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"होरा में नवम भाव और भाग्यभारतीय का शास्त्रीय विश्लेषण" ✓•१. भूमिका: भारतीय ज्योतिष परम्परा में भाग्य (Fortune / Destiny...
16/12/2025

"होरा में नवम भाव और भाग्यभारतीय का शास्त्रीय विश्लेषण"

✓•१. भूमिका: भारतीय ज्योतिष परम्परा में भाग्य (Fortune / Destiny) केवल संयोग या आकस्मिक घटना नहीं है, अपितु यह पूर्वकृत कर्मों का फल है, जो वर्तमान जीवन में विविध भावों के माध्यम से प्रकट होता है। होरा-शास्त्र में नवम भाव को सर्वसम्मति से भाग्य-भाव माना गया है। यह भाव धर्म, पुण्य, गुरु, पिता, दीर्घ यात्रा, तीर्थ, आस्था, ईश्वरकृपा तथा जीवन में अदृश्य सहायता के स्रोतों का प्रतिनिधित्व करता है।

“धर्मभाग्यपितॄणां च नवमं भावमाचरेत्।”
( बृहत्पाराशर होरा शास्त्र)
यह शोधप्रबंध नवम भाव की अवधारणा को दार्शनिक, कर्म-सिद्धान्त, ग्रह-फल, दृष्टि-युति, नवांश, दशा तथा व्यावहारिक फलादेश के स्तर पर स्पष्ट करता है।

✓•२. होरा-शास्त्र में ‘भाव’ की संकल्पना:
‘भाव’ शब्द संस्कृत धातु भू (होना, प्रकट होना) से निष्पन्न है। ज्योतिष में भाव वह क्षेत्र है जहाँ कर्म फल के रूप में व्यक्त होता है।

पराशर ऋषि कहते हैं—
“भावा एव फलं प्रोक्तं ग्रहाः कारणरूपिणः।”
( बृहत्पाराशर होरा शास्त्र)
अर्थात् फल का वास्तविक क्षेत्र भाव है और ग्रह केवल उसके कारण (निमित्त) हैं। इस दृष्टि से नवम भाव भाग्य-फल का क्षेत्र है।

✓•३. नवम भाव की मूल संकल्पना:
नवम भाव को निम्न नामों से जाना गया है—
•धर्म भाव
•भाग्य भाव
•पुण्य भाव
•गुरु भाव
•पितृ भाव
पराशर, वराहमिहिर, कल्याणवर्मा और मन्थेश्वर — सभी आचार्यों ने नवम भाव को सर्वाधिक शुभ भावों में रखा है।
“नवमं धर्मभाग्यं च गुरुभावं प्रकीर्तितम्।”
(सारावली)

✓•४. भाग्य की दार्शनिक पृष्ठभूमि:

✓•४.१ कर्म और भाग्य:
भारतीय दर्शन में भाग्य कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं है। यह संचित कर्म का परिणाम है।

•संचित कर्म → नवम भाव
•प्रारब्ध कर्म → लग्न
•क्रियमाण कर्म → दशम भाव

“पूर्वजन्मकृतं कर्म तद्भाग्यं इति कथ्यते।”
( बृहत्जातक टीका परम्परा)
अतः नवम भाव व्यक्ति के पूर्व जन्मों के पुण्य-संस्कारों का द्योतक है।

✓•५. नवम भाव के कारक तत्त्व:
नवम भाव निम्न विषयों का द्योतक है—
•१. भाग्य
•२. धर्म और नैतिकता
•३. गुरु और उपदेश
•४. पिता और पितृकृपा
•५. तीर्थ और दीर्घ यात्राएँ
•६. उच्च शिक्षा
•७. ईश्वर में आस्था
•८. जीवन में अदृश्य संरक्षण

✓•६. नवम भाव और गुरु (बृहस्पति):
गुरु नवम भाव का प्राकृतिक कारक (Natural Significator) है।

Pt. Chiranjiv Sharma+91 70098 10722
10/06/2025

Pt. Chiranjiv Sharma
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4.8 ★ · Astrologer

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10/06/2025

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ऐश्वर्य कामना प्राप्ति पूजा
श्रीविद्या उपासना ( 14 )

भोग और मोक्ष कामना विधान

महाविद्या के मंत्र और पूजा विधान सिर्फ दीक्षित हुवे उपासको को ही दिए जाते है , पर हरेक धर्मपरेमिओ को भी महामाया त्रिपुरसुंदरी की उपासना का अधिकार है । जीवमात्र महात्रिपुर सुंदरी के ही संतान है । महामाया की ये श्रेष्ठ पूजा द्वारा हरकोई धन वैभव सुख सम्पति प्राप्त करे और जीव मोक्षगामी बने इस हेतु सर ये विधान दे रहे है । ये ये विधान उपासना हरकोई कर सकते है । हमारे ऋषिमुनियो ने अनेक अविष्कार किये और लोगो के कल्याण केलिए प्रसिद्ध कर दिए वही साधु का धर्म है ।

श्री विद्या साधना" भगवान श्री शिव जी की दूसरी प्रणाली एवं अर्धागनी कही जाती हैं.. "श्री विद्या साधना" 16 कलाओं से परिपूर्ण हैं! इसलिए इनका नाम श्री विद्या,त्रिपुर- सुंदरी,त्रिपुर- मालिनी या ‘षोडशी’ भी है। ये चार पायों से युक्त हैं जिनके नीचे ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर पाया बन जिस सिंहासन को अपने मस्तक पर विराजमान किए हैं उसके ऊपर सदा शिव लेटे हुए हैं और उनकी नाभी से एक कमल जो खिलता है, उस पर ये त्रिपुरा विराजमान हैं। सैकड़ों पूर्वजन्म के पुण्य प्रभाव और गुरु कृपा से इनका मंत्र मिल पाता है। किसी भी ग्रह, दोष, या कोई भी अशुभ प्रभाव इनके भक्त पर नहीं हो पाता।

