Vedic astrologer

Vedic astrologer Our aim is to improve those who are facing problems and betterment of humanity using divine science It is true that our mind and heart rule our actions.

But, it is not the complete truth as hidden ruler of our actions is heavenly bodies. It is surprising fact for those who are not aware about Vedic astrology horoscopes. Hindu astrology depicts the right position of planet in anyone's birth chart that is main reason behind all your actions and all the incidents of your life.Our aim is to improve those who are facing problems and betterment of human

ity using divine science of astrology.We are expert in Vedic astrology,Palmistry,Kundli making,Kundli matching.I hope your visit is enjoyable and beneficial.

20/01/2026
22/10/2020

कोई दुविधा न रखें। अष्टमी कल (शुक्रवार) ही है

01/01/2018

सभी पेज मेम्बर्स और आपके परिवार को नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं l

17/11/2017

🙏 प्रणाम का महत्व 🙏
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महाभारत का युद्ध चल रहा था -
एक दिन दुर्योधन के व्यंग्य से आहत होकर "भीष्म पितामह" घोषणा कर देते हैं कि -

"मैं कल पांडवों का वध कर दूँगा"

उनकी घोषणा का पता चलते ही पांडवों के शिविर में बेचैनी बढ़ गई -

भीष्म की क्षमताओं के बारे में सभी को पता था इसलिए सभी किसी अनिष्ट की आशंका से परेशान हो गए|

तब -

श्री कृष्ण ने द्रौपदी से कहा अभी मेरे साथ चलो -

श्री कृष्ण द्रौपदी को लेकर सीधे भीष्म पितामह के शिविर में पहुँच गए -

शिविर के बाहर खड़े होकर उन्होंने द्रोपदी से कहा कि - अन्दर जाकर पितामह को प्रणाम करो -

द्रौपदी ने अन्दर जाकर पितामह भीष्म को प्रणाम किया तो उन्होंने -
"अखंड सौभाग्यवती भव" का आशीर्वाद दे दिया , फिर उन्होंने द्रोपदी से पूछा कि !!

"वत्स, तुम इतनी रात में अकेली यहाँ कैसे आई हो, क्या तुमको श्री कृष्ण यहाँ लेकर आये है" ?

तब द्रोपदी ने कहा कि -

"हां और वे कक्ष के बाहर खड़े हैं" तब भीष्म भी कक्ष के बाहर आ गए और दोनों ने एक दूसरे से प्रणाम किया -

भीष्म ने कहा -

"मेरे एक वचन को मेरे ही दूसरे वचन से काट देने का काम श्री कृष्ण ही कर सकते है"

शिविर से वापस लौटते समय श्री कृष्ण ने द्रौपदी से कहा कि -

"तुम्हारे एक बार जाकर पितामह को प्रणाम करने से तुम्हारे पतियों को जीवनदान मिल गया है " -

" अगर तुम प्रतिदिन भीष्म, धृतराष्ट्र, द्रोणाचार्य, आदि को प्रणाम करती होती और दुर्योधन- दुःशासन, आदि की पत्नियां भी पांडवों को प्रणाम करती होंती, तो शायद इस युद्ध की नौबत ही न आती " -.....तात्पर्य्......

वर्तमान में हमारे घरों में जो इतनी समस्याए हैं उनका भी मूल कारण यही है कि -

"जाने अनजाने अक्सर घर के बड़ों की उपेक्षा हो जाती है "

" यदि घर के बच्चे और बहुएँ प्रतिदिन घर के सभी बड़ों को प्रणाम कर उनका आशीर्वाद लें तो, शायद किसी भी घर में कभी कोई क्लेश न हो "

बड़ों के दिए आशीर्वाद कवच की तरह काम करते हैं उनको कोई "अस्त्र-शस्त्र" नहीं भेद सकता -

"निवेदन 🙏 सभी इस संस्कृति को सुनिश्चित कर नियमबद्ध करें तो घर स्वर्ग बन जाय।"

क्योंकि:-

प्रणाम प्रेम है।
प्रणाम अनुशासन है।
प्रणाम शीतलता है।
प्रणाम आदर सिखाता है।
प्रणाम से सुविचार आते है।
प्रणाम झुकना सिखाता है।
प्रणाम क्रोध मिटाता है।
प्रणाम आँसू धो देता है।
प्रणाम अहंकार मिटाता है।
प्रणाम हमारी संस्कृति है।

