिगाल में जगमालोत मेड़तिया निवासरत हैं।
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लेख पठन ••संग्राम सिंह गिंगालिया
प्रेषण +गूगल लोकेशन •भवानी सिंह गेलासर
गाँव•ढिगाल[माताजी के मन्दिर के पास]ग्रा•पं•बेड़वा
तहसील ••मोलासर,जिला••डीडवाना-कुचामन
दिनांक ३०•०६•२६,मंगलवार[शि•सं•1092]
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#शोधसंकलनएवंप्रकाशनपटल





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मयूर छतरी से बदलेगी बूंदी की पर्यटन तस्वीर।350 साल पुरानी विरासत को मिलेगा नया जीवन; बायोलॉजिकल पार्क, ‘वन वीर भूमि’ और ...
11/08/2026

मयूर छतरी से बदलेगी बूंदी की पर्यटन तस्वीर।

350 साल पुरानी विरासत को मिलेगा नया जीवन; बायोलॉजिकल पार्क, ‘वन वीर भूमि’ और एडवेंचर टूरिज्म का बनेगा संगम

बूंदी। बूंदी की पहाड़ियों पर इतिहास की गवाही देती करीब साढ़े तीन सौ साल पुरानी मयूर छतरी अब केवल अतीत की स्मृति बनकर नहीं रहेगी। इसे आने वाले समय में विरासत, प्रकृति, पर्यावरण और रोमांच के अनूठे संगम के रूप में विकसित करने की तैयारी है।

बूंदी बाईपास स्थित ऐतिहासिक मयूर छतरी को नया स्वरूप देने की दिशा में जिला प्रशासन ने कदम बढ़ाया है। रविवार को जिला कलक्टर हरफूल सिंह यादव और पुलिस अधीक्षक अवनीश कुमार शर्मा ने ‘सेव आवर हेरिटेज फाउंडेशन’ की टीम के साथ मौके का निरीक्षण किया। इस दौरान मयूर छतरी और इसके आसपास के क्षेत्र के समग्र विकास को लेकर कई महत्वाकांक्षी प्रस्तावों पर चर्चा हुई।

इतिहास की छतरी, भविष्य की नई पहचान

ऐतिहासिक जानकारी के अनुसार मयूर छतरी का निर्माण 17 वीं शताब्दी के अंत में राव भाव सिंह के शासनकाल में मयूर कंवर ने अपने पति महाराव छत्रसाल सिंह की स्मृति में करवाया था।

समय के साथ यह ऐतिहासिक स्थल उपेक्षा और सीमित पहुंच के कारण पर्यटन के मुख्य मानचित्र से दूर होता गया। अब प्रस्तावित विकास योजना के जरिए इसे फिर से बूंदी की पहचान के केंद्र में लाने का प्रयास किया जा रहा है।

‘सेव आवर हेरिटेज फाउंडेशन’ के अध्यक्ष अरिहंत सिंह चरड़ास ने निरीक्षण के दौरान मयूर छतरी के संरक्षण एवं विकास की विस्तृत कार्ययोजना जिला प्रशासन के समक्ष रखी।

जहां विरासत के साथ गूंजेगा वन वीरों का सम्मान।

मयूर छतरी परिसर को केवल पर्यटन स्थल बनाने के बजाय इसे पर्यावरण संरक्षण और वनकर्मियों के बलिदान से जोड़ने की अनूठी योजना है।

वन एवं वन्यजीवों की रक्षा करते हुए अपने प्राण न्योछावर करने वाले वनकर्मियों की स्मृति में परिसर को ‘वन वीर भूमि’ के रूप में विकसित करने का प्रस्ताव रखा गया है।

यह स्थान आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश देगा कि जंगल और वन्यजीवों की रक्षा केवल एक सरकारी जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।

परिसर में लगभग 100 फीट ऊंचा राष्ट्रीय ध्वज स्थापित करने का प्रस्ताव भी है, जो मयूर छतरी की पहाड़ी से बूंदी के लिए गौरव और राष्ट्रभावना का प्रतीक बन सकेगा।