श्रीयंत्र का पूजन सभी के वश की बात नहीं है। कालिका पुराण के अनुसार एक बार पार्वती जी ने भगवान शंकर से पूछा, ‘भगवन! आपके द्वारा वर्णित तंत्र शास्त्र की साधना से जीव के आधि-व्याधि, शोक संताप, दीनता-हीनता तो दूर हो जाएगी, किन्तु गर्भवास और मरण के असह्य दुख की निवृत्ति और मोक्ष पद की प्राप्ति का कोई सरल उपाय बताइए।’ तब पार्वती जी के अनुरोध पर भगवान शंकर ने त्रिपुर सुन्दरी श्रीविद्या साधना-प्रणाली को प्रकट किया। "भैरवयामल और शक्तिलहरी" में त्रिपुर सुन्दरी उपासना का विस्तृत वर्णन मिलता है। ऋषि दुर्वासा आपके परम आराधक थे। इनकी उपासना "श्री चक्र" में होती है। आदिगुरू शंकरचार्य ने भी अपने ग्रन्थ सौन्दर्यलहरी में त्रिपुर सुन्दरी श्रीविद्या की बड़ी सरस स्तुति की है। कहा जाता है भगवती त्रिपुर सुन्दरी के आशीर्वाद से साधक को भोग और मोक्ष दोनों सहज उपलब्ध हो जाते हैं।

शाम सुर्यास्त से एक घंटा पूजा घर में उत्तरमुखी होकर गुलाबी रंग के आसन पर बैठ जाएं। अपने सामने लकड़ी के पट्टे पर गुलाबी वस्त्र बिछाकर उस पर महात्रिपुर सुन्दरी का चित्र और श्री यंत्र को विराजमान करें। दाएं हाथ में जल लेकर संकल्प करें तत्पश्चात हाथ जोड़कर महात्रिपुर सुन्दरी का ध्यान करें।

ध्यानमंत्र : सा काली द्विविद्या प्रोक्ता श्यामा रक्ता प्रभेदत:। श्यामा तु दक्षिणा प्रोक्ता रक्ता श्री सुन्दरी मता।।

देवी महात्रिपुर सुन्दरी की विभिन्न प्रकार से पूजा करें। आटे से बना चौमुखी शुद्ध घी का दीपक जलाएं। देवी पर गुलाल चढ़ाएं। देवी पर गुलाब के फूल चढ़ाएं। खुशबूदार धूप जलाएं और इत्र अर्पित करें। काजू व मावे से बने मिष्ठान का भोग लगाएं। तत्पश्चात बाएं हाथ मे कमलगट्टे लेकर दाएं हाथ से स्फटिक की माला से देवी के इस अदभूत मंत्र का 11 माला का जाप करें।

मंत्र: ॐ ह्रीं महालक्ष्मये नमः

पूजा विधान :-

किसी भी शुक्रवार को सूर्यास्त समय स्नान करके उत्तर मुख आसन पर बैठे ।

1 आसन पूजा - भूमि को स्पर्श करते हुवे मनमे एक गायत्री मंत्र पढ़े ।
2 देह शुद्धि - दाएं हाथमे जल लेकर तीन आचमन करे । ॐ भु: स्वाहा
ॐ भुव: स्वाहा
ॐ स्व: स्वाहा
आचमन करके हाथ धो लीजिये

3 प्राणायाम - मूलमंत्र से ( यहां मूल मंत्र ॐ ह्रीं महालक्ष्मये नमः ) तीन प्राणायाम करे । नाक के दाएं छिद्र से एक मंत्र मनमे पढ़ते हुवे स्वास खिंचे । चार मंत्र मनमे पढ़े तबतक स्वास को रोके । फिर मनमे दो मंत्र पढ़ते पढ़ते नाक के बाएं छिद्र से स्वास छोड़े । अब उल्टा करे , नाक के बाएं छिद्र से मनमे एक मंत्र पढ़ते हुवे स्वास खिंचे । मनमे चार मंत्र पढ़े तबतक स्वास रोके । फिर नाक के दाएं छिद्र से मनमे दो मंत्र पढ़ते हुवे स्वास छोड़े । ये एक प्राणायाम हुवा ,ऐसे तीन प्राणायाम करे और हाथ धो ले ।

4 अब आंखे बंद करके गुरु गणपति ओर कुलदेवी का ध्यान करे ।

5 संकल्प - हाथमे जल की चमच भरे ओर महामाया की पूजा का संकल्प करे
में ( आपका नाम गोत्र ) अध्यदिने ( उसदिन की तिथि ) ( गांव शहर का नाम ) स्थिते महात्रिपुर सुंदरी महालक्ष्मी प्रीत्यर्थे यथामति अनुसार जप पूजा करिष्ये ।ऐसे संकल्प बोलकर जल भगवती के शरणमे छोड़े ।

5 स्थापन - बाजोठ ( लकड़ी की पाट ) पर गुलाबी वस्त्र बिछाए । हल्दी केशर मिश्रित अक्षत बाजठ पर रखे और उनपर त्रिपुरसुंदरी की एक फोटो तस्वीर स्थापित करे । ओर श्रीयंत्र अक्षत की ढगली पर स्थापित करे ।

6 आवाहन - आंखे बंद करके महामाया का ध्यान करे। ध्यान मंत्र पढ़े । और मनोमन भगवती को आवाहन करे ।

7 आसन :- हाथमे थोड़े अक्षत ओर फूल लेकर भगवती को आसन देने की भावना करे । फूल और अक्षत तस्वीर के पास छोड़े ।