🙏🙏🙏

🙏 सबको प्रणाम 🙏

01/08/2017

कुण्‍डली मिलान में नाड़ी दोष का महत्त्व
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विवाह के लिए कुण्डली और गुण मिलान करते समय नाड़ी दोष को नजर-अंदाज नहीं करना चाहिए।
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विवाह में वर-वधू के गुण मिलान में नाड़ी का सर्वाधिक महत्त्व को दिया गया है। 36 गुणों में से नाड़ी के लिए सर्वाधिक 8 गुण निर्धारित हैं। ज्योतिष की दृष्टि में तीन नाडियां होती हैं - आदि, मध्य और अन्त्य। *इन नाडियों का संबंध मानव की शारीरिक धातुओं से है।* वर-वधू की समान नाड़ी होने पर दोषपूर्ण माना जाता है तथा संतान पक्ष के लिए यह दोष हानिकारक हो सकता है।
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शास्त्रों में यह भी उल्लेख मिलता है कि: *★"नाड़ी दोष केवल ब्रह्मण वर्ग में ही मान्य है।"*
*★"समान नाड़ी होने पर पारस्परिक विकर्षण तथा असमान नाड़ी होने पर आकर्षण पैदा होता है।"* आयुर्वेद के सिद्धांतों में भी तीन नाड़ियाँ – वात (आदि ), पित्त (मध्य) तथा कफ (अन्त्य) होती हैं। शरीर में इन तीनों नाडियों के समन्वय के बिगड़ने से व्यक्ति रूग्ण हो सकता है।
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भारतीय ज्योतिष में नाड़ी का निर्धारण जन्म नक्षत्र से होता है। प्रत्येक नक्षत्र में चार चरण होते हैं।
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9-नौ नक्षत्रों की एक नाड़ी होती है।
जो इस प्रकार है।
〰〰〰〰〰〰〰〰〰★आदि नाड़ी👉 अश्विनी, आर्द्रा, पुनर्वसु, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, ज्येष्ठा, मूल, शतभिषा, पूर्व भाद्रपद ।
★मध्य नाड़ी👉 भरणी, मृगशिरा, पुष्य, पूर्वाफाल्गुनी, चित्रा, अनुराधा, पूर्वाषाढ़ा, धनिष्ठा और उत्तराभाद्रपद
★अन्त्य नाड़ी👉कृतिका, रोहिणी, आश्लेषा, मघा, स्वाति, विशाखा, उत्तराषाढ़ा, श्रवण तथा रेवती ।
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*नाड़ी के तीनों स्वरूपों आदि, मध्य और अन्त्य ..आदि नाड़ी ब्रह्मा विष्णु और महेश का प्रतिनिधित्व करती हैं। *यही नाड़ी मानव शरीर की संचरना की जीवन गति को आगे बढ़ाने का भी आधार है।*
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*सूर्य नाड़ी, चंद्र नाड़ी और ब्रह्म नाड़ी"* जिसे *इड़ा, पिंगला, सुषुम्णा के नाम से भी जानते हैं। कालपुरुष की कुंडली की संरचना बारह राशियों, सत्ताईस नक्षत्रों तथा योगो करणों आदि के द्वारा निर्मित इस *"शरीर में नाड़ी का स्थान सहस्रार चक्र के मार्ग पर होता है।" यह विज्ञान के लिए अब भी "पहेली"-बना हुआ है कि नाड़ी दोष वालों का ब्लड प्राय: ग्रुप एक ही होता है । और "ब्लड ग्रुप" एक होने से रोगों के "निदान, चिकित्सा, उपचार" आदि में समस्या आती हैं।*
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*★इड़ा, ★पिंगला, और ★सुसुम्णा* हमारे *★मन ★मस्तिष्क और ★सोच* का प्रतिनिधित्व करती है ।
*यही सोच और वंशवृद्धि का द्योतक "नाड़ी" हमारे दांपत्य जीवन का आधार स्तंभ है।* अत: नाड़ी दोष को आप गंभीरता से देखें। यदि एक नक्षत्र के एक ही चरण में वर कन्या का जन्म हुआ हो तो नाड़ी दोष का परिहार संभव नहीं है। और यदि परिहार है भी तो जन मानस के लिए असंभव है। ऐसा देवर्षि नारदने भी कहा है।

एक नाड़ी विवाहश्च गुणे:
सर्वें: समन्वित: l
वर्जनीभ: प्रयत्नेन
दंपत्योर्निधनं ll

अर्थात वर -कन्या की नाड़ी एक ही हो तो उस विवाह वर्जनीय है। भले ही उसमें सारे गुण हों, क्योंकि ऐसा करने से पति -पत्नी के स्वास्थ्य और जीवन के लिए संकट की आशंका उत्पन्न हो जाती है।
🌺
पुत्री का विवाह करना हो या पुत्र का, विवाह की सोचते ही *"कुण्‍डली मिलान की सोचते हैं जिससे सब कुछ ठीक रहे और विवाहोपरान्‍त सुखमय गृहस्‍थ जीवन व्‍यतीत हो. कुंडली मिलान के समय आठ कूट मिलाए जाते हैं, इन आठ कूटों के कुल अंक 36 होते हैं.* इन में से एक *..कूट नाड़ी होता है जिसके सर्वाधिक अंक 8 होते हैं.* लगभग *23% प्रतिशत इसी कूट के हिस्‍से में आते हैं, इसीलिए नाड़ी दोष प्रमुख है।*
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ऐसी लोक चर्चा है कि वर कन्या की नाड़ी एक हो तो पारि‍वारिक जीवन में अनेक बाधाएं आती हैं और संबंधों के टूटने की आशंका या भय मन में व्‍याप्‍त रहता है. *कहते हैं कि यह दोष हो तो संतान प्राप्ति में विलंब या कष्‍ट होता है, पति-पत्नी में परस्‍पर ईर्ष्या रहती है और दोनों में परस्‍पर वैचारिक मतभेद रहता है.*
नब्‍बे प्रतिशत लोगों का एकनाड़ी होने पर ब्लड ग्रुप समान और आर एच फैक्‍टर अलग होता है यानि एक का पॉजिटिव तो दूसरे का ऋण होता है. हो सकता है इसलिए भी संतान प्राप्ति में विलंब या कष्‍ट होता है।
🌺
चिकित्सा विज्ञान की आधुनिक शोधों में भी समान ब्लड ग्रुप वाले युवक युवतियों के संबंध को स्वास्थ्य की दृष्टि से अनपयुक्त पाया गया है। चिकित्सकों का मानना है कि यदि *लड़के का आरएच फैक्टर RH+ पॉजिटिव हो व लड़की का RH- आरएच फैक्टर निगेटिव हो तो विवाह उपरांत पैदा होने वाले बच्चों में अनेक विकृतियाँ सामने आती हैं, जिसके चलते वे मंदबुद्धि व अपंग तक पैदा हो सकते हैं।* वहीं *रिवर्स केस में इस प्रकार की समस्याएँ नहीं आतीं, इसलिए युवा अपना रक्तपरीक्षण अवश्य कराएँ, ताकि पता लग सके कि वर-कन्या का रक्त समूह क्या है।* चिकित्सा विज्ञान अपनी तरहसे इस दोष का परिहार करता है, लेकिन *"ज्योतिष" ने इस समस्या से बचने और उत्पन्न होने पर नाड़ी दोष के उपाय निश्चित किए हैं । इन उपायों में जप-तप, दान पुण्य, व्रत, अनुष्ठान आदि साधनात्मक उपचारों को अपनाने पर जोर दिया गया है ।*
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शास्त्र वचन यह है कि-
*एक ही नाड़ी होने पर*
*★"गुरु और शिष्य"*
*★"मंत्र और साधक"*,
*★"देवता और पूजक" में भी क्रमश: †ईर्ष्या, †अरिष्ट और †मृत्यु" जैसे कष्टों का भय रहता है l*

