28/08/2026
रक्षाबंधन: प्रेम और विश्वास का पवित्र बंधन
©आलेख- दयालसिंह चौहान-सिलारी
रक्षाबंधन सनातन धर्म का एक महत्वपूर्ण त्योहार है जो भाई-बहन के पवित्र रिश्ते का प्रतीक है। यह त्योहार श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस दिन बहनें अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांधती हैं तथा भाई के सुदीर्घ जीवन की मंगल-कामना करती है और भाई अपनी बहन के मान-सम्मान की रक्षा का वचन देते हैं। रक्षा-बंधन का पर्व कुछ स्थानों पर रक्षासूत्र के नाम से भी जाना जाता है। प्राचीन काल से यह पर्व भाई-बहन के निश्चल स्नेह के प्रतीक के रुप में मनाया जाता है। हमारे यहां सभी पर्व किसी न किसी कथा, दंत कथा या किवदन्ती से जुड़े हुए है। रक्षाबंधन का पर्व भी ऐसी ही कुछ कथाओं से संबन्धित है। रक्षाबंधन क्यों मनाया जाता है, हजारों साल पुराना है रक्षाबंधन का इतिहास यह जानने का प्रयास करते है।
रक्षाबंधन मनाने का पौराणिक आधार राजा बलि और माता लक्ष्मी की कथा: पुराणों के अनुसार रक्षा बंधन पर्व लक्ष्मी जी का राजा बली को राखी बांधने से जुड़ा हुआ है। स्कंद पुराण, पद्मपुराण और श्रीमद्भागवत में वामनावतार कथा में रक्षाबंधन का प्रसंग मिलता है। राजा बलि ने विश्वजित् और 100 अश्वमेध यज्ञों का संपादन कर तीनों लोकों पर अधिकार जमा लिया। लोक मान्यता है कि इन 100 यज्ञों में से 5 यज्ञ राजा बलि ने जोधपुर जिले के बिलाड़ा कस्बे के पास स्थित पिचियाक गांव में सम्पन्न किए थे। दानवेंद्र राजा बलि कालांतर में जब अंतिम अश्वमेघ यज्ञ का समापन कर रहे थे, तब बलि का अहंकार चूर करने के लिए भगवान विष्णु ने वामन अवतार लिया और राजा बलि के यहां भिक्षा मांगने पहुंच गये। शुक्राचार्य के सावधान करने पर भी राजा बलि दान से विमुख न हुआ। वामन ने तीन पग भूमि दान में माँगी, बलि अपने वचन पर अडिग रहते हुए तीन पग भूमि दान में दे दी। विशाल रूप धारण कर प्रथम दो पगों में पृथ्वी और आकाश को नाप लिया। अभी तीसरा पैर रखना शेष था, बलि के सामने संकट उत्पन्न हो गया। ऐसे में राजा बलि अपना वचन नहीं निभाते तो अधर्म होगा यह सोचकर आखिरकार उन्होंने अपना सिर भगवान के आगे कर दिया और कहां तीसरा पग आप मेरे सिर पर रख दीजिए। वामन भगवान ने ठीक वैसा ही किया, श्री विष्णु के पैर रखते ही, राजा बलि पाताल लोक में पहुंच गया। राजा बलि के द्वारा वचन का पालन करने पर भगवान विष्णु अत्यन्त प्रसन्न हुए, उन्होंने आग्रह किया कि राजा बलि उनसे कुछ मांग लें। इसके बदले में बलि ने पाताल लोक में रात दिन भगवान को अपने सामने रहने का वचन मांग लिया। विष्णुजी ने वरदान दे दिया और वह उनके साथ रहने लगे। दूसरी ओर, मां लक्ष्मी भगवान विष्णु के वापस लौटने का इंतजार कर रही थी। भगवान को वापस लाने के लिए नारद ने लक्ष्मीजी को एक उपाय बताया। मां लक्ष्मी एक गरीब