8 प्रक्षाल - हाथमे जल का चमच रखे और महामाया के हाथ और चरण धोने के भाव करे और जल तस्वीर के पास छोड़े ।

9 आवर्तन :- हाथमे एक सुगंधित पुष्प ले और भगवती को अर्पण करें ।

10 स्नान - अभिषेक :- एक पात्रमे श्रीयंत्र को रखे और प्रथम जल से फिर पंचामृत से , इत्र ओर पुष्प से ओर फिर जलसे अभिषेक करें । मूल मंत्र का जाप करते हुवे अभिषेक करें । स्वच्छ वस्त्र से श्रीयंत्र को साफ करके फिरसे बाजठ पर स्थापन करे ।

11 वस्त्रांलंकार ;- चंदन ओर कूम कूम का श्रीयंत्र ओर तस्वीर को तिलक करें । और भगवती की तस्वीर पर गुलाबी वस्त्र अर्पण कर केशर मिश्र अक्षत धरे । गुलाब , चमेली , कनेर बिगैरे सुगन्दीत पुष्प ओर पुष्पमाला अर्पण करें।

12 धूप- दीप :- भगवती की दायी तरफ गाय के घी का ओर बायीं तरफ चमेली के तेल का दीपक जलाएं ओर सुगन्दीत धूप करे ।

13 नैवेद्य - प्रसाद :- गाय के दुग्धमे केशर साकर चावल से बनाई क्षीर , बेसनमें बनाई मिठाई ओर सुका मेवा का प्रसाद धरे । आंखे बंद करे और भगवती को प्रसाद ग्रहण करने की भावना करे और शुद्ध पात्रमे जल अर्पण करें ।

14 मुखवास : भगवती को फल अर्पण कर , इलाइची , लोंग वाला पान बीड़ा अर्पण करे ।

15 दक्षिणा :- यथाशक्ति दक्षिणा अर्पण करे ।

16 आरती :- आटे से बना चौमुखी दीपक जलाये ओर ध्वनिनाद सह भगवती की आरती उतारे । ओर पुष्पांजलि अर्पित करे ।

17 क्षमापना :- आंखे बंद करके भगवती से प्राथना करे कि मुज अबुध से आपकी पूजा अर्चना मे कोई क्षति हुई हो तो हमे क्षमा करें और हमारी पूजा स्वीकार करे ।

अब बाए हाथमे कमल गट्टे रखे और दाएं हाथमे स्फटिक मालासे भगवती के इस मंत्र की 11 माला का जाप करे ।

मंत्र - ॐ ह्रीं महालक्ष्मये नमः

मंत्र जाप के बाद महालक्ष्मी स्तोत्र का पाठ करे :-

महालक्ष्मी कृपा प्रार्थना स्तोत्र

इन्द्र उवाच

नमस्तेऽस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते।
शंखचक्रगदाहस्ते महालक्ष्मी नमोऽस्तु ते।।1।।

नमस्ते गरुडारूढे कोलासुरभयंकरि।
सर्वपापहरे देवि महालक्ष्मी नमोऽस्तु ते।।2।।

सर्वज्ञे सर्ववरदे देवी सर्वदुष्टभयंकरि।
सर्वदु:खहरे देवि महालक्ष्मी नमोऽस्तु ते।।3।।

सिद्धिबुद्धिप्रदे देवि भुक्तिमुक्तिप्रदायिनि।
मन्त्रपूते सदा देवि महालक्ष्मी नमोऽस्तु ते।।4।।

आद्यन्तरहिते देवि आद्यशक्तिमहेश्वरि।
योगजे योगसम्भूते महालक्ष्मी नमोऽस्तु ते।।5।।

स्थूलसूक्ष्ममहारौद्रे महाशक्तिमहोदरे।
महापापहरे देवि महालक्ष्मी नमोऽस्तु ते।।6।।

पद्मासनस्थिते देवि परब्रह्मस्वरूपिणी।
परमेशि जगन्मातर्महालक्ष्मी नमोऽस्तु ते।।7।।

श्वेताम्बरधरे देवि नानालंकारभूषिते।
जगत्स्थिते जगन्मातर्महालक्ष्मी नमोऽस्तु ते।।8।।


एक माला मंत्र जाप शिवमंत्र की करे।

मंत्र :- ॐ ह्रीं नमः शिवाय

मंत्र जाप होने के बाद खड़े हो जाये और भगवती को दंडवत प्रणाम करे । बैठकर भगवती को सदैव हमारे निवासमे वास करे यह प्रार्थना करे । श्रीयंत्र ओर कमलगट्टे गुलाबी वस्त्रमे लपेट कर आपके घरके पूजा स्थानमे स्थापित करे और पूजा का बाकी सब सामान जलमे विसर्जित करदे । अब दिन या रातमे एकबार हरदिन श्रीयंत्र को कुम कूम तिलक करके मूल मंत्र की 10 माला का जाप करे । ये क्रम नित्य करते रहिए । स्फटिक माला हमेशा गौमुखी ने ही रखे ।

आपका ओर आपके परिवार जनो का पूरा जीवन ही बदल जायेगा । धन , धान्य , सुख , सम्पति , सुसन्तति , सुआरोग्य ओर यश कीर्ति के साथ जीव की मोक्षगति प्राप्त होती है l

10/06/2025

ऐश्वर्य कामना प्राप्ति पूजा
श्रीविद्या उपासना ( 14 )