*🕉 देवर्षि नारद ने भी कहा है :-*

*★वर-कन्या की नाड़ी एक ही हो तो वह विवाह वर्जनीय है.* भले ही उसमें सारे गुण हों, क्योंकि ऐसा करने से तो पति-पत्नी के स्वास्थ्य और जीवनके लिए संकट की आशंका उत्पन्न हो जाती है ।

ll वेदोक्त श्लोक ll
〰〰〰〰〰
अश्विनी रौद्र आदित्यो,
अयर्मे हस्त ज्येष्ठयो l
निरिति वारूणी पूर्वा
आदि नाड़ी स्मृताः ll

भरणी सौम्य तिख्येभ्यो,
भग चित्रा अनुराधयो l
आपो च वासवो धान्य
मध्य नाड़ी स्मृताः ll

कृतिका रोहणी अश्लेषा,
मघा स्वाती विशाखयो।
विश्वे श्रवण रेवत्यो,
*अंत्य नाड़ी* स्मृताः॥
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*★आदि नाड़ी* के अंतर्गत नक्षत्र
क्रम: 01, 06, 07, 12, 13, 18, 19, 24, 25 वें नक्षत्र आते हैं।
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*★मध्य नाड़ी* के अंतर्गत नक्षत्र
क्रम : 02, 05, 08, 11, 14, 17, 20, 23, 26 नक्षत्र आते हैं।
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*★अन्त्य नाड़ी* के अंतर्गत क्रम : 03, 04, 09, 10, 15, 16, 21, 22, 27 वें नक्षत्र आते हैं ।
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*★‌‌‌ गण :-*
〰〰〰
अश्विनी मृग रेवत्यो,
हस्त: पुष्य पुनर्वसुः।
अनुराधा श्रुति स्वाती,
कथ्यते *देवता-गण* ॥

त्रिसः पूर्वाश्चोत्तराश्च,
तिसोऽप्या च रोहणी ।
भरणी च मनुष्याख्यो,
गणश्च कथितो बुधे ॥

कृतिका च मघाऽश्लेषा,
विशाखा शततारका ।
चित्रा ज्येष्ठा धनिष्ठा,
च मूलं रक्षोगणः स्मृतः॥

*देव गण- नक्षत्र :- 01, 05, 27, 13, 08, 07, 17, 22, 15*

*मनुष्य गण-नक्षत :- 11, 12, 20, 21, 25, 26, 06, 04.*

*राक्षस गण- नक्षत्र क्रम:- 03, 10, 09, 16, 24, 14, 18, 23, 19.*

*स्वगणे परमाप्रीतिर्मध्यमा देवमर्त्ययोः।
*मर्त्यराक्षसयोर्मृत्युः कलहो देव रक्षसोः॥

*"संगोत्रीय विवाह" को कराने के लिए कर्म कांडों में एक विधान है, जिसके चलते संगोत्रीय लड़के का दत्तक दान करके विवाह संभव हो सकता है ।*
🌺
इस विधान में जो माँ-बाप लड़के को गोद लेते हैं। विवाह में उन्हीं का नाम आता है।
🌺
*वहीं ज्योतिष के वैज्ञानिक पक्ष के अनुरूप यदि एक ही रक्त समूह वाले वर-कन्या का विवाह करा दिया जाता है तो उनकी होने वाली संतान विकलांग पैदा हो सकती है।*

*अत: नाड़ी दोष का विचार ही आवश्यक है.*
★एक नक्षत्र में जन्मे वर कन्या के मध्य नाड़ी दोष समाप्त हो जाता है लेकिन नक्षत्रों में चरण भेद आवश्यक है.
ऐसे अनेक सूत्र हैं जिनसे नाड़ी दोष का परिहार हो जाता है।

🔺जैसे दोनों की राशि एक हो लेकिन नक्षत्र अलग-अलग हों.
🔺वर-कन्या का नक्षत्र एक हो और चरण अलग-अलग हों.