महिला के रूप में राजा बलि के पास पहुंची और उन्हें राखी बांध दी। राखी के बदले राजा ने कुछ भी मांग लेने को कहा। मां लक्ष्मी तुरंत प्रकट हुई और उन्होंने विष्णु जी को मुक्त करने का वचन लिया। राखी का मान रखते हुए राजा बलि ने भगवान विष्णु को वापस लक्ष्मीजी के साथ भेज दिया। जिस दिन का यह प्रसंग है, उस दिन श्रावण मास की पूर्णिमा थी। उस दिन से ही रक्षा बंधन का पर्व मनाया जाने लगा। सनातन धर्म के सभी धार्मिक अनुष्ठानों में रक्षासूत्र बाँधते समय या रक्षाबंधन में राखी बांधते वक्त या किसी मंगल कार्य में मौली बांधते वक्त यह स्वस्तिवाचन किया (यह श्लोक रक्षाबन्धन का अभीष्ट मन्त्र है) -
येन बद्धो बलि: राजा दानवेन्द्रो महाबल: ।
तेन त्वामभिबध्नामि रक्षे मा चल मा चल ।।
इस श्लोक का हिन्दी भावार्थ है- "जिस रक्षासूत्र से महान शक्तिशाली दानवेन्द्र राजा बलि को बाँधा गया था, उसी सूत्र से मैं तुझे बाँधता हूँ। हे रक्षे (राखी)! तुम अडिग रहना (तू अपने संकल्प से कभी भी विचलित न हो।)"
यमुना और यमराज: शास्त्रों में रक्षाबंधन के संदर्भ में मृत्यु के देवता भगवान यम और उनकी बहन यमुना का एक प्रसंग मिलता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार यमराज और यमुना जी भगवान सूर्य देव की संतान है। यमुना जी बहन के रूप में अपने भाई यम से स्नेह पाना चाहती थी। कहते है इसीलिए यमुना जी ने एक बार यमराज की कलाई पर धागा बांधा था। भगवान यम, यमुना की इस बात से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने यमुना की रक्षा का वचन देने के साथ ही यमुना को अमरता का वरदान भी दे दिया। यमराज जी ने अपनी बहन यमुना को यह भी वचन दिया कि जो भी बहन सावन की पूर्णिमा के दिन अपने भाई को शुभ मुहूर्त में राखी/रक्षा सूत्र बांधेगी और भाई अपनी बहन की मदद के लिए वचन देगा, उसका कल्याण होगा और वह उसे लंबी आयु का वरदान देंगे, उससे अकाल मृत्यु दूर रहेगी।
एक अन्य पौराणिक कथा पुराणों के अनुसार: पौराणिक कथाओं के अनुसार, देवताओं और असुरों में भीषण युद्ध चल रहा था और राक्षसों से देवताओं की सेना को पराजय का सामना करना पड़ रहा था। यह देख इंद्रदेव की पत्नी शचि(इंद्राणी) को अपने पति और देवताओं की चिंता होने लगी। उन्होंने कठोर जप-तप किया और एक रक्षासूत्र बनाया। धार्मिक मान्यता है कि शचि ने यह रक्षासूत्र अपने पति इंद्र की कलाई पर बांधा, जिसके बाद राक्षसों को पराजित करने की शक्ति प्राप्ति हुई। जिस दिन यह रक्षासूत्र बांधा गया उस दिन श्रावण पूर्णिमा का दिन था। उसी दिन से ही श्रावण पूर्णिमा के दिन रक्षासूत्र बांधने की प्रथा चली आ रही है।