भोग और मोक्ष कामना विधान

महाविद्या के मंत्र और पूजा विधान सिर्फ दीक्षित हुवे उपासको को ही दिए जाते है , पर हरेक धर्मपरेमिओ को भी महामाया त्रिपुरसुंदरी की उपासना का अधिकार है । जीवमात्र महात्रिपुर सुंदरी के ही संतान है । महामाया की ये श्रेष्ठ पूजा द्वारा हरकोई धन वैभव सुख सम्पति प्राप्त करे और जीव मोक्षगामी बने इस हेतु सर ये विधान दे रहे है । ये ये विधान उपासना हरकोई कर सकते है । हमारे ऋषिमुनियो ने अनेक अविष्कार किये और लोगो के कल्याण केलिए प्रसिद्ध कर दिए वही साधु का धर्म है ।

श्री विद्या साधना" भगवान श्री शिव जी की दूसरी प्रणाली एवं अर्धागनी कही जाती हैं.. "श्री विद्या साधना" 16 कलाओं से परिपूर्ण हैं! इसलिए इनका नाम श्री विद्या,त्रिपुर- सुंदरी,त्रिपुर- मालिनी या ‘षोडशी’ भी है। ये चार पायों से युक्त हैं जिनके नीचे ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर पाया बन जिस सिंहासन को अपने मस्तक पर विराजमान किए हैं उसके ऊपर सदा शिव लेटे हुए हैं और उनकी नाभी से एक कमल जो खिलता है, उस पर ये त्रिपुरा विराजमान हैं। सैकड़ों पूर्वजन्म के पुण्य प्रभाव और गुरु कृपा से इनका मंत्र मिल पाता है। किसी भी ग्रह, दोष, या कोई भी अशुभ प्रभाव इनके भक्त पर नहीं हो पाता।

श्रीयंत्र का पूजन सभी के वश की बात नहीं है। कालिका पुराण के अनुसार एक बार पार्वती जी ने भगवान शंकर से पूछा, ‘भगवन! आपके द्वारा वर्णित तंत्र शास्त्र की साधना से जीव के आधि-व्याधि, शोक संताप, दीनता-हीनता तो दूर हो जाएगी, किन्तु गर्भवास और मरण के असह्य दुख की निवृत्ति और मोक्ष पद की प्राप्ति का कोई सरल उपाय बताइए।’ तब पार्वती जी के अनुरोध पर भगवान शंकर ने त्रिपुर सुन्दरी श्रीविद्या साधना-प्रणाली को प्रकट किया। "भैरवयामल और शक्तिलहरी" में त्रिपुर सुन्दरी उपासना का विस्तृत वर्णन मिलता है। ऋषि दुर्वासा आपके परम आराधक थे। इनकी उपासना "श्री चक्र" में होती है। आदिगुरू शंकरचार्य ने भी अपने ग्रन्थ सौन्दर्यलहरी में त्रिपुर सुन्दरी श्रीविद्या की बड़ी सरस स्तुति की है। कहा जाता है भगवती त्रिपुर सुन्दरी के आशीर्वाद से साधक को भोग और मोक्ष दोनों सहज उपलब्ध हो जाते हैं।

शाम सुर्यास्त से एक घंटा पूजा घर में उत्तरमुखी होकर गुलाबी रंग के आसन पर बैठ जाएं। अपने सामने लकड़ी के पट्टे पर गुलाबी वस्त्र बिछाकर उस पर महात्रिपुर सुन्दरी का चित्र और श्री यंत्र को विराजमान करें। दाएं हाथ में जल लेकर संकल्प करें तत्पश्चात हाथ जोड़कर महात्रिपुर सुन्दरी का ध्यान करें।

ध्यानमंत्र : सा काली द्विविद्या प्रोक्ता श्यामा रक्ता प्रभेदत:। श्यामा तु दक्षिणा प्रोक्ता रक्ता श्री सुन्दरी मता।।

देवी महात्रिपुर सुन्दरी की विभिन्न प्रकार से पूजा करें। आटे से बना चौमुखी शुद्ध घी का दीपक जलाएं। देवी पर गुलाल चढ़ाएं। देवी पर गुलाब के फूल चढ़ाएं। खुशबूदार धूप जलाएं और इत्र अर्पित करें। काजू व मावे से बने मिष्ठान का भोग लगाएं। तत्पश्चात बाएं हाथ मे कमलगट्टे लेकर दाएं हाथ से स्फटिक की माला से देवी के इस अदभूत मंत्र का 11 माला का जाप करें।

मंत्र: ॐ ह्रीं महालक्ष्मये नमः

पूजा विधान :-

किसी भी शुक्रवार को सूर्यास्त समय स्नान करके उत्तर मुख आसन पर बैठे ।

1 आसन पूजा - भूमि को स्पर्श करते हुवे मनमे एक गायत्री मंत्र पढ़े ।
2 देह शुद्धि - दाएं हाथमे जल लेकर तीन आचमन करे । ॐ भु: स्वाहा
ॐ भुव: स्वाहा
ॐ स्व: स्वाहा
आचमन करके हाथ धो लीजिये

3 प्राणायाम - मूलमंत्र से ( यहां मूल मंत्र ॐ ह्रीं महालक्ष्मये नमः ) तीन प्राणायाम करे । नाक के दाएं छिद्र से एक मंत्र मनमे पढ़ते हुवे स्वास खिंचे । चार मंत्र मनमे पढ़े तबतक स्वास को रोके । फिर मनमे दो मंत्र पढ़ते पढ़ते नाक के बाएं छिद्र से स्वास छोड़े । अब उल्टा करे , नाक के बाएं छिद्र से मनमे एक मंत्र पढ़ते हुवे स्वास खिंचे । मनमे चार मंत्र पढ़े तबतक स्वास रोके । फिर नाक के दाएं छिद्र से मनमे दो मंत्र पढ़ते हुवे स्वास छोड़े । ये एक प्राणायाम हुवा ,ऐसे तीन प्राणायाम करे और हाथ धो ले ।