*उदाहरण:-*
*वर-ईश्वर* (कृतिका द्वितीय),
*वधू-उमा* (कृतिका तृतीया)
*🔺दोनों की अंत्य नाड़ी है।* परंतु कृतिका नक्षत्र के चरण भिन्नता के कारण शुभ है।

*एक ही नक्षत्र हो परंतु चरण भिन्न हों:– यह निम्न नक्षत्रों में होगा l*

*★आदि नाड़ी*👉
*वर*- आर्द्रा, (मिथुन),
*वधू*- पुनर्वसु, प्रथम, तृतीय चरण (मिथुन),
*वर* उत्तरा फाल्गुनी (कन्या)- *वधू*- हस्त (कन्या राशि).

*★मध्य नाड़ी*👉 *वर*- शतभिषा (कुंभ)- *वधू*- पूर्वाभाद्रपद प्रथम, द्वितीय, तृतीय (कुंभ)

*अन्त्य नाड़ी👉*: *वर*- कृतिका- प्रथम, तृतीय, चतुर्थ (वृष)-
*वधू*- रोहिणी (वृष)

*★वर*- स्वाति (तुला)- *वधू*-विशाखा- प्रथम, द्वितीय, तृतीय (तुला)
*★वर*- उत्तराषाढ़ा- द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ (मकर)- *वधू*- श्रवण (मकर) —-

*एक नक्षत्र हो परंतु राशि भिन्न हो*
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जैसे *वर अनिल*- कृतिका- प्रथम (मेष) तथा *वधू इमरती*-
कृतिका- द्वितीय (वृष राशि)। दोनों की अन्त्य नाड़ी है परंतु राशि भिन्नता के कारण शुभ पाद-वेध नहीं होना चाहिए.
★वर-कन्‍या के नक्षत्र चरण "प्रथम और चतुर्थ" या
★"द्वितीय और तृतीय" नहीं होने चाहिएं.

*🔺उक्त परिहारों में यह ध्यान रखें कि वधू की जन्म राशि, नक्षत्र तथा नक्षत्र चरण, वर की राशि, नक्षत्र व चरण से पहले नहीं होने चाहिए।* "अन्यथा नाड़ी दोष परिहार होते हुए भी शुभ नहीं होगा ।"

*उदाहरण देखें :-*

1.★वर- कृतिका- प्रथम (मेष), वधू- कृतिका द्वितीय (वृष राशि)-

2.★शुभ वर- कृतिका- द्वितीय (वृष),
वधू-कृतिका- प्रथम (मेष राशि)- *अशुभ*

*🔺वैसे तो वर कन्या के राशियों के* *स्वामी आपस में मित्र हो तो ★वर्ण दोष, ★वर्ग दोष, ★तारा दोष, ★योनि दोष, ★गण दोष भी ...नष्ट हो जाता है.*

*🔺वर और कन्या की कुंडली में राशियों के स्वामी एक ही हो या मित्र हो* अथवा *D-9 नवांश के स्वामी परस्पर मित्र हो या एक ही हो तो सभी "कूट-दोष" समाप्त हो जाते हैं.*

*🔺नाड़ी दोष हो तो महामृत्युञ्जय मंत्र का जाप अवश्य करना चाहिए. इससे दांपत्य जीवन में आ रहे सारे दोष समाप्त हो जाते हैं.*

*नाड़ी दोष का उपचार:*
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*पीयूष धारा* के अनुसार स्वर्ण दान, गऊ दान, वस्त्र दान, अन्न दान, स्वर्ण की सर्पाकृति बनाकर प्राण प्रतिष्ठा तथा महामृत्युञ्जय जप करवाने से नाड़ी दोष शान्त हो जाता है।
🔺ज्योतिषशास्त्र के अनुसार अगर वर और कन्या की (१=१) राशि समान हो तो उनके बीच परस्पर मधुर सम्बन्ध रहता है.
🔺दोनों की राशियां एक दूसरे से (४×१०)चतुर्थ और दशम होने पर वर वधू का जीवन सुखमय होता है.
*🔺तृतीय और एकादश राशि होने पर (३×११) गृहस्थी में धन की कमी नहीं रहती है.*

*🔺ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि वर और कन्या की कुण्डली में षष्टम भाव, अष्टम भाव और द्वादश भाव में समान राशि नहीं हो।*

🔺वर और कन्याकी राशि अथवा लग्न समान होने पर गृहस्थी सुखमय रहती है परंतु गौर करने की बात यह है कि
🔺राशि अगर समान हो तो नक्षत्र भेद होना चाहिए ...अगर नक्षत्र भी समान हो तो चरण भेद आवश्यक है.
🔺अगर ऐसा नही है तो *राशि लग्न समान होने पर भी वैवाहिक जीवन के सुख में कमी आती है।*

*कुण्डली में दोष विचार*
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विवाहके लिए कुण्डली मिलान करते समय दोषों का भी विचार करना चाहिए.
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*कन्या की कुण्डली में*🔺वैधव्य योग , 🔺व्यभिचार योग, 🔺नि:संतान योग, 🔺मृत्यु योग एवं दारिद्र योग हो तो ज्योतिष की दृष्टि से सुखी वैवाहिक जीवन के यह शुभ नहीं होता है.
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इसी प्रकार वर की कुण्डली में 🔺अल्पायु योग, 🔺नपुंसक योग, 🔺🔺व्यभिचार योग, 🔺पागलपन योग एवं 🔺पत्नी नाश योग ..रहने पर गृहस्थ जीवन में सुख का अभाव होता है.
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ज्योतिष शास्त्र के अनुसार कन्या की कुण्डली में विष कन्या योग होने पर जीवन में सुख का अभाव रहता है.पति पत्नी के सम्बन्धों में मधुरता नहीं रहती है.
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हालाँकि कई स्थितियों में कुण्डली में यह दोष प्रभावशाली नहीं होता है अत: जन्म कुण्डली के अलावा नवमांश और चन्द्र कुण्डली से भी इसका विचार करके विवाह किया जा सकता है।





