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04/11/2015
भाजपा एक बार फिर ३७० को हटाने की बात कह रही है .बार बार इस मुद्दे को उठाकर वह भोली-भाली जनता का बेवकूफ तो बना सकती है कि...
08/06/2015

भाजपा एक बार फिर ३७० को हटाने की बात कह रही है .बार बार इस मुद्दे को उठाकर वह भोली-भाली जनता का बेवकूफ तो बना सकती है किन्तु जो इस सम्बन्ध में जानकारी रखते हैं उनका बेवकूफ व् कैसे बना रही है यह समझ में नहीं आता .जम्मू कश्मीर को हमारे संविधान में अनुच्छेद ३७० द्वारा विशेष दर्जा दिया गया है और यह दर्जा भाजपा चाहकर भी ख़त्म नहीं कर सकती क्योंकि वास्तविकता यह है -
जिसके बारे में विकिपीडिया पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार स्थिति ये है -

Under Article 370(3), consent of state legislature and the constituent assembly of the state are also required to amend Article 370. Now the question arises, how can we amend Article 370 when the Constituent Assembly of the state no longer exists? Or whether it can be amended at all? Some jurists say it can be amended by an amendment Act under Article 368 of the Constitution and the amendment extended under Article 370(1). But it is still a mooted question .

अर्थात अनु .370 [3] के अनुसार -
-इस अनुच्छेद के पूर्वगामी उपबंधों में किसी बात के होते हुए भी ,राष्ट्रपति लोक अधिसूचना द्वारा घोषणा कर सकेगा कि यह अनुच्छेद प्रवर्तन में नहीं रहेगा या ऐसे अपवादों और उपानतरनो सहित ही और ऐसी तारीख से ,जो विनिर्दिष्ट करें ,प्रवर्तन में रहेगा .
परन्तु राष्ट्रपति द्वारा ऐसी अधिसूचना जारी किये जाने से पहले खंड[२] में निर्दिष्ट उस राज्य की संविधान सभा की सिफारिश आवश्यक होगी .और खंड [२] कहता है -
*[२] यदि खंड [१] के उपखंड [ख] के पैरा [२] में या उस खंड के उपखंड [घ] के दूसरे परन्तुक में निर्दिष्ट उस राज्य की सरकार की सहमति ,उस राज्य का संविधान बनाने के प्रयोजन के लिए संविधान सभा के बुलाये जाने से पहले दी जाये तो उसे ऐसी संविधान सभा के समक्ष ऐसे विनिश्चय के लिए रखा जायेगा जो वह उस पर करे .
और जहाँ तक वहां की संविधान सभा की बात है तो १ मई १९५१ को जम्मू कश्मीर के लिए पृथक संविधान सभा बनाने की उद्घोषणा युवराज कर्ण सिंह ने की जो ३१ अक्टूबर १९५१ को अस्तित्व में आई और 21 अगस्त 1952 को उसने युवराज कर्ण सिंह को सदर-ए- रियासत के रूप में निर्वाचित किया .इस प्रकार जम्मू-कश्मीर राज्य में राजाओं का शासन समाप्त हो गया और राज्य का प्रधान निर्वाचित व्यक्ति होने लगा .संविधान सभा के गठन के उपरांत ४० हज़ार की आबादी पर एक चुनाव क्षेत्र बना .७५ चुनाव क्षेत्रों से ७५ प्रतिनिधि आये इनमे ७३ पर शेख की नॅशनल कॉन्फ्रेंस निर्विरोध जीती तथा दो पर उसने चुनाव जीते २४ सीटें पाक अधिकृत कश्मीर के लिए सुरक्षित छोड़ी गयी जो अभी तक नहीं भरी जा सकी हैं .