4 अब आंखे बंद करके गुरु गणपति ओर कुलदेवी का ध्यान करे ।

5 संकल्प - हाथमे जल की चमच भरे ओर महामाया की पूजा का संकल्प करे
में ( आपका नाम गोत्र ) अध्यदिने ( उसदिन की तिथि ) ( गांव शहर का नाम ) स्थिते महात्रिपुर सुंदरी महालक्ष्मी प्रीत्यर्थे यथामति अनुसार जप पूजा करिष्ये ।ऐसे संकल्प बोलकर जल भगवती के शरणमे छोड़े ।

5 स्थापन - बाजोठ ( लकड़ी की पाट ) पर गुलाबी वस्त्र बिछाए । हल्दी केशर मिश्रित अक्षत बाजठ पर रखे और उनपर त्रिपुरसुंदरी की एक फोटो तस्वीर स्थापित करे । ओर श्रीयंत्र अक्षत की ढगली पर स्थापित करे ।

6 आवाहन - आंखे बंद करके महामाया का ध्यान करे। ध्यान मंत्र पढ़े । और मनोमन भगवती को आवाहन करे ।

7 आसन :- हाथमे थोड़े अक्षत ओर फूल लेकर भगवती को आसन देने की भावना करे । फूल और अक्षत तस्वीर के पास छोड़े ।

8 प्रक्षाल - हाथमे जल का चमच रखे और महामाया के हाथ और चरण धोने के भाव करे और जल तस्वीर के पास छोड़े ।

9 आवर्तन :- हाथमे एक सुगंधित पुष्प ले और भगवती को अर्पण करें ।

10 स्नान - अभिषेक :- एक पात्रमे श्रीयंत्र को रखे और प्रथम जल से फिर पंचामृत से , इत्र ओर पुष्प से ओर फिर जलसे अभिषेक करें । मूल मंत्र का जाप करते हुवे अभिषेक करें । स्वच्छ वस्त्र से श्रीयंत्र को साफ करके फिरसे बाजठ पर स्थापन करे ।

11 वस्त्रांलंकार ;- चंदन ओर कूम कूम का श्रीयंत्र ओर तस्वीर को तिलक करें । और भगवती की तस्वीर पर गुलाबी वस्त्र अर्पण कर केशर मिश्र अक्षत धरे । गुलाब , चमेली , कनेर बिगैरे सुगन्दीत पुष्प ओर पुष्पमाला अर्पण करें।

12 धूप- दीप :- भगवती की दायी तरफ गाय के घी का ओर बायीं तरफ चमेली के तेल का दीपक जलाएं ओर सुगन्दीत धूप करे ।

13 नैवेद्य - प्रसाद :- गाय के दुग्धमे केशर साकर चावल से बनाई क्षीर , बेसनमें बनाई मिठाई ओर सुका मेवा का प्रसाद धरे । आंखे बंद करे और भगवती को प्रसाद ग्रहण करने की भावना करे और शुद्ध पात्रमे जल अर्पण करें ।

14 मुखवास : भगवती को फल अर्पण कर , इलाइची , लोंग वाला पान बीड़ा अर्पण करे ।

15 दक्षिणा :- यथाशक्ति दक्षिणा अर्पण करे ।

16 आरती :- आटे से बना चौमुखी दीपक जलाये ओर ध्वनिनाद सह भगवती की आरती उतारे । ओर पुष्पांजलि अर्पित करे ।

17 क्षमापना :- आंखे बंद करके भगवती से प्राथना करे कि मुज अबुध से आपकी पूजा अर्चना मे कोई क्षति हुई हो तो हमे क्षमा करें और हमारी पूजा स्वीकार करे ।

अब बाए हाथमे कमल गट्टे रखे और दाएं हाथमे स्फटिक मालासे भगवती के इस मंत्र की 11 माला का जाप करे ।

मंत्र - ॐ ह्रीं महालक्ष्मये नमः

मंत्र जाप के बाद महालक्ष्मी स्तोत्र का पाठ करे :-

महालक्ष्मी कृपा प्रार्थना स्तोत्र

इन्द्र उवाच

नमस्तेऽस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते।
शंखचक्रगदाहस्ते महालक्ष्मी नमोऽस्तु ते।।1।।

नमस्ते गरुडारूढे कोलासुरभयंकरि।
सर्वपापहरे देवि महालक्ष्मी नमोऽस्तु ते।।2।।

सर्वज्ञे सर्ववरदे देवी सर्वदुष्टभयंकरि।
सर्वदु:खहरे देवि महालक्ष्मी नमोऽस्तु ते।।3।।

सिद्धिबुद्धिप्रदे देवि भुक्तिमुक्तिप्रदायिनि।
मन्त्रपूते सदा देवि महालक्ष्मी नमोऽस्तु ते।।4।।

आद्यन्तरहिते देवि आद्यशक्तिमहेश्वरि।
योगजे योगसम्भूते महालक्ष्मी नमोऽस्तु ते।।5।।

स्थूलसूक्ष्ममहारौद्रे महाशक्तिमहोदरे।
महापापहरे देवि महालक्ष्मी नमोऽस्तु ते।।6।।

पद्मासनस्थिते देवि परब्रह्मस्वरूपिणी।
परमेशि जगन्मातर्महालक्ष्मी नमोऽस्तु ते।।7।।

श्वेताम्बरधरे देवि नानालंकारभूषिते।
जगत्स्थिते जगन्मातर्महालक्ष्मी नमोऽस्तु ते।।8।।