01/08/2017

राक्षस गण वाले जातकों की जीवन
प्रकृति में सकारात्मक और नकारात्मक ऊर्जा दोनों का समावेश होता है। मनुष्य के लिए अपने आसपास फैली ऊर्जा को महसूस कर पाना थोड़ा मुश्किल होता है लेकिन कुछ लोग इस प्रकार की ऊर्जा को महसूस करने और देखने की क्षमता रखते हैं।
मनुष्य के जन्म से संबंधित ‘राक्षस गण’ वाले जातक इसी श्रेणी में आते हैं। इनमें अपने आसपास की ऊर्जा को पहचानने और महसूस करने की शक्ति होती है। ये लोग अन्य मनुष्यों की तुलना में अपने आसपास की नकारात्मक ऊर्जा को जल्दी पहचान लेते हैं।
क्या है राक्षस गण
राक्षस गण के नाम से ही आभास होता है कि जरूर इससे कोई नकारात्मक शक्ति जुड़ी होगी लेकिन यह अवधारणा बिलकुल गलत है। ज्योतिष शास्त्र में मनुष्य को तीन गणों में बांटा गया है जिसके अंतर्गत देव गण, मनुष्य गण और राक्षस गण आते हैं।
देवगण में जन्म लेने वाला व्यक्ति उदार, बुद्धिमान, साहसी, अल्पाहारी और दान-पुण्य करने वाला होता है। मनुष्य गण में जन्म लेने वाला व्यक्ति अभिमानी, समृद्ध और धनुर्विद्या में निपुण होता है। राक्षस गण के बारे में लोगों का मानना है कि यह नकारात्मक गुणों से परिपूर्ण होता है किंतु यह सत्य नहीं है।
कैसे पहचानें गण को
मनुष्य के जन्म नक्षत्र अथवा जन्म कुंडली के आधार पर ही उसका गण निर्धारित किया जाता है। राक्षस गण में जन्म लेने वाले व्यक्ति की खासियत होती है कि वह अपने आसपास की नकारात्मक ऊर्जा को जल्द ही महसूस कर लेता है।
राक्षस गण वाले जातक के गुण
इस गण वाले जातकों में विलक्षण प्रतिभा होती है। ऐसे व्यक्ति की छठी इंद्रिय काफी शक्तिशाली और सक्रिय होती है। यह जातक मुश्किल परिस्थिति में भी धैर्य और साहस से काम लेते हैं।
मनुष्य गण तथा देव गण वाले लोग सामान्य होते हैं। जबकि राक्षस गण वाले जो लोग होते हैं उनमें एक नैसर्गिक गुण होता है कि यदि उनके आस-पास कोई नकरात्मक शक्ति है तो उन्हें तुरंत इसका अहसास हो जाता है। कई बार इन लोगों को यह शक्तियां दिखाई भी देती हैं, लेकिन इसी गण के प्रभाव से इनमें इतनी क्षमता भी आ जाती है कि वे इनसे जल्दी ही भयभीत नहीं होते। राक्षस गण वाले लोग साहसी भी होते हैं तथा विपरीत परिस्थिति में भी घबराते नहीं हैं।
इन नक्षत्रों में बनता है ‘राक्षस गण’
कृत्तिका
अश्लेषा
मघा
चित्रा
विशाखा
ज्येष्ठा
मूल
धनिष्ठा
शतभिषा

हर हर महादेव

20/07/2017

प्रेत श्राप और उसके उपाय

किसी व्यक्ति की कुंडली में यदि पंचम भाव में शनि तथा सूर्य हों और सप्तम भाव में कमजोर चंद्रमा स्थित हो तथा लग्न में राहु, बारहवें भाव में गुरु हो तब प्रेत श्राप के कारण वंश बढ़ने में समस्या आती है।

यदि कोई व्यक्ति अपने दिवंगत पितरों और अपने माता-पिता का श्राद्ध कर्म ठीक से नहीं करता हो या अपने जीवित बुजुर्गों का सम्मान नहीं कर रह हो तब इसी प्रेत बाधा के कारण वंश वृद्धि में बाधाएँ आ सकती हैं।

प्रेत श्राप के शांति उपाय

प्रेत शांति के लिए भगवान शिवजी का पूजन करवाने के बाद विधि-विधान से रुद्राभिषेक कराना चाहिए। ब्राह्मणों को अन्न, वस्त्र, फल, गोदान आदि उचित दक्षिणा सहित अपनी यथाशक्ति अनुसार देनी चाहिए। इससे प्रेत बाधा से राहत मिलती है।

गयाजी, हरिद्वार, प्रयाग आदि तीर्थ स्थानों पर स्नान तथा दानादि करने से लाभ और शुभ फलों की प्राप्ति होती
जय श्री राम जय श्री राम जय श्री राम

11/07/2017

महामृत्युंजय मंत्र के 33 अक्षर हैं जो महर्षि
वशिष्ठ के अनुसार 33 कोटि(प्रकार) देवताओं के द्योतक हैं
उन तैंतीस देवताओं में 8 वसु 11 रुद्र और 12 आदित्यठ 1 प्रजापति तथा 1 षटकार हैं।
इन तैंतीस कोटि देवताओं की सम्पूर्ण शक्तियाँ महामृत्युंजय मंत्र से निहीत होती है