एक देश में दो संविधान दो प्रधानमंत्री व् दो ध्वज को लेकर इसका विरोध भी किया गया किन्तु अनुच्छेद ३७० के अंतर्गत यह व्यवस्था थी और संविधान सभा चुनी हुई संस्था थी जो राज्य के लोगों की इच्छा को दर्शा रही थी परन्तु शेख अब्दुल्लाह ने अपने लोगों को ये बताया कि संविधान सभा सर्वोच्च संस्था है जो कि भारतीय संवैधानिक बाध्यताओं से स्वतंत्र है .शेख अब्दुल्लाह की ऐसी ही बयानबाजी व् अन्य गतिविधियों के कारण मई १९७१ में उन्हें राज्य से निष्कासित किया गया उसके बाद वे कभी विपक्ष में बोलते थे कभी पक्ष में .भारत और प्लैय्बिसित फ्रंट के प्रतिनिधियों के बीच बहुत सी वार्ताएं हुई और अंत में २४ फरवरी १९७५ को एक करार की घोषणा की गयी इस समझौते का शुद्ध राजनितिक परिणाम यह हुआ कि जनमत संग्रह की मांग को शेख अब्दुल्लाह और उनके अनुयायिओं ने त्याग दिया और यह तय किया गया कि जम्मू कश्मीर राज्य की भारतीय संविधान के अनुच्छेद ३७० के उपबंधों के अधीन विशेष स्थिति बनी रहेगी
और अब रही इसके लिए अनुच्छेद ३६८ के संशोधन की बात तो ये भी सहज नहीं कहा जा सकता क्योंकि इसके लिए विशेष बहुमत व् आधे से अधिक राज्यों का अनुसमर्थन आवश्यक है जो कि वर्तमान राजनीतिक विचारधारा के इन अनुयायिओं द्वारा जुटाया जाना नामुमकिन नहीं तो कठिन अवश्य कहा जा सकता है.

Ahead of alliance formation, the PDP had demanded that the BJP, which won 25 seats from the Hindu-majority Jammu region, should work towards restoring the original status of Article 370, which gives special status to the region.

और फिर जनता को यह दिखाना कि हम ऐसी चाहत रखते हैं यह भाजपा स्वयं ही झूठ के घेरे में ले जा चुकी है क्योंकि उसने जम्मू कश्मीर में सत्ता पाने के लिए पी.डी.पी.से गठबंधन किया जिसकी प्रमुखता ही अनुच्छेद ३७० है और यह मंशा पी.डी.पी. गठबंधन के समय ही दिखा चुकी है फिर बार बार संवैधानिक स्थिति और गठबंधन की सच्चाई को छिपाकर भाजपा जनता को बेवकूफ बनाने का अपना धर्म कब तक निभाती रहेगी ये समझ के परे हैं।

17/11/2014
14/11/2014

aapne prob. ko solve karne ka ek mouka instanst so solu ko de

डॉलर और रूपए पर बोलने वालो के लिए एक समाधान..
11/11/2014

डॉलर और रूपए पर बोलने वालो के लिए एक समाधान..

ये सलूशन उनके लिए जो बाल कटवाते समय भी ऊँगली करते रहते हैं।।।
07/11/2014

ये सलूशन उनके लिए जो बाल कटवाते समय भी ऊँगली करते रहते हैं।।।

हम स्वयं सर्वोत्तम वैज्ञानिक यंत्र है. हमारी चेतना, हमारा मन एवं हमारा शरीर। इनसे दुनिया का हर कार्य संभव है. सभी रिसर्च...
25/10/2014

हम स्वयं सर्वोत्तम वैज्ञानिक यंत्र है. हमारी चेतना, हमारा मन एवं हमारा शरीर। इनसे दुनिया का हर कार्य संभव है. सभी रिसर्च किये जा सकते हैं, ब्रह्माण्ड में कहीं भी जाया जा सकता है और कुछ भी जाना जा सकता है. यह सारी शक्तियाँ हम में हैं. पर उन्हें जागृत करना पड़ता है. जागृत करने के लिए विधियाँ हैं. Prescribed processes हैं. इन्हे technologies कहा जाता है जो योग के अंतर्गत आती हैं. इन technologies के सहारे हम वह सब कर जो कोई उपकरण, यंत्र या लेबोरेटरी करते हैं. Microcosm ( सूक्ष्मतम कण ) से लेकर Macrocosm ( बृहद्तम ब्रह्माण्डों) तक सबकुछ। जो अष्ट -सिद्धियाँ हैं वह भी इसीके अंतर्गत आती हैं.

१ अणिमा :- अपने को सूक्ष्म बना लेने की क्षमता
२ महिमा :- अपने को बड़ा बना लेने की क्षमता
३ लघिमा :- अपने को हल्का बना लेने की क्षमता
४ ईशित्व :- हर सत्ता को जान लेना और उस पर नियंत्रण करना
५ वशित्व:- जड़, चेतन, जीव-जन्तु, पदार्थ- प्रकृति, सभी को स्वयं के वश में करना
६ प्रकाम्य:- कोई भी रूप धारण कर लेने की क्षमता
७ प्राप्ति :- कुछ भी निर्माण कर लेने की क्षमता
८ अंतर्मितत्व:- किसी भी वस्तु या जीव के अंतर्तत्व तथा उसके स्वभाव को जान लेने की क्षमता

इनके अतिरिक्त भी बहुत कुछ है. ये ही वे तकनीकें ( technologies ) हैं जिनके जरिये आर्यों ने सृष्टि में पदार्थ, ऊर्जा और चेतना के समस्त वैज्ञानिक रहस्यों का ज्ञान हासिल किया है.
जीवन एवं विज्ञान की उन्नति के लिए इन्हे शिक्षा व्यवस्था ( Education System) में लागू करने की आवश्यकता है.