एक माला मंत्र जाप शिवमंत्र की करे।

मंत्र :- ॐ ह्रीं नमः शिवाय

मंत्र जाप होने के बाद खड़े हो जाये और भगवती को दंडवत प्रणाम करे । बैठकर भगवती को सदैव हमारे निवासमे वास करे यह प्रार्थना करे । श्रीयंत्र ओर कमलगट्टे गुलाबी वस्त्रमे लपेट कर आपके घरके पूजा स्थानमे स्थापित करे और पूजा का बाकी सब सामान जलमे विसर्जित करदे । अब दिन या रातमे एकबार हरदिन श्रीयंत्र को कुम कूम तिलक करके मूल मंत्र की 10 माला का जाप करे । ये क्रम नित्य करते रहिए । स्फटिक माला हमेशा गौमुखी ने ही रखे ।

आपका ओर आपके परिवार जनो का पूरा जीवन ही बदल जायेगा । धन , धान्य , सुख , सम्पति , सुसन्तति , सुआरोग्य ओर यश कीर्ति के साथ जीव की मोक्षगति प्राप्त होती है l

25/01/2025

गोविन्द दामोदर स्तोत्र
करार विन्दे न पदार विन्दम् ,मुखार विन्दे विनिवेश यन्तम् ।
वटस्य पत्रस्य पुटे शयानम् ,बालम् मुकुंदम् मनसा स्मरामि ॥ १ ॥

वट वृक्ष के पत्तो पर विश्राम करते हुए, कमल के समान कोमल पैरो को, कमल के समान हस्त से पकड़कर, अपने कमलरूपी मुख में धारण किया है, मैं उस बाल स्वरुप भगवान श्री कृष्ण को मन में धारण करता हूं॥ 1 ॥

श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारे,हे नाथ नारायण वासुदेव ।
जिह्वे पिबस्वामृतमेतदेव,गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ २ ॥

हे नाथ, मेरी जिह्वा सदैव केवल आपके विभिन्न नामो (कृष्ण, गोविन्द, दामोदर, माधव.) का अमृतमय रसपान करती रहे॥ 2 ॥

विक्रेतु कामा किल गोप कन्या,मुरारि – पदार्पित – चित्त – वृति ।
दध्यादिकम् मोहवशाद वोचद्,गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ३ ॥

गोपिकाएँ दूध, दही, माखन बेचने की इच्छा से घर से चली तो है, किन्तु उनका चित्त बालमुकुन्द (मुरारि) के चरणारविन्द में इस प्रकार समर्पित हो गया है कि, प्रेम वश अपनी सुध–बुध भूलकर “दही लो दही” के स्थान पर जोर–जोर से गोविन्द, दामोदर, माधव आदि पुकारने लगी है ॥ 3 ॥

गृहे गृहे गोप वधु कदम्बा,सर्वे मिलित्व समवाप्य योगम् ।
पुण्यानी नामानि पठन्ति नित्यम्,गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ४ ॥

घर–घर में गोपिकाएँ विभिन्न अवसरों पर एकत्र होकर, एक साथ मिलकर, सदैव इसी उत्तमोतम, पुण्यमय, श्री कृष्ण के नाम का स्मरण करती है, गोविन्द, दामोदर, माधव॥ 4 ॥

सुखम् शयाना निलये निजेपि,नामानि विष्णो प्रवदन्ति मर्त्याः ।
ते निश्चितम् तनमय – ताम व्रजन्ति,गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ५ ॥

साधारण मनुष्य अपने घर पर आराम करते हुए भी, भगवान श्री कृष्ण के इन नामो, गोविन्द, दामोदर, माधव का स्मरण करता है, वह निश्चित रूप से ही, भगवान के स्वरुप को प्राप्त होता है॥ 5 ॥

जिह्वे सदैवम् भज सुंदरानी, नामानि कृष्णस्य मनोहरानी ।
समस्त भक्तार्ति विनाशनानि,गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ६ ॥

है जिह्वा, तू भगवान श्री कृष्ण के सुन्दर और मनोहर इन्हीं नामो, गोविन्द, दामोदर, माधव का स्मरण कर, जो भक्तों की समस्त बाधाओं का नाश करने वाले हैं॥ 6 ॥

सुखावसाने इदमेव सारम्,दुःखावसाने इद्मेव गेयम् ।
देहावसाने इदमेव जाप्यं,गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ७ ॥

सुख के अन्त में यही सार है, दुःख के अन्त में यही गाने योग्य है, और शरीर का अन्त होने के समय यही जपने योग्य है, हे गोविन्द! हे दामोदर! हे माधव॥ 7 ॥

श्री कृष्ण राधावर गोकुलेश,गोपाल गोवर्धन – नाथ विष्णो ।
जिह्वे पिबस्वामृतमेतदेव,गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ८ ॥

हे जिह्वा तू इन्हीं अमृतमय नामों का रसपान कर, श्री कृष्ण ,अतिप्रिय राधारानी, गोकुल के स्वामी गोपाल, गोवर्धननाथ, श्री विष्णु, गोविन्द, दामोदर, और माधव॥ 8 ॥

जिह्वे रसज्ञे मधुर – प्रियात्वं,सत्यम हितम् त्वां परं वदामि ।
आवर्णयेता मधुराक्षराणि,गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ९ ॥

हे जिह्वा, तुझे विभिन्न प्रकार के मिष्ठान प्रिय है, जो कि स्वाद में भिन्न–भिन्न है। मैं तुझे एक परम् सत्य कहता हूँ, जो की तेरे परम हित में है। केवल प्रभु के इन्हीं मधुर (मीठे), अमृतमय नामों का रसास्वादन कर, गोविन्द, दामोदर, माधव॥ 9 ॥

त्वामेव याचे मम देहि जिह्वे,समागते दण्ड – धरे कृतान्ते ।
वक्तव्यमेवं मधुरं सुभक्त्या ,गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ १० ॥

हे जिह्वा, मेरी तुझसे यही प्रार्थना है, जब मेरा अंत समय आए, उस समय सम्पूर्ण समर्पण से इन्हीं मधुर नामों लेना, गोविन्द, दामोदर, माधव॥ 10 ॥