मंत्र इस प्रकार है

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥
महामृत्युंजय मंत्र ( संस्कृत: महामृत्युंजय मंत्र

"मृत्यु को जीतने वाला महान मंत्र") जिसे त्रयंबकम मंत्र भी कहा जाता है, ऋग्वेद का एक श्लोक है।
यह त्रयंबक "त्रिनेत्रों वाला", रुद्र का विशेषण (जिसे बाद में शिव के साथ जोड़ा गया)को संबोधित है।
यह श्लोक यजुर्वेद में भी आता है।
गायत्री मंत्र के साथ यह समकालीन हिंदू धर्म का सबसे व्यापक रूप से जाना जाने वाला मंत्र है।
शिव को मृत्युंजय के रूप में समर्पित महान मंत्र ऋग्वेद में पाया जाता है।
इसे मृत्यु पर विजय पाने वाला महा मृत्युंजय मंत्र कहा जाता है।
इस मंत्र के कई नाम और रूप हैं।
इसे शिव के उग्र पहलू की ओर संकेत करते हुए रुद्र मंत्र कहा जाता है;
शिव के तीन आँखों की ओर इशारा करते हुए त्रयंबकम मंत्र और इसे कभी कभी मृत-संजीवनी
मंत्र के रूप में जाना जाता है क्योंकि यह कठोर तपस्या पूरी करने के बाद पुरातन ऋषि शुक्र को प्रदान की गई "जीवन बहाल" करने वाली विद्या
का एक घटक है।

ऋषि-मुनियों ने महा मृत्युंजय मंत्र को वेद का
ह्रदय कहा है।
चिंतन और ध्यान के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले अनेक मंत्रों में गायत्री मंत्र के साथ इस मंत्र का सर्वोच्च स्थान है।
महा मृत्युंजय मंत्र का अक्षरशः अर्थ
त्रयंबकम = त्रि-नेत्रों वाला (कर्मकारक)
यजामहे = हम पूजते हैं,सम्मान करते हैं,हमारे श्रद्देय
सुगंधिम= मीठी महक वाला, सुगंधित (कर्मकारक)
पुष्टि = एक सुपोषित स्थिति, फलने-फूलने वाली,समृद्ध जीवन की परिपूर्णता
वर्धनम = वह जो पोषण करता है,शक्ति देता है, (स्वास्थ्य,धन,सुख में) वृद्धिकारक;जो हर्षित करता है,आनन्दित करता है और स्वास्थ्य प्रदान करता है,
एक अच्छा माली
उर्वारुकम= ककड़ी (कर्मकारक)
इव= जैसे,इस तरह
बंधना= तना (लौकी का); ("तने से" पंचम विभक्ति - वास्तव में समाप्ति द से अधिक लंबी है जो संधि के माध्यम से न/अनुस्वार में परिवर्तित होती है)
मृत्युर = मृत्यु से
मुक्षिया = हमें स्वतंत्र करें, मुक्ति दें
मा= न
अमृतात= अमरता, मोक्

सरल अनुवाद
हम त्रि-नेत्रीय वास्तविकता का चिंतन करते हैं जो जीवन की मधुर परिपूर्णता को पोषित करता है और वृद्धि करता है।
ककड़ी की तरह हम इसके तने से अलग ("मुक्त") हों,अमरत्व से नहीं बल्कि मृत्यु से हों।