24/10/2014

थोडा बिजी होने के कारण आप सभी के समक्ष मैं नहीं प्रस्तुत हो पाया

इसलिए आप सभी को दीपावली की सपरिवार सुभकामना...

समानता का अधिकार संविधान की प्रमुख गारंटियों में से एक है। यह अनुच्छेद 14-16 में सन्निहित हैं जिसमें सामूहिक रूप से कानू...
16/10/2014

समानता का अधिकार संविधान की प्रमुख गारंटियों में से एक है। यह अनुच्छेद 14-16 में सन्निहित हैं जिसमें सामूहिक रूप से कानून के समक्ष समानता तथा गैर-भेदभाव के सामान्य सिद्धांत शामिल हैं, तथा अनुच्छेद 17-18 जो सामूहिक रूप से सामाजिक समानता के दर्शन को आगे बढ़ाते हैं। अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता की गारंटी देता है, इसके साथ ही भारत की सीमाओं के अंदर सभी व्यक्तियों को कानून का समान संरक्षण प्रदान करता है। इस में कानून के प्राधिकार की अधीनता सबके लिए समान है, साथ ही समान परिस्थितियों में सबके साथ समान व्यवहार। उत्तरवर्ती में राज्य वैध प्रयोजनों के लिए व्यक्तियों का वर्गीकरण कर सकता है, बशर्ते इसके लिए यथोचित आधार मौजूद हो, जिसका अर्थ है कि वर्गीकरण मनमाना न हो, वर्गीकरण किये जाने वाले लोगों में सुगम विभेदन की एक विधि पर आधारित हो, साथ ही वर्गीकरण के द्वारा प्राप्त किए जाने वाले प्रयोजन का तर्कसंगत संबंध होना आवश्यक है।

अनुच्छेद 15 केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्म स्थान, या इनमें से किसी के ही आधार पर भेदभाव पर रोक लगाता है। अंशतः या पूर्णतः राज्य के कोष से संचालित सार्वजनिक मनोरंजन स्थलों या सार्वजनिक रिसोर्ट में निशुल्क प्रवेश के संबंध में यह अधिकार राज्य के साथ-साथ निजी व्यक्तियों के खिलाफ भी प्रवर्तनीय है| हालांकि, राज्य को महिलाओं और बच्चों या अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति सहित सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों के नागरिकों के लिए विशेष प्रावधान बनाने से राज्य को रोका नहीं गया है। इस अपवाद का प्रावधान इसलिए किया गया है क्योंकि इसमें वर्णित वर्गो के लोग वंचित माने जाते हैं और उनको विशेष संरक्षण की आवस्यकता है। अनुच्छेद 16 सार्वजनिक रोजगार के संबंध में अवसर की समानता की गारंटी देता है और राज्य को किसी के भी खिलाफ केवल धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, वंश, जन्म स्थान या इनमें से किसी एक के आधार पर भेदभाव करने से रोकता है। किसी भी पिछड़े वर्ग के नागरिकों का सार्वजनिक सेवाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व सुनुश्चित करने के लिए उनके लाभार्थ सकारात्मक कार्रवाई के उपायों के कार्यान्वयन हेतु अपवाद बनाए जाते हैं, साथ ही किसी धार्मिक संस्थान के एक पद को उस धर्म का अनुसरण करने वाले व्यक्ति के लिए आरक्षित किया जाता है।

अस्पृश्यता की प्रथा को अनुच्छेद 17 के अंतर्गत एक दंडनीय अपराध घोषित कर किया गया है, इस उद्देश्य को आगे बढ़ाते हुए नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम 1955 संसद द्वारा अधिनियमित किया गया है। अनुच्छेद 18 राज्य को सैन्य या शैक्षणिक विशिष्टता को छोड़कर किसी को भी कोई पदवी दे्ने से रोकता है तथा कोई भी भारतीय नागरिक किसी विदेशी राज्य से कोई पदवी स्वीकार नहीं कर सकता। इस प्रकार, भारतीय कुलीन उपाधियों और अंग्रेजों द्वारा प्रदान की गई और अभिजात्य उपाधियों को समाप्त कर दिया गया है। हालांकि, भारत रत्न पुरस्कारों जैसे, भारतरत्न को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इस आधार पर मान्य घोषित किया गया है कि ये पुरस्कार मात्र अलंकरण हैं और प्रप्तकर्ता द्वारा पदवी के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

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