31/05/2026
नमन मंच
दिनांक:31/5/26
दैनिक सृजन
गजल: तुम्हारी यादों के घेरे से
तुम्हारी यादों के घेरे से, मैं जब भी दूर जाता हूं,
नजर कुछ भी नहीं आता, नजर में डूब जाता हूं।
जहां जाता हूं, हर चेहरे में तेरा अक्स दिखता है,
मैं खुद को ढूंढने निकलूं, तो तुझ में डूब जाता हूं।
ये कैसी कश्मकश है, कैसा ऐ दरिया -उल्फत है,
संभलना चाहता हूं, पर भंवर में डूब जाता हूं।
जमाने की दलीलों का असर मुझ पर नहीं होता,
वो जब आंखें झुकाती है, असर में डूब जाता हूं।
चरागो को बूझाकर रात भर रोता हूं कमरे में,
सुबह जब मुस्कुराती है, सहर में डूब जाता हूं।
पुकारे जब कोई मेरा नाम ही इस महफिल में,
मैं खोया रहता हूं, उस नाम-बर में डूब जाता हूं।
कोई दीवार, कोई छत, मुझे अपनी नहीं लगती,
मैं जब भी लौटता हूं, अपने घर में डूब जाता हूं।
वो बातें, वो मुलाकातें, वो हंसना-रूठना उसका,
खयालों की किसी गुमसुम डगर में डूब जाता हूं।
अम्बरीष चन्द्र पाठक
जौनपुर। यूपी
स्वरचित मौलिक