||महा मृत्‍युंजय मंत्र ||
ॐ हौं जूं सः ॐ भूर्भुवः स्वः ॐ त्र्यम्‍बकं
यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् उर्वारुकमिव
बन्‍धनान् मृत्‍योर्मुक्षीय मामृतात्
ॐ स्वः भुवः भूः ॐ सः जूं हौं ॐ !!
||महा मृत्‍युंजय मंत्र का अर्थ ||
''समस्‍त संसार के पालनहार,तीन नेत्र वाले शिव
की हम अराधना करते हैं।
विश्‍व में सुरभि फैलाने वाले भगवान शिव मृत्‍यु
न कि मोक्ष से हमें मुक्ति दिलाएं।''
महामृत्युंजय मंत्र के वर्णो (अक्षरों) का अर्थ महामृत्युंघजय मंत्र के वर्ण पद वाक्यक चरण
आधी ऋचा और सम्पुतर्ण ऋचा-इन छ: अंगों
के अलग-अलग अभिप्राय हैं।
ओम त्र्यंबकम् मंत्र के 33 अक्षर हैं जो महर्षि
वशिष्ठर के अनुसार 33 कोटि(प्रकार) देवताओं
के घोतक हैं।
उन तैंतीस देवताओं में 8 वसु 11 रुद्र और 12 आदित्यठ 1 प्रजापति तथा 1 षटकार हैं।
इन तैंतीस कोटि देवताओं की सम्पूर्ण शक्तियाँ महामृत्युंजय मंत्र से निहीत होती है जिससे महा महामृत्युंजय का पाठ करने वाला प्राणी दीर्घायु
तो प्राप्त करता ही हैं।
साथ ही वह नीरोग,ऐश्व‍र्य युक्ता धनवान भी होता है।
महामृत्युंरजय का पाठ करने वाला प्राणी हर दृष्टि से सुखी एवम समृध्दिशाली होता है।
भगवान शिव की अमृतमययी कृपा उस निरन्तंर बरसती रहती है।
त्रि – ध्रववसु प्राण का घोतक है जो सिर में
स्थित है।
यम – अध्ववरसु प्राण का घोतक है,जो मुख
में स्थित है।
ब – सोम वसु शक्ति का घोतक है,जो दक्षिण
कर्ण में स्थित है।
कम – जल वसु देवता का घोतक है,जो वाम
कर्ण में स्थित है।
य – वायु वसु का घोतक है,जो दक्षिण बाहु
में स्थित है।
जा अग्नि वसु का घोतक है,जो बाम बाहु
में स्थित है।
म – प्रत्युवष वसु शक्ति का घोतक है,
जो दक्षिण बाहु के मध्य में स्थित है।
हे – प्रयास वसु मणिबन्धत में स्थित है।
सु वीरभद्र रुद्र प्राण का बोधक है।
दक्षिण हस्त के अंगुलि के मुल में स्थित है।
ग शुम्भ् रुद्र का घोतक है दक्षिणहस्त्
अंगुलि के अग्र भाग में स्थित है।
न्धिम् गिरीश रुद्र शक्ति का मुल घोतक है।
बायें हाथ के मूल में स्थित है।
पु अजैक पात रुद्र शक्ति का घोतक है।
बाम हस्तह के मध्य भाग में स्थित है।
ष्टि – अहर्बुध्य्त् रुद्र का घोतक है,बाम हस्त
के मणिबन्धा में स्थित है।
व – पिनाकी रुद्र प्राण का घोतक है।
बायें हाथ की अंगुलि के मुल में स्थित है।
र्ध – भवानीश्वपर रुद्र का घोतक है,बाम हस्त
अंगुलि के अग्र भाग में स्थित है।
नम् – कपाली रुद्र का घोतक है।
उरु मूल में
स्थित है।
उ दिक्पति रुद्र का घोतक है।
यक्ष जानु में स्थित है।
र्वा – स्था णु रुद्र का घोतक है जो यक्ष
गुल्फ् में स्थित है।
रु – भर्ग रुद्र का घोतक है,जो चक्ष
पादांगुलि मूल में स्थित है।
क – धाता आदित्यद का घोतक है जो यक्ष पादांगुलियों के अग्र भाग में स्थित है।
मि – अर्यमा आदित्यद का घोतक है जो
वाम उरु मूल में स्थित है।
व – मित्र आदित्यद का घोतक है जो
वाम जानु में स्थित है।
ब – वरुणादित्या का बोधक है जो वाम
गुल्फा में स्थित है।
न्धा – अंशु आदित्यद का घोतक है।
वाम पादंगुलि के मुल में स्थित है।
नात् – भगादित्यअ का बोधक है।
वाम पैर की अंगुलियों के अग्रभाग में स्थित है।
मृ – विवस्व्न (सुर्य) का घोतक है जो दक्ष पार्श्वि
में स्थित है।
र्त्यो् – दन्दाददित्य् का बोधक है।
वाम पार्श्वि भाग में स्थित है।
मु – पूषादित्यं का बोधक है।
पृष्ठै भगा में स्थित है।
क्षी – पर्जन्य् आदित्यय का घोतक है।
नाभि स्थिल में स्थित है।
य – त्वणष्टान आदित्यध का बोधक है।
गुहय भाग में स्थित है।
मां – विष्णुय आदित्यय का घोतक है यह
शक्ति स्व्रुप दोनों भुजाओं में स्थित है।
मृ – प्रजापति का घोतक है जो कंठ भाग
में स्थित है।
तात् – अमित वषट्कार का घोतक है जो
हदय प्रदेश में स्थित है।
उपर वर्णन किये स्थानों पर उपरोक्तध देवता,
वसु आदित्य आदि अपनी सम्पुर्ण शक्तियों सहित विराजत हैं।
जो प्राणी श्रध्दा सहित महामृत्युजय मंत्र का पाठ करता है उसके शरीर के अंग – अंग (जहां के जो देवता या वसु अथवा आदित्यप हैं) उनकी रक्षा
होती है।
मंत्रगत पदों की शक्तियाँ जिस प्रकार मंत्रा में अलग अलग वर्णो (अक्षरों) की शक्तियाँ हैं। उसी प्रकार अलग – अल पदों की भी शक्तियाँ है।
त्र्यम्‍‍बकम् – त्रैलोक्यक शक्ति का बोध कराता है
जो सिर में स्थित है।
यजा सुगन्धात शक्ति का घोतक है जो ललाट में स्थित है।
महे माया शक्ति का द्योतक है जो कानों में स्थित है।
सुगन्धिम् – सुगन्धि शक्ति का द्योतक है जो नासिका (नाक) में स्थित है।
पुष्टि – पुरन्दिरी शकित का द्योतक है जो मुख में स्थित है।
वर्धनम – वंशकरी शक्ति का द्योतक है जो कंठ में स्थित है।
उर्वा – ऊर्ध्देक शक्ति का द्योतक है जो ह्रदय में स्थित है।
रुक – रुक्तदवती शक्ति का द्योतक है जो नाभि में स्थित है।
मिव रुक्मावती शक्ति का बोध कराता है जो कटि भाग में स्थित है।
बन्धानात् – बर्बरी शक्ति का द्योतक है जो गुह्य भाग में स्थित है।
मृत्यो: – मन्त्र्वती शक्ति का द्योतक है जो उरुव्दंय में स्थित है।
मुक्षीय – मुक्तिकरी शक्तिक का द्योतक है जो जानुव्दओय में स्थित है।
मा – माशकिक्तत सहित महाकालेश का बोधक है जो दोंनों जंघाओ में स्थित है।
अमृतात – अमृतवती शक्तिका द्योतक है जो पैरो के तलुओं में स्थित है।