श्री नाथ विश्वेश्वर विश्व मूर्ते, श्री देवकी – नन्दन दैत्य – शत्रो ।
जिह्वे पिबस्वामृतमेतदेव,गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ११ ॥

हे प्रभु, सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के स्वामी, विश्व के स्वरुप, देवकी नन्दन, दैत्यों के शत्रु, मेरी जिह्वा सदैव आपके अमृतमय नामों गोविन्द, दामोदर, माधव का रसपान करती है॥ 11 ॥ पंडित चिरंजीवशास्त्री प्राचीन ज्योतिष केंद्र 70098 10722 श्री बाबा दयाराम मंदिर तपस्थानरामबाड़ा

गोविन्द दामोदर स्तोत्रकरार विन्दे न पदार विन्दम् ,मुखार विन्दे विनिवेश यन्तम् ।वटस्य पत्रस्य पुटे शयानम् ,बालम् मुकुंदम्...
25/01/2025

गोविन्द दामोदर स्तोत्र
करार विन्दे न पदार विन्दम् ,मुखार विन्दे विनिवेश यन्तम् ।
वटस्य पत्रस्य पुटे शयानम् ,बालम् मुकुंदम् मनसा स्मरामि ॥ १ ॥

वट वृक्ष के पत्तो पर विश्राम करते हुए, कमल के समान कोमल पैरो को, कमल के समान हस्त से पकड़कर, अपने कमलरूपी मुख में धारण किया है, मैं उस बाल स्वरुप भगवान श्री कृष्ण को मन में धारण करता हूं॥ 1 ॥

श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारे,हे नाथ नारायण वासुदेव ।
जिह्वे पिबस्वामृतमेतदेव,गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ २ ॥

हे नाथ, मेरी जिह्वा सदैव केवल आपके विभिन्न नामो (कृष्ण, गोविन्द, दामोदर, माधव.) का अमृतमय रसपान करती रहे॥ 2 ॥

विक्रेतु कामा किल गोप कन्या,मुरारि – पदार्पित – चित्त – वृति ।
दध्यादिकम् मोहवशाद वोचद्,गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ३ ॥

गोपिकाएँ दूध, दही, माखन बेचने की इच्छा से घर से चली तो है, किन्तु उनका चित्त बालमुकुन्द (मुरारि) के चरणारविन्द में इस प्रकार समर्पित हो गया है कि, प्रेम वश अपनी सुध–बुध भूलकर “दही लो दही” के स्थान पर जोर–जोर से गोविन्द, दामोदर, माधव आदि पुकारने लगी है ॥ 3 ॥

गृहे गृहे गोप वधु कदम्बा,सर्वे मिलित्व समवाप्य योगम् ।
पुण्यानी नामानि पठन्ति नित्यम्,गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ४ ॥

घर–घर में गोपिकाएँ विभिन्न अवसरों पर एकत्र होकर, एक साथ मिलकर, सदैव इसी उत्तमोतम, पुण्यमय, श्री कृष्ण के नाम का स्मरण करती है, गोविन्द, दामोदर, माधव॥ 4 ॥

सुखम् शयाना निलये निजेपि,नामानि विष्णो प्रवदन्ति मर्त्याः ।
ते निश्चितम् तनमय – ताम व्रजन्ति,गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ५ ॥

साधारण मनुष्य अपने घर पर आराम करते हुए भी, भगवान श्री कृष्ण के इन नामो, गोविन्द, दामोदर, माधव का स्मरण करता है, वह निश्चित रूप से ही, भगवान के स्वरुप को प्राप्त होता है॥ 5 ॥

जिह्वे सदैवम् भज सुंदरानी, नामानि कृष्णस्य मनोहरानी ।
समस्त भक्तार्ति विनाशनानि,गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ६ ॥

है जिह्वा, तू भगवान श्री कृष्ण के सुन्दर और मनोहर इन्हीं नामो, गोविन्द, दामोदर, माधव का स्मरण कर, जो भक्तों की समस्त बाधाओं का नाश करने वाले हैं॥ 6 ॥

सुखावसाने इदमेव सारम्,दुःखावसाने इद्मेव गेयम् ।
देहावसाने इदमेव जाप्यं,गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ७ ॥

सुख के अन्त में यही सार है, दुःख के अन्त में यही गाने योग्य है, और शरीर का अन्त होने के समय यही जपने योग्य है, हे गोविन्द! हे दामोदर! हे माधव॥ 7 ॥

श्री कृष्ण राधावर गोकुलेश,गोपाल गोवर्धन – नाथ विष्णो ।
जिह्वे पिबस्वामृतमेतदेव,गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ८ ॥

हे जिह्वा तू इन्हीं अमृतमय नामों का रसपान कर, श्री कृष्ण ,अतिप्रिय राधारानी, गोकुल के स्वामी गोपाल, गोवर्धननाथ, श्री विष्णु, गोविन्द, दामोदर, और माधव॥ 8 ॥

जिह्वे रसज्ञे मधुर – प्रियात्वं,सत्यम हितम् त्वां परं वदामि ।
आवर्णयेता मधुराक्षराणि,गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ९ ॥

हे जिह्वा, तुझे विभिन्न प्रकार के मिष्ठान प्रिय है, जो कि स्वाद में भिन्न–भिन्न है। मैं तुझे एक परम् सत्य कहता हूँ, जो की तेरे परम हित में है। केवल प्रभु के इन्हीं मधुर (मीठे), अमृतमय नामों का रसास्वादन कर, गोविन्द, दामोदर, माधव॥ 9 ॥

त्वामेव याचे मम देहि जिह्वे,समागते दण्ड – धरे कृतान्ते ।
वक्तव्यमेवं मधुरं सुभक्त्या ,गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ १० ॥