बायोलॉजिकल पार्क से प्रकृति और पर्यटन का संगम।

मयूर छतरी के आसपास के क्षेत्र को बायोलॉजिकल पार्क के रूप में विकसित करने की संभावनाओं पर भी चर्चा हुई। यदि यह योजना साकार होती है तो ऐतिहासिक स्थापत्य और प्राकृतिक जैव विविधता एक ही परिसर में पर्यटकों को आकर्षित करेगी।

इससे मयूर छतरी क्षेत्र को बूंदी के पारंपरिक किला-हवेली पर्यटन से आगे बढ़ाकर नेचर एवं हेरिटेज टूरिज्म का नया केंद्र बनाया जा सकेगा।

आसमान में उड़ान, पहाड़ियों पर रोमांच।

मयूर छतरी के विकास की योजना में रोमांच और साहसिक पर्यटन को भी महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है।

पर्यटकों की पहुंच आसान बनाने के लिए हेरिटेज ट्रैक, क्षेत्र में एविएशन एडवेंचर स्पोर्ट्स को बढ़ावा देने तथा पावर पैराग्लाइडिंग बेस विकसित करने जैसे प्रस्ताव सामने आए हैं।

यदि इन प्रस्तावों को स्वीकृति मिलती है तो पर्यटक एक ही स्थान पर बूंदी के इतिहास को देखने के साथ-साथ पहाड़ियों, प्रकृति और आसमान के रोमांच का अनुभव भी कर सकेंगे।

अब बूंदी की हर छतरी और हवेली का बनेगा डिजिटल रिकॉर्ड।

निरीक्षण के दौरान जिला कलक्टर हरफूल सिंह यादव ने बूंदी की अन्य ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण को लेकर भी महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश दिए।

उन्होंने जिले की प्राचीन छतरियों और हेरिटेज हवेलियों की जियो टैगिंग कराने तथा प्रत्येक धरोहर की वर्तमान स्थिति का विस्तृत दस्तावेजीकरण तैयार करने के निर्देश दिए।

यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि बूंदी में अनेक ऐतिहासिक संरचनाएं शहर और ग्रामीण क्षेत्रों में बिखरी हुई हैं। उनका डिजिटल रिकॉर्ड तैयार होने से भविष्य में इनके संरक्षण, जीर्णोद्धार और पर्यटन विकास की योजनाओं को वैज्ञानिक आधार मिल सकेगा।

एक छतरी से शुरू हो सकती है बड़ी विरासत यात्रा।

मयूर छतरी का प्रस्तावित विकास केवल एक स्मारक के जीर्णोद्धार की कहानी नहीं है। यह बूंदी की विरासत को संरक्षण से विकास और विकास से पर्यटन तक ले जाने की एक व्यापक सोच है।

यदि प्रस्तावित योजना धरातल पर उतरती है तो मयूर छतरी बूंदी के पर्यटन मानचित्र पर एक ऐसा नया अध्याय जोड़ सकती है, जहां इतिहास दिखाई देगा, प्रकृति सांस लेगी, वन वीरों का सम्मान होगा और रोमांच आसमान तक पहुंचेगा।

यही वह मॉडल हो सकता है जिसके माध्यम से बूंदी की उपेक्षित विरासतें आने वाले समय में संरक्षित भी हों और स्थानीय अर्थव्यवस्था की ताकत भी बनें।

निरीक्षण के दौरान ‘सेव आवर हेरिटेज फाउंडेशन’ की टीम से शैलेन्द्र चौधरी, एडवोकेट अजय नुवाल, नारायण मंडोवरा, हिमांशु सिंह, राजेन्द्र सिंह, मनीष सिंह, जितेन्द्र मोदी, अमर सिंह, अर्जुन यादव, नवीन नागर, प्रसून बाहेती एवं अतुल्यदेव सिंह चरड़ास सहित अन्य सदस्य मौजूद रहे।

जय मां भारती,

सेव ऑवर हेरिटेज फाउंडेशन।

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