महामृत्युजय प्रयोग के लाभ :-
कलौकलिमल ध्वंयस सर्वपाप हरं शिवम्।
येर्चयन्ति नरा नित्यं तेपिवन्द्या यथा शिवम्।।
स्वयं यजनित चद्देव मुत्तेमा स्द्गरात्मवजै:।
मध्यचमा ये भवेद मृत्यैतरधमा साधन क्रिया।।
देव पूजा विहीनो य: स नरा नरकं व्रजेत।
यदा कथंचिद् देवार्चा विधेया श्रध्दायान्वित।।
जन्मचतारात्र्यौ रगोन्मृदत्युतच्चैरव विनाशयेत्।
कलियुग में केवल शिवजी की पूजा फल देने
वाली है।
समस्त पापं एवं दु:ख भय शोक आदि का हरण
करने के लिए महामृत्युजय की विधि ही श्रेष्ठ है।
ॐ नमः शिवाय !
🌹जय श्री राम जय श्री राम जय श्री राम🌹

19/06/2017

*👉गायत्री मंत्र क्यों और कब ज़रूरी हैं*
☀सुबह उठते वक़्त 8 बार ❕✋✌👆❕अष्ट कर्मों को जीतने के लिए !!

🍚🍜 भोजन के समय 1 बार❕👆❕ अमृत समान भोजन प्राप्त होने के लिए !!

🚶 बाहर जाते समय 3 बार ❕✌👆❕समृद्धि सफलता और सिद्धि के लिए !!

👏 मन्दिर में 12 बार ❕👐✌❕
प्रभु के गुणों को याद करने के लिए !!

😢छींक आए तब गायत्री मंत्र उच्चारण ☝1 बार अमंगल दूर करने के लिए !!

सोते समय 🌙 7 बार ❕✋✌ ❕सात प्रकार के भय दूर करने के लिए !!

कृपया सभी बन्धुओं को प्रेषित करें 👏👏 !!!

*🙏ॐ भूर्भुवः स्वःतत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्यः धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्🙏*

यह मंत्र सूर्य देवता (सवितुर) के लिये प्रार्थना रूप से भी माना जाता है.

हे प्रभू! आप हमारे जीवन के दाता हैं आप हमारे दुख़ और दर्द का निवारण करने वाले हैं आप हमें सुख़ और शांति प्रदान करने वाले हैं
हे संसार के विधाता हमें शक्ति दो कि हम आपकी ऊर्जा से
शक्ति प्राप्त कर सकें
कृपा करके हमारी बुद्धि को सही रास्ता दिखायें

मंत्र के प्रत्येक शब्द की व्याख्या गायत्री मंत्र के पहले नौं शब्द प्रभु के गुणों की व्याख्या करते हैं

*ॐ = प्रणव*
*भूर = मनुष्य को प्राण प्रदाण करने वाले*
*भुवः = दुख़ों का नाश करने वाले*
*स्वः = सुख़ प्रदान करने वाले*
*तत = वह,*
*सवितुर = सूर्य की भांति उज्जवल*
*वरेण्यं = सबसे उत्तम*
*भर्गो = कर्मों का उद्धार करने वाले*
*देवस्य = प्रभू*
*धीमहि = आत्म चिंतन के* *योग्य (ध्यान)*
*धियो = बुद्धि,*
*यो = जो,*
*नः = हमारी,*
*प्रचोदयात् = हमें शक्तिदे*
🌹🌹🌹🌹🌹🌹

17/06/2017

शनि का जन्म के सूर्य से गोचर

जब कभी भी शनि का गोचर आपके जन्म समय के सूर्य के पास से होता है, तब यह समय अच्छा नही होगा...

खासकर वे लोग जो सरकारी नौकरी में जुड़े हुए है और उन्हें रिश्वतखोरी की आदत है, ऐसा गोचर उनको सजा देता है ...ऐसे समय मे उन्हें अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ता है और घर बैठना पड़ता है।
ऐसे समय मे उन्हें सावधान रहने की जरूरत है।

ईमानदार सरकारी कर्मचारी को भी इस गोचर समय मे समस्या होती है, उसे अनचाहा स्थान परिवर्तन (transfer) और तरक्की में बाधा आती है।

गैर सरकारी नौकरी या व्यवसाय वाले लोगो को भी यह समय परेशानी भरा होता है, उन्हें पूर्व में वाणिज्यिक करो (sales tax), आमदनी से जुड़ी गलत जानकारी देने (income tax) के कारण सरकारी तंत्र से प्रताड़ना (punishment notice) मिलते है।

और मेरे जैसे लोगो को ऐसे गोचर समय मे अपना नाम खराब होने की और खराब स्वास्थ्य से जुड़ी समस्या होती है।
कृपया ऐसे समय की गोचर दशा को हल्के में न ले।

Address

New Baldev Nagar
Jalandhar
144004

Opening Hours

Monday 11am - 2pm
4pm - 7pm
Tuesday 11am - 2pm
4pm - 7pm
Wednesday 11am - 2pm
4pm - 7pm
Thursday 11am - 2pm
4pm - 7pm
Friday 11am - 2pm
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Saturday 11am - 2pm
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Sunday 11am - 2pm
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