हे जिह्वा, मेरी तुझसे यही प्रार्थना है, जब मेरा अंत समय आए, उस समय सम्पूर्ण समर्पण से इन्हीं मधुर नामों लेना, गोविन्द, दामोदर, माधव॥ 10 ॥

श्री नाथ विश्वेश्वर विश्व मूर्ते, श्री देवकी – नन्दन दैत्य – शत्रो ।
जिह्वे पिबस्वामृतमेतदेव,गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ११ ॥

हे प्रभु, सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के स्वामी, विश्व के स्वरुप, देवकी नन्दन, दैत्यों के शत्रु, मेरी जिह्वा सदैव आपके अमृतमय नामों गोविन्द, दामोदर, माधव का रसपान करती है॥ 11 ॥ पंडित चिरंजीवशास्त्री प्राचीन ज्योतिष केंद्र 70098 10722 श्री बाबा दयाराम मंदिर तपस्थानरामबाड़ा

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🌹🙏 #महाविद्या  #उग्र  #तारा  #प्रत्यंगिरा  #कवचं-🌹🙏शत्रु समूह को विध्वंस करने वाला अति शक्ति शाली महाविद्या उग्र तारा कव...
17/01/2025

🌹🙏 #महाविद्या #उग्र #तारा #प्रत्यंगिरा #कवचं-🌹🙏

शत्रु समूह को विध्वंस करने वाला अति शक्ति शाली महाविद्या उग्र तारा कवचं की प्रशंसा जितनी कि जाए उतनी कम यू है,इसकी व्याख्या करना सूर्य को दीपक दिखाने के सामान है,जो साधक इसका नित्य पाठ करते हैं,उनके शत्रु स्वतः ही नष्ट हो जाते हैं,वह कारगर की हवा खाते हैं या नगर छोड़ के चले जाते हैं,वह साधक के सेवक बन जाते हैं,जीवन में आ रही प्रत्येक बाधाओं को नष्ट करने में यह कवच अति सक्षम है।यह कवच तन्त्र बाधा नाशक है,किसी भी तरह की नकारात्मक शक्ति साधक को छू नही सकती।

।। तारा प्रत्य़ञ्गिरा कवचम् ।।

।। ॐ प्रत्य़ञ्गिरायै नमः ।।
ईश्वर उवाच –
ॐ तारायाः स्तम्भिनी देवी मोहिनी क्षोभिनी तथा ।
हस्तिनी भ्रामिनी रौद्री संहारण्यापि तारिणी ।
शक्तयोहष्टौ क्रमादेता शत्रुपक्षे नियोजितः ।
धारिता साधकेन्द्रेण सर्वशत्रु निवारिणी ।
ॐ स्तम्भिनी स्त्रें स्त्रें मम शत्रुन् स्तम्भय स्तम्भय ।
ॐ क्षोभिनी स्त्रें स्त्रें मम शत्रुन् क्षोभय क्षोभय ।
ॐ मोहिनी स्त्रें स्त्रें मम शत्रुन् मोहय मोहय ।
ॐ जृम्भिनी स्त्रें स्त्रें मम शत्रुन् जृम्भय जृम्भय ।
ॐ भ्रामिनी स्त्रें स्त्रें मम शत्रुन् भ्रामय भ्रामय ।
ॐ रौद्री स्त्रें स्त्रें मम शत्रुन् सन्तापय सन्तापय ।
ॐ संहारिणी स्त्रें स्त्रें मम शत्रुन् संहारय संहारय ।
ॐ तारिणी स्त्रें स्त्रें सर्व्वपद्भ्यः सर्व्वभूतेभ्यः सर्व्वत्र रक्ष रक्ष मां स्वाहा ।।
य इमां धारयेत् विध्यां त्रिसन्ध्यं वापि यः पठेत् ।
स दुःखं दूरतस्त्यक्त्वा ह्यन्याच्छत्रुन् न संशयः ।
रणे राजकुले दुर्गे महाभये विपत्तिषु ।
विध्या प्रत्य़ञ्गिरा ह्येषा सर्व्वतो रक्षयेन्नरं ।।
अनया विध्या रक्षां कृत्वा यस्तु पठेत् सुधी ।
मन्त्राक्षरमपि ध्यायन् चिन्तयेत् नीलसरस्वतीं ।
अचिरे नैव तस्यासन् करस्था सर्व्वसिद्ध्यः
ॐ ह्रीं उग्रतारायै नीलसरस्वत्यै नमः ।।
इमं स्तवं धीयानो नित्यं धारयेन्नरः ।
सर्व्वतः सुखमाप्नोति सर्व्वत्रजयमाप्नुयात् ।
नक्कापि भयमाप्नोति सर्व्वत्रसुखमाप्नुयात् ।।
इति रूद्रयामले श्रीमदुग्रताराया प्रत्य़ञ्गिरा कवचम् समाप्तम् ।।

नोट-भगवती तारा अति उग्र देवी हैं,साधक को चाहिए कि वो ब्रम्हचर्य व संयम धारण कर इस कवच का पाठ किसी योग्य गुरु के परामर्श के पश्चात करे।
जय माँ तारिणी🙏❤️🙏 प्राचीन ज्योतिष केंद्र संपर्क का नंबर 70098 10722 व्हाट्सएप

30/03/2024
आर्थिक स्थिति से तंगी आ रहे हैं तो इस श्री सुक्तम को हिंदी संस्कृत दोनों में दिया गया है एक बार जरूर पढ़ें आपकी समस्या क...
30/03/2024

आर्थिक स्थिति से तंगी आ रहे हैं तो इस श्री सुक्तम को हिंदी संस्कृत दोनों में दिया गया है एक बार जरूर पढ़ें आपकी समस्या का हल निकल जाएगा

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