महाभारत में द्रौपदी का श्री कृष्ण को राखी बांधना: राखी का यह पर्व पुराणों से होता हुआ, महाभारत अर्थात द्वापर युग में गया और आज आधुनिक काल में भी इस पर्व का महत्व कम नहीं हुआ है। राखी से जुड़ा हुआ एक प्रसंग महाभारत में भी आता है। शिशुपाल का वध करने के बाद जब श्रीकृष्ण की अंगुली पर सुदर्शन चक्र वापस बैठने के लिए लौटने लगा तो कृष्णजी की तर्जनी अंगुली पर चोट लग गई। ऐसे में द्रौपदी ने तुरंत साड़ी का पल्लू फाड़कर कृष्णजी की अंगुली पर बांध दिया। भगवान कृष्ण इससे बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने द्रौपदी की जीवनभर रक्षा करने का वचन दिया। इसी ऋण को चुकाने के लिये श्री कृष्ण ने चीर हरण के समय द्रौपदी की लाज बचाकर इस ऋण को चुकाया था। यह घटना जिस दिन घटित हुई उस दिन भी श्रावण मास की पूर्णिमा थी।
रक्षा बंधन का सामाजिक आधार: क्षत्रिय (राजपूत) जब लड़ाई पर जाते थे तब महिलाएँ उनको माथे पर कुमकुम तिलक लगाने के साथ साथ हाथ में रेशमी धागा बाँधती थी, इस विश्वास के साथ कि यह धागा उन्हें विजयश्री के साथ सुरक्षित वापस ले आयेगा। राजस्थान में इस दिन रामराखी और चूड़ा राखी बांधने की परम्परा है। राम राखी केवल भगवान, देवपुरुषों और झुंझारो को ही बांधी जाती है व चूड़ा राखी केवल भाभी की चूड़ियों में ही बांधी जाती है। क्षत्रियों के घरों में रेशमी डोरे से बनी यह राखी तलवारों व शस्त्रों को भी बांधी जाती हैं।
रक्षाबंधन पर्व के संबंध में राजस्थान में निम्न पंक्तियां प्रसिद्ध हैं -
करू स्मरण मात भवानी रो, सिंवरु पांचू देव।
हाथ खांडो करे रुखाली, मुलखे बीरो सदैव।।
पेली राखी शमशिर री, रेवे बीरें रे सँग सदैव।
दूजी राखी कुल रा वीर री, हिम्मत थरपे देव।।
तीजी राखी जामण जाया री, निरखे दुनिया सदैव।
चौथी राखी भूमि अर नीर री, ध्यान धरे सदैव।।
रक्षाबंधन का धार्मिक आधार व अन्य रुप : भारत में स्थान बदलने के साथ ही पर्व को मनाने की परम्परा भी बदल जाती है, यही कारण है कि तमिलनाडू, केरल और उडीसा के दक्षिण में इसे अवनि अवितम के रुप में मनाया जाता है, महाराष्ट्र में यह त्योहार नारियल पूर्णिमा के नाम से विख्यात है। इस दिन लोग नदी या समुद्र के तट पर जाकर अपने जनेऊ बदलते हैं और समुद्र की पूजा करते हैं। उत्तरांचल में इसे श्रावणी कहते हैं। इस दिन यजुर्वेदी द्विजों का उपकर्म होता है। उत्सर्जन, स्नान-विधि, ऋषि-तर्पणादि करके नवीन यज्ञोपवीत धारण किया जाता है। रक्षाबंधन से पहले तक ठाकुरजी झुले में दर्शन देते है, परन्तु रक्षा बंधन के दिन से ये दर्शन समाप्त होते है। अमरनाथ की अतिविख्यात धार्मिक यात्रा गुरु पूर्णिमा से प्रारम्भ होकर रक्षाबन्धन के दिन सम्पूर्ण होती है। भाई-बहनों में परस्पर अपार स्नेह और प्रेम की उत्तरोत्तर वृद्धि हो, जीवन में शुभत्व, मंगल एवं आनंद के दीप देदीप्यमान रहें। रक्षाबंधन पर्व की आप सभी को हार्दिक बधाई एवं मंगल शुभकामनाएं।
ओझल हो रही स्मृति, सिमट रहा इतिहास।
बॉट निहारे पूर्वज, करके हमसे आस।।
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